समरेंद्र सिंह-
और इस तरह मारक सेक्रेटरी ने एक झटके में तोल दिए सारे मेंढक और लागू हो गया राम राज पार्ट टू!
जब से पत्रिकाओं को जाने वाले खुदरा विज्ञापन की सामूहिक रकम का ब्यौरा सेक्रेटरी को मिला है, वो पगलाया घूम रहा है। उसकी देह से अंगारे निकल रहे हैं। जुबान जहरीली हो गई है। वो बार-बार यही सोच रहा है कि इतने में तो राजधानी में एक और फॉर्म हाउस बन जाता। गोवा में समंदर किनारे बड़ी सी हवेली होती और उसकी बालकनी में बैठ कर किंग जॉर्ज पंचम का पेग लगाते हुए लहरें गिनने में जो मजा आता, उसका कहना ही क्या था! न जाने कितनी रोलेक्स घड़ियां और सेल्वाटोर फैरागामो के जूते आ जाते। लुई विटॉन से भी आलमारी भर जाती। सोच कर ही आनंद आ रहा है। लेकिन पीड़ा इस बात की थी कि उसके कार्यकाल में इतना पैसा इन ‘उगता सूरज-ढलता सूरज’ जैसे चिल्लरों पर खर्च हो गया। ये सरासर नाजायज बात थी। लेकिन सवाल ये था कि ये लीकेज रोकें तो कैसे रोकें?
इस सवाल पर मंथन के लिए उसने अपने चहेते बाबू को शाम में घर आने को कहा था। बाबू उसके विश्वविद्यालय का जूनियर भी था। इसलिए गुरू-चेला जैसा रिश्ता था। घर पहुंचने पर सेक्रेटरी ने बाबू को पेग बनाने का आदेश दिया। बाबू ने हमेशा की तरह सेक्रेटरी के लिए स्कॉच का बड़ा और अपने लिए रम का छोटा पेग बनाया।
सेक्रेटरी ने स्कॉच का ग्लास उठाया और घूंट पीने के बाद बाबू से कहा कि हरामखोर तुम कर क्या रहे हो? यमुना में डूब क्यों नहीं जाते? बाकी सारे तो निकम्मे हैं, उनसे तो मुझे कोई खास उम्मीद नहीं है, लेकिन तुम तो मेरे अपने हो। तुमने ऐसा कैसे होने दिया? करोड़ों रुपये इन दो टके के नमकहराम पत्रकारों पर खर्च हो रहे हैं और उसका कोई “हिसाब” ही नहीं है।
बाबू बहुत पहुंची हुई चीज था। उसने कहा कि हुजूर बात तो सही है। बड़ी जोत वाले सारे तो आपके चंगुल में आ गए हैं, लेकिन ये साले चिल्लर इतने हैं कि इन्हें कौन तौले? ससुरे पच्चीस-पचास हजार के लिए सुबह से शाम तक दफ्तर में बैठे रहते हैं। इनका कोई दीन-ईमान भी नहीं है। ऊपर से कोई आंख दिखाता है। कोई नाक फुलाता है। कोई पैर पर लोट जाता है। इन्हें तराजू पर टिकाए भी तो कैसे टिकाए?
बाबू आगे बोलता है कि एक तो इन्हें तोलना मुश्किल है और दूसरा ये साले टर्र-टर्र बहुत करेंगे। फिर बहुत सारे तो पार्टी और संगठन से भी जुड़े हैं। बात बढ़ेगी। बदनामी होगी। हुजूर यही सब सोच कर रहने दिया है।
बाबू की बात सुन कर सेक्रेटरी को गुस्सा आ गया। उसने कहा कि साले ये पैसे इनके बाप के हैं कि छोड़ दें। और मुन्नी तो पहले से ही इतनी बदनाम है कि अब शर्म किस बात की! बजट में प्रावधान कराऊं मैं, फाइल पर साइन करूं मैं और मौज काटेंगे ये सब? पार्टी और संगठन मेरी जूती पर। बात पच्चीस हजार या पच्चीस करोड़ की नहीं है। बात सिस्टम की है। इन सबका हिसाब होना चाहिए। और मेरा टका, मेरे पास होना चाहिए।
फिर सेक्रेटरी ने स्कॉच का एक और घूंट लगाया और सिगरेट सुलगाते हुए शकुनि वाले अंदाज में कहा कि तुमसे नहीं होता तो किसी और को काम पर लगा दें?
