मोदी राज में बेरोजगारी चरम पर, UPSC एक्जाम देने वालों के लिए भी बुरी खबर, सीटों की संख्या घटी

Ravish Kumar : यूपीएससी देने वाले दस लाख छात्रों के लिए बुरी खबर… सीटों की संख्या घटी… 2018 में यूपीएससी की परीक्षा के लिए सीटों की संख्या छह साल में सबसे कम है। 2018 की यूपीपीएसी परीक्षा के लिए नोटिफिकेशन आ गया है। 782 सीटों के लिए परीक्षा हो रही है। 2017 की तुलना में 198 सीटें कम हैं। यह पिछले छह साल में सबसे कम है। आई ए एस आई पी एस की संख्या कम हो रही है तो सोचिए बाकी अधिकारियों की संख्या में किस स्तर और रफ़्तार से कटौती हो रही होगी।

2017 की यूपीएससी परीक्षा के लिए 980 सीटें थीं। 2016 की तुलना में 99 सीटें कम थीं। तब कहा गया था कि पांच साल में सबसे कम सीटें निकली हैं। 2016 की यूपीपीएससी की परीक्षा के लिए 1079 सीटें रखी गईं थीं। 2015 में यूपीपीएससी की परीक्षा के लिए 1129 सीटें थीं। 2014 में यूपीपीएससी की परीक्षा 1299 सीटें थीं । इस बीच नए राज्य बने, नए नए विभाग बने, नई योजनाएं आईं इसके बाद भी शीर्ष अधिकारियों की सीटों में कटौती हो रही है। तब क्यों आई ए एस, आई पी एस अधिकारियों की संख्या कम हो रही है? फिर सोचिए, बाकी स्तर के अधिकारियों की संख्या में किस रफ़्तार में कटौती हो रही होगी। यह दुखद है।

पूरा देश हिन्दू मुस्लिम टॉपिक पर डिबेट करने में सनका हुआ है। नशे की तरह लोगों को आनंद आ रहा है। इन सब का लाभ उठाकर नौकरियां कम की जा रही हैं। नौकरी में असुरक्षा बढ़ती जा रही है। घटती नौकरी के बीच चैनलों पर हिन्दू मुस्लिम टॉपिक की बहुलता बताती है कि हमारे नौजवानों ने ही जैसे कह दिया हो कि हमें सिर्फ हिन्दू मुस्लिम टॉपिक चाहिए। न नौकरी चाहिए न सैलरी चाहिए। नौजवानों, आपके लिए दुख हो रहा है। पर क्या कर सकता हूं। रेलवे के छात्रों के लिए उम्र सीमा 30 से घटाकर 28 कर दी गई। आप अपने अपने इम्तहानों के खेमें में बंटे रहे। तनाम परीक्षाओं में नौजवान अपने अपने टापू पर फंसे हैं। कोई किसी के लिए नहीं बोल रहा है। रेलवे वाले सिर्फ अपने लिए बोल रहे हैं, कंप्यूटर आपरेटर वाले रेलवे के लिए नहीं बोल रहे हैं, दोनों मिलकर शिक्षा मित्रों के लिए नहीं बोल रहे हैं, इनमें से किसी के लिए यूपीएससी वाले नहीं बोल रहे हैं। लेकिन हिन्दू मुस्लिम टॉपिक दे दो, सब मिलकर बोलेगे। अच्छा है कि कुछ छात्रों को बात समझ आ रही है कि इसके बहाने पर्दे के पीछे क्या खेल खेला जा रहा है मगर अब भी यह नशा उतरा नहीं है।

जब नौजवान धर्म के अफीम में डूबा हो तो तब वह समय नेता बनने का स्वर्ण काल होता है। फर्ज़ी बात ही कहनी होती है, लोग लपक कर गटकने के लिए तैयार बैठे हैं। अब ये फ्राड नेता आपको लेक्चर भी देंगे कि रोज़गार देने वाला बनें। मांगने वाला नहीं। तो फिर खुद मंत्री संत्री बनने के लिए क्यों मारामारी कर रहे हैं, क्यों मंत्री बन रहे हैं, क्यों सांसद बन रहे हैं, क्यों विधायक बन रहे हैं? ख़ुद सरकार में बने रहने के लिए तीन सौ झूठ और प्रपंच रचेंगे और आपको नैतिक शिक्षा देंगे कि सरकारी नौकरी क्यों मांग रहे हो। इसिलए कहा कि ख़ुश रहो कि नौकरियां कम हो रही हैं। सरकार आपको जॉब गिवर बनने का मौक़ा दे रही है।

एनडीटीवी के चर्चित और बेबाक एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

Anil Singh : रोज़गार पर देश भर में बढ़ रहा है हाहाकार! केंद्रीय वित्त मंत्रालय के इतने बड़े फौज-फांटे ने भले ही आर्थिक सर्वे 2018 में बेरोज़गारी की तस्वीर न पेश की हो। लेकिन लोकनीति-सीएसडीएस का ताज़ा सर्वे सारा सच खोलकर सामने रख देता है। यह सर्वे इसी जनवरी माह के दूसरे व तीसरे हफ्ते के दौरान देश के 19 प्रमुख राज्यों में किया गया। सर्वे में भाग लेनेवाले 28 प्रतिशत मतदाता मानते हैं कि देश के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी की है। भाजपा के सत्ता में आने से पहले साल 2013 में यह संख्या 13 प्रतिशत थी। यानी, मोदी सरकार के दौरान यह 15 प्रतिशत चढ़कर दोगुनी से ज्यादा हो गई है। 49 प्रतिशत मानते हैं कि पिछले तीन-चार सालों में उनके लिए अपने क्षेत्र में काम पाना पहले से ज्यादा कठिन हो गया है। ग्रामीण इलाकों के 50 प्रतिशत लोग बताते हैं कि गांवों में काम पाने के अवसर लगातार घटते जा रहे हैं। वहीं, 5-10 लाख आबादी वाले शहरों के 61 प्रतिशत लोगों ने बताया कि पिछले तीन-चार साल में उनका जीवन बद से बदतर होता गया है। शायद अब आपको समझ में आया होगा कि अचानक देश भर में हिंदू-मुस्लिम झगड़े क्यों खड़े किए जाने लगे हैं और कौन इसके पीछे है।

वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संपादक अनिल सिंह की एफबी वॉल से.

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देश के सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले में देश के सबसे अमीर अम्बानी परिवार का दामाद शामिल

यह घोटाला भी अच्छे दिनों की गिनती में आ जायेगा…. 

Girish Malviya : देश के सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले में देश के सबसे अमीर अम्बानी परिवार का दामाद शामिल… यदि यह हेडलाइन आपको आज के अखबारों में, न्यूज़ चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज़ में नहीं दिखाई दे रही है इसका मतलब है कि मीडिया पूरा बिक चुका है जो ऊपर लिखा है वह 100 प्रतिशत सत्य है लेकिन कोई बताएगा नहीं! कल जिस नीरव मोदी का नाम पीएनबी घोटाले में सामने आ रहा है उसके सगे भाई निशाल मोदी से, धीरूभाई अंबानी की बेटी, मुकेश ओर अनिल अंबानी की बहन दीप्ति सलगांवकर की बेटी इशिता की शादी हुई है. सीबीआई ने एफआईआर में निशाल का भी नाम लिया है.  कल पीएनबी बैंक में जो घोटाला सामने आया है उसने पूरे विश्व मे भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की इज्जत की धज्जियाँ बिखेर दी है. पोस्ट लम्बी है पर पूरी जरूर पढियेगा. वैसे पता नहीं मीडिया इसे किस तरह से दिखाएगा. पर वास्तव में यह घोटाला बताता है कि हमारी बैंकिंग व्यवस्था की चाबी किस तरह के भ्रष्ट लोगों के हाथ में आ गयी है.

आपकी जानकारी के लिए बता दूं पंजाब नेशनल बैंक देश में एसबीआई के बाद सार्वजनिक क्षेत्र का दूसरा सबसे बड़ा बैंक है. जो रकम घोटाले की बताई जा रही है वह 11,330 करोड़ रुपए (1.8 अरब डॉलर) है. पंजाब नेशनल बैंक की 2017 में 1320 करोड़ नेट इनकम थी. यानि घोटाला सालभर की नेट इनकम का आठ गुना है. घोटाले के सामने आने के बाद शेयर बाजार में पीएनबी के शेयरों की कीमत 10 फीसद गिर गई हैं. दूसरे बैंकों के शेयरों ने भी खूब गोता लगाया है। अब पीएनबी तो अपना दामन बचाते हुए कह रहा है कि इस रकम से हुए लेन-देन अनिश्चित स्वरूप के हैं. लेकिन यदि लेन-देन की वैधता साबित हो जाती है तो बैंक को इतनी रकम का प्रावधान अपने बैलेंसशीट में करना होगा. यानि जिसकी आय 1320 करोड़ रुपये वार्षिक हो उसे 11330 करोड़ रुपये भरने ही होंगे. यह रक़म बैंक के मार्केट कैप का एक तिहाई है.

अब जिसके बारे में मीडिया चुप होकर बैठ गया है वह भी सुन लीजिए कि यह घोटाला किया किसने है? दरअसल भारत मे डायमंड ओर डायमंड ज्वेलरी से जुड़ा व्यापार 70 हजार करोड़ रुपए का है. इस व्यापार का मुख्य गढ़ सूरत और मुम्बई है. कहते हैं कि इस इंडस्ट्री के छह बड़े बिजनेस टाइकून हैं जिनके आसपास यह सारा व्यापार घूमता है. उसमें से दो टाइकून इस घोटाले में संलिप्त पाए गए हैं. पहले हैं नीरव मोदी और दूसरे हैं मेहुल चोकसी.  नीरव मोदी ज्वेलरी डिजाइनर कहे जाते हैं और 2.3 अरब डॉलर के फ़ायरस्टार डायमंड के संस्थापक हैं. यह साल 2013 में फ़ोर्ब्स लिस्ट ऑफ़ इंडियन बिलिनेयर में आए थे और तब से अपनी जगह बनाए हुए हैं. नीरव देश के सबसे रईस लोगों की गिनती में 46वें पायदान पर खड़े हैं. इनके खिलाफ एक हफ्ते पहले भी 280 करोड़ की धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज हुआ. नीरव की पत्नी एमी और भाई निशाल मोदी भी इस घोटाले में शामिल हैं.

दूसरे आरोपी हैं मेहुल चोकसी. आपने नक्षत्र, संगिनी और अश्मि जैसे ब्रांड का नाम सुना होगा. मेहुल चोकसी इसे बनाने वाली कम्पनी गीतांजलि जेम्स के मालिक हैं और नीरव मोदी के चाचा हैं. पर ऐसा नही है कि गीतांजली जेम्स इससे पहले बिल्कुल साफ सुथरी कम्पनी रही हो. 2013 में ही सेबी ने इसके खिलाफ कुछ एक्शन लिया था. उन पर आरोप थे कि गीतांजलि में ट्रेड करने के लिए चोकसी 25 शैल कंपनियों को फाइनैंस करते थे.  लेकिन 2013 भी छोड़िए. आरोपी नीरव मोदी के यहाँ जनवरी 2017 में आयकर विभाग ने घर समेत 50 दफ्तरों पर छापेमारी की थी. उसी वक़्त इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने गीतांजली ग्रुप के दफ्तरों पर भी रेड मारी थी. यह मामला तभी खुल सकता था लेकिन कुछ नहीं किया गया.

अब आते हैं उस पक्ष की ओर जिसे समझना बहुत आवश्यक है कि यह घोटाला किया कैसे गया? आपने कुछ दिन पहले यह सुना होगा कि अमित शाह के बेटे को एक प्राइवेट वित्तीय कम्पनी ने लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किया था. यहाँ भी कुछ ऐसा ही मामला है.  दरअसल नीरव मोदी पीएनबी की मुम्बई कारपोरेट ब्रांच से हासिल एलओयू के आधार पर दूसरे देशों में कर्ज हासिल करता था. यह काम वर्ष 2010 से ही चल रहा था. एल ओ यू का अर्थ है “लेटर ऑफ अंडरटेकिंग”. यह एक बैंक शाखा की तरफ से, दूसरे बैंक शाखा को जारी एक ऐसा प्रपत्र है जो निश्चित खाताधारकों के पक्ष में दी गई एक गारंटी होती है। इसके आधार पर दूसरे जगह स्थित बैंक शाखा उस ग्राहक को कर्ज की सुविधा देती हैं.

नीरव मोदी पीएनबी की उक्त शाखा से हासिल एलओयू के आधार पर दूसरे देशों में कर्ज हासिल करता था. मोदी इस कर्ज को समय पर चुका देता था और बात दबी रहती थी. लेकिन हाल ही में नीरव मोदी ने कर्ज का भुगतान नहीं किया. हुआ यूं कि गड़बड़ी में शामिल पीएनबी के अधिकारियों ने अधिक रिश्वत की मांग की। मोदी ने इसे देने से मना कर दिया. इसके जवाब में उसे पीएनबी ने भी एलओयू जारी नहीं किया और वर्षों से चल रहा यह चक्र टूट गया. ऐसे में एक विदेशी बैंक ने हांगकांग की नियामक एजेंसी के साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक को सूचना भेज दी. आरबीआई ने जब पीएनबी से जबाव तलब किया तो उसके पास इसे सार्वजनिक करने और मामले की जांच करवाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा.  लेकिन यह मामला अब सिर्फ पीएनबी तक ही सीमित नहीं रह गया है. पता चला है कि यूनियन बैंक, इलाहाबाद बैंक और निजी क्षेत्र के एक्सिस बैंक ने भी पीएनबी की तरफ से गड़बडी करने वाले खाताधारकों को जारी एलओयू के आधार पर कर्ज दिए हैं.

