प्रियदर्शन-
एक दिन दफ़्तर की एक लड़की बिल्कुल डबडबाई आंखें लिए मेरे पास आई- ‘सर, नीरज ने बहुत बुरे ढंग से बात की है।’
दफ़्तर में संपादकीय और प्रोडक्शन की टीम में टकराव आम बात है, लेकिन मुझे लगा कि एक लड़की रोने-रोने को हो आए, यह तो नहीं चलेगा। मैंने तत्काल नीरज को खोजा। वह सीट पर नहीं था, दूर एक कोने में खड़ा था। मैं फौरन उसके पास पहुंचा कि उससे पूछूं कि यह बात करने का क्या तरीक़ा है कि कोई रो पड़े। लेकिन वहां नज़ारा कुछ और था। नीरज ही रो रहा था। मैंने पूछा तो उसने कहा, ‘सर इस लड़की ने मुझसे बहुत बुरे ढंग से बात की है।’
मेरी समझ में नहीं आया, अब क्या करूं। दोनों को बुलाकर यही कह पाया- थोड़ा बहुत लड़ना चलेगा, लेकिन ऐसा क्या लड़ना कि दोनों रोने लगो! कुछ देर बाद देखा, दोनों शायद साथ चाय पी कर हंसते हुए लौट रहे थे।
एनडीटीवी के प्रशिक्षण संस्थान से जो कुछ युवा बिल्कुल पहले साल हमारे साथ जुड़े थे, उनमें नीरज वत्स था। एक तरह की लापरवाह अलमस्ती उसकी तबीयत का हिस्सा थी। मुझे लगता था, इसी मनमौजी लापरवाही ने उसे पत्रकारिता के दूर से आकर्षक लगने वाले पेशे की ओर खींचा था। उसमें एक तरह की हाजिरजवाबी थी- कुछ हरियाणवी हास्य बोध से लैस। दिल्ली में जो बहुत सारे लोग अपना सरल गंवई-क़स्बाई मिज़ाज छोड़ नहीं पाते और दूसरों की मदद में जुटे रहते हैं, नीरज उनमें से एक था। दोस्तों के साथ तरह-तरह के किस्से साझा करना उसका शगल था।
मैं उसका दोस्त नहीं था। सीनियर होने के नाते सम्मान वाली एक दूरी हमेशा बनी रही। लेकिन हम सहज आत्मीयता के धागे से बंधे हुए थे। मुझे भी पता था और उसे भी कि किसी भी तरह के संकट में वह मुझसे बात कर सकता है। कुछ बरस पहले जब उसकी मां बेहद बीमार थी, तब वह लगातार अपनी परेशानी साझा करता था।
मैं उसकी शादी में समालखा गया था। उस दिन मुझे देहरादून जाना था और मैं स्मिता के साथ सुबह सात बजे निकल पड़ा था। दोपहर देहरादून में दो घंटे ठहर कर हम गूगल की आधी-अधूरी मदद से अनजान-अंधेरे रास्तों से होते लगभग एक रोमांचक सफर के बीच वहां रात नौ बजे तक पहुंच पाए थे। नीरज ने तत्काल किसी को हमारे साथ लगा कर हमें होटल का एक कमरा दिलाया- बताते हुए कि ये हमारे ‘बॉस’ हैं। तब भी एक सरल-शरारती हंसी उसके चेहरे पर थी- क्योंकि वरिष्ठ और कनिष्ठ जैसा संबंध हमारे बीच नहीं था। (वैसे भी बॉस हो सकने वाला मिज़ाज कुछ अलग मिट्टी का होता है जो शायद मुझमें नहीं है।) हालांकि हम वहां रुके नहीं, रात साढ़े ग्यारह बजे निकल गए। उस दिन मैंने साढ़े छह सौ किलोमीटर गाड़ी चलाई थी।
फिर नीरज का मन पत्रकारिता से उचट गया। उसने नौकरी छोड़ दी। वह राजनीति करना चाहता था। उसने बताया कि वह बीजेपी से जुड़ गया है। मुझे हैरानी हुई। हालांकि मुझे संदेह था कि वह राजनीति में देर तक टिकेगा। यही लगता था कि एक दिन यहां मन उचटेगा और वह इस गली से निकल आएगा।