जूनियर को बड़ी मुश्किल से ये पोजिशन मिली थी। बहुत साल के सूखे के बाद तो पैसे का फ्लो बना था। कोई बाधा नहीं हो इसके लिए दिन रात तो बॉस की परिक्रमा करता था। तेल लगाता था। फिर बॉस को फैरागामो और लुई विटॉन का शौक था तो साथ रहते-रहते सीके और टॉमी का शौक इसे भी हो गया था। फॉर्म हाउस और विला का सपना इसका भी था। अब ये नहीं चाहता था कि इस सपने में कोई खलल पड़े।
बाबू ने थोड़ा सोचते हुए, दिमाग पर जोर देते हुए, बॉस से कहा कि हुजूर एक उपाय है। ये सुन कर सेक्रेटरी की आंखें चमक उठीं। उसने तपाक से पूछा कि क्या?
बाबू ने कहा कि आप आदेश करें तो जैन को काम पर लगा दें?
जैन… कौन जैन?
अरे वही मुंबई वाली एजेंसी का मालिक… आप कहो तो उसे बीच में डाल देते हैं।
सेक्रेटरी ने कहा कि मतलब?
बाबू ने कहा कि इतने सारे मेंढक जोखना हमारे बस का नहीं है और इनसे वसूली करना भी संभव नहीं है। लेकिन ये सारा ऑर्डर जैन समेत पांच-सात एजेंसियों के जरिए रूट कर दें तो जैन अपने स्तर पर दो-ढाई सौ और बाकी भी अपने-अपने स्तर पर सौ-सौ, पचास-पचास मेंढक तो जोख ही लेंगे। बड़े अखबारों को भी तो उन्हीं के जरिए ऑर्डर जाता है। जैसे बड़े अखबारों को जाता है, वैसे इन चिल्लरों को जाएगा। फिर इन एजेंसियों से अपना हिसाब हो जाएगा।
सेक्रेटरी को एक झटके में कोबरा के विष का जंतर मिल गया। वो खुशी से उछल पड़ा। उसने चेले बाबू को शाबासी देते हुए कहा कि साले यही अकल पहले लगा देता तो करोड़ों का घाटा नहीं हुआ होता। तुझे भी तो कुछ मिलता ही।
बाबू बोला- लेकिन हुजूर हल्ला बहुत होगा।
सेक्रेटरी ने ठहाका लगाया – कहा कि जब टाइम्स-टुइम्स वाले तागरण जागरण वाले कुछ नहीं उखाड़ सके तो ये चिल्लर क्या उखाड़ेंगे! दो-चार दिन टर्र-टर्र करके चुप हो जाएंगे।
सेक्रेटरी ने स्कॉच का घूंट लगाते हुए बाबू से कहा कि कल सुबह से ही सारा ऑर्डर एजेंसियों के जरिए रूट करो।
सेक्रेटरी के देह की आग बुझ गई। जुबान का जहर भी मिट गया। चेहरे पर सुकून के भाव आ गए। मन सूफी हो चला। गोवा में समंदर किनारे एक बड़ी सी हवेली का सपना आंखों में तैरने लगा। और जेहन में ये खुशी कि आउटडोर और अखबारों के बाद खुदरा कारोबार का भी ‘सिस्टम’ तैयार हो गया है। एक बार ये चिल्लर, ये मेंढक टर्र-टर्र करके शांत हों तो अगले सीजन में न्यूज चैनलों और डिजिटल डिविजन सेट करें। और हजार करोड़ के बजट में से डेढ़-दो सौ करोड़ की वसूली का सिस्टम तैयार हो।
शायराना अंदाज में आ चुके सेक्रेटरी ने चहकते हुए बाबू से पूछा कि अगर यही फॉर्मूला टीवी और डिजिटल पर लागू कर दें तो कैसा रहेगा? शातिर बाबू ने कहा कि हुजूर राम राज आ जाएगा। सेक्रेटरी ने पूछा तो अभी क्या है? बाबू ने कहा कि आप जब आए, राम राज तभी से आ गया है। अभी राम राज पार्ट वन चल रहा है। कल से राम राज पार्टू टू चलेगा और जिस दिन टीवी और डिजिटल वाले संगठित तौर पर कसे जाएंगे उस दिन से राम राज पार्ट थ्री होगा। ये कहते हुए उसने रम का घूंट लिया और जोर से जयकारा लगाया – बोलो सियावर रामचंद्र की जय!


