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मोदी राज में बेरोजगारी चरम पर, UPSC एक्जाम देने वालों के लिए भी बुरी खबर, सीटों की संख्या घटी

Ravish Kumar : यूपीएससी देने वाले दस लाख छात्रों के लिए बुरी खबर… सीटों की संख्या घटी… 2018 में यूपीएससी की परीक्षा के लिए सीटों की संख्या छह साल में सबसे कम है। 2018 की यूपीपीएसी परीक्षा के लिए नोटिफिकेशन आ गया है। 782 सीटों के लिए परीक्षा हो रही है। 2017 की तुलना में 198 सीटें कम हैं। यह पिछले छह साल में सबसे कम है। आई ए एस आई पी एस की संख्या कम हो रही है तो सोचिए बाकी अधिकारियों की संख्या में किस स्तर और रफ़्तार से कटौती हो रही होगी।

Ravish Kumar : यूपीएससी देने वाले दस लाख छात्रों के लिए बुरी खबर… सीटों की संख्या घटी… 2018 में यूपीएससी की परीक्षा के लिए सीटों की संख्या छह साल में सबसे कम है। 2018 की यूपीपीएसी परीक्षा के लिए नोटिफिकेशन आ गया है। 782 सीटों के लिए परीक्षा हो रही है। 2017 की तुलना में 198 सीटें कम हैं। यह पिछले छह साल में सबसे कम है। आई ए एस आई पी एस की संख्या कम हो रही है तो सोचिए बाकी अधिकारियों की संख्या में किस स्तर और रफ़्तार से कटौती हो रही होगी।

2017 की यूपीएससी परीक्षा के लिए 980 सीटें थीं। 2016 की तुलना में 99 सीटें कम थीं। तब कहा गया था कि पांच साल में सबसे कम सीटें निकली हैं। 2016 की यूपीपीएससी की परीक्षा के लिए 1079 सीटें रखी गईं थीं। 2015 में यूपीपीएससी की परीक्षा के लिए 1129 सीटें थीं। 2014 में यूपीपीएससी की परीक्षा 1299 सीटें थीं । इस बीच नए राज्य बने, नए नए विभाग बने, नई योजनाएं आईं इसके बाद भी शीर्ष अधिकारियों की सीटों में कटौती हो रही है। तब क्यों आई ए एस, आई पी एस अधिकारियों की संख्या कम हो रही है? फिर सोचिए, बाकी स्तर के अधिकारियों की संख्या में किस रफ़्तार में कटौती हो रही होगी। यह दुखद है।

पूरा देश हिन्दू मुस्लिम टॉपिक पर डिबेट करने में सनका हुआ है। नशे की तरह लोगों को आनंद आ रहा है। इन सब का लाभ उठाकर नौकरियां कम की जा रही हैं। नौकरी में असुरक्षा बढ़ती जा रही है। घटती नौकरी के बीच चैनलों पर हिन्दू मुस्लिम टॉपिक की बहुलता बताती है कि हमारे नौजवानों ने ही जैसे कह दिया हो कि हमें सिर्फ हिन्दू मुस्लिम टॉपिक चाहिए। न नौकरी चाहिए न सैलरी चाहिए। नौजवानों, आपके लिए दुख हो रहा है। पर क्या कर सकता हूं। रेलवे के छात्रों के लिए उम्र सीमा 30 से घटाकर 28 कर दी गई। आप अपने अपने इम्तहानों के खेमें में बंटे रहे। तनाम परीक्षाओं में नौजवान अपने अपने टापू पर फंसे हैं। कोई किसी के लिए नहीं बोल रहा है। रेलवे वाले सिर्फ अपने लिए बोल रहे हैं, कंप्यूटर आपरेटर वाले रेलवे के लिए नहीं बोल रहे हैं, दोनों मिलकर शिक्षा मित्रों के लिए नहीं बोल रहे हैं, इनमें से किसी के लिए यूपीएससी वाले नहीं बोल रहे हैं। लेकिन हिन्दू मुस्लिम टॉपिक दे दो, सब मिलकर बोलेगे। अच्छा है कि कुछ छात्रों को बात समझ आ रही है कि इसके बहाने पर्दे के पीछे क्या खेल खेला जा रहा है मगर अब भी यह नशा उतरा नहीं है।

जब नौजवान धर्म के अफीम में डूबा हो तो तब वह समय नेता बनने का स्वर्ण काल होता है। फर्ज़ी बात ही कहनी होती है, लोग लपक कर गटकने के लिए तैयार बैठे हैं। अब ये फ्राड नेता आपको लेक्चर भी देंगे कि रोज़गार देने वाला बनें। मांगने वाला नहीं। तो फिर खुद मंत्री संत्री बनने के लिए क्यों मारामारी कर रहे हैं, क्यों मंत्री बन रहे हैं, क्यों सांसद बन रहे हैं, क्यों विधायक बन रहे हैं? ख़ुद सरकार में बने रहने के लिए तीन सौ झूठ और प्रपंच रचेंगे और आपको नैतिक शिक्षा देंगे कि सरकारी नौकरी क्यों मांग रहे हो। इसिलए कहा कि ख़ुश रहो कि नौकरियां कम हो रही हैं। सरकार आपको जॉब गिवर बनने का मौक़ा दे रही है।

एनडीटीवी के चर्चित और बेबाक एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

Anil Singh : रोज़गार पर देश भर में बढ़ रहा है हाहाकार! केंद्रीय वित्त मंत्रालय के इतने बड़े फौज-फांटे ने भले ही आर्थिक सर्वे 2018 में बेरोज़गारी की तस्वीर न पेश की हो। लेकिन लोकनीति-सीएसडीएस का ताज़ा सर्वे सारा सच खोलकर सामने रख देता है। यह सर्वे इसी जनवरी माह के दूसरे व तीसरे हफ्ते के दौरान देश के 19 प्रमुख राज्यों में किया गया। सर्वे में भाग लेनेवाले 28 प्रतिशत मतदाता मानते हैं कि देश के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी की है। भाजपा के सत्ता में आने से पहले साल 2013 में यह संख्या 13 प्रतिशत थी। यानी, मोदी सरकार के दौरान यह 15 प्रतिशत चढ़कर दोगुनी से ज्यादा हो गई है। 49 प्रतिशत मानते हैं कि पिछले तीन-चार सालों में उनके लिए अपने क्षेत्र में काम पाना पहले से ज्यादा कठिन हो गया है। ग्रामीण इलाकों के 50 प्रतिशत लोग बताते हैं कि गांवों में काम पाने के अवसर लगातार घटते जा रहे हैं। वहीं, 5-10 लाख आबादी वाले शहरों के 61 प्रतिशत लोगों ने बताया कि पिछले तीन-चार साल में उनका जीवन बद से बदतर होता गया है। शायद अब आपको समझ में आया होगा कि अचानक देश भर में हिंदू-मुस्लिम झगड़े क्यों खड़े किए जाने लगे हैं और कौन इसके पीछे है।

वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संपादक अनिल सिंह की एफबी वॉल से.

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