सबसे अधिक शर्मिंदगी की बात तो यह है कि विदेशी बैंकों को भी एक तरह से धोखा दिया गया है. यह मामला भारतीय बैंकिंग पर लग चुका बदनुमा दाग है. यह मामला टिप ऑफ द आइसबर्ग भी साबित हो सकता है क्योंकि जानकारों की मानें तो बैंक एलओयू जारी करने का यह धंधा अनाधिकृत तौर पर आयातकों के साथ मिल कर खूब करते हैं और इसे परोक्ष तौर पर उन्हें शीर्ष अधिकारियों से अनुमति होती है. अब इस केस में अम्बानी के दामाद शामिल हैं, इसीलिए मोदी सरकार के वित्त मंत्रालय के बैंकिंग विभाग में संयुक्त सचिव लोक रंजन जी कह रहे है कि ‘यह एक बड़ा मामला नहीं है और ऐसी स्थिति नहीं है जिसे कहा जाए कि हालात काबू में नहीं है।’

अम्बानी के दामाद का मामला हो तो हालात क्यो न काबू में बताए जाएंगे, शायद यह घोटाला भी अच्छे दिनों की गिनती में आ जायेगा. 

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आपको याद होगा जून 2017 में रिजर्व बैंक ने 12 डिफॉल्टरों की पहली सूची जारी की थी इन 12 कंपनियों में बैंकिंग क्षेत्र का लगभग 25 फीसदी का बैड लोन हैं यह रकम लगभग 2 लाख करोड़ रुपये बताई गई थी. इन कम्पनियों में एस्सार स्टील, भूषण स्टील, एबीजी शिपयार्ड, इलेक्ट्रोस्टील और अलोक इंडस्ट्रीज बड़े लोन डिफॉल्टर के तौर पर शामिल थी. दीवालिया कानून के बाद इसे सबसे बड़ी कार्यवाही कहा जा रहा था.  अब जाकर पता चला है कि भारतीय रिजर्व बैंक की एनपीए की पहली सूची में शामिल 12 कंपनियों में से 9 मामलों के निपटान में बैंकों को अपने कुल बकाया कर्ज में औसतन 50 से 80 फीसदी की चपत लग सकती है। यह आकलन इन कंपनियों की बोली प्रक्रिया और पांच मामलों में लगाई गई बोली के आधार पर किया गया है.  इस 12 कम्पनियों की सूची के बाद 55 कम्पनियों की एक ओर सूची जारी की गयी है.  आरबीआई की इस नई सूची में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज और जयप्रकाश एसोसिएट बड़े डिफॉल्टरों के तौर पर शामिल हैं। इन दोनों कंपनियों पर 1 ट्रिलियन रुपये से अधिक का नॉन परफोर्मिंग असेट (बैड लोन) है.  यानी इस आधार पर देखा जाए भारतीय बैंकिंग व्यवस्था गहरे संकट में नजर आ रही है एसबीआई के तिमाही परिणाम इसी तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं.

इंदौर के पत्रकार गिरीश मालवीय की एफबी वॉल से.

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मोदी ने एक अच्छा मौका बकलोली-थेथरई में गंवा दिया, राहुल गांधी के जरूर अच्छे दिन ला दिए : यशवंत सिंह

Yashwant Singh :  मोदी ने एक अच्छा मौका बकलोली-थेथरई में गंवा दिया। बढ़ता आतंकवाद, गिरती इकानामी, चढ़ती महंगाई, उग्र बेरोजगारी, भयावह करप्शन और तेज होते जातीय-धार्मिक हमलों के बाद भी भाजपाई अगर 2019 में जीतने के सपने देख रहे हैं तो वाकई उनकी मानसिक स्थिति खराब है। राहुल गांधी को एक मौका देना बनता है। लिख लो, मेरा वोट अब राहुल गांधी को, 2019 में। मोदी ने जो दिन दिखा दिए, उसके आधार पर कह सकता हूँ कि उनसे सौ गुना ज्यादा समझदार नेता साबित होंगे राहुल गांधी, मेरा ये दावा है। कह सकते हैं कि मोदी ने अपनी करनी से राहुल गांधी के अच्छे दिन जरूर ला दिए हैं। बेहद दुखी और त्रस्त जनता अब राहुल गांधी पर ही दांव लगाएगी.

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जिन्हें जनता विजनरी और सीरियस मानती रही, आज वो अपने कर्मों से सबकी नजर में एक मजाक की चीज बन कर रह गए हैं… जिन पर सबसे ज्यादा जोक बनाए गए, उन्होंने अपने संघर्ष, समझ और हार कर भी उठ खड़े होने के जमीनी जज्बे से खुद को एक आधुनिक और समझदार व्यक्तित्व में शुमार कर लिया है… समझदारों के लिए इशारा काफी होता है.. मूर्ख दाएं बाएं निकल लें और अपने दूसरे भक्तों से समझदारी पाएं…

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मनरेगा को छोटी मोटी योजना मानते हैं? आरटीआई को आप छोटी चीज मानते हैं? गिनाने को हर कोई अपनी अपनी पार्टी के तीस चीज गिना देगा. लेकिन बात देश के वर्तमान हालत की हो रही है… ये जो बुरा हाल है, उसके लिए एकमात्र जिम्मेदार मोदी जी हैं.. ये तय मान लीजिए… ये लिख लीजिए… न महंगाई काबू हुई, न पेट्रोल डीजल के दाम घटे, न रोजगार है, न आतंकवाद रुका है, न पाकिस्तान शांत है, न देश में आंतरिक शांति है… गोवा में भाजपा वाले बीफ बिकवा रहे हैं तो कश्मीर में किनके साथ मिल कर सरकार चला रहे हैं… खुद देख लीजिए.. हां, जो कुछ फैक्ट्रियां वैक्ट्रियां चल रही थीं, वो बंद हो गईं… बैंक घाटे में चले गए.. तरह तरह के टैक्स लगा दिए गए… राफेल दलाली के बारे में पूछने पर दांत चियार रहे हैं… ऐसी दोगली और जनविरोधी पार्टी से भगवान बचाए…

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मोडिया कुछ बोला भई…. बढ़ते आतंकवाद पर…. सीमा पर बिछती लाश पर… आसमान चढ़े गैस पेट्रोल दाम पर.. राफेल-पीएनबी घोटाले पर… मरते किसानों पर… तबाह हुई फसलों पर… रेल के निजीकरण पर… रिटेल में सौ फीसदी विदेशी निवेश पर…. भू-लुंठित इकनॉमी पर… बढ़ती महंगाई पर.. बैंकों द्वारा खताधारकों की लूट खसोट पर… बंद हुए उद्योग धंधों पर… बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि पर…

अररर्रे… उ त विदेश में टहल रहा होगा… समधन बन के परधानों को गले लगा रहा होगा… उसको देश से क्या मतलब.. उसके लंठ लग्गू भग्गू मुसलमान पाकिस्तान बांग्लादेश गाय गोबर करने के लिए भारत में बैठे जो हैं.. हां, लाल किला में शुद्धिकरण महायज्ञ होगा… राम रथ यात्रा निकलेगा… आपको डायरेक्ट 13वी सदी में ले जाने की गारंटी है… इंतज़ार करिए… रामराज्य आएगा… दलित पिछड़ा पिटाएगा… मुसलमान पाकिस्तान भगाया जाएगा… प्यार करने वालों को दौड़ा दौड़ा कर मारा जाएगा… औरतों को उनकी औकात बताया जाएगा… मनु स्मृति सबको रटवाया जाएगा…

उसके बाद हर समस्या का हल हो जाएगा… देश सोने की चिड़िया बन जाएगा… तब सबके एकाउंट में पनरह पनरह लाख आएगा…
धीर धरो… और जोर से बोलो… जय जय श्रीराम 🙂 😀

परधान जी का एक वीडियो दे रहा हूं… देखिए जरा हिप्पोक्रेसी… क्लिक करिए इस लिंक पर…. https://www.youtube.com/watch?v=YLVLqYFdQWI

एक अन्य वीडियो भी डाल रहा हूँ, समधन जी के सिंगार व्यवहार पर…. क्लिक करिए इस लिंक पर…. https://www.youtube.com/watch?v=sLW1Gt9hRY4

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मुद्दे पर बात करने को कहो तो फेचकुर फेंकने लगते हैं लोग…सत्ता धारी आजकल अपोजीशन पार्टी वालों जैसी बकचोदी करने लगे हैं… वे हर जगह सरकार में हैं… लेकिन उन्हें सीरियस बातचीत से बैर है… काम की बात बिलकुल न करेंगे… कोई कर देगा, पूछ देगा तो वो फौरन मुस्लिम पाकिस्तान आतंकवाद बांग्लादेश कांग्रेस टाइप बक बक करने लगेंगे क्योंकि उनके दिलोदिमाग में बहुत कायदे से जहर भरा गया है… वे मनुष्य नहीं रह गए हैं, वे मोगांबो की फैक्ट्री के रोबोट बन गए हैं… जितनी प्रोग्रामिंग, उतनी वाकिंग, उतनी टाकिंग… सो, इनके दिमाग में जितना जहर भरा हुआ है, उतना उगलकर शांत हो जाने के अलवा कुछ न उगलेंगे-बकेंगे… वे ये कतई न बताएंगे कि आखिर कश्मीर में जिसे ‘आतंकवाद’ परस्त पार्टी कहते हो, उसी के साथ सरकार क्यों चलाते हो और कश्मीर से लेकर दिल्ली तक में जब तुम्हार शासन है तो कश्मीर में शांति क्यों नहीं लिए चले आते हो… क्यों वहां पत्थरबाजों का राज चलवाते हो… क्यों वहां सैनिकों और सिविलियन्स की लाशें गिरवाते हो… गाय भैंसा पूरे देश में चिल्लाते हो लेकिन गोवा में खुद ही बीफ क्यों बिकवाते हो रे… सीमा पर हमारे सैनिकों की लाशें क्यों गिरा रहे हैं रोज पाकिस्तान वाले… आतंकवादी क्यों रोज भारतीय सेना के मुख्यालयों पर धावा बोल जा रहे हैं… पेट्रोल डीजल के दाम रोज रोज क्यों बढ़वाते हो… फैक्ट्रियों और व्यापार को किसके इशारे पर तबाह कर डालते हो… रोजगराशुदा लोगों को घर काहें बिठाते हो… राफेल डील में दलाली लिए जाने पर काहे कुछ नहीं बोल बतियाते हो… काहें गोपनीयता का हवाला देकर दांत चियारते हो… क्या ये सब कुछ चुप्पा मनमोहन के राज में हो रिया है या छप्पन इंच वाले बकबक बाबा मोदी के राज में चल रिया है..

…आखिर में….

दो लाइनें सुन लो जहरबेरियों…. और जहरबोरियों…….

मुद्दे पर बात करने को कहो तो फेचकुर फेंकने लगते हैं लोग…

सवाल पूछ लो तो कांग्रेसियों को गरियाने लगते हैं भाजपा के लोग…

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अब भगवा भक्त सिखाएंगे पत्रकारिता। भयावह दौर है। बिना इमरजेंसी लगाए ये भक्त लोग आपातकाल को मात दे रहे हैं। जज, पत्रकार, दलित, मुस्लिम सब निशाने पर हैं। हाहाकार टाइप माहौल है। आतंकवाद चरम पर है। इकानामी की लंका लगी हुई है। महंगाई और बेरोजगारी भयंकरतम है। कुछ नहीं बदला, सिवाय थेथरई और बकलोली के। जो फीडबैक मुझे कई जगहों से मिल रहा है, उसके आधार पर कह सकता हूँ कि मोदी-योगी सरकारों का रिपीट करना मुश्किल है। लिख कर रख लीजिए। राम भी आगे काम न आवेंगे। देखें वीडियो https://youtu.be/Bb8YATcXrFQ

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.


Shailendra Pandey :  किसी भी मीडिया हाउस की नीति या मानसिकता उसका मालिक या बॉस तय करता है ना कि उस चैनल या अखबार के रिपोर्ट्स और उसी के तहत वो काम करते हैं। असल मे अगर विरोध दर्ज करना है और मामले पर एक्शन चाहते है तो उसके बॉस को टारगेट करे ना कि एक सैलरी के लिए के लिए काम करने वाले उसके कर्मचारी को क्योकि मालिकों के सरकार या अपोजिशन से अपने स्वार्थ होते है और उन्ही के आधार पर अपनी मानसिकता बनाते है। ये बात और है कि लंबे समय तक काम करते करते अधिकांश उन कर्मचारियों की मानसिकता भी चापलूसी के तहत कुछ उसी टाइप की हो जाती है। सच्चे पत्रकारों के लिए ये लाइनें है…. चंदन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग… देखें वीडियो… https://youtu.be/Bb8YATcXrFQ

फिल्मकार और फोटो पत्रकार शैलेंद्र पांडेय की एफबी वॉल से.

