
संजय कुमार सिंह
भारत पर कनाडा के आरोप, जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई की बढ़ती ताकत का राज कल तक गंभीर मुद्दा था। अब महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव घोषित हो चुके हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री तय हो चुके हैं और भाजपा आलाकमान अपने फैसले को लागू करने में कामयाब हुआ है। ऐसे में आज एक अखबार की लीड का शीर्षक है, “पाक को खरी-खरी” (नवोदय टाइम्स)। आतंकवाद क्षेत्रीय सहयोग के लिए खतरा एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान जरूरी (अमर उजाला)। कनाडा के आरोपों के बारे में अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, त्रूदो पलटे, माना – बिना ठोस सबूत भारत पर लगाये आरोप। उपशीर्षक है, स्वतंत्र जांच आयोग के सामने कहा, सिर्फ खुफिया जानकारी थी। नवोदय टाइम्स में चार कॉलम का शीर्षक है, ट्रूडो ने माना, भारत के खिलाफ नहीं थे ठोस सबूत। हाइलाइट किया गया है, स्वीकार किया कि आरोप लगाते वक्त थी केवल खुफिया जानकारी। इनके मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, “त्रूदो ने भारत पर ‘संप्रभुता के उल्लंघन’ और ‘हिंसा संभव’ करने का आरोप लगाया”। मुझे नहीं पता है कि सच क्या है लेकिन इस शीर्षक से तो नहीं लगता है कि, ट्रूडो पलटे। पर वह एक अखबार का शीर्षक है तो कोई आधार होगा और लीपा-पोती ऐसे ही की जाती है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर, चार कॉलम की लीड के साथ है। इसका शीर्षक है, पाकिस्तान में एससीओ बैठक के दौरान भारत ने आतंकवाद के खतरे का मुद्दा उठाया। इसी शीर्षक के नीचे भारत पर त्रूदेव के आरोप छपे हैं जो बता रहे हैं कि भारत (विदेश मंत्री के जरिये) पाकिस्तान में आतंकवाद का मुद्दा उठा रहा है तो कनाडा उस पर अपने यहां हिंसा संभव करने का आरोप लगा रहा है। सबूत दिये हैं, मामला है, उदाहरण है पर भारत उसे ‘ठोस’ नहीं मानता है। जहां तक ठोस सबूत की बात है, वीडियो को एडिटेड या डॉक्टर्ड कह दिया गया है, जिस वीडियो पर कन्हैया के खिलाफ आरोप लगाया गया, उसपर कार्रवाई नहीं हुई और एक मामले में वीडियो को वसूली के लिए बनाया गया बता दिया गया और सबसे दिलचस्प है, एक वीडियो को नाटक का रिहर्सल कह दिया जाना। कंप्यूटर में सबूत प्लांट करके गिरफ्तार किये जाने के आरोप हैं और उसपर न्यायपालिका में वह हंगामा (कार्रवाई तो भूल जाइये, उसका रिवाज ही नहीं है) नहीं हुआ जो होना चाहिये था। ऐसे में भारत कैसे सबूत को ठोस मानेगा मैं नहीं जानता। खबर के संबंध में मुझे फैसला करना होता तो मैं भी उलझन में रहता। खासकर तब जब इसमें देशभक्ति और देश का विरोध भी जोड़ दिया जाना हो।
इसके बावजूद आज खबर है, कानून अब अंधा नहीं (नवोदय टाइम्स)। अमर उजाला में इसका शीर्षक है, न्याय की देवी की आंखों से पट्टी हटी, हाथ में अब संविधान। नवोदय टाइम्स में यह टॉप पर दो कॉलम में है और अमर उजाला में सिंगल कॉलम में – पर मुद्दा यह है कि खबर में जो तथ्य है उससे आम जनता को क्या फायदा हुआ या अदालतों में पिछले कई सालों में जो फैसले (या न्याय) हुए हैं उनमें इसका कुछ मतलब है? मुझे तो यह पहले पन्ने की खबर नहीं लगती है। लेकिन नवभारत टाइम्स में यह दो कॉलम की फोटो के साथ एक कॉलम की खबर कुल तीन कॉलम में है। हालांकि शीर्षक एक कॉलम में ही है। हिन्दी के कई अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और संभव है ऐसा विज्ञापन ज्यादा होने के कारण हो। पर यह न्याय की मूर्ति में बदलाव के कारण हेडलाइन मैनेजमेंट के लिहाज से सरकार के कामों का प्रचार करने वाली अच्छी खबर है तभी पहले पन्ने पर छपी है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। जहां तक अदालतों की कार्रवाई, फैसलों आदि का मामला है, विकलांग व्यक्ति को 10 साल जेल में रखने औऱ मामला साबित नहीं होने के साथ 80 पार के बुजुर्ग को गिरफ्तार करने और सिपर के लिए परेशान करने जैसे कई मामले हैं जो बताते हैं कि मूर्ति बदलना बहुत मायने नहीं रखता है।
