यशवंत सिंह-
वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय जी के ख़िलाफ़ यूपी में मुक़दमा दर्ज किए जाने की मैं निंदा करता हूँ। अभिषेक जी को मैं निजी तौर पर जानता हूँ। इनका करियर बेदाग़ रहा है। किसी की एक चाय तक नहीं पी इस शख़्स ने। उनके विचार और उनके लिखे से असहमत हो सकते हैं हम आप। इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें सलाख़ों के पीछे करने की साज़िश की जाये।

सरकारों के ख़िलाफ़ आरोप लगते रहते हैं। आरोपों का जवाब देना चाहिए, न कि मुक़दमा लिखना चाहिए।
बड़े बड़े मसलों मुद्दों को किनारे कर एक वरिष्ठ पत्रकार से लड़ कर और एफ़आईआर दर्ज करा के उसे इतना अहमियत देना कैसी रणनीति है। अभिषेक ने ठाकुर अफ़सरों की लिस्ट दी तो आप ग़ैर-ठाकुर अफ़सरों की लिस्ट जारी कर देते। मामला ख़त्म था। फिर ये एफ़आईआर दर्ज कराने की बात कहाँ से आ गई?
लेखक भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं.
कुछ प्रतिक्रियाएँ-
अमरेन्द्र राय- सहमत। यह आरोप बहुत लोग लगाते हैं। अगर एक पत्रकार ने लगा भी दिया तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके खिलाफ एफआईआर कराई जाए। हो सकता है लिस्ट में कुछ नाम गलत भी चल गया हो। अगर ऐसा है तो भी इसकी शिकायत प्रेस काउंसिल या उचित जगह करनी चाहिए।
मनीष सिंह- चाय भले ही न पी हो मगर यह कई साल तक संघी टोले में शामिल रहे हैं, गांधी पर इनकी लिखी शर्मनाक पोस्टें एकदम से याद आ गई।
यशवंत सिंह- आपकी बात सही मान भी लें तो क्या संघी टोले में शामिल होना और गांधी की आलोचना लिखना अपराध है? फिर तो सारे संघ बीजेपी के सत्ताधारी नेताओं के ख़िलाफ़ मुक़दमा लिखाया जाये, अकेले अभिषेक के ख़िलाफ़ ही क्यों?
मनीष सिंह- भैया आलोचना तो सभी करते हैं,पर यह गांधी वही था जो लिखकर पोस्ट शुरू कौन करता है, खैर आज विरोध में लिख रहे हैं, क्या कहा जा सकता है,
यशवंत सिंह- मैंने मूल पोस्ट में लिखा है कि हम अभिषेक के विचार से लेखन से असहमत हो सकते हैं। लेकिन इस बिना पर एफ़आईआर तो दर्ज नहीं कराया जा सकता। ख़ुद गांधी जी होते तो अपने आलोचकों पर मुक़दमा लिखने की बजाय उन्हें माफ़ करने की बात कहते।
हरेंद्र मोरल- भैया समस्या ये ही है कि ऐसे लोग सत्ता से सटने के चक्कर में बहुत आगे तक बढ़ जाते हैं लेकिन वहाँ पहुँचकर एहसास होता है कि सरकारें किसी के नहीं होती।
मनोज भावुक- अभिषेक की रूस-यूक्रेन कहानी मैं भोजपुरी जंक्शन के रूस-यूक्रेन विशेषांक में छाप चुका हूँ। सुलझे हुए पत्रकार व दिलेर इंसान हैं। उनके साथ गलत नहीं होना चाहिए।
सुधीर सिंह- इन्होंने तमाम फर्जी आंकड़े दिए है। आजमगढ़ कमिश्नर को ठाकुर बताया है जबकि वो ठाकुर नहीं हैं। मुजफ्फरनगर के एसपी अभिषेक यादव को ठाकुर बताया है जो यादव हैं। मऊ एसपी रहे हैं। इनको व्यक्तिगत जानता हूँ। ऐसे तमाम फर्जी डाटा दिए है । एक पत्रकार से फर्जी डाटा की उम्मीद नहीं है।
श्याम मीरा सिंह- पत्रकार मंदीप पुनिया पर हुई FIR और जेल को इस आदमी ने जस्टिफ़ाई ठहराया। इसने आज़म ख़ान पर हुई राजनीतिक कार्रवाई के वक्त कहा कि- “आज़म ख़ान रो क्यों रहे हैं? योगी ने कार्रवाई की है क्या?”, ये संवेदनशील मुस्लिम महिला आरजे सायमा को जिहादी लिखता है- “जिहादी”। मुस्लिम पत्रकारों को तालिबानी कहता है। बुलडोज़र को न्याय कहता है। जब ये उस सिस्टम को बनाने में भागीदारी रहा है तो उसका प्रसाद इसे ही मिल गया तो कोई बड़ी आफ़त नहीं है। इस पर जो धाराएँ हैं वे ऐसी हैं कि घर पर बैठे ज़मानत हो जाएगी। उसने आज़म ख़ान को बोला कि- रो क्यों रहे हो। इस दलाल से मैं भी कहना चाहता हूँ- रो क्यों रहे हो?