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गोलीबारी और सर्जिकल स्ट्राइक कर सिर्फ गाल बजाने से काम नहीं चलेगा मोदी जी

आतंकी हमले नहीं होंगे, यह कौन सुनिश्चित करेगा… जम्मू के सुंजवान में शनिवार तड़के आतंकियों ने एक बार फिर नापाक हरकत की। सुंजवान सैन्य शिविर में केवल सैनिक ही नहीं बल्कि उनके परिजन भी थे। इस हमले का संदेह जैश-ए-मोहम्मद पर ही जा रहा है। इससे पहले उरी और पठानकोट पर भी आतंकियों ने इसी तरह हमला किया था। पिछले साल सेना ने 213  आतंकियों को मार गिराया, यह उनकी हताशा का परिचायक है। लेकिन इस तथ्य से मन को बहलाया नहीं जा सकता है। पाकिस्तान की ओर से सीमा पर गोलीबारी, घुसपैठ का सिलसिला थम नहीं रहा है। शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब हमारे जवान शहीद न होते हों। इस बार हमले में शहीद हुए लेफ्टिनेंट मदन लाल चोधरी की एक रिश्तेदार गर्भवती थीं, वे भी घायल हुई पर उन्हें किसी तरह बचाया गया और उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।

हमले के चुने गए स्थान से साफ है कि आतंकी सेना के भारी दबाव और अक्रामक रुख के कारण घाटी से जान बचाकर भाग रहे हैं और जम्मू में पैठ बना रहे हैं। सुंजवान के जिस शिविर पर हमला किया गया है, वह जम्मू का नजदीकी शांत क्षेत्र है। यहां उन जवानों के परिवार रहते हैं, जो घाटी में तैनात हैं। आतंकियों द्वारा आसान स्थल को निशाना बनाना दर्शाता है कि वे बड़ी साजिश के तहत घुसे और संदेश देना चाहते है कि हम कमजोर नहीं पड़े है।

दरअसल ऐसा हमला पहली बार नहीं हुआ है। कालूचक में सेना के कैम्प पर 2002 में ऐसा ही हमला हुआ था। इसमें सेना के 22 जवानों समेत 34 लोगों की जान गई। भारत ने उस वक्त खुद को दिलासा देकर, घटना को भुला दिया था। सरकार यह नहीं देखती है कि उसकी नीतियों और नाकामियों का खामियाजा सैनिकों और उनके परिजनों को उठाना पड़ा रहा है।  वहीं केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आश्वस्त रहिए, हमारी सेना और सुरक्षा बल प्रभावी तरीके से अपना काम कर रहे हैं और अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे कभी भी किसी भी भारतीय का सिर शर्म से झुकने नहीं देंगे।

जनवरी 2016 में पठानकोट हमले के बाद सैन्य ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए 2000 करोड़ रुपये अलग से दिए जाने की मांग की गई थी। लेकिन पिछले साल रक्षा मंत्रालय ने इस मांग को वाजिब नहीं माना था। अब बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए मंत्रालय ने कुछ दिन पहले लगभग 1487.27 करोड़ रुपये जारी करने का फैसला किया है। शायद साल के अंत तक सैन्य शिविरों का सुरक्षा घेरा बढ़ जाए। लेकिन इससे आंतकी हमले होने रुक जाएंगे, यह कौन सुनिश्चित करेगा। वहीं जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भाजपा विधायकों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता अकबर लोन ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए। लोन का कहना है कि यह उनका निजी मामला है, इस पर किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। आतंकी त्रासदी के बाद पाक जिंदाबाद के नारे लगाना तो दुखद है ही, उससे भी दुखद यह है कि विधायक लोन इसे अपना निजी मामला बता रहे है। जब वे भारतीय लोकतांत्रिक पद्धति के तहत जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं, और भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे में वे विधानसभा में पाक जिंदाबाद के नारे लगाने को अपना निजी मामला कैसे बता सकते है।

एक तरफ दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत चल रही है, वहीं सीमा पार से अघोषित युद्ध जारी है। हमें ये भी पता है कि पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत का कोई मतलब नहीं है। हम सिर्फ कूटनीति से ऐसे हमले नहीं रोक पाएंगे। केवल बातचीत बंद करने, या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे धकेलने से उसकी नीयत सुधरती नजर नहीं आती है। बड़ा सवाल ये है कि हम कब ऐसे हमलों से निपटेंगे। कब हम ऐसी हरकतों पर रोक लगा पाएंगे। हमारे सत्ताधीशों को समझना होगा कि गोलीबारी और सर्जिकल स्ट्राइक कर गाल बजाने से काम नहीं चलेगा।

कुशाग्र वालुस्कर
भोपाल, मध्यप्रदेश
kushagravaluskar@rediffmail.com

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कांग्रेसी सरकार चल रही है या भाजपा की… जनता फर्क नहीं कर पा रही… देखें संघियों की शाहखर्ची

उत्तराखंड की त्रिवेंद्र रावत वाली भाजपा सरकार ने नौ महीने में 69 लाख रुपए केवल चाय-नाश्ते पर खर्च कर दिए

Yashwant Singh : उत्तराखंड सरकार ने मेहमानों के चाय-नाश्ते पर बीते 9 महीने में सरकारी फंड से 68 लाख 59 हजार 865 रुपए खर्च कर दिए. हेमंत सिंह गौनियां नाम के आरटीआई एक्टिविस्ट ने 19 दिसंबर 2017 को अप्लीकेशन लगाई थी. इसमें पूछा गया था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से अब तक चाय-पानी तक कितना सरकारी पैसा खर्च हुआ? 19 साल आरएसएस के प्रचारक रहे त्रिवेंद्र रावत ने 18 मार्च, 2017 को उत्तराखंड के नौवें सीएम के रूप में शपथ ली थी.

वाह रे पूरब वाली संस्कारी सरकार… इसने तो पश्चिमी सभ्यता वालों के गुलछर्रे उड़ाने के रिकार्ड को भी ध्वस्त कर दिया…. भजपइये सदी के सबसे बड़े दोगले साबित होने जा रहे हैं…. देखते रहिए… अर्थव्यस्था हो या आतंकवाद का मामला, हर फील्ड में उल्टे नतीजे आ रहे हैं.. देशवासी हैरान हैं.. वे फर्क नहीं कर पा रहे कि ये कांग्रेस की सरकार है या भाजपा की… ऐसे ही कुछ हालात तो कांग्रेस सरकारों के दिनों में थे… भजपइयों को सिर्फ बक-बक आता है… इनसे बकलोली करवा लीजिए… अंड बंड संड ये बोलते लिखते बताते जाएंगे… इनके बकबक का नतीजा ये है कि चीजें दुरुस्त होने की जगह, सब कुछ चौपट होता जा रहा है… लेकिन शरम इनको आती नहीं.. ये नेहरू-कांग्रेस और हिंदू-मुस्लमान का मुद्दा उठा-उठा कर जनता को चूतिया बनाने में लगे हैं.. पर जनता जब लात मारेगी न गुरु, तो कई दशक तक दर्द बना रहेगा… याद है न शाइन इंडिया….

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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सुंजवां सैनिक अड्डे पर हमला मोदी सरकार के मुंह पर करारे तमाचे हैं : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

इस आतंकी हमले का अर्थ क्या है? जम्मू के सुंजवां सैनिक अड्डे पर आतंकवादियों ने फिर हमला कर दिया। 5 भारतीय जवान शहीद हो गए और अन्य पांच-छह लोग घायल हो गए। यह हमला पाकिस्तान के आतंकवादियों ने ही किया है, ऐसा जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक का दावा है। यह हमला अफजल गुरु और मकबूल बट को हुई फांसी के दिन किया गया है। इसी अड्डे पर 2003 में भी हमला हो चुका है। तब 12 जवान मारे गए थे।

इसी तरह के हमले पठानकोट, उड़ी और नगरोटा के सैनिक अड्डों पर 2016 में हुए थे। सुंजवां के हमले की आशंका हमारे गुप्तचर विभाग ने फौज को पहले से बता रखी थी और पश्चिमी कमांड के ले.ज. सुरेंद्र सिंह 8-9 फरवरी को इस इलाके का मुआइना करने भी गए थे। इस तरह के हमलों का बार-बार होना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि हमारा बंदोबस्त बिल्कुल लचर-पचर है।

हमलावरों ने सुंजवां में भी वही तौर-तरीके अपनाए, जो उन्होंने पिछले हमलों में अपनाए थे। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे लोग पिछली घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखते। इसके अलावा हमारी सरकार के मुंह पर ये हमले करारे तमाचे हैं। हमारे प्रधानमंत्री देश को यह कहकर भरमाते रहे कि हमने पाकिस्तान की सीमा में जाकर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है लेकिन यदि वह की होती तो पिछले एक साल में क्या 406 बार हमारी सीमा का उल्लंघन होता? वह सर्जिकल नहीं फर्जीकल स्ट्राइक थी, यह सिद्ध होता है, हमारे सैनिक अड्डों पर होनेवाले हमलों से!

सरकार का यह दावा भी हास्यास्पद सिद्ध हो रहा है कि आतंकवाद और बातचीत, साथ-साथ नहीं चल सकते। दोनों चल रहे हैं और आराम से चल रहे हैं। हमारे सैनिक अड्डों पर होनेवाले हमले कश्मीर में भारत-विरोधियों की हौसला-आफजाई करते हैं। वे विधानसभा में बैठकर भारत-विरोधी नारे लगाते हैं। हमारे सरकारी नेता सिर्फ बयानबाजी करके खुश हो लेते हैं।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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आम्रपाली से ठगे गए निवेशक बोल रहे- ‘Modi and Yogi have no plans to give us relief’

Yashwant Singh : आम्रपाली से ठगे गए फ्लैट बायर्स ने अपने व्हाट्सअप ग्रुप में मुझे भी जोड़ रखा है, क्योंकि पीड़ितों में से एक मैं भी हूं। हजारों लोगों से अरबों रुपए वसूलने वाले अनिल शर्मा को इतनी बड़ी ठगी, धोखेबाजी और छल करने के बावजूद मजाल है कोई छू ले।

पैसे खाकर सब कान में तेल डाल लिए हैं। पढ़िए आज सुबह ग्रुप में एक पीड़ित निवेशक द्वारा डाला गया मैसेज.. एक अन्य निवेशक द्वारा डाली गई जागरण अखबार की न्यूज़ कटिंग भी देखिए.. बस सोचते रहिए, न्याय चालू आहे….

Freinds

-We are leaving in Rented homes

– paying EMIs

– paying taxes

– no tax benefits can avail

– Govts are passing time

– 8-9 years gone

– growing age every year

– builders are happily giving us pain

– No relief for service class

– even today we don’t know when we will get justice

– Modi n Yogi have no plans to give us relief

We are in great pain….


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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मोदी और तोगड़िया : ये जंग हिंदू चहरे के लिए है!

देश में इन दिनों एक सवाल सबके पास है कि प्रवीण तोगड़िया और बीजेपी सरकार के बीच आखिर तकरार है क्या? क्या वजह है कि तोगड़िया ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और क्या वजह है कि वो ये कह रहे हैं कि एनकाउंटर की साजिश रची जा रही है। तो जरा लौटिए 2017 दिसंबर के महीने में, क्यों कि संघ से जुड़े सूत्र कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद जो कि संघ की अनुषांगिक शाखा है, इसके इतिहास में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए चुनाव करवाए गए। इसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि संघ के भीतर ही दो खेमे बन गए थे। एक खेमा चंपत राय को अध्यक्ष के रूप में देखना चाहता है तो दूसरा खेमा प्रवीण तोगड़िया को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहता था। लिहाजा तय किया गया कि इसके लिए चुनाव करवाए जाएंगे।

विश्व हिंदू परिषद में ज्यादातर प्रचारक हैं। इनमें 40 फीसदी प्रचारक प्रवीण तोगड़िया के साथ हैं। इसके साथ ही सुब्रमण्यम स्वामी, आचार्य धर्मेंद्र, गोविंदाचार्य, रासबिहारी और महावीर जी भी तोगड़िया के पक्षधर हैं। दरअसल हमेशा नरेंद्र मोदी के साथ रहने वाले तोगड़िया पिछले कुछ समय से सरकार से खफा हैं, क्योंकि पिछले कुछ समय से तोगड़िया राम मंदिर, किसान और बेरोजगारी के मसले पर लगातार सरकार को अपने निशाने पर ले रहे हैं। सूत्र कहते हैं कि सत्ता और संघ के कई नेता नहीं चाहते थे कि प्रवीण तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद की कमान संभालें। इसी विरोधाभास को खत्म करने के लिए चुनाव का रास्ता निकाला गया लेकिन इस चुनाव में कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना भी शायद संघ और मोदी सरकार ने कभी नहीं की थी।

सूत्र कहते हैं कि जब भुवनेश्वर में वोटिंग हुई तो करीब 60 फीसदी वोट प्रवीण तोगड़िया को मिले, जबकि संघ और मोदी सरकार चंपत राय को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहते थे, जो मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय महामंत्री हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद प्रवीण तोगड़िया को सबसे ज्यादा वोट मिले। संघ के भीतर हुई इस घटना ने सबको सकते में डाल दिया था क्योंकि ये कोई छोटी बात नहीं थी, जब सरकार ने अपने ही संगठन में मुंह की खायी थी। इसी के बाद प्रवीण तोगड़िया के बेहोश मिलने वाली घटना होती है, जिस पर प्रवीण तोड़िया कहते हैं- ‘मैं सुबह अपने कार्यालय में पूजा कर रहा था तभी वहां मेरा एक परिचित आता है जो मुझसे कहता है कि आप यहां से तुरंत निकल जाइए क्यों कि कुछ लोग आपके एनकाउंटर के लिए निकले हैं’।

