
मोदी को कुवैत का सर्वोच्च सम्मान, मुबारक अल-कबीर मिला – खबर सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स में, अमर उजाला में फोटो कैप्शन ही!
संजय कुमार सिंह
आज द टेलीग्राफ की लीड बहुत सीधी-सरल है, कांग्रेस ने मोदी सरकार से पूछा – जासूसी के निशाने पर कौन लोग थे? मुख्य शीर्षक है, पेगासस (मामले की) जांच सुप्रीम कोर्ट के लिए टेस्ट है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह मामला पहले से ही पर्याप्त गंभीर है पर मुख्यधारा की मीडिया ने इसके न्यूनतम उल्लेख से ज्यादा कुछ नहीं किया है। अब जब अमेरिकी कोर्ट के एक फैसले ने इजराइल के एनएसओ समूह को पेगासस के उपयोग से जासूसी में करने का जिम्मेदार पाया है तो कांग्रेस ने पूछा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट विपक्षी राजनेताओं समत 300 से ज्यादा भारतीय व्हाट्सऐप्प उपयोगकर्ताओं की कथित हैकिंग की जांच करेगा। दे टेलीग्राफ की यह लीड आज दूसरे अखबारों में लीड हो सकती थी पर नहीं है। इसके अलावा, कल आपने पढ़ा होगा कि सरकार ने चुनाव संबंधी नियमों में परिवर्तन किये हैं। यह खबर (या प्रचार) कल नवोदय टाइम्स में कल चार कॉलम का बॉटम था। इंडियन एक्सप्रेस में भी पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर तो थी ही। आज कांग्रेस ने इसकी आलोचना की है तो खबर दि एशियन एज और हिन्दुस्तान टाइम्स में तो है ही, इंडियन एक्सप्रेस की खबर भी मूल खबर से बड़ी है। शीर्षक भी अच्छा भला है, चुनाव नियमों में परिवर्तन चुनाव आयोग की ईमानदारी को नष्ट करने की साजिश का भाग है।
मुझे लगता है कि सरकार जब अदाणी मामले को छोड़कर संविधान पर चर्चा करा रही है उसके रक्षक होने और उसे बदलने के इच्छुक होने के आरोप लगाये जा रहे हैं। भाजपा दमखम से अपनी राजनीति कर रही है और प्रचारकों को लगा रखा है तो सामान्य खबर का भी महत्व बढ़ जाता है यह तो चुनाव आयोग की रीढ़ खत्म करने जैसा मामला है और इसलिये संविधान पर भी हमला है लेकिन बाकियों के लिए यह पहले पन्ने की खबर नहीं है तो बात सामान्य नहीं है। जहां कल भी नहीं थी और आज भी नहीं है उन्हें तो अपनी देश भक्ति के बारे में सोचना चाहिये। अगर अखबार निकालने की जिम्मेदारी ली है तो इस मुश्किल समय पर अपना रुख साफ रखना चाहिये। वह इसलिए भी कि भाजपा जैसी अनैतिक पार्टी को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किये जाने की भी मांग की जा सकती है। अगर भविष्य में कभी ऐसा हुआ तो मीडिया को आज की रिपोर्टिंग के लिए याद किया जायेगा। खबरों की परिभाषा बदलना भाजपा की राजनीति (अगर वह सौ प्रतिशत शुद्ध है भी) का समर्थन करना नहीं है। हालांकि वह अलग मुद्दा है।
द टेलीग्राफ की आज की रिपोर्ट भारतीय जनता पार्टी की सरकार की कार्यशैली और पिछली कार्रवाइयों व चुप्पी की भी याद दिलाई है। इससे लगता है कि मामले में सुप्रीम कोर्ट को भी प्रभावित किया गया या धोखे में रखा गया हो सकता है। मैंने इसीलिए कहा है कि भविष्य में भाजपा को चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दिये जाने की मांग हो सकती है और भाजपा निर्वाचित जब प्रतिनिधियों, विपक्षियों से निपटने के लिए खुलेआम सत्ता का दुरुपयोग कर रही है तो यह सब दर्ज हो ही रहा है और निश्चित रूप से यह मांग की जा सकेगी। सुनी जायेगी कि नहीं वह अलग बात है लेकिन