मायने अगर रखता है तो गणेश पूजा के लिए प्रधानमंत्री का मुख्य न्यायाधीश के घर जाना, उसका वीडियो बनवाना और उसे सार्वजनिक रूप से जारी किया जाना। मुख्य न्यायाधीश द्वारा इसे रोका नहीं जाना और बाद में यह कहना कि, ‘चिंतित हूं कि इतिहास मेरे कार्यकाल का मूल्यांकन कैसे करेगा’। इसे देश की न्याय व्यवस्था का हाल कहा जा सके या नहीं देश का हाल तो है ही कि अगले महीने रिटायर होने जा रहे मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि उन्होंने देश की सेवा ‘अत्यंत समर्पण’ के साथ की है, जबकि उन्हें इस बात का ‘भय और चिंता’ है कि इतिहास उनके कार्यकाल का मूल्यांकन कैसे करेगा। मेरा मानना है कि अगर मुख्य न्यायाधीश को यह चिन्ता है तो आम आदमी का क्या हाल होगा। आम आदमी आप फिल्म अभिनेता सलमान खान को मानें या लॉरेंस बिश्नोई को। बाबा सिद्दीक की हत्या के बाद जेल से लॉरेंस बिश्नोई का टीवी इंटरव्यू सोशल मीडिया पर चर्चा में था – इसमें उसने यह कहा बताते हैं कि सलमान खान किसी मंदिर में माफी मांग लें तो उन्हें बख्शा जा सकता है। कई लोगों ने सलाह दी है कि सलमान खान को माफी मांग लेनी चाहिये और विश्नोई का आतंक इतना है कि फिल्म अभिनेत्री राखी सावंत ने सलमान खान की तरफ से माफी मांगने वाला वीडियो ट्वीट किया है। इससे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति का पता चलता है।
जहां तक कनाडा या जस्टिन त्रूदो के आरोपों और संबंधित खबर का मामला है, टाइम्स ऑफ इंडिया में आज यह सेकेंड लीड है। इसमें त्रूदो के हवाले से कहा गया है, “हमने जब भारत पर पहली बार आरोप लगाया तो कोई सबूत नहीं था, सिर्फ खुफिया सूचना थी”। इसमें अभी की स्थिति की चर्चा नहीं है लेकिन खबर का इंट्रो है, इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि भारत ने हमारी संप्रभुता का उल्लंघन किया। एक और खबर का शीर्षक है, यूके सरकार ने निज्जर विवाद में कनाडा का साथ दिया। यह तो हुई कनाडा के आरोपों की बात। लॉरेंस बिश्नोई के मामले में कुछ नहीं है लेकिन विदेश मंत्री के पाकिस्तान दौरे के अनुकूल परिणाम दिखाने की कोशिश की गई है। आप जानते हैं कि इसी 22 सितंबर 2024 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि आतंकवाद के पूरी तरह खत्म होने तक पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होगी। श्री शाह ने जम्मू-कश्मीर चुनाव के 25 सितंबर को होने वाले दूसरे चरण के लिए पार्टी उम्मीदवार रविंदर रैना के समर्थन में नौशेरा निर्वाचन क्षेत्र में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, “आतंकवाद पूरी तरह खत्म होने तक पाकिस्तान से बातचीत की कोई संभावना नहीं है।” इसके बावजूद विदेश मंत्री के पाकिस्तान जाने की खबर आई। इसे ऐसे पेश किया गया था जैसे कोई बड़ी रणनीति, योजना या उपलब्धि हो (05 अक्तूबर 2024)।