Z+ सिक्यूरिटी वाले प्रवीण तोगड़िया वहां से समय रहते निकल जाते हैं, जिसके बाद वो बेहोशी की हालत में मिलते हैं।

इसी समय राहुल गांधी देश भर के मंदिरों में हिंदू वोटबैंक खंगाल रहे हैं।

11 घंटे बाद बेहोशी की हालत में मिले प्रवीण तोगड़िया से मिलने के लिए हार्दिक पटेल पहुंचते हैं और ये इल्जाम लगाते हैं कि ‘इस पूरी घटना के पीछे मोदी और शाह का हाथ है’।  यहां एक अहम तस्वीर देखने को मिली क्योंकि विरोधी खेमे के हार्दिक पटेल तो अस्पताल में हालचाल जानने पहुंचे लेकिन पुराने साथी नरेंद्र मोदी और बीजेपी का कोई भी नेता प्रवीण तोगड़िया से मिलने अस्पताल नहीं पहुंचा। अलबत्ता तोगड़िया के इतने बड़े आरोपों पर बीजेपी एकदम खामोश है। वैसे ये वही बीजेपी है जिसने राम मंदिर का सपना अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया के कंधे पर बैठकर देखा था और ये वही प्रवीण तोगड़िया हैं जिन्हें 1979 में महज 22 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों का मुख्य मार्गदर्शक बनाया गया था।

इसी घटना के ठीक 24 घंटे पहले सर संघ चालक मोहन भागवत ने ये कहा था कि ‘सत्ता कृत्रम चीज है, वो बदलती रहती है’। आप इस बात का क्या मतलब निकालते हैं। जरा जोर देंगे दिमाग पर तो तस्वीर साफ हो जाएगी कि ये शब्द किसके लिए कहे गए थे और इसका आशय क्या था। अब जरा एक और तस्वीर देख लीजिए। राम मंदिर का संकल्प लेने वाले प्रवीण तोगड़िया पिछले 22 सालों से अपने घर नहीं गए हैं। बेटी की शादी में भी वो इसलिए नहीं पहुंच पाए थे क्योंकि उस दिन वो धर्म जागरण कार्यक्रम में थे। डॉ. प्रवीण तोगड़िया देश के सबसे बड़े कैंसर सर्जन में शुमार होते हैं। उन्होंने अपने पैसे से एक कैंसर इंस्टीट्यूट खोला है, जहां के मुनाफे के रुपयों में से 1 लाख रुपए उनके घर खर्च को जाता है। बाकी पूरा पैसा सेवा के काम में इस्तेमाल होता है। इतना ही नहीं, जब भी पैसे की कमी होती है तो विदेश जाकर सर्जरी करते हैं और उससे कमाए पैसे को संघ और सेवा कार्यों में खर्च करते हैं।

इसी तस्वीर के समानांतर एक और तस्वीर देखिए। देश में स्वर्गीय अशोक सिंघल और स्वर्गीय बालाजी साहब ठाकरे के बाद अगर किसी नेता की छवि हिंदू नेता के तौर पर सबसे प्रभावशाली थी तो वो नाम डॉ. प्रवीण तोगड़िया का है। संघ से जुड़े सूत्र खुद इस बात का दावा करते हैंं कि गुजरात हिंसा के समय सबसे प्रभावशाली हिंदू नेता प्रवीण तोगड़िया ही थे। उस दौर में तोगड़िया ने ही लाल कृष्ण आडवाणी से बात की थी और हालातों की जानकारी दी थी। लेकिन इसके बाद जो कुछ भी हुआ उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। यही वो दौर था जब देश के हिंदू वोटबैंक ने एक चेहरे पर अपनी मुहर लगाई थी। ये चेहरा था गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी जिससे आज भी पर्दा नहीं उठा है। देश जिस हिंदू चेहरे को स्वीकार रहा था उसके पीछे सबसे बड़ा योगदान तो प्रवीण तोगड़िया का था। काम तोगड़िया कर रहे थे और नाम मोदी का हो रहा था।  कई बार ये क्रेडिट था तो कई मायनों में इसे डिसक्रेडिट भी कहा गया, क्यों कि जिस रीयल हिंदू नेता की छवि को देश देख रहा था असल में उसका जमीन पर कुछ भी आधार था ही नहीं। करते तोगड़िया जा रहे थे लेकिन सीएम होने के नाते उसका पूरा श्रेय मोदी लेते जा रहे थे।

मौजूदा समय में जो क्लेश है या जो विवाद है, वो यही है कि असल में हिंदू चेहरा है कौन? प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सामने खुद को हिंदू चेहरे के रूप में पेश किया। लेकिन अगर इसे समझना हो तो उदाहरण के तौर पर क्रिसिटोफर मार्लो और विलियम शेक्सपीयर को देखा जा सकता है। कहा जाता है कि विलियम शेक्सपीयर ने क्रिस्टोफर मार्लो को अपने घर में रख रखा था। वो उनको खाना, कपड़े और पैसे देते थे। इसके एवज में क्रिस्टोफर लिखते थे लेकिन विलियम शेक्सपीयर उसे अपने नाम से प्रकाशित करवाते थे। ठीक इसी तरह से जो कुछ भी होता था वो करते तो प्रवीण तोगड़िया थे लेकिन उसका फल या प्रतिफल नरेंद्र मोदी को मिलता था। बल्कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे बड़ा सपोर्ट भी प्रवीण तोगड़िया का ही था लेकिन पिछले कुछ समय से तोगड़िया ने खिलाफत का रास्ता चुन लिया था। वो चाहते थे कि राम मंदिर पर संसद में कानून लाया जाए। बेरोजगारी और किसानों की समस्या को सिरे से नकारा ना जाए। इनसे निपटने के लिए रणनीति बनाई जाए। असल में जो हिंदू वोटबैंक के मसीहा थे वो प्रवीण तोगड़िया ही थे, इसलिए सत्ता को उनकी खिलाफत नागवार लगने लगी। अंदर ही अंदर ये डर सताने लगा कि कहीं तोगड़िया ही सबसे बड़ा चेहरा ना बन जाएं इसलिए उनको संगठन से बाहर रखे जाने का फैसला किया गया।

यहां सबसे ज्यादा भटकी हुई कांग्रेस थी। अगर कांग्रेस ने 2002 में आरोपों के कटघरे में मोदी की जगह प्रवीण तोगड़िया को रखा होता तो शायद आज ये तस्वीर खड़ी ही नहीं होती लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। उसने हमेशा अपने निशाने पर मोदी को लिया। मोदी खुद भी इस बात को बार बार कहते हैं कि उन्होंने अपनी परेशानियों को अपने मौके में तब्दील किया है। असलियत भी यही है। ये बिल्कुल वैसा ही नजारा है जैसा अगर आप मोदी की तस्वीर को साफ करेंगे तो उसके अंदर से तोगड़िया की तस्वीर को निकलकर सामने आना होगा।

अनुराग सिंह
प्रोड्यूसर
सहारा समय
नोएडा
singh.or.anu@gmail.com

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मोदी जी का इंटरव्यू और जी न्यूज के सामने पकौड़े वाला….

Nitin Thakur : सुधीर सर ने जो इंटरव्यू लिया उसे जर्नलिज़्म के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाए. छात्रों को वो हुनर सिखाया जाए कि एकतरफा संवाद करनेवाले नेता के भाषण के बीच में सवालनुमा टिप्पणी कुशलतापूर्वक घुसाकर कैसे इंटरव्यू होने का भ्रम पैदा किया जाता है. मोदी जी ने बाकायदा समझाया कि कैसे ज़ी न्यूज़ के बाहर पकौड़े तलनेवाले को 200 रुपए रोज़ाना का रोज़गार मोदीकाल में मिला है।

उन्होंने कायदे से ये भी बताकर कि ऐसे रोज़गार सरकारी आंकड़ो में नहीं आ पाते आगे तक की शंकाओं का समाधान कर दिया। अब कोई उनसे आंकड़े लेकर सवाल ना करे क्योंकि ये सब आंकड़ों में तो होता नहीं। सबसे अद्भुत तो वो दृश्य था जब मोदी जी इस अनर्थशास्त्र की आखिरी लाइन बोल रहे थे तो एंकर महोदय ने पूरी श्रद्धा से उनकी वो लाइन अपने शब्दों से पूरी की। आह… खेल लो बैडमिंटन.. जितनी देर खेलना चाहते हो.. लोग लंबे वक्त तक एक ही आदमी से मूर्ख नहीं बनते रह सकते। जिस दिन कुएं में डाली गई तुम्हारी अफीम का नशा टूटा ये ही तुम्हें दौड़ाएंगे.. फिर तुम पकौड़े तलना.. जैसे इतिहास के कई नायकों ने बाद में तले।

वैसे, टेक्निकली देखा जाए तो ज़ी के सामने कोई पकौड़े वाला नहीं खड़ा है. हर जगह सिर्फ अवैध अतिक्रमण किए ज़ी वालों की कारें पार्क रहती हैं. अगर कहीं कोई पकौड़े वाला है तो वो “आज तक” के सामने और “दैनिक भास्कर” के बगल में है. मोदी जी जब मिसाल दे रहे थे तो एंकर को उन्हें बताना चाहिए था कि सर हम तो किसी ठेलेवाले को खड़ा ही नहीं होने देते. यूं मोदी जी को एक दौरा फिल्मसिटी का भी करना चाहिए. उनके ढेरों छिपे-खुले प्रशंसक बड़ी मेहनत से चैनलों की नौकरी करते हुए बीजेपी की बेगार करते हैं. अब ये भी क्या बात हुई कि वो इंटरव्यू के लिए भी जाएं तो निर्जन में बसे इंडिया टीवी जाएं. हमारे यहां आएं.. दो सौ रुपए रोज़ की कमाई वाले पकौड़े वाले से लाकर पकौड़े मैं खिलाऊंगा.. चाय वो झा जी की पियेंगे या चंदू की वो तो उन्हें ही बताना पड़ेगा.

Anand Sharma : पकोड़ा जलेबी बेचने वाले हल्दीराम हैं। पैन कांटिनेंट ब्रांड। आप जैसे डिग्रीधारियों की फौज रोज़ सुबह लाला का चरणामृत करती है। बुरा न मानना पर उद्यमिता से आप का दूर दूर तक वास्ता नही क्यों कि उसमें लगता है जिगर जिसको आपने अपनी तनखा के लिए गिरवी रख दिया है। जिगर वाले रामदेव, गोपालजी मिल्क, सलोनी मस्टर्ड आयल, पारस मिल्क, घासीटाराम कराची हलवाई, MDH और शक्ति मसाला होते हैं, किसी प्लांट के सुपरवाइजर नहीं।

Sheetal P Singh : महान मोदी जी ने करीब पौने चार साल बिताने के बाद पहली बार एक तिहाड़ी पत्रकार को आमने सामने से उपकृत किया। वैसे मंच से तो वे रोज भाषण ठेले रहते हैं पर किसी असली पत्रकार से आमना सामना करने का साहस उनमें नहीं दिखता। कांग्रेस के राहुल गांधी ने इधर कुछ इम्प्रूव किया है वरना तो वे भी प्रायोजित प्रेस का ही सामना करते थे।

Rakesh Kayasth : किस्सा पुराना हो चुका है, लेकिन सुधीर चौधरी को प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करता हुआ देखकर दोबारा याद आ गया। जयललिता जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं, तब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए एक डिबेट कंपीटशन हुआ था। विषय था– अम्मा ज्यादा hardworking हैं या फिर ज्यादा efficent. पक्ष और विपक्ष में जोरदार दलीले पेश की गईं। विजेता वह सरकारी कर्मचारी बना जिसने धारदार तर्कों के आधार पर साबित कर दिया कि अम्मा दोनो हैं।

Rajeev Ranjan Jha : संघ-भाजपा से ‘जुड़े’ पत्रकार जब तक वाम-कांग्रेस के अनुकूल सवाल पूछते हैं, तब तक ही वे खरे व सच्चे होते हैं। दूसरा कोई भी सवाल पूछते ही वापस संघी-भाजपाई हो जाते हैं। दूसरी ओर वाम-कांग्रेस के पत्रकार स्वाभाविक रूप से ही खरे व सच्चे होते हैं और कभी भी गलत सवाल नहीं पूछते हैं। वाम-कांग्रेस के पत्रकार कभी पक्षपात नहीं करते, क्योंकि पक्ष एकमात्र उन्हीं का है, दूसरों का कोई पक्ष नहीं होता। दूसरों का जो होता है, वह केवल गलत होता है। वाम-कांग्रेस की बातों को काटने वाला हमेशा अलोकतांत्रिक, फासीवादी, सांप्रदायिक, कट्टर, मनुवादी, ब्राह्मणवादी, प्रतिक्रियावादी होता है। और हाँ, कम समझ रखने वाला मूर्ख भी…