मामला बन तो रहा ही है। ऐसे में जेपी यादव ने द टेलीग्राफ में अपनी रिपोर्ट में लिखा है, 2021 में मीडिया रपटों में कहा गया था कि पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल तीन विपक्षी नेताओं, कम से कम दो मौजूदा केंद्रीय मंत्रियों (भाजपा के ही), एक न्यायाधीश और भारत में कई पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और व्यापारियों की जासूसी करने के लिए किया गया था। खबर यह भी थी कि पेगासस केवल सरकारों को बेचा जाता है। (भारत सरकार ने अभी तक ना तो पेगासस खरीदना स्वीकार किया है और ना इससे इनकार किया है)। नरेंद्र मोदी सरकार और एनएसओ समूह ने आरोपों को खारिज कर दिया था। शुक्रवार को कैलिफोर्निया के उत्तरी जिले के लिए अमेरिकी जिला न्यायालय ने 2019 में 1,400 व्हाट्सएप उपयोगकर्ताओं के उपकरणों की हैकिंग के लिए एनएसओ समूह को उत्तरदायी पाया।
कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने रविवार को इस फैसले के आधार पर आरोप लगाया कि इन 1,400 उपयोगकर्ताओं में 300 भारतीय शामिल हैं और उन्होंने मोदी सरकार से कई सवाल पूछे। उन्होंने एक्स पर एक लंबी पोस्ट में कहा है, “पेगासस स्पाइवेयर मामले में (अमेरिकी अदालत का) फैसला साबित करता है कि कैसे अवैध स्पाइवेयर रैकेट में भारतीयों के 300 व्हाट्सएप नंबरों को निशाना बनाया गया। मोदी सरकार को जवाब देने का समय आ गया है: लक्षित 300 नाम कौन हैं! दो केंद्रीय मंत्री कौन हैं? तीन विपक्षी नेता कौन हैं? संवैधानिक प्राधिकारी कौन है? पत्रकार कौन हैं? व्यवसायी कौन हैं?” सुरजेवाला ने कहा: “भाजपा सरकार और एजेंसियों द्वारा कौन सी जानकारी प्राप्त की गई? इसका उपयोग कैसे किया गया – दुरुपयोग कैसे किया गया और इसका क्या परिणाम हुआ? क्या वर्तमान सरकार में राजनीतिक कार्यकारी/अधिकारियों और एनएसओ के स्वामित्व वाली कंपनी के खिलाफ उचित आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे?” कई याचिकाओं में मांग किये जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में पेगासस जासूसी आरोपों की जांच के लिए एक तकनीकी समिति का गठन किया था। समिति ने 2022 में अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए कहा कि उसे पेगासस के माध्यम से अवैध निगरानी का कोई निर्णायक सबूत नहीं मिला है। पूरी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तकनीकी समिति ने शिकायत की थी कि “सरकार ने उसकी जांच में पूरा सहयोग नहीं किया है।” भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “समिति ने एक बात कही थी कि सरकार ने मैलवेयर या स्पाइवेयर के लिए फोन की जांच करने के कार्य में पूरा सहयोग नहीं किया है।”
कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार पूरी तरह मनमानी कर रही है और (प्रचारकों तथा वेतन भोगियों के अलावा) ऐसी सरकार के समर्थन का कोई कारण नहीं हो सकता है। फिर भी जो करना चाहे उसे रोका नहीं जा सकता है और जो कर रहा है वह ऐसा ही माना जायेगा। हिन्दुत्व की रक्षा के लिए यह कीमत सही है कि नहीं उसपर विचार तो करना ही पड़ेगा। चुनाव नियम में बदलाव साधारण नहीं है। खबरों के अनुसार, यह कदम पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा भारत के चुनाव आयोग को हाल ही में दिए गए निर्देश के बाद उठाया गया है। इसमें हरियाणा विधानसभा चुनाव से संबंधित सभी दस्तावेज साझा करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें सीसीटीवी फुटेज को भी चुनाव संचालन नियमों के नियम 93(2) के तहत स्वीकार्य माना गया था, तथा यह निर्देश याचिकाकर्ता महमूद प्राचा के साथ साझा किया गया था। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “नियम में चुनाव पत्रों का उल्लेख किया गया है। चुनाव पत्र और दस्तावेज विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का उल्लेख नहीं करते हैं। इस अस्पष्टता को दूर करने और मतदान की गोपनीयता के उल्लंघन और एक व्यक्ति द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके मतदान केंद्र के अंदर के सीसीटीवी फुटेज के संभावित दुरुपयोग के गंभीर मुद्दे पर विचार करने के लिए, मतदान केंद्र के अंदर के सीसीटीवी फुटेज के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियम में संशोधन किया गया है।”
कोई भी जानता है और समझ सकता है कि वास्तविक सीसीटीवी फुटेज और एआई से छेड़छाड़ कर बनाये गये फुटेज में अंतर होगा। अगर इसे सार्वजनिक नहीं किया जाना है तो रिकार्ड करने और उसपर खर्च करने की क्या जरूरत है? जहां तक समय पर काम आने की बात है तो महमूद प्राचा ने ईवीएम के दुरुपयोग से संबंधित तथ्यों की पुष्टि के लिए ही वीडियो जारी करने की मांग की थी और सरकार उसे जारी करने की बजाय पहले ही कह रही है कि एआई से उसका दुरुपयोग किया जा सकता है और दुरुपयोग दिखा दिये जाने के बाद यही कहना चुनाव आयोग का पुराना तरीका है। 2010 में जब ईवीएम से छेड़छाड़ करके दिखा दिया गया तो कह दिया गया कि हमने नहीं दिया था चोरी का है। हालांकि चोरी के ईवीएम से भी छेड़छाड़ हो गई थी तभी ऐसा करके दिखाने और वीडियो सार्वजनिक करने के लिए संबंधित इंजीनियर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई और उन्हें जेल जाना पड़ा। वह एआई का जमाना नहीं था और तभी साबित किया जा चुका है ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है। सरकार और चुनाव आयोग कहते रहे हैं कि उसके अधिकारियों की निगरानी में यह संभव नहीं है और सीसीटीवी की जरूरत इसी को साबित करने के लिए थी और इसीलिये रिकार्ड करने का आदेश दिया गया होगा। अब नियम में बदलाव कर बचाव किया जा रहा है और यह सब उस सरकार ने किया है जो फंस जाने पर संविधान की रक्षक होने का भी दावा कर रही है।
यह तो हुई सरकार और चुनाव आयोग की बात। पर इस सत्य का खुलासा करना तो अखबारों का काम है पर उनमें से कितने ने यह काम खुद किया वह तो छोड़िये विपक्ष ने कल खबर छपने के बाद कहा कि चुनाव नियमों में परिवर्तन लोकतंत्र पर हमला है और इसकी आलोचना की तो आज यह खबर मेरे आठ में से दो ही अखबारों, दि एशियन एज और हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर हैं। यही नहीं, कल आपने पढ़ा कि जीएसटी कौंसिल ने पुरानी कारों पर जीएसटी 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत करने का निर्णय किया है। अखबारों ने यह खबर तो नहीं ही छापी आज सिर्फ द हिन्दू ने पहले पन्ने पर छापा है कि कांग्रेस ने केंद्र सरकार से मांग की है कि जीएसटी को दुरुस्त करे। इस खबर को भी ढूंढ़ना पड़ रहा है।
पीएमएलए के मामले
इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी एक खबर के अनुसार ‘उसे पता चला है’ कि, अदालतों में मामले टिक नहीं पा रहे हैं सो ईडी ने स्टाफ से कहा कि साजिश भर के आधार पर पीएमएलए मामले नहीं बनाये जायें। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला ईडी का नहीं है और अपने स्तर पर ईडी अगर विपक्षी नेताओं को परेशान कर रहा है तो सरकार उसे निदेशक को सेवा विस्तार दिलाने के लिए परेशान नहीं होती। फिर भी खबर ऐसे छपी है जैसे ईडी को अपनी गलतियों का अहसास हो गया है और जैसे वह पश्चाताप करने की ओर बढ़ रहा हो। मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई खबर है और वह भी पहले पन्ने पर टॉप पर छपने लायक। खासकर तब जब बताया गया है कि कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसी तरह, आईएएस अधिकारी के खिलाफ छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में भी सुप्रीम कोर्ट ने मामला रद्द कर दिया था। कुल मिलाकर, ईडी ने तमाम मामलों में मुंह की खाई है जबकि निर्वाचित जनप्रतनिधियों को जेल में रहना पड़ा है। इस मामले में खबर अगर हो भी तो आलोचनात्मक होगी न कि समय के अनुसार काम करने के लिए प्रशंसा करने वाली। फिर भी ईडी इन दिनों चर्चित हैं तो कुछ भी पढ़ा जायेगा और उस लिहाज से खबर है ही। मेरा मुद्दा यह है कि इसके लिए ईडी की आलोचना होनी चाहिये, जिनलोगों को परेशान किया गया उनके नाम सार्वजनिक होने चाहिये और उन्हें हुए नुकसान की भरपाई की मांग की जानी चाहिये – यह सब कौन करेगा?
प्रशंसा वाली खबर भी नहीं है
वैसे, आज के अखबारों ने नहीं लगता कि पत्रकारिता वैसी ही है। और उसमें आवश्यक सुधार नहीं हो रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने प्रधानमंत्री के कुवैत दौरे की लीड खबर के साथ तीन कॉलम की एक खबर छापी है, मोदी को कुवैत का सर्वोच्च सम्मान — मुबारक अल-कबीर मिला। खबर सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी है। तथ्य है कि तीसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी प्रचार के जरिये भी भारत के लिए जितने लाभदायक साबित किये गये हैं उससे ज्यादा विदेशियों के लिए किये गये हैं। किस देश ने उन्हें अपना सम्मान नहीं दिया और किस देश के प्रमुख ने पांव नहीं छुए जैसी खबरों के बाद अगर भारत में या भारत के नागरिकों को सिलेंडर की कीमत, या डॉलर के मुकाबले रुपये या पेट्रोल डीजल की कीमत के रूप में कोई राहत नहीं मिली है तो विदेशियों के काम आने पर ध्यान देने की जरूरत है और यह तय किया जाना चाहिये कि उनका प्रधानमंत्री रहना भारत के लिए फायदेमंद है, सिर्फ अदाणी के लिए, संघ परिवार के लिए, उनके अपने लिये या विदेशियों के लिए। पुरस्कारों से तो लगता है कि विदेशियों के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद रहे हैं। आज यह पुरस्कार उन्हीं खबरों की कड़ी में एक नया मोती है पर किसी और ने नहीं छापा – तो लगता है अब लोग उनका सच समझ रहे हैं।
बैंक में लॉकर तोड़ चोरी