लेकिन यह नहीं मालूम था कि एक दिन वह इतनी जल्दी ज़िंदगी की गली से भी निकल आएगा। क्या इससे भी उसका मन उचट गया था? पता नहीं, लेकिन कल किसी आघात की तरह यह ख़बर आई तो हम सब स्तब्ध रह गए, मन सिकुड़ सा गया।
यह सच है कि सांसों का कोई समीकरण नहीं होता, इंसान कभी भी चला जाता है। लेकिन इतनी युवा उम्र जाने की नहीं होती। पीछे एक कातर संसार रह जाता है। अभी कई दिन नीरज वत्स याद आता रहेगा।
सुभाष तरान-
अलविदा नीरज…
इस लड़के के बारे में मुझे सबसे पहले रवीश कुमार के ब्लॉग से तब मालूम हुआ जब इस लड़के ने हरियाणा में अपने गृह क्षेत्र समालखा से चुनाव लड़ने के लिए एनडीटीवी की नौकरी छोड़ दी। यह इस लड़के की खासियत थी कि धुर दक्षिणपंथी विचारधारा से संबंधित होने के बावजूद यह रवीश कुमार जैसे जनवादी पत्रकार का प्रिय था। बात आई गई हो जाती, अगर Neeraj Vats नाम का यह लड़का फेसबुक पर मेसेज कर मुझसे मिलने की बात ना करता।
वह सावन के महीने की कोई उमस भरी शाम थी जिस रोज़ नीरज हरियाणा के किसी मशहूर हलवाई का बनाया घेवर लेकर घर आया। बहुत सौम्य और सभ्य नीरज ने पहली ही मुलाक़ात में दिल जीत लिया। बातचीत के बाद मालूम हुआ कि वैचारिक विरोधाभास के बावजूद वह मेरा मुरीद है। बाद के वक्त में वह पहाड़ पर लिखे मेरे संस्मरणों और कविताओं पर मुझसे घंटों बात करने लगा। वह कहता, भाई साहब, मैं पहाड़ नहीं जा पाता लेकिन आपकी खूबी यह है कि आपका लिखा हुआ मुझे पहाड़ को महसूस कराता है।
नीरज दिलदार आदमी था। कमल जोशी की पहली बरसी पर देहरादून में आयोजित कार्यक्रम में जाने के लिए मंगलेश डबराल और मैं मेरे घर से बस अड्डे की तरफ़ जाने को हो ही रहे थे कि तभी उसका फ़ोन आ गया। उस वक़्त वह भाजपा की आई टी सेल में महत्वपूर्ण ओहदे पर तैनात था। दुआ-सलाम के बाद मैंने उसे बताया कि जरा देहरा दून तक जाना हो रहा है। वह कहने लगा, कैसे जा रहे हो भाई साहब? मैंने कहा, बस से। कहने लगा, ऐसा कैसे। हम लोग पटेल चौक मेट्रो पहुँचे ही थे कि नीरज वहाँ अपनी नई नवेली सियाज़ कार के साथ हाज़िर था। मैंने मंगलेश दादा से उसका परिचय कराया। बहुत आत्मीयता से मिलने के बाद वह गाड़ी की चाबी मुझे पकड़ाते हुए मजाकिया अंदाज़ में कहने लगा,
भाई साहब, इस गाड़ी के होते हुए आप बस से जाने की सोच भी कैसे सकते हो।
नीरज पहाड़ के लिए काम करना चाहता था। वह जौनसार बावर के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश पर पीएचडी करना चाहता था। इसी सिलसिले में वह जौनसार में कम्युनिटी रेडियो स्टेशन खोलने के लिए भी प्रयासरत था।