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव– साल 2007 – 08 में दिल्ली के हिंदुस्तान अखबार में काम करने के दौरान, पहले तो भड़ास ब्लॉग और फिर Bhadas4media पढ़ने का चस्का मुझे इसलिए लगा था क्योंकि इसके कर्ता धर्ता Yashwant Singh मीडिया की हर अंदरूनी खबर को बिना किसी हील हुज्जत के बाहर ले आते हैं।
भड़ास पढ़कर ही मुझे यह पता चल पाया है कि सामान्य जाति वर्ग के पत्रकार और बुद्धिजीवी खेमे में आजकल योगी आदित्यनाथ सरकार को लेकर एक नई ही घमासान शुरू हो गई है।
हाल ही में खबर आई थी कि एक ब्राह्मण टीवी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने यूपी में योगी राज में घनघोर ठाकुरवाद पर पीड़ा जताई और आरोप है कि खफा सरकारी तंत्र की शह पर पत्रकार पर मुकदमा दर्ज हो गया। इस पर भड़ास के मंच पर एक ठाकुर महोदय शीतल पी सिंह ने भी पीड़ा जताई कि न जाने कब से ब्राह्मण और कायस्थ सारी सरकारी मलाई खा रहे थे लेकिन हाल के दशकों में ठाकुर भी इस मलाई में हिस्सा लेने लगे तो पत्रकार महोदय को कष्ट हो रहा है। उनका कहना था कि ठाकुरवाद का आरोप लगाने से पहले पत्रकार महोदय को अपनी बिरादरी यानी ब्राह्मणों की संख्या का भी जिक्र करना चाहिए।
मुझे तो यही समझ आया कि शीतल जी की मूल पीड़ा यही है, भले ही उन्होंने बाद में पिछड़ा दलित आदिवासी आदि वर्गों के साथ हो रहे अन्याय पर ही ज्यादा शब्द लिख दिए हैं। उन्होंने मीडिया में भी सवर्ण वर्चस्व पर चिंता जताई है लेकिन लेख एक ब्राह्मण के इस तरह ठाकुरराज पर जातिवाद की तोहमत लगाने की पीड़ा को ही ज्यादा अभिव्यक्त कर रहा है। शायद न करता अगर लेखक की जाति कोई और होती।
बहरहाल, मीडिया में सामान्य जाति का दबदबा है, यह तो सही ही है लेकिन दलित आदिवासी पिछड़ा आदि को योगी राज में क्या मिल रहा है, इसकी चिंता से ज्यादा बड़ी चिंता और खासी बड़ी बहस पर अब इसी पर होनी चाहिए कि सामान्य जाति वर्ग में मलाई कौन ज्यादा खा रहा है। हिंदू राज में हमेशा ही इसी पर बहस होती आई है। देश अभी भले ही हिंदू राष्ट्र न घोषित हुआ हो लेकिन यूपी में योगी जी के राज में इसकी नेट प्रैक्टिस यूं ही चलती रहनी चाहिए।
मेरा तो सुझाव है कि कोई पत्रकारिता से जुड़ा हो या न जुड़ा हो, मीडिया और बुद्धिजीवी खेमे की गंध अगर उसे भी देखनी – समझनी हो तो भड़ास 4 मीडिया उसे भी जरूर पढ़ना चाहिए।
राज दरबार में मलाई बंटवारे को लेकर ब्राह्मण पत्रकार की पीड़ा, इस पर आइना देखने की ठाकुर साहब की सलाह और राज दरबार में हो रही हलचल या उस पर लग रहे आरोप, सभी मसालों के मिश्रण के साथ यहां भड़ास 4 मीडिया में भरपूर मनोरंजन मिलने की पूरी गारंटी है। मुझे तो लगता है कि यह बहस अभी और दिलचस्प होने वाली है।