दूसरी ओर, तथ्य यह है कि सीमा पर लगातार सीज फायर, भारत में आतंकी घटनाओं में लिप्तता और अंतररा्ष्ट्रीय स्तर पर लगातार खिलाफत करने की वजह से क्रिकेट की द्विपक्षीय श्रृंखला रोक दी गई है। दोनों देशों के बीच आखिरी द्विपक्षीय सीरीज 2012 में खेली गई थी। पाकिस्तान टीम ने उस समय भारत का दौरा किया था। उसके बाद से भारत और पाकिस्तान केवल आईसीसी या एसीसी टूर्नामेंटों में ही एक-दूसरे के आमने-सामने होते हैं। भारत पाकिस्तान के बीच अगले साल डब्ल्यूटीसी का फाइनल खेला जाना है तो दोनों टीमें 18 साल बाद टेस्ट में आमने-सामने होंगी। भारत-पाकिस्तान के बीच आखिरी टेस्ट मैच साल 2007 में खेला गया था। नवभारत टाइम्स की एक खबर के अनुसार, एस जयशंकर के भारत लौटते ही इतराया पाकिस्तान, क्रिकेट सीरीज पर कर डाला बड़ा दावा। खबर में कहा गया है, सीमा पर तोपें तैनात करके आए दिन सीज फायर का उल्लंघन करने वाले पाकिस्तान का दावा है कि उसके और भारत के बीच क्रिकेट सीरीज जल्द ही शुरू हो सकती है। पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, इस बारे में दोनों देशों के बीच बातचीत भी जल्द शुरू हो जाएगी। हालांकि, अचरज की बात यह है इस बारे में न तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने कोई बयान जारी किया है, न ही पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड की ओर से कुछ कहा गया है। इस बार यह सिगुफा सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान की मीडिया की ओर से छोड़ा गया है। कुछ रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष मोहसिन नकवी विदेश मंत्री जयशंकर से मुलाकात करने के लिए पहुंचे थे, लेकिन क्या बातचीत हुई इस पर कोई अपडेट नहीं है।
ऐसे में आज यहां विदेश मंत्री के दौरे की खबर कई अखबारों में लीड है जबकि कुछेक में है ही नहीं। हिन्दी अखबारों के शीर्षक पहले बता चुका हूं। टाइम्स ऑफ इडिया का शीर्षक है, द्विपक्षीय नहीं, पर जयशंकर के दौरे से भारत, पाकिस्तान को शुरुआत करने में मदद मिली। द हिन्दू का शीर्षक है – एससीओ बैठक में भारत, पाकिस्तान एक-दूसरे पर आरोप लगाने से बचे। द टेलीग्राफ और कुछ अन्य अखबारों में जयशंकर के दौरे की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। कनाडा मामले में अनीता जोशुआ ने नई दिल्ली डेटलाइन से लिखा है, कनाडा की धरती पर खालिस्तानी कार्यकर्ता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत के कथित हाथ को लेकर अमेरिका सहित फाइव आइज एंग्लोस्फीयर इंटेलिजेंस नेटवर्क में कनाडा के साझेदारों ने नई दिल्ली के साथ अपने राजनयिक गतिरोध में ओटावा के साथ एकजुटता दिखाई है। फ़ाइव आईज़ में कनाडा के सभी चार साझेदार – ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, यूके और यूएस – पिछले कुछ दिनों में ओटावा के समर्थन में बयान दिये हैं। अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत से जून 2023 में ब्रिटिश कोलंबिया में निज्जर की हत्या की कनाडाई जांच में सहयोग करने का भी आग्रह किया है।
दि एशियन एज ने विदेश मंत्री के पाकिस्तान दौरे को लीड बनाया है। फ्लैग शीर्षक है, जयशंकर ने एससीओ चार्टर और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की मांग की। मुख्य शीर्षक है, विदेशमंत्री ने चीन पाकिस्तान की आलोचना की कहा, आतंकवाद, एकतरफा एजंडा, बाधा है। कनाडा की खबर लीड के नीचे चार कॉलम में है। शीर्षक है, ब्रिटेन, अमेरिका, न्यूजीलैंड ने विवाद को लेकर कनाडा का समर्थन किया। भारत का यही कहना है, कोई सबूत नहीं है। वह नहीं बता रहा है कि जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई जेल से इंटरव्यू कैसे दे रहा है। गृह मंत्रालय के आदेश के कारण उसे मुंबई पुलिस को नहीं सौंपा जा सकता है आदि आदि। जब वीडियो जैसे सबूत होते हैं तो उन्हें डॉक्टर्ड कहना पुराना मामला है। कन्हैया के मामले में तो तब के पुलिस कमिश्नर ने रजत शर्मा से टीवी पर कहा था कि उनके पास सबूत है और मामला अदालत में साबित नहीं हुआ है। दूसरी ओर कांग्रेस, उसके नेताओं, समर्थकों समेत रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप हैं जो 10 साल सत्ता में रहकर भी साबित नहीं किये जा सके हैं।