वह अपनी योग्यता के बूते पर उत्तराखंड के राजनीतिक केंद्र देहरादून पहुंच भी गया था।वह पहाड़ को जीना चाहता था लेकिन पहाड़ को जीने की दौड़ में मृत्यु ने उससे पहले बाजी मार ली और एक सपना उसको देखने वाले के साथ ही खत्म हो गया।
अश्करी जाफरी-
ख़बर ने झकझोर दिया है। पत्रकार साथी Neeraj Vats ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है। आपकी विनम्रता हमेशा याद रहेगी भाई। एक माह पहले आपसे आख़िरी दुआ सलाम हुई थी। नीरज जी और मैं एक ही पत्रकारिता संस्थान ( IMS, Dehradun) जिसको अब IMS Unison University के नाम से जाना जाता है के उत्पाद हैं हालांकि नीरज जी मेरे सुपर सीनियर साथी थे। नीरज जी ने NDTV India जैसे देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान में बतौर आउटपुट एडिटर भी अपनी सेवाएं दी हैं।
दोस्तों, वक़्त बे वक्त अपने यारों दोस्तों से बात करते रहा करो क्योंकि कब किसकी आँखें बंद हो जाएं इसकी कोई गारंटी नहीं है।
नीरज भाई को विनम्र श्रद्धांजलि…
हेमराज सिंह चौहान-
बाइक पर बैठा हूँ और ये लिखते समय ढेर सारे ख़्याल आ रहे हैं. ज़िंदगी में बहुत कम लोग होते हैं जो अलग मत के बावजूद भी दिल से जुड़े होते हैंड ऐसा ही था Neeraj Vats. फ़ोन पर लंबी बातचीत एक दूसरे को सलाह देना और सबसे बड़ी बात गर्मजोशी से मिलना एक बात करना. दोस्त ये ही कह सकता हूं कि अच्छे इंसान धरती से कम हो रहे हैं शायद ऊपर ज़्यादा ज़रूरत हो किसी बड़े मनोरथ के लिए. आज ये जान लिया कि कितने भी परेशान हो व्यस्त हों अपनों से बात कर लो समय निकालकर. मैं आज पछता रहा हूं.
चंद्रमोहन मित्तल-
Neeraj Vats भाई आप इस तरह चले जाओगे… यकीन से परे है! ईश्वर आपके परिवार को संबल दे और आपको अपने श्री चरणों में स्थान दें. ॐ शांति!
पारितोष सेठ-
मित्र Neeraj Vats की अचानक दुःख भरी खबर मिली प्रभु हमारे मित्र को अपने चरणों में स्थान दे इस दुःख की घड़ी में हम सभी मित्र आपके परिवार के साथ है प्रभु सभी को दुःख सहने की शक्ति दे ॐ शांति
ह्रितिक भंडारी-
बड़े भाई, एक दिलखुश और समोसा खाने के शौकीन… जब भी घर जाता, तो कहते मुझे पहाड़ तुमने ही घुमाना, हर तरह की मदद के लिए हमेशा तैयार रहे वाले, हमारे दफ्तर में सीनियर रहे बड़े भाई Neeraj Vats जी का यूं ही चले जाने से स्तब्ध हूं…!
आपने हर किसी से प्रेम करना सिखाया है। आप हमेशा याद आओगे। अलविदा….



SG
February 9, 2025 at 9:39 am
Apka bohot dhanyawaad humare bhai ki yaad main itna acha likhne k liye. Neeraj bhai wakai main bohot pyaare Insaan the. Humare parivar main ek wahi tha jisse asal main parivaar k logon se bina kisi swaarth bhawna k prem tha. Wo bohot kuch karna chahte the iss jeewan main per Paramaatma ko kuch aur he manzoor tha. Bhagwaan unki aatma ko shanti de.