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उत्तर प्रदेश

यूपी विस उपचुनाव : भाजपा व सपा में सीधी टक्कर, बंटेंगे तो कटेंगे v/s जुड़ेंगे तो जीतेंगे

यह चुनाव यूपी में हिंदुत्व बनाम पीडीए बन चुका है। दोनों दलों की कठिन परीक्षा है। सरकारी मशीनरी के उपयोग के भी खुले आरोप सपा लगा रही है। सहयोगी दल कांग्रेस में खास उत्साह नहीं है। वह नाम भर को सपा के साथ है…

महेश शर्मा-

लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनाव वाली सभी नौ सीटों पर भाजपा नीत एनडीए और सपा-कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हर चुनावी क्षेत्र के तकरीबन दो-दो दौरे करके विकास की योजनाओं का लॉलीपॉप भी दिया है।

दरअसल, गुलाबी ठंड में हो रहे इस चुनाव को नारों ने काफी कुछ गरमी दे दी है। भाजपा की ओर से कमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभाली है तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव भाजपा पर तरकश खाली करने में जुटे रहे। इस चुनावी जंग की धार तब देखने को मिली जब योगी आदित्यनाथ ने आगरा में पुरानी मंडी चौराहे पर 26 अगस्त को दुर्गादास राठौर की प्रतिमा अनावरण के अवसर पर भाषण में यह कह दिया कि अगर हम एक रहेंगे, नेक रहेंगे, सुरक्षित रहेंगे- बंटेंगे तो कटेंगे।

इसके ठीक बाद यह भी कहा कि बांग्लादेश में देख रहे हो न, वह गलती यहां नहीं होनी चाहिए।

बस, यह नारा योगी की हिंदुत्व राजनीति का सियासी जुमला बन गया। अब अखिलेश भला कहां चूकने वाले। वह तो जैसे वक्त का इंतजार कर रहे हों। उन्होंने दो नवंबर को सोशल मीडिया के एक्स पर किसी नेता का नाम लिए बगैर पोस्ट डाली कि उनका नकारात्मक नारा, उनकी निराशा और विफलता का प्रतीक है। इस नारे ने साबित कर दिया है कि जो दस फीसदी मतदाता बचे हैं वे भी पार्टी छोड़ने की कगार पर हैं, इसलिए उन्हें डराकर एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला है।

अखिलेश ने यह भी लिखा कि देश के इतिहास में यह नारा निकृष्टतम नारे के रूप में दर्ज होगा। और उनके राजनीतिक पतन के अंतिम अध्याय के रूप में शाब्दिक कील सा साबित होगा। यहीं से सपा की प्रचार सामग्री में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) में एकता मजबूती के लिए न बंटेंगे न कटेंगे, पीडीए संग रहेंगे, जुड़ेंगे तो जीतेंगे जैसे नारों ने जगह बना ली।

इसी साल लोकसभा चुनाव में झटका खायी भाजपा ने इस उपचुनाव की सभी सीटों पर जीत दर्ज करके विपक्ष को करारा जवाब देने के साथ ही जनता और कार्यकर्ताओं में एकता और मजबूती का संदेश देने के साथ ही हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा दिया।

उनका यह नारा महाराष्ट्र के चुनावी मैदान में बहस का मुद्दा बना है। इसके निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। हां, झारखंड में यह बहुत ज्यादा चर्चा में नहीं आया।

20 नवंबर को मतदान है और 23 को रिजल्ट। यह चुनाव यूपी में हिंदुत्व बनाम पीडीए बन चुका है। दोनों दलों की कठिन परीक्षा है। सरकारी मशीनरी के उपयोग के भी खुले आरोप सपा लगा रही है। सहयोगी दल कांग्रेस में खास उत्साह नहीं है। वह नाम भर को सपा के साथ है।

सपा ने नौ में से पांच पर लोकल लीडरों के परिवार वालों को टिकट देकर दांव खेला है। सपा ने तीन-तीन पिछड़े, दो दलित, चार मुसलमान उतारे हैं। गाजियाबाद सीट पर जाटव उतारकर सपा ने फैजाबाद लोकसभा की सामान्य सीट पर दलित प्रत्याशी उतारने वाला दांव खेला। जाटव को बसपा का वोट बैंक माना जाता है। सपा ने अगड़ी जाति का एक भी प्रत्याशी नहीं उतारा। वह जीत का फार्मूला पीडीए को मानती है।

