
सुरेंद्र किशोर-
बात तब की है जब मैं बिड़ला फाउंडेशन की जूरी का सदस्य हुआ करता था। नई दिल्ली स्थित हिन्दुस्तान टाइम्स भवन में फाउंडेशन का ऑफिस था। सालाना बैठक में शामिल होने के लिए मैं वहां जाया करता था। एक दफा सोचा कि जरा दैनिक हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक अजय उपाध्याय जी से मिल लूं। सिर्फ शिष्टाचार मुलाकात।
कोई प्रयोजन सोच कर नहीं गया था। यूं ही मिल लिया। अजय जी मुझे दैनिक ‘आज’ के दिनों से ही जानते थे। इसलिए गर्मजोशी से मिले। मुझसे उन्होंने पूछा कि आप दिल्ली में कहां रुके हुए हैं? मैं कहा–बिहार निवास में। उन्होंने कहा कि मैं कल सुबह आपसे वहां चाय पर मिल रहा हूं।
अगली सुबह अजय जी बिहार निवास पहुंच गये। उन्होंने बिना किसी भूमिका के सवाल किया–क्या आप जनसत्ता में ही रहिएगा? मैंने पूछा-ऐसा आप क्यों पूछ रहे हैं? उन्होंने कहा कि आप मेरे यहां ज्वाइन कीजिए।
मैंने उनसे कहा कि देखिए मैं नौ बजे रात में सो जाता हूं। प्रभाष जोशी जी ने मुझे इसकी छूट दे रखी है। पर, आपके यहां जो काम मुझे मिलेगा, उसमें रात में देर तक जागना पड़ेगा। मेरे साथ यही कठिनाई है।
अजय जी ने कहा कि तब कोई रास्ता निकालिए। मैंने कहा कि यदि आप मुझे राजनीतिक संपादक बना दें और 8 बजे रात तक मुझे घर जाने की इजाजत दे दें तो मैं सोचूंगा। इस पर वे सोच में पड़ गये। कहा कि मेरे यहाँ तो राजनीतिक संपादक का कोई पद ही नहीं है। फिर कहा कि मैं कुछ करता हूं। उन्होंने हिन्दी हिन्दुस्तान में राजनीतिक संपादक पद का सृजन करवाया। फिर मुझे ज्वाइन करवाया। इस काम में चार महीने लग गये थे। यह सन 2001 की बात है।
दरअसल अजय जी का मूल उद्देश्य पटना संस्करण का मुझे स्थानीय संपादक बनाना था। मैं उसके लिए तैयार नहीं था। प्रभाष जोशी का ऐसा ही ऑफर मैंने ठुकरा दिया था। मेरा मानना रहा है कि आप जिस पद को ठीक से संभाल नहीं सकते, उस पद को स्वीकार नहीं करना चाहिए। अपने इस निर्णय पर अंत तक मैं कायम रहा।
एक बार मैंने अजय जी को लिखा कि आप मुझे पटना संस्करण से हटा कर दिल्ली संस्करण से जोड़ दीजिए। वैसा तो वे न कर सके, पर मेरे एक मित्र से कहा कि सुरेंद्र जी भी गजब आदमी हैं। मैं उन्हें संपादक बनाना चाहता हूं और वे संवाददाता बनना चाहते हैं।
यह तो कुछ अपनी और उनकी बातें हुईं। अब मैं सिर्फ अजय जी पर आता हूं। उनका बड़प्पन देखिए। कुछ लोग अक्सर यह कहा करते हैं कि आपके पेशे में जातिवाद बहुत है। होगा। पर, अपने पूरे सेवाकाल में मेरा अनुभव अलग रहा। मैंने अजय जी से लेकर अनेक ब्राह्मण संपादकों व कुछ अन्य में जाति को लेकर उदारता व बड़प्पन देखे हैं। पत्रकारिता की जिन सात बड़ी हस्तियों ने समय -समय पर मुझे संपादक बनाना चाहा था, उनमें एक कायस्थ, चार ब्राह्मण और दो राजपूत थे।
इधर वर्षों से अजय उपाध्याय से न तो मेरी मुलाकात थी और न ही फोन पर बातचीत। पर, उनकी बीच -बीच में याद आती रही। सोचा था कि कभी दिल्ली जाऊंगा, (वैसे मैं अब दिल्ली जाता नहीं) तो खोजकर अजय जी के दर्शन जरूर करुंगा। हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया है कि जीवन में जो भी तुम्हें थोड़ी भी मदद करे तो उसे कभी नहीं भूलना। भले दूसरे तुम्हारा उपकार भूल जाएं। उसकी परवाह भी मत करना। यानी नेकी कर, दरिया में डाल!
इस अवसर पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर याद आते हैं जिन्होंने लिखा है- “पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, ‘जाति जाति’ का शोर मचाते केवल कायर क्रूर….”
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