
संजय कुमार सिंह
अमर उजाला में आज तीन कॉलम की खबर है, मस्जिद में जय श्रीराम का नारा लगाना अपराध कैसे, परखेगी शीर्ष अदालत। इस खबर और शीर्षक के कानूनी पहलू पर चर्चा करना न तो मेरे वश का है और न मेरा विषय। मैं इस खबर को प्रमुखता दिये जाने पर बात करूंगा क्योंकि इसके साथ ही एक और खबर का शीर्षक है, देश में राम-कृष्ण व बुद्ध की परंपरा ही रहेगी, बाबर औरंगजेब की नहीं। खबर के अनुसार यह बात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कही है। आप जानते हैं कि संसद में जब अदाणी की चर्चा होनी थी तब संविधान पर चर्चा हुई, जो कुछ कहा-सुना और सुनाया गया उसपर मैंने लिखा था कि इससे भाजपा की राजनीति अंधेरी सुरंग में घुस गई है। आज इन खबरों से साफ है कि भाजपा के पास सत्ता में रहने या राजनीति करने के लिए हिन्दुत्व के सिवा कुछ है ही नहीं। वैसे तो सबको पता है कि पत्नी और ससुराल वालों के साथ अदालती कार्रवाई से परेशान होकर आत्महत्या के लिए मजबूर होने वाला इंजीनियर हिन्दू ही है और अब आत्महत्या के बाद हुई कार्रवाई में गिरफ्तार उसके ससुराल के लोग भी हिन्दू ही हैं तो अमर उजाला का उपशीर्षक से मिली सूचना है, सीएम बोले – 2017 से यूपी में दंगों में 99 फीसदी कमी आई है।
जहां तक मस्जिद में नारा लगाना कैसे गलत है को परखने की बात है, शीर्ष अदालत को परखने देना चाहिये पर यह खबर नहीं है। सब को पता है कि यह होता रहा है और गलत होता तो कैसे हो पाता। अपराध है कि नहीं इसका पता लगाना चाहें तो आग लगाने वाले के रूप में पहचाने जाने वाले कपड़े पहन कर किसी मंदिर में जाइये, अल्ला हू अकबर का नारा लगाइये। समझ में आ जायेगा कि कैसा अपराध है और है या नहीं। मुद्दा वह नहीं है, सबको पता है कि मंदिर में नारा लगाना तो छोड़िये किसी कोने में योग भी करें और सामने वाले ने नमाज पढ़ना समझ लिया तो खैर नहीं है और नारा लगाना मंदिर में ही क्यों, सार्वजनिक जगहों पर भी संभव नहीं है। ऐसे में मस्जिद में नारा लगाना अपराध कैसे है, तय करना निश्चित रूप से मुश्किल होगा और संभव है, मामला कानून को राम-कृष्ण व बुद्ध की परंपरा से देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत सुलझाने का है। इसलिए मुश्किल ज्यादा हो। सुप्रीम कोर्ट को मस्जिद में जयश्री राम का नारा लगाने पर फैसला करने दीजिये, मंदिर में अल्लाह हू अकबर नहीं बोल सकते और इसलिए कोई संकट नहीं है। और संकट हो भी कैसे?
कौन सी धाराएं लगेंगी यह तो कोई भी सिपाही तय कर देगा और अदालत में साबित होने की बात हो तो आप जानते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यक्रम में मुस्लिम विरोधी टिप्पणी की थी। इसके लिए नोटिस दिया है। द टेलीग्राफ की आज की लीड के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस नोटिस के लिये समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के खिलाफ नाराजगी जताई है। कोई 55 विपक्षी और स्वतंत्र सांसदों ने शुक्रवार को नोटिस दिया है। पर मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि भारत बहुसंख्यकों की इच्छा के अनुसार चलेगा और यूनिफॉर्म सिविल कोड एक वास्तविकता होगी। जो भी हो, द टेलीग्राफ में खबर का शीर्षक है, घृणा फैलाने वाले मुखौटे के पीछे योगी हैं। दो कॉलम की इस लीड का फ्लैग शीर्षक है, आदित्य नाथ ने जज का समर्थन किया, बाबर के मुकाबले राम को खड़ा किया। जो भी हो, यह उनकी राजनीति है लेकिन अखबारों के पहले पन्ने पर यह खबर आज आमतौर पर नहीं है। इसी तरह आज एक और खबर अखबारों में उतनी प्रमुखता से नहीं है जो टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। विपक्ष में अशांति मुख्य शीर्षक से दो छोटी खबरें छपी हैं। एक बताती है कि दिल्ली के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के मुकाबले आम आदमी पार्टी का पक्ष लिया।
