वरिष्ठ पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी कहते हैं कि, “चुनौती देता हूँ कॉंग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा को कि इनके नेता भोले बाबा को ढोंगी या पाखंडी बाबा कह कर दिखायें तो जान जाऊँ, गिरफ़्तारी की माँग कर के दिखायें तो मान जाऊँ। ये पॉलिटिक्स है और ये पब्लिक है जो सब जानती है। आगे आने वाले दिनों में इसमें एक एससी-एसटी की धारा और बढ़ाई जाएगी, वह भी मुआवजा बढ़वाने के लिए। बाबा का कोई कुछ नहीं कर पाएगा, क्योंकि पश्चिमी यूपी के एक जात विशेष की नाराजगी का असर सत्ता व अन्य पार्टियों पर पड़ सकता है। इसलिए बाबा पर हाथ डालने से शबी बच रहे हैं। सीधी बात, बिना बकवास।”

महेंद्र अवधेश-
ऐसा सिर्फ हमारे देश में ही संभव है कि चोर, डकैत, उठाईगीर, भूमाफिया, दुष्कर्मी, हत्यारे अथवा हत्या के प्रयास के दोषी तत्व संत-महात्मा बनकर लोगों की अंधश्रद्धा का फायदा उठाकर उनकी जान के दुश्मन बन जाते हैं। यूपी के सिकंदराराऊ (हाथरस) की घटना इसका ताजा और एक छोटा-सा उदाहरण मात्र है। इधर हमारे यहां एक विचित्र स्थिति पैदा हुई है। वह यह कि जिसे देखो, वही परम् पिता परमात्मा से डायरेक्ट कनेक्शन का दावा करने में जुटा हुआ है। हाथरस वाले साकार विश्व हरि बाबा उर्फ भोले बाबा उर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस का बर्खास्त सिपाही सूरज पाल का भी तीन लोक के स्वामी भूतभावन आशुतोष उर्फ शिव-शंभू से हॉटलाइन कनेक्शन बताया जा रहा है।
सूरज पाल हाथरस में तकरीबन सवा सौ लोगों को इहलोक से मुक्ति दिलाकर परलोक के मार्ग पर प्रशस्त करने के बाद मैनपुरी स्थित अपने आश्रम में आराम फरमा रहा है। यही नहीं, वहां पहुंच कर उसने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताने वाला बयान जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट के नामी वकील एपी सिंह को अपना पैरोकार भी नियुक्त कर दिया है।
हमारे देश में हर दस में दो-तीन लोग गद्दी, आसन, दरबार लगाकर बैठे हैं। किसी के सिर पर श्री ब्रह्मदेव महाराज आ रहे हैं तो किसी के सिर पर पवनसुत हनुमान। किसी के सिर पर माता श्री दुर्गा आ रही हैं, तो किसी के सिर पर माता श्री काली सवार हैं। सवाल यहां सिर्फ इतना है कि जो लोग अपने सहोदरों, पट्टीदारों और पड़ोसियों के कभी साथी नहीं बने, दुःख-सुख और तरक्की में, वे जन कल्याण का ढोंग रच रहे हैं तथा समाज भी उन्हें बर्दाश्त कर रहा है, आखिर क्यों और कैसे? दोषी कौन? हाथरस जैसे हादसों को साफ तौर पर शासन-प्रशासन के निकम्मेपन का नतीजा माना जाना चाहिए। ऐसे कथित संतों और बाबाओं को फलने-फूलने का मौका वे सरकारी अधिकारी-कर्मचारी ही अधिक देते हैं, जो खुद आला दर्जे के पथभ्रष्ट होते हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को क्या कहा जाए, वे तो वोटों के सौदागर हैं। उन्हें आमजन की जान-माल की परवाह भला क्यों होने वाली? यह अपेक्षा तो सिर्फ और सिर्फ शासन-प्रशासन के जिम्मेदार लोगों से की सकती है, जिनके हाथों में व्यवस्था की बागडोर है।