दूसरी तरफ भाजपा ने पिछड़ों को आगे किया है। चार ओबीसी, रालोद का मीरापुर से प्रत्याशी को जोड़ लें तो पांच ओबीसी। दो ब्राह्मण, एक ठाकुर मैदान में है। चुनाव अधिसूचना से महीना भर पहले से योगी के दौरे शुरू हो गए थे। उनका लक्ष्य था सभी सीटों पर दो-दो बार जाना है। कानपुर की सीसामऊ में वह तीन बार आए। 29 सितंबर, 9 नवंबर और 16 नवंबर।

कानपुर की सीसामऊ सीट पर करीब 1.11 लाख यानी करीब 45 फीसदी मुस्लिम है। उसके बाद दलित व फिर ब्राह्मण है। बाकी अन्य जातियों के हैं। दलित वोट निर्णायक बताया जाता है। सपा से नसीम सोलंकी, भाजपा से सुरेश अवस्थी और बसपा से वीरेंद्र शुक्ला मैदान में है। सपा और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है।

गाजियाबाद सीट पर भाजपा ने संजीव शर्मा तो सपा ने राज सिंह जाटव और बसपा ने परमानंद गर्ग को उतारा है। यहां पर वैश्य और दलित वोटर विधायक बनाएंगे। मुजफ्फरनगर की मीरापुर सीट पर भाजपा समर्थित रालोद प्रत्याशी मिथिलेश पाल, सपा से सुम्बुल राणा और बसपा शाहनजर मैदान में हैं। मीरापुर में 30 फीसदी मुस्लिम निर्णायक वोट माना जाता है।

अलीगढ़ की खैर सीट पर भाजपा ने सुरेंद्र दिलेर, सपा से डॉ.चारूकेन तो बसपा नितिन कुमार चोटेल को उतारा है। दलित और जाट वोट जिधर घूमा वही विधायक होगा। मिर्जापुर की मांझवा सीट पर भाजपा ने सुचिस्मिता मौर्य, सपा ज्योति बिंद, बसपा ने दीपक तिवारी प्रत्याशी बनाया है। यहां पर दलित और बिंद वोट पर दारोमदार है।

मुरादाबाद की कुंदरकी सीट पर भाजपा ने रामवीर सिंह, सपा ने मोहम्मद रिजवान बसपा रफतउल्लाह को उम्मीदवार बनाया है। यहां पर मुसलमान वोटरों के हाथ में जीत की चाबी है। प्रयागराज की फूलपुर सीट पर सपा से मुस्तफा सिद्दीकी, भाजपा से दीपक पटेल और बसपा से जीतेंद्र सिंह मैदान में हैं। इस सीट पर कुरमी और दलित मतदाता निर्णायक स्थिति में है।

अंबेडकरनगर की कटेहरी सीट पर सपा ने सांसद लालजी वर्मा की पत्नी शोभावती वर्मा को तो भाजपा ने धर्मराज निषाद और बसपा ने अमित वर्मा को उतारा है। यहां पर करीब 25 फीसदी दलित मतदाता चुनाव में उल़ट-पुलट कर सकता है।

मैनपुरी की करहल सीट पर लालू यादव के दमाद अखिलेश के भतीजे तेजप्रताप यादव सपा के प्रत्याशी हैं। भाजपा ने इनके करीबी रिश्तेदार अनुजेश यादव पर दांव लगाया है जबकि बसपा अवनीश शाक्य मैदान में हैं। यहां पर लगभग 30 प्रतिशत यादव रिजल्ट किसी के भी पक्ष में कर सकता है।

यहां से अखिलेश यादव विधायक थे जो कन्नौज से लोकसभा चुनाव जीते थे। इस सीट पर उपचुनाव इसीलिए हो रहा है। 23 नवम्बर को नतीजा चौंकाने वाला हो सकता है।

दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।

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