दूसरी खबर बताती है कि नेशनल कांफ्रेंस के बाद टीएमसी ने ईवीएम पर कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया। वैसे तो आज भी अखबारों में रोज की तरह सरकारी प्रचार ही लीड है पर ईवीएम वाली खबर द टेलीग्राफ में भी है। टेलीग्राफ में टाइम्स ऑफ इंडिया वाली दोनों खबरें तो हैं ही उमर अब्दुल्ला की राजनीति पर भी टिप्पणी है जो इंडिया ब्लॉक में कलह शीर्षक से है। ईवीएम पर कल उमर अब्दुल्ला ने जो कहा था वह छपा था और आज जो छपा है वह तृणमूल के अभिषेक बनर्जी ने कहा है। इन खबरों से एक तरफ अगर यह बताने की कोशिश की जा रही है इंडिया ब्लॉक में सब ठीक नहीं है तो द टेलीग्राफ ने आज अपनी खबर से बताया है कि कश्मीर में चुनाव जीतने (और मुख्यमंत्री बनने) के बाद उमर भाजपा के साथ गलबहियां करने के आरोपों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने न सिर्फ ईवीएम पर कांग्रेस को सीख दी है भाजपा के सेंट्रल विस्टा और नये संसद भवन की परियोजना की भी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। ऐसे में आज जो खबरें आमतौर पर अखबारों में नहीं हैं या कम हैं, वही ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
जहां तक ईवीएम की बात है, जब दल बदलू भी चुनाव जीत चुके हैं और ऐसे कई किस्से हैं। फिर भी उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस को सीख दी है तो यह उनकी राजनीति है तथ्य यह है कि, ईवीएम कांग्रेस के समय आई थी। भाजपा ने विरोध किया फिर वाशिंग मशीन में धोकर गले लगा लिया। विरोध कांग्रेस के जिम्मे कर दिया गया। लोग कहते रहे – कांग्रेस विरोध क्यों नहीं करती, चुनाव क्यों लड़ती है। अब उमर अब्दुल्ला ने कहा है, कांग्रेस को विरोध छोड़ देना चाहिये, चुनाव क्यों लड़ी। मतलब, भाजपा को खुला मैदान दे दिया जाये? कांग्रेस विरोध नहीं कर रही है तो यह कहानी है और करे तो तुरंत कहा जायेगा उसी ने लाया है। सरकार और विपक्ष को ईवीएम से समय मिले तो देश सेवा हो पर उसकी जरूरत किसे है? ईवीएम का विरोध इतना लचर तब है जब ज्यादातर दल बदलू भी चुनाव जीत जाते रहे हैं। चाहे वे कर्नाटक के हों या मध्य प्रदेश के। हालांकि, इतना ही आसान होता तो महाराष्ट्र में विधानसभा अध्यक्ष का फैसला भी आ गया होता। चुनाव में जीत तो अप्रत्याशित है ही। वही हाल हरियाणा का भी रहा। बाकी आंकड़े गवाह हैं। इसलिये संभव है गड़बड़ी ईवीएम में नहीं, वोटर में ही हो।
संविधान पर चर्चा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जज साब के विचार और उसे गोरखनाथ मंदिर के महंत या साधु, योगी आदित्य नाथ का समर्थन, बंटेंगे तो कटेंगे का मशहूर नारा और महाराष्ट्र चुनाव जीत के बाद योगी अब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लगते हैं। अगर भाजपा हिन्दुत्व के अपने तय लक्ष्य पर ही आगे बढ़ती है तो संभव है नरेन्द्र मोदी की जगह योगी आदित्यनाथ को आगे कर दिया जाये लेकिन संविधान की रक्षा के साथ भाजपा के लिए अंधेरी सुंरग में लड़ना मुश्किल होगा खासकर दूसरे मुद्दों पर। पर अब वही स्थिति बनती नजर आ रही है। हिन्दुत्व की राजनीति में परिपक्वता के मामले में अगर नरेन्द्र मोदी अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के मुकाबले योग्य साबित हुए तो भाजपा की राजनीति अब योगी आदित्य नाथ शैली की होती दिख रही है। भविष्य में जो हो, यह तय है कि भाजपा का भला होगा तो देश छूट जायेगा और देश नहीं छूटा तो भाजपा छूटेगी। पर वह बाद की बात है।
आज की कम महत्वपूर्ण खबरों में एक लीड, नवोदय टाइम्स में है , गैप-4 लागू। आप जानते हैं कि अभी हाल में इसे वापस लिया गया था और तुरंत बाद फिर लागू करना पड़ा। ऐसे में आप समझ सकते हैं अमीर-गरीब, आम और खास, हिन्दू और मुसलमान सबके स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला प्रदूषण का मुद्दा कई साल से चल रहा है। सरकारी उपाय असरकारक कम और दिखावटी ज्यादा हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा पटाखों पर प्रतिबंध और भाजपा नेताओं द्वारा उसका उल्लंघन, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना सब सार्वजनिक है। फिर भी अब ग्रेप-4 दोबारा लागू किया गया है तो खबर ऐसे छपी है जैसे सरकार कुछ भारी काम कर रही है। ऐसे में आज दैनिक भास्कर के पहले पन्ने की खबर का शीर्षक है, प्रदूषण दिल्ली नहीं, देश की समस्या, दूषित