विडम्बना देखिए, सूरजपाल जैसे धूर्त हादसे के बाद न सिर्फ सुरक्षित निकल भागने में कामयाब हो जाते हैं, बल्कि बड़ी ढिठाई के साथ मृतकों के परिजनों के प्रति सांत्वना जताने का बयान भी जारी कर देते हैं। उसके नवनियुक्त पैरोकार एपी सिंह वही वकील साहब हैं, जिन्होंने देश के बहुचर्चित निर्भया कांड में आरोपियों की पैरवी की थी और उन्हें फांसी की सजा से बचाने के लिए अंत तक तिकड़म दर तिकड़म भिड़ाते रहे। लेकिन, घटना के प्रति देशव्यापी आक्रोश और निर्भया के माता-पिता एवं उनकी बहादुर वकील सीमा कुशवाहा के जी-तोड़ प्रयासों ने अदालत को सच्चाई से भटकने नहीं दिया। अंततः चार नरपिशाचों को फांसी पर झूलना पड़ा।
बाद में यही एपी सिंह नोएडा निवासी एक युवक के कथित प्यार में फंसकर अपना पति छोड़कर बच्चों समेत चोरी-छिपे सरहद पार करके हिंदुस्तान आई पाकिस्तानी महिला सीमा हैदर के पैरोकार बने और अब साकार विश्व हरि भोले बाबा उर्फ सूरजपाल की पैरवी करते हुए देशवासियों को नजर आएंगे। खैर, यह उनकी पेशागत मजबूरी है, क्योंकि घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर लेगा, तो आखिर खाएगा क्या? हर घर में मिट्टी के चूल्हे हैं और सम्मानित अधिवक्ता समाज इसका अपवाद नहीं है। लेकिन, यह चिंता का एक बड़ा विषय जरूर है।
चैतन्य भट्ट-
उत्तर प्रदेश के हाथरस में नारायण साकार हरि नाम के बाबा के सत्संग में हुई भगदड़ में सवा सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हैं। हादसा गीली मिट्टी में बाबा जी के पांव छूने के लिए दौड़े लोगों को हटाकर बाबा के लिए रास्ता बना रहे सेवादारों के कारण हुआ। सत्संग जहां 80 हजार की अनुमति के बावजूद ढाई लाख से ज्यादा लोग पहुंचे थे, का अनुभव पलक झपकते त्रासदी में बदल गया। संवेदना जताने और पीड़ितों की मदद तो दूर बाबा फरार हो गया। किसी जमाने में सरकारी नौकरी के दौरान छेड़खानी जैसे मामले में निलंबन झेल चुका बाबा खुद को सुदर्शन चक्र धारी भगवान कृष्ण बताकर अधर्म के विनाश का दावा करता था।
धार्मिक आयोजनों में भगदड़ की ऐसी घटनाओं का अपना इतिहास है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2000 से 2013 तक की अवधि में ही इनमें लगभग 2,000 लोग मारे गए। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन द्वारा प्रकाशित अध्ययन बताता है कि भारत में 79 फीसदी भगदड़ धार्मिक सभाओं और आयोजनों के कारण होती हैं जिनके प्रमुख कारण हैं निकलने का संकरा रास्ता होना, क्षमता से अधिक लोगों की भीड़ पर नियंत्रण के उपायों का अभाव और खराब तरीके से चुना गया कार्यक्रम स्थल।
आयोजनों में भीड़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी आयोजकों और प्रशासन की मानी जाती है। ऐसे आय़ोजनों की अनुमति के प्रमुख आधार हैं: निकास की समुचित व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन के उपाय और आग जैसी संभावित आपदाओं से निपटने की व्यवस्था। मगर सब जानते हैं कि सारी कार्यवाही महज औपचारिकता है। सामान्यत: आयोजन छोटे मैदानों और यहां तक कि सड़कों तक को घेरकर आयोजित किए जाते हैं। अग्नि प्रबंधन तो छोड़िए, प्राथमिक चिकित्सा जैसी सुविधाएं तक नहीं रहतीं। भीड़ प्रबंधन गैर अनुभवी अप्रशिक्षित कार्यकर्ता संभालते हैं।
हादसों के शुरुआती ट्रिगर अफ़वाह फैलना, फिसल जाना. संकरी जगह में घबराए हुए लोगों का एक-दूसरे को धक्का देना जैसे कारण होते हैं। बुनियादी ढांचे की कमी से भीड़ का व्यवहार और भी खराब हो जाता है। घबराहट में हर दिमाग में यह अलार्म बजता है कि कोई खतरा है। लोग यह भी नहीं सोचते कि खतरा वास्तविक है या नहीं और क्या यह उन्हें प्रभावित करेगा? अपने और अपने परिवार के बारे में चिंतित हर व्यक्ति स्वार्थी हो जाता है और बाकी सभी को सिर्फ़ वस्तु और बाधा के रूप में देखता है। हादसों का शिकार ज्यादातर पारिवारिक धुरी का आधार महिलाएं बनती हैं। भागदौड़ में वह शारीरिक तौर पर उतनी मजबूत नहीं होतीं। साड़ी का सामान्य पहनावा भागने में रुकावट बनता है। घबराहट भी तुरंत बढ़ती है जो हृदयाघात और दम घुटने का कारण बनता है।