सौजन्य : फेसबुक

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मोदी और तोगड़िया : कभी दोस्त थे, आज दुश्मन बन बैठे… जानिए अंदर की कहानी

हमेशा से कहा जाता रहा है कि “जर, जोरू और जमीन” के कारण पक्के दोस्तों में ही नहीं, भाइयों में भी दुश्मनी हो जाती है। धीरूभाई अंबानी के देहावसान के बाद अंबानी भाइयों में छिड़ा युद्ध इस सत्य की मिसाल है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। हालांकि इतिहास इस बात का भी गवाह है कि “जर, जोरू और जमीन” के साथ इसमें “तख्त” भी जोड़कर इसे “जर, जोरू, जमीन और तख्त” कहा जाना चाहिए। “जर” यानी धन, “जोरू” यानी स्त्री, “जमीन” यानी चल-अचल संपत्ति, और “तख्त” यानी सत्ता। इतिहास उन उदाहरणों से भी भरा हुआ है जहां तख्त के लिए पुत्र ने पिता को कारागार में डाल दिया या भाई ने भाई को मार डाला। राजा की वफादार सेना अलग होती थी और युवराज की वफादार सेना अलग, या अलग-अलग राजकुमारों की सेनाएं अलग-अलग रही हैं और उनमें युद्ध हुए हैं।

प्रवीण तोगड़िया से जुड़ा ताज़ा मामला “तख्त” का है जिसने तोगड़िया को इस हाल तक पहुंचा दिया कि ज़ेड सुरक्षा के बावजूद वे गायब हो गये और बाद में बेहोशी की हालत में पाये गये। कैंसर डाक्टर से फायर ब्रांड हिंदू नेता के रूप में उभरे डा. प्रवीण तोगड़िया को अब भाजपा में कोई पूछता नहीं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें पसंद नहीं करते और मोदी का प्रभामंडल ऐसा है कि कोई उनके सामने सिर उठाकर बोल नहीं सकता। मोदी की दूसरी आदत है कि वे अपने सामने सिर उठाकर बोलने वाले को बर्दाश्त नहीं करते और सिर्फ नापसंदगी तक ही सीमित नहीं रहते। किसी ज़माने में उनके सबसे बड़े शुभचिंतक रहे लालकृष्ण आडवाणी का हाल हम सबके सामने है।

एक ज़माने में प्रवीण तोगड़िया और नरेंद्र मोदी अच्छे मित्र रहे हैं और उन्होंने गुजरात में भाजपा को सत्ता में लाने के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समय का फेर है कि महत्वाकांक्षाओं के चलते दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हो गये और इसी कारण डा. तोगड़िया प्रधानमंत्री के मुखर आलोचक बन गए।

डाक्टरी की पढ़ाई के लिए सन् 1978 में प्रवीण तोगड़िया अहमदाबाद आये थे और गुजरात के होकर रह गए। वे एक नामचीन कैंसर डाक्टर रहे हैं और हिंदुत्व के अपने प्रेम के कारण वे संघ से जुड़े हुए थे और 1985 में वे बाकायदा विश्व हिंदू परिषद में चले गए और अपनी लगन और मेहनत के कारण उन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि विश्व हिंदू परिषद में उनका प्रभाव भी बढ़ता चला गया।

हिंदू प्रेम के कारण ही नरेंद्र मोदी भी संघ से जुड़े और 1987 में वे संघ से भाजपा में भिजवा दिये गए। मोदी भी शुरू से ही बहुत अनुशासित, मेहनती और महत्वाकांक्षी रहे हैं। विचारधारा की समानता के कारण मोदी और तोगड़िया की आपस में खूब जमती थी और दोनों मिलकर काम करते थे। मार्च 1990 में चिमन भाई पटेल के मुख्यमंत्री बनने और फिर मार्च 1995 में केशुभाई पटेल के मुख्यमंत्रित्व में भाजपा को सत्ता में लाने में इन दोनों मित्रों की अहम भूमिका रही।  उसीका परिणाम था कि केशुभाई पटेल लगभग हर छोटे-बड़े फैसले में दोनों की सलाह लेते थे और यह बात सरकारी अधिकारियों से भी छिपी नहीं थी। उसी दौरान प्रवीण तोगड़िया का कद ऐसा बढ़ा कि उन्हें ज़ेड सेक्योरिटी दे दी गई।

अक्तूबर 2001 में गुजरात के बिगड़ते हालात को संभालने के लिए केशुभाई पटेल को हटाकर नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। फरवरी 2002 के गुजरात दंगों के बावजूद उसी साल दिसंबर में गुजरात में हुए विधानसभा चुनाव हुए और नरेंद्र मोदी शान के साथ सत्ता में वापिस आये। इस चुनाव में प्रवीण तोगड़िया ने भाजपा के पक्ष में सौ से भी अधिक जनसभाएं कीं। इसके बाद ही दोनों में दरार की शुरुआत हुई, और कारण वही था “तख्त”!

प्रवीण तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद में पहले से ही स्थापित थे, जबकि मोदी दिसंबर 2002 में सत्ता में वापसी के बाद से ज़्यादा उभरे। अब हम जानते हैं कि मोदी अपने किसी प्रतिद्वंद्वी या विरोधी को बर्दाश्त नहीं करते। वे विपक्षियों को हराने में नहीं बल्कि कुचलने में विश्वास रखते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी उनके मंत्रियों को उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। उनके एक वरिष्ठ मंत्री हीरेन पंड्या अपनी महत्वाकांक्षा और अहम के चलते ही जान गंवा बैठे। इसी तरह तोगड़िया भी महत्वाकांक्षी थे और मोदी भी, सो दोनों में दरार पड़ना स्वाभाविक था। मोदी ने तोगड़िया के पर कतरने शुरू किये और अंतत: तोगड़िया को यह कहना पड़ा कि नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार में उनकी कोई पूछ नहीं है। इसके बाद नरेंद्र मोदी जब तक गुजरात में मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने तोगड़िया को अपने नज़दीक नहीं फटकने दिया। इस तरह दो मित्र, दो दुश्मन बन गए।

यह संयोग की बात है कि मोदी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अमरीकी कंसल्टेंसी एप्को वर्ल्डवाइड की सेवाएं लीं और वाइब्रेंट गुजरात नामक आयोजन के माध्यम से विदेशी निवेश बढ़ाने का प्रयत्न किया। इस आयोजन में प्रवासी गुजरातियों और उनके संपर्क वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने शिरकत की। मोदी ने योजनाबद्ध ढंग से कई अन्य विकास कार्यक्रम भी चलाए। धीरे-धीरे देश भर में गुजरात के विकास के माडल की चर्चा होने लगी। इस बीच एप्को वर्ल्डवाइड उनकी नयी छवि गढ़ने में लगी रही।

सन् 2009 का लोकसभा चुनाव एक तरफ सोनिया गांधी, डा. मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के नेतृत्व में और दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लड़ा गया और उसमें कांग्रेस की जीत हुई, लेकिन यूपीए-2 के शासनकाल के घोटालों, डा. मनमोहन सिंह की चुप्पी और तत्कालीन सरकार में व्याप्त अनिर्णय की स्थिति से देश त्रस्त था। मोदी एक कर्मठ, ऊर्जावान और दूरदृष्टि वाले नेता के रूप में तेजी से उभर रहे थे। अब तक भाजपा कार्यकर्ताओं में यह भाव घर कर गया था कि कांग्रेस को अगर हराना है तो उसके लिए लालकृष्ण आडवाणी के बजाए नरेंद्र मोदी ज़्यादा उपयुक्त व्यक्ति हैं और अंतत: सारी अड़चनों को हटाकर मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। मोदी ने पहली बार भाजपा को केंद्र में बहुमत दिला कर और अपने दम पर सरकार बनाने के काबिल बना कर इतिहास रचा । केंद्र में हालांकि एक गठबंधन सरकार है लेकिन तूती सिर्फ मोदी की बोलती है।

सन् 2008 में मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो राज्य में अवैध मंदिरों को गिराया गया था जिससे नाराज़ होकर तोगड़िया ने मोदी के विरुद्ध बोलना शुरू किया। पहले से पड़ी संशय की दरार अब बढ़ने लगी और समय के साथ-साथ बढ़ती ही गई। आज  स्थिति यह है कि दोनों आमने-सामने हैं। तोगड़िया यह कह चुके हैं कि उन्हें मारने की कोशिश की गई थी।

सवाल यह है कि तोगड़िया को ज़ेड सेक्योरिटी मिली हुई है, फिर कैसे वे एक आटो-रिक्शा में किसी के साथ चले गए? यदि वह गए तो उसी वक्त हड़कंप क्यों नहीं मचा? जब उनके “गुम” होने की आशंका हुई तो सरकारी मशीनरी सुस्त कैसे रह गई? क्या सरकारी मशीनरी का सुस्त रहना किसी और गहरी बात की ओर का संकेत है? क्या उनका हश्र भी हीरेन पंड्या का-सा हो सकता है? मैं कुछ भी सोचने में असमर्थ हूं और बहुत अच्छा हो कि मेरी सारी आशंकाएं गलत साबित हों।

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे. वे फिलवक्त तीन कंपनियों क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड,  दि सोशल स्टोरीज़ प्राइवेट लिमिटेड और विन्नोवेशन्स के जरिए कई फील्ड में सक्रिय हैं. उनसे संपर्क pkk@lifekingsize.com के जरिए किया जा सकता है.

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नेतन्याहू इजरायल से ‘भाग’ कर आये हैं भारत, जानिए क्यों…

Mithilesh Priyadarshy : नेतन्याहू इजरायल से ‘भाग’ कर आये हैं. उनके अपने देश में लोग उनसे इस्तीफ़ा मांग रहे हैं. क्योंकि उनपर गैस के सबसे बड़े उत्पादक कोबी मेमोन (भारत का अम्बानी) को एक बड़े सौदे में फ़ायदा पहुँचाने का आरोप लगा है. और यह बात बड़े दिलचस्प तरीके से सामने आई है. नेतन्याहू का बेटा कोबी मेमोन के बेटे से एक वेश्या को देने वास्ते कुछ उधार माँगता है, ‘भाई, मेरे बाप ने तुम्हारे लिए 20 अरब डॉलर का सौदा करवाया है और तुम मुझे 400 शेकेल ‘पंइचा’ नहीं दे सकते?’ बस तब से बवाल कटा पड़ा है.

उससे भी दिलचस्प बात कि इस टेप के सामने आते ही उसी रात इसराइली एयरफ़ोर्स का सीरियाई आर्मी ठिकानों पर हमला हो जाता है. मतलब सब देशों की एक ही कहानी है. सत्ता और पूंजी का गठजोड़ चौतरफ़ा कायम है. सबके अपने ‘अंबानी-अदानी’ हैं, जो अपने मुनाफे वास्ते चुनाव में अपनी पूंजी खर्चकर किसी मनमाफ़िक ‘जमूरे’ को सत्ता में पहुंचाते हैं. फिर ‘जमूरा’ विकास के नाम पर दुनिया-जहान के सौदों में उसे लाभ पहुंचाकर ५ साल तक वह ऋण उतारता रहता है.

इन सबके बीच हो-हंगामे होने पर सब देशों का अपना एक ‘पाकिस्तान’ भी होता है, जो जनता का ध्यान बंटाने में मदद करता है. सबके अपने विदेशी दौरे भी होते हैं, जो मुसीबत के वक्त जनता के जूतों की ज़द में आने से बचाते हैं. याद ही होगा, मोदी जी ८ नवम्बर को नोटबंदी करके १० नवम्बर को थाईलैंड निकल गए थे. और जीएसटी लागू कर तीन दिन बाद ही 4 जुलाई को इजरायल निकल गए थे. शायद उसी दौरे पर इन्होंने नेतन्याहू को कान में कहा होगा, भाई, भारत को अपना ही घर समझो. जब मुसीबत लगे, आ जाओ. और मुसीबत में फंसे नेतन्याहू आ गये. सिम्पल.

जेएनयू के रिसर्च स्कालर मिथिलेश प्रियदर्शी की एफबी वॉल से.

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अमित शाह का केस लड़ ने वाला वकील सुप्रीम कोर्ट में जज बना, जिस जज ने शाह को बरी किया वह राज्यपाल बन गया

भारत में न्यायपालिका को लेकर बहस जारी है. सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जो विद्रोह कर सुप्रीम कोर्ट के भीतर सब कुछ ठीक न चलने की जो बात कही है, उसके दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं. इसी दौर में कुछ लोगों ने कुछ घटनाओं की तरफ ध्यान दिलाया. जैसे अमित शाह का जो केस एक वकील लड़ रहा था, उसे सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के जिस जज ने अमित शाह को बाइज्जत बरी किया, उसे रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बना दिया गया.

जिस जज ने अमित शाह को अभियुक्त करार देते हुए दंडित किया, उसकी बहन की शादी में आयकर विभाग का छापा पड़ गया. ये तीनों खबरें विभिन्न समय पर विभिन्न वेबसाइटों पर छप चुकी हैं. तीनों खबरों का स्क्रीनशाट यहां दिया जा रहा है ताकि आप जान सकें कि अदालतों का किस कदर राजनीतिकरण किया जा चुका है. साथ ही यह भी कि अगर आप अदालत को न्याय का घर मानते हैं तो यह आपकी अपनी समझदारी का स्तर है. अदालतें भी अब गिव एंड टेक के चंगुल में बुरी तरह  फंस चुकी हैं.