कोई और न उतरा तो मैं खुद भी पिछड़ा दलित आदिवासी को लेकर चिंता जताते हुए बीच में कहीं दो चार लाइन में धीमे से यह पीड़ा तो व्यक्त कर ही सकता हूं कि आजादी से पहले और बाद में भी दशकों तक लगभग 60 प्रतिशत सरकारी मलाई अकेले ही चट कर जाने वाले कायस्थ अब सरकारी नौकरियों में दहाई अंक में भी अपना प्रतिशत नहीं जुटा पा रहे हैं। ठाकुरवाद, ब्राह्मणवाद, भूमिहारवाद आदि ने मिलकर उन्हें हाशिए पर ढकेल दिया है।
मूल ख़बर-
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Hp singh
September 22, 2024 at 6:38 am
21 वी सदी के इस लोकतत्रिक देश मै हर बात जाति पर ही शुरू होती है। जाति के आधार पर शिक्षा मिलेगी, संस्थान मैं प्रवेश मिलेगा, आयोग और बोर्ड बनेंगे, जाति के आधार पर सरकारी नोकरी मिलेगी, सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा, सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलेगा, जाति के आधार पर कानून बनेगा (ScSt एक्ट), जाति के आधार पर नेता,dr, Eng, अधिकारी सब जाति के आधार पर ही बनेंगे, जो योग्यता से बनेंगे उनकी जाति धूड़ी जाएगी। जाति के आधार पर मीडिया खबरों को दिखाता है। जिस देश मै मुख्य मंत्री के पद पर बैठने वाला अपराधियों मैं जाति ढूंढता नजर आ रहा है। आज 76 साल से आरक्षण ने पुरे देश का तंत्र अपंग बना दिया है। फिर भी शान्ति नहीं लौटी।
विकास श्रीवास्तव
September 22, 2024 at 10:53 am
यशवंत सिंह भी निष्पक्ष नहीं रहे। मैने काफी पहले एक संपादक के खिलाफ तथ्यों सहित पोस्ट दी थी पर इनकी दोस्ती आड़े आ गई। मेरे एक पत्रकार मित्र ने भी यही बात कही थी। मसला यह है कि कोई भी हो हर बात को अपने चश्मे से देखता है।
रवींद्र सिंह राठौर
September 22, 2024 at 11:05 am
कुछ लोगो को जातिगत आरोप लगाने में बड़ा मजा आता है विशेषकर उनकी जाति का न हो। अगर उनसे कहा जाए की पत्रकारिता में जातिवाद कितनी हावी है उसका खुलासा करे तो नानी याद आने लगती है। वैसे हमारा मत है कि जिस दिन प्रेस मीडिया में आरक्षण लागू हो जायेगा। उस दिन समस्या कहने वालो की बहुत कुछ खत्म हो जाएगी।
अभिनंदन
September 22, 2024 at 10:10 pm
इतना हंगामा क्यों है, न्यायिक प्रक्रिया को फेस करें ख़ुद तो सबको यही सलाह देते हैं ना ? पत्रकार की आड़ में न्यूज़ के स्थान पर व्यूज परोसने वाले पर कार्यवाही होने पर दर्द कैसा और क्यों ? सब पर कुछ भी बक देना ये कैसी आज़ादी है “विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर”
एक नं का घटिया व्यक्ति है
पंडित अनुपम दुबे
October 24, 2024 at 3:05 pm
पत्रकारिता वो आईना है जिसमें समाज का हर तबका निष्पक्ष रूप से देखता है और रही जाति पाति की बात तो यह सिर्फ और सिर्फ हिन्दुस्तान में ही चलती है कभी किसी राष्ट्र में जाकर देखो सभी राष्ट्र के लिए खड़े होते हैं।
हम अपने गिरेबान में झांक कर देखें कि कितने अच्छे हैं तब किसी दूसरे पर उगुली उठाएं।