शहरों की लिस्ट दें। आप समझ सकते हैं कि जो बात सरकार को नहीं समझ में आ रही है या जिसकी परवाह नहीं है उसकी चिन्ता सुप्रीम कोर्ट कर रही है और वह भी तब जब पटाखों पर प्रतिबंध के उसके आदेश को सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने नहीं माना और सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं की (कम से कम प्रचार नहीं हुआ) है। ऐसे में प्रदूषण की समस्या का क्या होगा वह तो समय बतायेगा पर अखबारों की रिपोर्टिंग और जो हो रहा है उसका लचर होना किसी से छिपा नहीं है। फिर भी जनता भाजपा को वोट दिये जा रही है और ईवीएम से शिकायत नहीं है। कुल मिलाकर यह भाजपा की राजनीति है और इसमें काम कम, सेटिंग ज्यादा है। ईवीएम से लेकर चुनाव आयोग तक। भले यह सीबीआई – ईडी के दम पर किया गया हो। पिछले चुनाव आयुक्त और उनके परिवार वालों के खिलाफ कार्रवाई याद कीजिये।
मुख्य धारा के आज के अखबारों में इन खबरों को छोड़कर रूटीन और सरकार के प्रचार वाली खबरों को महत्व दिया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड, संविधान पर चर्चा में निर्मला सीतारमन और मल्लिकार्जुन खरगे भिड़े खास है। इसकी साथ विशेष है, संभल पर योगी का दावा, कई हिन्दू मारे गये। उन्होंने कहा है और अखबार ने छापा है कि 1947 से अभी तक संभल में 209 हिन्दू मारे गये हैं फिर भी इन निर्दोष पीड़ितों के लिए एक भी शब्द नहीं कहा गया है। संविधान की शपथ लेकर, संविधान की रक्षा करने वाली पार्टी में रहकर ऐसी असंवैधानिक बातें करने वाले योगी आदित्यनाथ देश के पहले मुख्यमंत्री हैं जो गेरुआ पहनते हैं। दि एशियन एज में एक खबर है, महाराष्ट्र में मंत्री बनने के इच्छुक अलग-थलग महसूस कर रहे हैं विकल्पों को आजमा रहे हैं। उपशीर्षक है – भुजबल ने कहा, मैं परेशान हूं, भविष्य की अपनी कार्रवाई पर विचार करने का संकेत दिया। द हिन्दू में आज आधा पन्ना विज्ञापन है, बाकी सरकारी और रूटीन खबरें हैं। निर्मला सीतारमण की भिड़ंत की खबर कई अखबारों में है लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्षक में बताया है कि वित्त मंत्री ने क्या कहा। यही कि कांग्रेस ने परिवारवाद को बढ़ावा दिया। मुझे याद आता है कि नरेन्द्र मोदी कहा करते थे कि भाजपा अनुशासित पार्टी है अध्यक्ष का चुनाव होता है और कांग्रेस गांधी परिवार से बाहर किसी को अध्यक्ष बनाकर दिखाये। अब यह साफ दिख रहा है कि मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस अध्यक्ष हैं जो गांधी परिवार के नहीं हैं और भाजपा कार्यवाहक अध्यक्ष से काम चला रही है। मोदी राज में कार्यवाहक कोषाध्यक्ष से भी काम चला और कोषाध्यक्ष को सीधे केंद्रीय वित्त मंत्री बनाने का काम भी हो चुका है। भाजपा को अपना परिवार वाद क्यों नहीं दिखता समझना मुश्किल नहीं है।
इंडियन एक्सप्रेस ने ईवीएम पर टीएमसी की मांग, वीडियो दिखाइये को प्रमुखता से शीर्षक बनाया है पर कन्हैया के वीडियो से लेकर आईटी सेल के सैकड़ों वीडियों में इस एक वीडियो से क्या होने वाला है समझना मुश्किल नहीं है। संभव है कि यह ईवीएम के बचाव में भाजपा की कोशिशों का नतीजा हो लेकिन पहले पन्ने पर है यही कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसलिए कि आज ही नवोदय टाइम्स में छह कॉलम का बॉटम है, “लोकसभा चुनाव की गलती को विधानसभा चुनाव में जनता ने नहीं दोहराया”। यह मैटराइज का सर्वेक्षण है और इसमें दावा किया गया है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में मोदी की लोकप्रियता खूब काम आई। शीर्षक से नहीं पता चलता है कि मोदी की यह लोकप्रियता किस बात पर है या क्यों बनी हुई है। या यह लोकप्रियता हिन्दू मुस्लिम के कारण ही है। यहां मुझे 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद एक निजी विश्वविद्यालय के अनुसंधान की खबर और उसपर भाजपा की प्रतिक्रिया तथा बाद में जो सब हुआ उसकी याद आती है और यह मानने की मजबूरी लगती है कि ईवीएम खराब नहीं है तो वोटर ही …. हो सकते हैं। समय बतायेगा। फिलहाल भाजपा की राजनीति और मीडिया का सहयोग तो समझ में आ रहा है।