जुमला सुन भोंकने लगा

सुप्रीम कोर्ट में जिस न्यायाधीश ने अमित शाह को हत्या, अपहरण ठगी आदि केस से बरी कर दिया था, वह जज रिटायर के 7 दिन बाद केरल के राज्यपाल बन गए…

जो वकील अमित शाह का केस लड़ रहा था, वह वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट का जज बन गया है…

गुजरात हाई कोर्ट में जिस जज ने अमित शाह को अभियुक्त करार देते हुए दंडित किया था, उनकी बहन की शादी में आय कर विभाग का छापा पड़ गया..

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भाजपा और मोदी का सिंगल ब्रांड रिटेल सौ फीसदी एफडीआई मंजूरी का पुराना विरोध जुमला हो गया

Paramendra Mohan : 2012 की बात है, भ्रष्टाचार-घोटालों के आरोपों में घिरी मनमोहन सरकार ने सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई लागू करने का फैसला लिया था। इससे भारतीय छोटे व्यापारियों का बर्बाद होना और विदेशी कंपनियों का फायदा होना तय था। ये बड़े विदेशी ब्रांड भारतीय बाजार से सस्ता माल खरीदकर उससे बने उत्पाद का एक बड़ा भाग ग्लोबल मार्केट में बेचते, लेकिन खरीदी को लोकल सोर्सिंग बताकर छूट पाते।

राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा के होते कांग्रेस के लिए ये राष्ट्रविरोधी प्रस्ताव का मंजूर हो पाना नामुमकिन था और ऐसा ही हुआ। उस वक्त नमो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने गुजरात में एक रैली की और उसमें दो टूक कहा-मैं हैरान हूं कि प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) कर क्या रहे हैं? रिटेल के लिए एफडीआई को परमिट दे दिया गया है। छोटे व्यापारियों की दुकानों में ताला लगाने का निर्णय लिया गया है। रिटेल में ऐसा मार्केट शुरू होगा तो हिंदुस्तान के छोटे व्यापारियों के पास कौन खरीदी करने आएगा।’ 2014 में वक्त बदला, राष्ट्रविरोधी सरकार सत्ता से बाहर हुई, राष्ट्रवादी सरकार बनी, सरकार बदली तो सोच भी बदली, सोच बदली तो ये सच सामने आया कि दरअसल मनमोहन के जिस फैसले से देश पीछे जा रहा था, नरेंद्र मोदी के उसी फैसले से देश आगे बढ़ेगा और अब सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दे दी गई।

अब नमो सीएम नहीं, बल्कि पीएम हैं और अब वो ये नहीं कह रहे हैं कि हिंदुस्तान के छोटे व्यापारियों के पास कौन खरीदी करने आएगा, बल्कि अब ये कहा जा रहा है कि इससे रोजगार और कमाई बढ़ेगी। यही बात मनमोहन 2012 में कह रहे थे तब भाजपा बवाल काट रही थी। ये है राजनीतिक राष्ट्रवाद और जनता भाजपा के इसी सत्तावादी राष्ट्रवाद को असली राष्ट्रवाद समझ बैठी थी। अब भाजपा और खुद नमो का सिंगल ब्रांड रिटेल सौ फीसदी एफडीआई मंजूरी का पुराना विरोध जुमला हो गया क्योंकि मनमोहन नीति में ही इन्हें रोजगार, कमाई, विकास दिखने लगा है, तो अपनी नीति से पलट गए।

अब अगर यशवंत सिन्हा नमो सरकार के इस ताजा फैसले का विरोध करते हुए याद दिला रहे हैं कि हम विपक्ष में थे तो पुरजोर विरोध करते रहे, लेकिन अब उसे ही मंजूरी देकर भाजपा नीतियों से भटक गई है, तो एक साथ तमाम भाजपा समर्थक यशवंत सिन्हा को सत्तालोलुप, गद्दार, राष्ट्रविरोधी करार देते हुए टूट पड़ेंगे। अब अगर कांग्रेस ये याद दिलाए कि खुद भाजपा जिस नीति का विरोध कर रही थी, उसे ही मंजूरी देकर लागू कर रही है तो भाजपा समर्थक कांग्रेस को भ्रष्टाचार-घोटालों की जननी और 60 साल में देश को बर्बाद करने वाली पार्टी बताकर मौजूदा फैसले को राष्ट्रवादी बताने लगेंगे।

राष्ट्रवाद के राजनीतिकरण और भाजपा का कांग्रेसीकरण देश की आम जनता के लिए कितना घातक होने जा रहा है, इसका अंदाजा अगर कोई लगा पाए तो उसे ये अंदाजा भी हो जाएगा कि देश के आर्थिक विकास और रोजाना किसी न किसी संस्था या एजेंसी के हवाले से जो ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उस चमक के पीछे एक स्याह सच छिपा है और वो स्याह सच ये है कि न तो देश के आर्थिक एकीकरण से आम उपभोक्ताओं को पहले से कम दाम में सामान मिल रहा है और न ही चार साल में किसी भी क्षेत्र में रोजगार सृजन में कोई तरक्की हुई है,अगर किसी भी क्षेत्र में रोजगार पहले से ज्यादा मिल रहे हों, तो आप बताएं। हां एक क्षेत्र में निश्चित रूप से तरक्की हुई है और वो क्षेत्र है पलटासन, क्योंकि राजनीति का असली आसन यही है, सत्तासन।

कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके पत्रकार प्रमेंद्र मोहन की एफबी वॉल से.

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मोदी अपने अहंकार में किसी दूसरे का रुख जानने-समझने को तैयार ही नहीं हैं

पी. के. खुराना

गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद संसद का संक्षिप्त सत्र चला और समाप्त हो गया। गुजरात विधानसभा चुनावों के समय हमने अमित शाह और नरेंद्र मोदी का नया रूप देखा। वहां किसानों में गुस्सा था, बेरोजगारी को लेकर नौजवानों में गुस्सा था, आरक्षण के मुद्दे पर पटेल समाज तथा अन्य पिछड़ी जातियों के लोग नाराज थे। नोटबंदी और जीएसटी के कारण व्यापारी वर्ग नाराज था। जीएसटी का सर्वाधिक विरोध सूरत में हुआ। सारे विरोध के बावजूद भाजपा अपनी सत्ता कायम रखने में सफल रही और विजय रूपाणी मुख्यमंत्री के रूप में कायम हैं।

जनता के सामने अब नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गाल फुला-फुला कर कह रहे हैं कि यदि सचमुच गुजरात की जनता हमसे नाराज होती तो हम सत्ता में वापस कैसे आते। हालांकि वे यह नहीं बताते कि गुजरात में उनकी सीटें पहले से भी कम हो गई हैं, उनके कई मंत्री चुनाव हार गए हैं, जिग्नेश मेवाणी चुनाव जीत गए हैं और किसानों का गुस्सा इस रूप में फूटा है कि गुजरात के ग्रामीण इलाकों से भाजपा को समर्थन नहीं मिला है। वहां उसे धूल चाटनी पड़ी है। यही नहीं, बहुत सी सीटों पर भाजपा बहुत मामूली अंतर से जीती है और यदि प्रदेश में कांग्रेस का संगठन होता और राज्य स्तर पर कांग्रेस के पास कोई बड़ा और विश्वसनीय नाम होता, तो शायद तस्वीर कुछ और होती। यह तो सच है कि जीतने वाला ही सिकंदर कहलाता है और मोदी तथा शाह ने अपनी रणनीति से यह सफलता तो पा ही ली है कि गुजरात की जनता के समर्थन से वे गुजरात में सत्ता में बने हुए हैं।

गुजरात चुनावों के दौरान मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह पर पाकिस्तान से साठगांठ का आरोप लगाया और इस आरोप को खूब भुनाया। संसद के शीतकालीन सत्र के समय कांग्रेस का रुख यह था कि मोदी के इस झूठे आरोप के लिए मोदी को डा. मनमोहन सिंह से माफी मांगनी चाहिए वरना संसद नहीं चलने देंगे। इसके जवाब में मोदी ने यह चाल चली कि लोकसभा में तीन तलाक का बिल पेश करवा दिया, ताकि वह मुस्लिम महिलाओं में यह संदेश दे सकें कि कांग्रेस इस प्रगतिशील कानून की राह में रोड़ा बन रही है। डा. सिंह से माफी न मांगने का मोदी का यह बड़ा हथियार था, जो लोकसभा में कामयाब हो गया, लेकिन राज्यसभा में जहां भाजपा का बहुमत नहीं है, वहां बिल पास नहीं हो सका। राज्यसभा में कांग्रेस यह कहती रही कि वह इस बिल के खिलाफ नहीं है, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों में संशोधन चाहती है, लेकिन सिलेक्ट कमेटी में बिल भेजकर मुद्दा सुलझाने का प्रयास करने के बजाय भाजपा जानबूझ कर अड़ी रही, क्योंकि उसका उद्देश्य बिल पास करवाने से ज्यादा राजनीतिक लाभ लेना था।

दरअसल मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग, खासकर पुरुष वर्ग इस बिल के खिलाफ था। बहुत से मुस्लिम महिला संगठनों ने भी इस बिल के कई प्रावधानों का विरोध किया था। यदि यह बिल इसी रूप में पास हो जाता तो सरकार को मुस्लिम वर्ग के सक्रिय विरोध का सामना करना पड़ता और यदि बिल में संशोधन मंजूर हो जाते तो मोदी की हेठी होती। अपने अहं के चक्कर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बिल पास न होने देना ज्यादा माकूल समझा।

मोदी की समस्या यह है कि वे मानते हैं कि देश हित को सिर्फ वही जानते हैं और जनहित की नीतियों में सिर्फ उनका रुख ही सही रुख है। अपने अहंकार में वे किसी दूसरे का रुख जानने-समझने को तैयार ही नहीं हैं। गुजरात चुनावों में जब उन्हें और अमित शाह दोनों को यह स्पष्ट नजर आ गया कि वहां भाजपा हार भी सकती है, तो उन्होंने जीएसटी के नियमों में फटाफट ढील देनी शुरू की, व्यापारियों को विश्वास में लेने की कोशिश की और युवाओं को यह समझाने का प्रयास किया कि बेरोजगारी दूर करने के लिए वे शीघ्र ही समुचित कदम उठाएंगे। स्थिति ऐसी थी कि गुजरात में कांग्रेस के पास जमीनी स्तर पर न तो मजबूत संगठन था और न ही कोई स्थानीय नेता जिसे वह मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर पाती। भाजपा को इसी का लाभ मिला और वह सत्ता में बनी रहने में कामयाब रही।

जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां के स्थानीय भाजपा नेताओं को केंद्रीय नेता बार-बार संदेश दे रहे हैं कि गुजरात से सबक लो, हार भी सकते हो, चुनाव के नजदीक आने का इंतजार मत करो, अभी से प्रचार में जुट जाओ इत्यादि। इसी से समझा जा सकता है कि भाजपा अंदर से किस कदर डरी हुई है।

हमें कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दों की ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। एक, संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में सिर्फ 41 घंटों में नौ बिल पास कर दिए गए और लोकसभा में बासठ घंटों से भी कम समय में बारह बिल पास हो गए। यानी राज्यसभा में हर बिल पर औसतन लगभग साढ़े चार घंटे ही चर्चा हुई और लोकसभा में हर बिल पर औसतन लगभग पांच घंटे चर्चा हुई। इतने कम समय में किसी बिल के प्रावधानों पर समग्र चर्चा संभव ही नहीं है और यह परंपरा जनहित के पक्ष में नहीं है।

दो, जीएसटी लागू होने के समय सूरत के व्यापारियों ने मोदी सरकार से मान-मनुव्वल करके इसके नियमों में संशोधन की बहुत कोशिशें कीं, लेकिन मोदी अपने अहंकार से छुटकारा पाते तो उनकी बात सुनते। इन व्यापारियों की सुनवाई तब हुई, जब वहां चुनाव हुए और वह भी इसलिए क्योंकि व्यापारी वर्ग एकजुट था और वह मोदी के विरोध में मत देने का मन बनाए हुए था, वरना अब भी जीएसटी के नियमों में कोई सार्थक बदलाव न हुआ होता।

तीन, इस समय मीडिया में यह खबरें छाई हुई हैं कि फरवरी में शुरू होने वाले बजट सत्र में भाजपा बेरोजगार युवकों को रोजगार देने के लिए किसी मास्टरस्ट्रोक की तैयारी में है। बेरोजगारी दूर हो, यह तो अच्छी बात है लेकिन बेरोजगारी दूर करने का प्रयास सिर्फ इसलिए किया जाए कि यह सत्र मोदी सरकार के वर्तमान शासनकाल का अंतिम बजट सत्र होगा और मोदी के पास स्वयं को जनहितकारी सिद्ध करने का यह आखिरी मौका है, तो यह जनहितकारी होने के बावजूद ओछी राजनीति है।

चार, बेरोजगारी के बारे में एक और महत्त्वपूर्ण नुक्ता यह है कि सरकारी नौकरियां बेरोजगारी दूर करने का सबसे घटिया साधन हैं और अंततः यह जनता पर बोझ है। यदि आवश्यकता न होने पर भी सरकारी पदों की संख्या बढ़ा दी जाए और नए लोग भर्ती कर लिए जाएं, तो नए लोगों का वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं अंततः जनता की जेब का बोझ ही बढ़ाएंगी। इसके बजाय सरकार को ऐसे नियम बनाने चाहिएं कि ज्यादा से ज्यादा नौजवान या तो उद्यमी बन सकें या अन्य निजी कंपनियों के लिए व्यवसाय चलाना आसान और लाभप्रद हो, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार दे सकें।

राजनीति की यह बीमारी किसी एक सरकार पर लगा कलंक नहीं है, बल्कि भाजपा की पूर्ववर्ती सरकारें भी इस दोष की भागी हैं। इसलिए व्यक्ति या दल बदलने के बजाय नीतियां बदलना आवश्यक है, ताकि जनहित में होने वाले काम सचमुच जनहित के लिए हों, राजनीतिक लाभ के लिए नहीं।

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं।

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सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी FDI : क्यों साहेब, तब देश बिक रहा था… अब तो ये देशभक्ति है ना?

