अमरेन्द्र राय-
सहारा छोड़े 20 साल हो गए। लेकिन उससे जुड़ी तमाम यादें साथ साथ चलती रहती हैं। मैं सहारा टीवी के संस्थापक सपादकों में से एक रहा हूं। अखबार से टीवी में जाने के कारण मेरा पद तो वहां बड़ा नहीं था लेकिन संस्थान ने मान सम्मान और प्रतिष्ठा बहुत दी। बाद में पद भी बड़ा हो गया।
मैं अपनी बड़ाई खुद नहीं करता, अपने कामों को बताना भी मुझे अच्छा नहीं लगता लेकिन सहारा टीवी के अपने दो योगदानों का यहां जरूर जिक्र करना चाहता हूं। मैं सहारा में तब से जुड़ा हूं जब सहारा का इंटरटेनमेंट टीवी चल रहा था। उसी पर न्यूज बुलेटिन लाने की तैयारी चल रही थी। आजकल स्टार टीवी की बहुत बड़ी हस्ती उदय शंकर तब सहारा टीवी में एक्जीक्यूटिव एडिटर थे। उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों में महारथ हासिल है। वही सारी स्क्रिप्ट फाइनल किया करते थे। लेकिन जल्दी ही उन्होंने फैसला लिया और कह दिया कि हिंदी की कॉपी अमरेंद्र से दिखवा लिया करो।
सहारा इंटरटेनमेंट पर बुलेटिन चलने के बाद न्यूज चैनल आया।
रीजनल चैनल के हेड प्रभात डबराल बनाए गए।नेशनल के अरूप घोष। मैं उत्तर प्रदेश चैनल का आउटपुट हेड बना। सारी तैयारियां हो चुकीं। ग्राफिक्स बन कर तैयार हो गए। लॉन्चिंग की डेट भी नजदीक आ गई। तभी उत्तर प्रदेश का बंटवारा हो गया। सहारा समय उत्तर प्रदेश का लोगो जो बना था उसमें ऊपर अशोक चक्र वाला चक्र था और नीचे लिखा था उत्तर प्रदेश। यूपी का बंटवारा होने के बाद उत्तराखंड अलग राज्य बन गया। अब समस्या आई कि लोगो का क्या किया जाए? इसमें उत्तराखंड कैसे शामिल किया जाए? नया बनाने की बात हुई। उस समय जॉन जीत सिंह अहलूवालिया ग्राफिक्स के हेड थे। उन्होंने साफ साफ कह दिया कि इसे नए सिरे से बनाने में बहुत वक्त लगेगा और चैनल के लॉन्चिंग तक यह तैयार नहीं हो पाएगा। मीटिंग में सब लोग परेशान।
मीटिंग में हेड प्रभात डबराल सहित सभी सीनियर लोग थे। एक से एक तकनीकी विशेषज्ञ भी थे। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था। मैं अपने आप को तब क्या आज भी तकनीकी व्यक्ति नहीं मानता। तब भी पत्रकार था, आज भी पत्रकार हूं। तब कोई दूसरा रीजनल चैनल भी नहीं था कि उसे देखकर आइडिया लिया जाए या उसी की कॉपी कर ली जाए। तब मैंने सुझाव दिया कि फ्लिक का इस्तेमाल किया जाए जिसमें एक बार उत्तर प्रदेश आए और घूमने पर उत्तराखंड। यह विचार सबको पसंद आया और जान ने भी स्वीकृति दे दी कि ऐसा करना संभव है क्योंकि इसमें कम समय लगेगा। ये हमारा सहारा न्यूज को पहला और बड़ा योगदान था। बाद में जब दूसरे रीजनल चैनल आए तो उन्होंने भी इसी को कॉपी किया।
चैनल आने के बाद सहारा श्री को लगा कि सम्मान देने के लिए सबके नाम के आगे श्री लगाया जाना चाहिए। उन्होंने इस बाबत लखनऊ से आदेश जारी कर दिया। रीजनल चैनल ने सहमत न होने के बावजूद उस आदेश को लागू कर दिया लेकिन नेशनल हेड अरूप घोष अड़ गए कि वो पहले सहारा श्री से बात करेंगे और अगर वो सहमत नहीं होंगे तो श्री लगाएंगे। नेशनल की आउट पुट एडिटर सीरीन थीं। इस पर सहारा श्री ने मीटिंग बुलाई।
इस बैठक में चैनल के सभी वरिष्ठ संपादकीय और प्रशासनिक लोग थे। सहारा श्री ने उनके आदेश के बावजूद नेशनल में श्री न लगाए जानने के बारे में पूछा। इस पर सीरीन ने अपना मत रखना शुरू किया। लेकिन सहारा श्री बिगड़ गए। उन्हें इस बात का बहुत बुरा लगा था कि उनके आदेश का पालन नहीं हुआ। अरूप घोष ने बीच में बोलना चाहा तो सहारा श्री ने उन्हें चुप करा दिया। मैंने देखा कि वहां मीटिंग में कोई कुछ नहीं बोल रहा। जबकि हम सब लोग नाम से पहले श्री लगाने के खिलाफ थे।
तब मैंने अपनी बात रखने की इजाजत मांगी। मैंने कहा सम्मान तो हम बिना श्री लगाए भी दे सकते हैं। वह जा रहा था कि बजाय अगर हम ये कहें कि वे जा रहे थे तो बिना श्री लगाए ही सम्मान मिल गया। और दूसरा कि श्री लगाने से कई जगह बहुत खराब लगेगा और रिदम भी टूटेगा। जैसे श्री मुलायम सिंह ने श्री अमर सिंह से कहा कि वे श्री जनेश्वर मिश्र के यहां जाकर कहें कि वे श्री शिवपाल सिंह को समझाएं। बात सहारा श्री की समझ में आ गई और उन्होंने श्री लगाने का विवेक हमलोगो पर छोड़ दिया। नतीजा ये निकला कि नेशनल ने कभी श्री नहीं लगाया और रीजनल ने भी धीरे धीरे छोड़ दिया। सहारा न्यूज को ये मेरा दूसरा महत्वपूर्ण योगदान था।
कल 20 साल बाद सहारा टीवी के दफ्तर गया। वहां अपने छोटे भाई अनिल राय इस समय पॉलिटिकल एडिटर हो गए हैं। उन्हीं के आमंत्रण पर गया था। अपने कार्यकाल के दौरान मैंने जिन लोगों को वहां नौकरी पर रखा, काम सिखाया वो अब वरिष्ठ हो गए हैं। जैसे ही मैं पहुंचा लोग पांव छूने लगे। मन भर आया। फोटो में मेरे दाहिने संजय मिश्र, उनके बगल में अजय मिश्र, उनकी बगल में उर्दू पत्रकार शरीफ साहब और बाकी साथी।