गहरी आस्थाओं वाले भारतीय हिन्दू समाज की धार्मिक गतिविधियां पहले धर्मस्थलों और तीर्थ यात्राओं तक सीमित थी। सत्संग और भजन कीर्तन जैसे समारोह मुख्यतः मंदिरों और प्रमुख धार्मिक त्यौहारों तक सीमित रहते थे। सहजता ऐसी थी कि रामलीला जैसी धार्मिक गतिविधियां भी मनोरंजन के दायरे में आती थीं। मगर पिछले बीस पच्चीस सालों में सहज धार्मिक गतिविधियों ने संगठित व्यावसायिक स्वरूप धारण कर लिया है। संत महात्माओं के रूप में खड़े हुए बाबा चमत्कार के नाम पर आवश्यक व्यवस्थाओं को ताक पर रखकर लाखों की भीड़ जुटाने लगते हैं जो ऐसे आयोजनों की टीआरपी है। हर बात को विशुद्ध वोट बैंक के आधार पर आंकने वाली राजनीति इसका फायदा उठाना चाहती है सो ज्यादा भीड़ जुटाने वाले बाबा महत्वपूर्ण हो जाते हैं और उनके आयोजनों को अनुमति देने के मामले में प्रक्रिया ताक पर रख दी जाती है। कुछ मामलों में तो ऐसे बाबा राजनीतिक दलों द्वारा समाज के वर्ग विशेष का वोट साधने के लिए बाकायदा प्रायोजित नजर आते हैं।
टैक्स फ्री सुविधा वाले इस विशुद्ध व्यावसायिक कर्मकांड से अचानक करोड़ पति बने लोकप्रियता के रथ पर सवार भगवान का गुण गाने वाले महात्मा खुद को भगवान मानने लगते हैं। स्वयं को सर्वज्ञ समझकर धार्मिक मान्यताओं के मनचाही व्याख्या की पृवृति इस हद तक पहुंच जाती हैं कि उनके और पारंपरिक संत समाज में टकराव की स्थितियां बनती हैं। राधारानी विवाद के बाद सीहोर के पं प्रदीप मिश्रा द्वारा संत संगठनों के दबाव में बरसाना जाकर नाक रगड़ कर माफी मांगने की घटना ताजा प्रमाण है।
हाथरस हादसे की जांच के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, जो खुद भी एक निर्विवाद पारंपरिक संत हैं, द्वारा सर्वकालीन तात्कालिक उपाय की तर्ज़ पर एस आई टी गठित हो गई है । बुल्डोजर बाहर निकलने की खबरें आ रही हैं । मगर स्व दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो “तफ़सील में जाने से ऐसा तो नहीं लगता, हालात के नक्शे में कुछ रद्दो बदल होगी” दीर्धकालीन उपायों की गंभीरता कहीं नहीं दिखती। अनुमति से अधिक भीड़ न जुटे और लोगों के निकास के समुचित रास्ते मौजूद हों, यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी थी। क्या इस चूक के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान स्थापित कर उनके खिलाफ भी कार्यवाही होगी?
पुलिस बल की कमी किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में अनुमति और व्यवस्थाओं पर तो नजर रखी जा सकती थी। लोगों की असावधानी पर ही सारा ठीकरा फोड़ना ठीक नहीं है। जरूरत है कि ऐसे आयोजनों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत कानून के माध्यम से लागू किए जाएं जिसमें आयोजकों समेत प्रशासकीय जिम्मेदारी भी निर्धारित हो। मगर जिस व्यवस्था में बाबाओं को उनकी भीड़ जुटाने की क्षमता देखकर राजनैतिक प्रश्रय और प्रशासकीय महत्व मिलता हो वहां ऐसी अपेक्षा ज्यादा सार्थक नहीं है। इसलिए उचित होगा कि सहज सीधा आम आदमी अपनी जान की जिम्मेदारी खुद ही संभाले।