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डॉ राकेश पाठक

स्वदेशी के पैरोकार अब कहाँ गायब हैं… अंततः मोदी सरकार ने सिंगल ब्रांड रिटेल में सौ फीसदी सीधे विदेशी निवेश (FDI ) के लिए दरवाज़े खोल कर लाल कालीन बिछा दिए हैं। अब तक इस तरह के निवेश की सीमा 49 फीसदी थी।इस फैसले के बाद “वालमार्ट” जैसी भीमकाय कंपनियां भारत में खुदरा व्यापार में सौ फीसदी निवेश कर धंधा कर सकेंगीं सो भी बेरोकटोक। लेकिन यह फैसला करते वक्त सत्ताधारी पार्टी यह भूल गयी कि वो इसी एफडीआई के विरोध में कैसे धरती आसमान एक कर देती थी । सरकार के मुखिया नरेंद्र दामोदर दास मोदी, वित्त मंत्री अरुण जैटली भूल गए कि कांग्रेस की सरकार में ऐसे निवेश के विरोध में क्या कहते-बोलते थे?

अब पलटी भी ऐसी कि बिना किसी लिहाज़ के खुदरा कारोबार में 100 फीसदी सीधे विदेश निवेश को मंजूरी दे दी है। अब होगा ये कि ‘वालमार्ट’ जैसे रिटेल के अन्तर्राष्ट्रीय दैत्य भारत आकर छोटे कारोबार को निगल जाएंगे और डकार भी न लेंगे। आइये याद कर लीजिए कि 2014 से पहले जब बीजपी सत्ता में नहीं थी तब FDI को लेकर उसकी क्या राय थी। तब बीजपी FDI का फूल फॉर्म बताती थी- Fund For Devlopment of Indian national congress…बीजपी के धरने पर लगा पोस्टर देखिये…

तब मोदी से लेकर तमाम बीजपी नेताओं के बयानों में कहा जाता था कि कांग्रेस पार्टी FDI के जरिये देश को बेच रही है। नरेंद्र मोदी ट्वीट करके तत्कालीन प्रधानमंत्री पर सीधे निशाना लगाते थे..। मोदी ने कहा था- “UPA सरकार विदेशियों की, विदेशियों द्वारा, विदेशियों के लिए है..पता नहीं पीएम क्या कर रहे हैं…छोटे कारोबारियों के शटर डाउन हो जाएंगे ।”

अरुण जेटली ने कसम खायी थी कि ‘आखिरी सांस तक एफडीआई का विरोध करेंगे।’ (ट्वीट्स के स्क्रीन शॉट देखिये)सुषमा स्वराज एफ डी आई विरोधी धरना प्रदर्शनों में भांगड़ा गिद्दा का छोंक डालतीं थीं। वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी जैसे सूरमा हाथों में तख्तियां लेकर लहराते थे जिन पर लिखा होता था–“भ्रष्टाचारियों, चोरों का हाथ- एफडीआई के साथ..”। 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी जी और उनके पूरे कुनबे को दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और वे एफडीआई के पक्ष में साष्टांग दंडवत होने लगे।

साल 2016 में मोदी सरकार ने रक्षा, विमानन, केबल, मोबाइल टीवी आदि आदि में 100 फीसदी विदेशी निवेश (FDI) को मंज़ूरी दे दी थी। देश को याद है कि जब यही सब पिछली सरकार करने वाली थी तब बीजेपी ने कितना हल्ला मचाया था। ससंद ठप्प कर दी जाती थी। पूरे देश में हाहाकार मचाया जाता था कि कांग्रेस/यूपीए की सरकार देश को बेच रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके स्वदेशी जागरण मंच जैसे अनुषांगिक संगठन तब छाती पीटते थे लेकिन अब आवाज़ भी गले से नहीं निकलती। जब सरकार ने सेना, विमानन जैसे क्षेत्रों में  सौ फीसदी निवेश को मंजूरी दी थी तब भी इनके मुंह से आवाज़ नहीं निकली थी।

लेखक डॉ राकेश पाठक कर्मवीर के प्रधान संपादक हैं. इनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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वरिष्ठ पत्रकार अजय सेतिया बोले- प्रधानमंत्री मोदी ने ब्यूरोक्रेसी को बेलगाम कर दिया है

Ajay Setia : मैं इसे पत्रकारिता पर हमला मानता हूं। यूआइडीएआई ने जिस तरह आधार कार्ड का डाटा बेचे जाना का भंडा फोड़ करने वाली ट्रिब्यून की रिपोर्टर रचना खेरा पर केस दर्ज किया है, यह लोकतंत्र के चौथे खंभे को नोचने वाली घटना है। ब्यूरोक्रेसी ने नरेंद्र मोदी को यह बता रखा था कि यह डाटा एक दम सुरक्षित है, उसी भरोसे मोदी सरकार सुप्रीमकोर्ट में सुरक्षा की गारंटी दे रही थी। सुप्रीमकोर्ट के फैसले से ठीक पहले ट्रिब्यून की रिपोर्टर ने आधार कार्ड के गोरख धंधे की पोल खोल कर रख दी , तो अफसरों के रंग में भंग पड़ गया। वे तिलमिला उठे है और उन्होंने रिपोर्टर पर ही एफआईआर दर्ज करवा दी है। ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र के चौथे खंभे पर हमले के लिए सिर्फ अधिकारी जिम्मेदार हैं । जिम्मेदार वे सब भी हैं, जिन्होंने ब्यूरोक्रेसी को बेलगाम बना दिया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से ब्यूरोक्रेसी को बेलगाम कर देने के कारण अधिकारियों की मति मारी गई है। सरकारी अधिकारी ब्रिटिश मानसिकता से बाहर नहीं निकल रहे और अब तक कोई प्रधानमंत्री या कोई मुख्यमंत्री ऐसा नहीं आया जो इन सरकारी नौकरों को उन की औकात बता सके कि राज जनता का है, उन का नहीं, आजादी के बाद से उन्होंने देश में ऐसे हालात बना रखे हैं कि अंग्रेज उन्हें स्थाई सत्ता सौंप कर गए हैं, पांच साल के लिए चुनी जाने वाली सरकारें तो मेहमान हैं। वे अधिकारी अपने निरंकुश राज में मीडिया को सब से बडी बाधा मानते है। इस लिए जब भी उन का दाव लगता है, वे मीडिया को निशाना बनाते हैं।

एक तरफ सरकारी अधिकारियों ने महिला पत्रकार के खिलाफ एफआईआर लिखा दी है, तो दूसरी तरफ यूआईडीएआई ने खुद दावा किया है कि जो हुआ वह कोई बड़ी बात नहीं है, कुछ लीक नहीं हुआ, सब कुछ सुरक्षित है। जब सब कुछ सुरक्षित है तो बेचैनी क्यों है, फिर एफआईआर दर्ज क्यों करवाई गई। यूआईडीएआई ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह बताने के लिए भागदौड़ शुरू कर दी है कि वास्तव में डाटा लीक नहीं हुआ है, यह साबित करने के लिए उस के चंडीगढ़ क्षेत्रीय कार्यालय ने ट्रिब्यून के संपादक को एक चालाकी भरा पत्र लिखकर पूछा है कि, “आपके संवाददाता के लिए (खरीदे गए यूजर आईडी और पासवर्ड से) क्या किसी व्यक्ति के फिंगर प्रिंट और आइरिस स्कैन देखना या प्राप्त करना संभव हुआ और संवाददाता ने उक्त यूजर आईडी और पासवर्ड से कौन से आधार नंबर डाले और ये किसके थे।” पत्र में कहा गया है कि ये विवरण 8 जनवरी तक भेज दिए जाएं वर्ना यह माना जाएगा कि किसी फिंगर प्रिंट और / या आयरिश स्कैन को ऐक्सस नहीं किया जा सका। यानी साफ है कि अगर ट्रिब्यून के संपादक का सोमवार तक जवाब नहीं आया तो सरकार कोर्ट में कह सकेगी कि डाटा लीक होने की खबर गलत है।

खबर करने वाली रिपोर्टर का नाम एफआईआऱ में डालने और उसके संपादक से पत्र लिखकर उपरोक्त विवरण मांगने का एक मकसद और भी है, कि यदि संपादक ने सोमवार को जवाब दे दिया और उस में कह दिया कि रिपोर्टर ने फींगर प्रींट नहीं देखे तो उनका काम आसान हो जाएगा, पर वह ट्रिब्यून के संपादक हरीश खरे को नहीं जानते । वह ऐसा कोई जवाब नहीं देंगे जो ट्रिब्यून की प्रतिष्ठा को धका पहुंचाए या उन की रिपोर्टर को गलत साबित करे। और ट्रिब्यून की रिपोर्टर रचना खेरा ने कह दिया है कि वह अपनी स्टोरी पर कायम है, स्वाभाविक है कि जब पैसा देने पर मांगे गए आधार कार्ड का डाटा खुल गया तो उस में फींगर प्रिंट भी तो होंगे ही।

यूआईडीएआई ने एफआईआर दर्ज करवा कर गलती की है , उस को तो दि ट्रिब्यून और उसकी रिपोर्टर का अहसानमंद होना चाहिए कि उसने एक गड़बड़ी का पुख्ता सबूत दिया। पर अधिकारी उलटे उसी को परेशान करने में लगे हैं। में मानता हूं कि मोदी सरकार मीडिया पर हमले की तोहमत अपने सिर पर लेने की बजाए तुरन्त एफआईआर रद्द करवाएं और ब्यूरोक्रेसी के मोहजाल से बाहर निकले। अब तो बच्चा यह कह रहा है कि सरकार ब्यूरोक्रेसी चला रही है। मोदी को यह धारणा ही ले बैठेगी।

वरिष्ठ पत्रकार अजय सेतिया की एफबी वॉल से.

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पीएम के गृहनगर में भाजपा फ्लॉप, गुजरात में 6 मंत्री चुनाव हारे, हिमाचल में भाजपा के भावी सीएम हारे

पीके खुराना

जीत-हार के चुनावी सबक : हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनाव अपने आप में अनोखे रहे। पहली बार ऐसा हुआ कि चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद हम सबको गहराई से सोचने पर विवश किया। बहुत से विश्लेषण हुए और विद्वजनों ने अपनी-अपनी राय रखी। सच तो यह है कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा के चुनाव परिणामों में मतदाताओं ने सत्तारूढ़ दल, विपक्ष और चुनाव आयोग को अलग-अलग संदेश दिये हैं। आइये, इन संदेशों को समझने का प्रयत्न करते हैं। नरेंद्र मोदी ने गुजरात जीत कर दिखा दिया है लेकिन उनकी जीत में हार का कसैला स्वाद भी शामिल है।

यह एक कटु सत्य है कि भाजपा गुजरात हार चुकी थी और अमित शाह की रणनीति तथा ब्रांड मोदी के प्रभामंडल ने भाजपा को गुजरात वापिस उपहार में दिला दिया। अमित शाह और नरेंद्र मोदी न होते तो गुजरात किसी भी हालत में भाजपा की झोली में न जाता। सौराष्ट्र का जल संकट, किसानों के लिए अलाभप्रद होती जा रही खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में लूट का आलम, बढ़ती बेरोज़गारी और विभिन्न आंदोलनों आदि की गंभीरता को अमित शाह और नरेंद्र मोदी भी तभी समझ पाये जब चुनाव प्रचार के दौरान उनका मतदाताओं से सामना हुआ, अन्यथा वे सिर्फ अपनी नीतियों का ढोल पीटने में ही मशगूल थे। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने जीएसटी के नियमों में तुरत-फुरत परिवर्तन किया और व्यापारियों की नाराज़गी दूर करने में सफल हुए। मोदी ने मणिशंकर अय्यर द्वारा ‘नीचÓ शब्द के प्रयोग को खूब भुनाया।