अमर उजाला में पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार लखनऊ में इंडियन ओवरसीज बैंक के 42 लॉकर तोड़ करोड़ों की चोरी शीर्षक से एक खबर छपी है। खबर के साथ छपी फोटो में वह दीवार दिख रही है जिसमें सेंध लगाई गई। ऐसी दीवार वाले परिसर में बैंक होना सेंध लगाने के निमंत्रण देना है। खबर बताती है कि बाहर की तरफ सीसीटीवी भी नहीं थे। मुद्दा यही है कि जब खाना है नहीं, खाने देना नहीं है तो नामुमकिन मुमकिन होंगे ही। इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है, मोहाली में बिल्डिंग गिरी। मरने वालों एक टेकी भी जो अपना फोन लेने वापस गया था। 30 साल का अभिषेक धनवाल शनिवार की शाम जिम में था तो उसके ट्रेन ने देखा दीवार में दरार पड़ रही थी। सभी भागे। बाद में अभिषेक को अपने फोन का ख्याल आया और वह वापस लेकर आता उससे पहले तीन मंजिल की बिल्डिंग गिर गई। सरकार ने प्रदूषण रोकने के लिए पुरानी कारों पर प्रतिबंध लगा दिया है। पुराने घर गिराना कितना मुश्किल है आप जानते हैं। इंजीनियर की पिटाई का मामला किसे नहीं याद होगा। ऐसे में बैंक की दीवार में सेंध मारना और जिम की बिल्डिंग गिर जाना भले पहले पन्ने की खबर हो, फर्क क्या पड़ना है।
द हिन्दू की खबर पर सवाल
जहां तक पत्रकारिता की गुणवत्ता और स्तर की बात है द हिन्दू में टॉप पर एक खबर का शीर्षक आरटीआई के जवाब के हवाले से है, बंगाल में जिन मनरेगा साइट्स का निरीक्षण हुआ उनमें आधे में दोष मिले। केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल को मनरेगा के पैसे नहीं दे रही है यह पुरानी बात है और यह पहले भी बताया जा चुका है कि इस कारण उसे लागू करने में गड़बड़ी है। फिर भी राज्य सरकार ने काम कराये हैं और गरीबों को उनके काम के पैसे मिलने चाहिये। केंद्र सरकार को राज्य सरकार से जो भी मुद्दा हो – निपटे पर सरकारी भुगतान नहीं रुकना चाहिये और रुका हुआ है तो आरटीआई के जरिये इस जवाब का मकसद और मतलब जो हो, भुगतान रोकना सही नहीं हो जायेगा। अगर निरीक्षण नतीजों के लिए भुगतान रोके गये हैं तो केंद्र सरकार को बताना चाहिये कि दूसरे किन राज्यों में निरीक्षण किये गये हैं और वहां की रिपोर्ट कैसी है वहां भुगतान हुए हैं कि नहीं। बगाल के खिलाफ आरटीआई जवाब का यह अंश पढ़ते ही मेरे दिमाग में यह सवाल आया कि दूसरे राज्यों में निरीक्षण कब हुए या क्यों नहीं हुए, उनकी रिपोर्ट क्या है आदि। उसके बिना इस खबर का कोई मतलब नहीं है पर बड़ी सी खबर छपी है। मुझे खबर से दिक्कत नहीं है। दिक्कत इससे है कि भाजपा सरकार के खिलाफ ऐसी खबर नहीं दिखी।
आप की खबर पर भाजपा
आज कल जब विपक्षी दलों की खबरें नहीं या बहुत कम छपती हैं तो इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर का शीर्षक है, दिल्ली चुनाव से पहले आप महिलाओं बुजुर्ग योजनाओं के लिए दरवाजे पर नामांकन शुरू करेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे सिंगल कॉलम में छापा है और इसके साथ बताया है कि अंदर पेज चार पर बांसुरी स्वराज ने कहा कि,यह झूठ का पुलिन्दा है। नवोदय टाइम्स में बांसुरी स्वराज फोटो के साथ है। शीर्षक है, घाटे में सरकार, छलावा है योजनाएं : भाजपा। इसमें कहा गया है, अरविन्द केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव से पहले भी महिलाओं को 1000 रुपये प्रतिमाह देने की घोषणा की थी, फार्म भी भरवाये थे पर दिया एक रुपया भी नहीं। मुद्दा यह है कि मतदाताओं को पता नहीं है या उन्हीं के पास फिर जायेंगे तो उनसे नहीं सुनेंगे? जाहिर है नए लोगों के पास जाना है और चुनाव से पहले यह कोशिश काफी कुछ कहती है। उसपर बांसुरी की झुंझलाहट भी बहुत कुछ कहती है और आज की राजनीति की रिपोर्टिंग का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है।


