कन्हैया शुक्ला-
छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगलों में परसा कोयला खदान में पेड़ों की कटाई का विरोध करने पर पुलिस ने बेरहमी से लाठीचार्ज कर दिया. इसमें आदिवासी नेता और हसदेव संघर्ष समिति के कार्यकर्ता रामलाल करियाम समेत कई आदिवासी घायल हो गए. नाराज ग्रामीणों ने धनुष, गुलेल और तीर के साथ जंगल में पेड़ों की कटाई का विरोध किया.
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने ग्रामीणों पर लाठीचार्ज की निंदा की है. संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा कि, हसदेव के जंगल जिन्हें अक्सर भारत के फेफड़े के रूप में बताया जाता है, प्राचीन और बेशकीमती है. हसदेव जंगलों में परसा कोयला खदान के लिए वन और पर्यावरण मंजूरी फर्जी दस्तावेजों पर आधारित है.
नेता विपक्ष राहुल गांधी ने भी इसे लेकर लिखा है- हसदेव अरण्य में पुलिस बल के हिंसक प्रयोग से आदिवासियों के जंगल और जमीन के जबरन गबन का प्रयास आदिवासियों के मौलिक अधिकार का हनन है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार के दौरान विधानसभा में सर्वसम्मति से हसदेव के जंगल को न काटने का प्रस्ताव पारित हुआ था – ‘सर्वसम्मति’ मतलब विपक्ष यानी तत्कालीन भाजपा की भी सम्मिलित सहमति! मगर, सरकार में आते ही न तो उन्हें यह प्रस्ताव याद रहा और न हसदेव के इन मूल निवासियों की पीड़ा और अधिकार।

सत्याहिंदी डॉट कॉम में प्रकाशित लेख के अनुसार, हसदेव मध्य भारत में 170,000 हेक्टेयर में फैले बहुत घने जंगल के सबसे बड़े हिस्सों में से एक है. और इसमें 23 कोयला ब्लॉक हैं. घने वन क्षेत्र के नीचे कुल पांच अरब टन कोयला होने का अनुमान है. छत्तीसगढ़ के परसा पूर्व और कांटा बसन (पीईकेबी) कोयला ब्लॉकों के लिए हसदेव में जैव विविधता से भरपूर 137 हेक्टेयर जंगल में अब तक हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं. पीईकेबी और परसा कोयला ब्लॉक राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को आवंटित किए थे, और अडानी समूह आरआरवीयूएनएल के खदान डेवलपर और ऑपरेटर (एमडीओ) के रूप में पीईकेबी खदान से कोयले की खुदाई कर रहा है.
1,898 हेक्टेयर घने जंगल में फैले, पीईकेबी ब्लॉक का खनन दो चरणों में किया जाना था- चरण 1 में 762 हेक्टेयर और चरण दो में 1,136 हेक्टेयर. स्वदेशी समुदायों और वन अधिकार कार्यकर्ताओं के तीव्र विरोध के बावजूद, निरंतर और व्यापक जंगल को नष्ट कर खनन के खिलाफ जन आंदोलनों के कारण अब तक केवल एक कोयला खदान, पीईकेबी (परसा ईस्ट केते बासन) खोली जा सकी है. आगे खनन के लिए नए ब्लॉक खोलने के लिए अडानी-मोदी सरकार के गठजोड़ द्वारा प्रयास जारी हैं.
पर्यावरण कार्यकर्ता आलोक शुक्ला के अनुमान के मुताबिक पीईकेबी ब्लॉक में आरआरवीयूएनएल के खनन के चरण 1 में 762 हेक्टेयर जंगल को साफ करने के लिए 2022 से पिछले एक दशक तक 1,50,000 पेड़ काटे गए.
द वायर की एक रिपोर्ट बताती है कि 2022 में 43 हेक्टेयर से ज्यादा पेड़ काटे गए, जबकि 2023 की शुरूआत में उसी क्षेत्र में 91 हेक्टेयर से ज्यादा पेड़ काट दिए गए. 21 दिसंबर 2023 के बाद से अधिक वनों की कटाई की गतिविधियां हुई हैं. जुलाई 2024 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने राज्यसभा को सूचित किया कि आने वाले वर्षों में हसदेव के जंगलों में खनन के लिए 2,73,000 और पेड़ काटे जाने की संभावना है क्योंकि वन्यजीव और जैव विविधता संस्थानों द्वारा खनन पर पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश नहीं की गई थी. मंत्री ने कहा कि रिपोर्ट के मुताबिक, परसा ईस्ट केते बेसन (पीईकेबी) खदान में 94,460 पेड़ काटे गए हैं.
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय आदिवासियों की 70 प्रतिशत तक आय, जो भोजन, चारा, ईंधन से लेकर औषधीय पोधों और क्षेत्र के सामाजिक- सांस्कृतिक मूल्यों सहित वन संसाधनों पर निर्भर थे, नष्ट हो जाएंगे.

हजारों पेड़ों के नुकसान के अलावा, सैकड़ों आदिवासी परिवार खनन से विस्थापित हो गए हैं, जबकि हजारों अन्य के विस्थापित होने का खतरा है. पिछले कई वर्षों से हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, हसदेव वन बचाओ समिति के आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ-साथ ग्राम सभा के नेता भी लगातार पेड़ों की कटाई का सक्रिय रूप से विरोध कर रहे हैं.
छत्तासगढ़ बचाओ आंदोलन (सीबीए) ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि हरिहरपुर, साल्ही, फतेहपुर की ग्राम सभाओं ने कभी भी वन मंजूरी के लिए सहमति नहीं दी है और खनन के लिए किसी भी वन मंजूरी का लगातार विरोध किया है.
सीबीए के बयान में आरोप लगाया गया है कि इन ग्राम सभाओं ने कभी भी किसी भी रूप में अपनी सहमति नहीं दी है, लेकिन 2018 में, कंपनी ने कथित तौर पर आवश्यक मंजूरी प्राप्त करने के लिए सरपंच और सचिव को फर्जी दस्तावेज बनाने के लिए मजबूर किया.
अडानी कोयला खनन और पेड़ों की कटाई के विरोध के बाद पुलिस लाठीचार्ज होने की खबर नीचे पढ़ें…