जमीन पर कांग्रेस का संगठन न होना, पाटीदारों का बंट जाना और नरेंद्र मोदी का गुजराती होना भी उनके काम आया। अमित शाह ने हमेशा की तरह इस चुनाव में भी बूथ-स्तर तक स्वयं को जोड़ा और संगठन शक्ति के कारण सत्ता में वापिस आये। इस बार पहली बार मतदान का प्रतिशत 71.3 प्रतिशत से घटकर 68.5 प्रतिशत पर आ गया, और महिलाओं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इसका स्पष्ट प्रभाव देखने को मिला। भाजपा और कांग्रेस, दोनों के वोट प्रतिशत बढ़े। भाजपा का वोट प्रतिशत सन् 2012 के 47.8 प्रतिशत से बढ़कर 49.1 प्रतिशत हो गया जबकि इसी दौरान कांग्रेस का वोट प्रतिशत 38.9 प्रतिशत से बढ़कर 41.4 प्रतिशत हो गया। लेकिन इसमें जो बड़ा पेंच है, वह यह है कि भाजपा का वोट बैंक शहरी क्षेत्रों में इतना अधिक बढ़ा कि उसने उसके कुछ वोट प्रतिशत को बढ़ा दिया जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को वोट प्रतिशत में जबरदस्त हानि हुई है। यही कारण है कि उसे शहरी क्षेत्र की 85 प्रतिशत सीटों पर जीत मिली जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस उस पर हावी रही।

दूसरी ओर, किसी बड़े स्थानीय नेता तथा संगठन के अभाव ने कांग्रेस को शहरी क्षेत्रों में मात दिलाई। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के समर्थन का कांग्रेस को लाभ मिला। यह कहना सरासर गलत है कि हार्दिक पटेल फैक्टर फेल हो गया। कांग्रेस को हार्दिक पटेल के समर्थन का भी लाभ मिला ही है। गुजरात में कांग्रेस-नीत गठबंधन एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरा है। देखना यह होगा कि अगले पांच सालों में इसकी भूमिका क्या रहती है और वे सत्तारूढ़ पक्ष की नीतियों को जनता के हक में कितना प्रभावित कर पाते हैं।
गुजरात में प्रधानमंत्री के गृहनगर में भाजपा हारी है, भाजपा के 6 मंत्री चुनाव हार गए हैं और हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार गए हैं।

संदेश स्पष्ट है कि यदि आप अपनी नीतियों को लेकर सिर्फ गाल बजाते रहेंगे और जनता की बात नहीं सुनेंगे तो जनता भी आपको नकार देगी फिर चाहे नेता कितना ही बड़ा क्यों न हो। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के समय राहुल गांधी को अमेठी में इसी स्थिति का सामना करना पड़ा था जब प्रियंका को मैदान में आकर स्थिति संभालनी पड़ी थी, लेकिन उसके बाद कोई और रचनात्मक कार्य न होने के कारण नतीजा यह रहा कि अमेठी में स्थानीय निकायों के चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया।

राहुल गांधी के लिए जनता का स्पष्ट संदेश है कि वे संगठन मजबूत करें और जनता से संपर्क बनाएं। गुजरात में राहुल ने इसकी अच्छी शुरुआत की है और लगता है कि अब वे संगठन की मजबूती पर भी काम करेंगे। उनकी कार्यशैली ही उनका और कांग्रेस का भविष्य तय करेगी। फिलहाल राहुल गांधी को जो सबसे बड़ा लाभ मिला है वह यह है कि वे न केवल वरिष्ठ कांग्रेसजनों का विश्वास फिर से हासिल करने में कामयाब हुए हैं बल्कि शेष विपक्ष भी अब उन्हें नई निगाह से देखने लगा है और कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले वर्षों में वे यूपीए के चेयरमैन के रूप में भी वैसे ही स्वीकार्य हो जाएं जैसी कि सोनिया गांधी रही हैं।

यह लोकतंत्र का सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्षण है कि इस देश में पहली बार चुनाव आयोग को शक की निगाह से देखा गया है। खबर यह भी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अरुण कुमार जोती, ईवीएम के चिप बनाने वाली कंपनी से जुड़े रहे हैं। यह लोकतंत्र पर बड़ा धब्बा है। नरेंद्र मोदी सभी संवैधानिक संस्थाओं को प्रभावहीन बनाने की जुगत में हैं जो बहुत खतरनाक है और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। चुनाव आयोग को शक के दायरे से बाहर होना चाहिए। तकनीक के इस युग बैलेट पेपर पर वापिस लौटने की जिद बेमानी है लेकिन ईवीएम पर यदि शक की सुई है तो इसे दूर होना ही चाहिए।

मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से बता दिया है कि यदि नेता, जनता से कट जाते हैं और अपने बड़े कद की खुमारी में रहते हैं तो जनता भी उन्हें सबक सिखाने में गुरेज़ नहीं करेगी। अमेठी में कांग्रेस की हार, वडनगर में भाजपा की हार और हिमाचल प्रदेश में धूमल की हार का सबक यही है कि जनता किसी को माफ नहीं करेगी, फिर वह चाहे प्रधानमंत्री हो या सबसे बड़े राष्ट्रीय दल का नेता ही क्यों न हो। अमित शाह ने गुजरात में हर स्तर पर मतदाताओं से संपर्क साधा और उन्हें आश्वस्त किया, मोदी ने जीएसटी के नियम ढीले किये, तब जाकर वे सत्ता बनाये रख पाने में सफल हुए। देखना यह है कि मोदी शेष नियम और नीतियां तय करते समय भी गुजरात का सबक याद रखेंगे या नहीं। जनता का एक और संदेश बहुत स्पष्ट है कि घोषणाओं से उसका पेट नहीं भरता, योजनाओं का जमीनी अमल ही परख की एकमात्र निशानी है।

मीडिया लंबे समय से बताता आ रहा है कि घोषणाओं का कार्यान्वयन न के बराबर है। प्रधानमंत्री मोदी की “मेक इन इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “स्टार्ट-अप इंडिया”, “स्टैंड-अप इंडिया”, “स्वच्छ भारत अभियान”, “नमामि गंगे”, “स्मार्ट पुलिस”, “स्मार्ट सिटी” आदि घोषणाएं फाइलों की धूल फांक रही हैं और इनकी असफलता ने नरेंद्र मोदी को सही अर्थों में जुमलेबाज बना डाला है।

गुजरात में भाजपा की जीत में उसकी हार छिपी है और कांग्रेस की हार में उसकी जीत छिपी है, लेकिन हिमाचल प्रदेश का सबक स्पष्ट है कि सत्ता में रहते हुए भी यदि आपने जनता से संपर्क नहीं रखा तो जनता आपको सिंहासन से उतार देगी। कांग्रेस के विधानसभा चुनावों में उत्तरोत्तर हार का यह एक बड़ा कारण है। इससे कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही सबक सीख सकते हैं। लेकिन वे कितना सीखेंगे, कितना मंथन करेंगे और मंथन का कितना नाटक करेंगे, यह कहना इसलिए मुश्किल है क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और बड़े नेताओं के सामने कोई मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करता। राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के बिना असली परिवर्तन की गुंजायश बहुत कम है। हम आशा ही कर सकते हैं कि नेतागण इस स्थिति में सुधार के लिए अहंकार का परित्याग करके कुछ ठोस काम करेंगे। आमीन!

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। सन् 1999 में उन्होंने अपनी जनसंपर्क कंपनी “क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड” की नींव रखी। उनकी दूसरी कंपनी “दि सोशल स्टोरीज़ प्राइवेट लिमिटेड” सोशल मीडिया के क्षेत्र में है। उनकी एक अन्य कंपनी “विन्नोवेशन्स” राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों के लिए कांस्टीचुएंसी मैनेजमेंट एवं जनसंपर्क का कार्य करती है। एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं।

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कश्मीर समस्या का एकमात्र हल

पी.के. खुराना

2014 के लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने कई नारे उछाले थे, उनमें से एक नारा था — “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सीमम गवर्नेंस”। मोदी ने तब यह नारा देकर लोगों का दिल जीता था क्योंकि इस नारे के माध्यम से उन्होंने आश्वासन दिया था कि आम नागरिकों के जीवन में सरकार का दखल कम से कम होगा। लेकिन आज हम जब सच्चाई का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि यह भी एक जुमला ही था। अमित शाह ही नहीं खुद मोदी भी गुजरात के विधानसभा चुनाव के लिए गुजरात में प्रचार कर रहे हैं। अमित शाह के साथ बहुत से विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी राज्य में दिन-रात एक किये दे रहे हैं। लगता है मानो देश की सारी सरकारें गुजरात में सिमट आई हैं। गुजरात विधानसभा चुनावों के कारण संसद का सत्र नहीं बुलाया जा रहा है ताकि संसद में असहज सवालों से बचा जा सके, वे सवाल मतदाताओं की निगाह में न आ जाएं। इसी प्रकार चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को प्रभावित करने के सफल-असफल प्रयास न तो गवर्नेंस हैं और न ही “मिनिमम गवर्नमेंट” के उदाहरण हैं।

उद्यम के विस्तार के लिए तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में आयोजित सम्मेलन में मोदी की उपस्थिति आवश्यक थी क्योंकि यह एक ऐसा कार्यक्रम है जो देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में सार्थक भूमिका निभा सकता है। गुजरात के विधानसभा चुनावों के बीच भी मोदी ने हैदराबाद के सम्मेलन के लिए समय निकाला क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय नेताओं से मिलकर बहुत खुश होते हैं, अच्छी खबर बन जाती है और इस सम्मेलन की उपलब्धियों को वे गुजरात के चुनाव में भी भुना सकते हैं। लेकिन गुजरात के विधानसभा चुनावों की आपाधापी में हम सब एक ज्वलंत समस्या, यानी कश्मीर को भुलाए दे रहे हैं।

वोट पाने के लिए भाजपा के काम करने का तरीका बहुत बारीकी से बुना जाता है। गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी से व्यापारियों में इस हद तक नाराज़गी थी कि कांग्रेस का एक छोटा-सा ट्वीट “विकास पागल हो गया है” सोशल मीडिया पर वायरल होकर अपने आप में एक बड़ा मुद्दा बन गया। इसके बाद गुजरात में राहुल गांधी की लोकप्रियता और कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी। जनता का मूड भांप कर भाजपा ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया और जीएसटी की दरें घटाईं, जीएसटी फाइल करने की कठिनाइयों को दूर करने का प्रयत्न किया और व्यापारी वर्ग को यह संदेश दिया कि भाजपा उनके साथ है। नीतियों में आनन-फानन में परिवर्तन के अलावा अपनी जानी-पहचानी रणनीति के मुताबिक मतदाता सूची पर आधारित पन्ना-प्रमुख, शक्ति केंद्र आदि की संरचना करके संगठन को न केवल मजबूत किया बल्कि उस संगठन के माध्यम से घर-घर पहुंचना सुनिश्चित किया। मतदाताओं तक पहुंचने के भाजपा के विशद कार्यक्रम का लाभ भाजपा को मिलना निश्चित है। अमित शाह की यह कार्य-प्रणाली सचमुच प्रभावशाली है। विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत इसका प्रमाण है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता से बातचीत में एक रोचक तथ्य सामने आया। नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर उन्होंने बताया कि दिल्ली से जो कांग्रेसी नेता छत्तीसगढ़ आते हैं, उनका काफी प्रचार होता है, वे तामझाम के साथ आते हैं, स्वागत करवाते हैं, कुछ बड़े नेताओं से मिलते हैं, प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और दिल्ली लौट जाते हैं जबकि भाजपा के केंद्रीय नेता बिना किसी तामझाम के पहुंचते हैं, नेताओं से मिलने के बाद गांवों में जाते हैं, कार्यकर्ताओं से मिलते हैं, उनसे चर्चा करते हैं, उन्हें सुझाव देते हैं और एक स्फूर्तिदायक माहौल बनाकर वापस जाते हैं।

कश्मीर की समस्या पर टिप्पणी करते हुए भाजपा की चुनावी रणनीति का विश्लेषण करना इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि भाजपा इसी रणनीति पर चलकर कश्मीर की समस्या का हल कर सकती है। कश्मीर के लोगों में नाराज़गी है, केंद्र सरकार से उनकी कई अपेक्षाएं हैं जो पूरी नहीं हो रही हैं। बातचीत के कई दौर असफल हो चुके हैं, मोदी सरकार की ओर से कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा का तीन दिन तक विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों से मिलकर बातचीत का हालिया दौर भी उससे अलग नहीं है क्योंकि इसके लिए कोई सोची-समझी रणनीति बनाने के बजाए बहुत उथले ढंग से प्रयास किया गया है। अलगाववादी नेताओं की बात तो छोड़िये, मुख्यधारा के बहुत से नेता भी उनसे बेदिली से ही मिले। भारत सरकार ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व मुखिया दिनेश्वर शर्मा को जम्मू-कश्मीर का मुद्दा सुलझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त किया और उन्हें किसी से भी बात करने की स्वतंत्रता दी।
दिनेश्वर शर्मा की वापसी के बाद स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया केंद्र सरकार की आशाओं के अनुरूप नहीं थी। वस्तुत: ऐसी कार्यवाहियों से अविश्वास और बढ़ता है, नाउम्मीदी और बढ़ती है।

इसकी बजाए भाजपा के केंद्रीय नेताओं को कश्मीर जाकर वहां के स्थानीय नेताओं से बातचीत करनी चाहिए और उनके साथ मिलकर कश्मीर के लोगों से अनौपचारिक चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों के साथ अनौपचारिक चर्चा में बहुत से छोटे-छोटे मुद्दे उभर कर सामने आयेंगे, जिनका हल बहुत आसान है लेकिन समस्या बने रहने पर वे नाराज़गी के बड़े कारण बन जाते हैं। कश्मीर के लोगों के अनौपचारिक संपर्क की यह प्रक्रिया न तो आसान होगी और न ही अल्पकालिक। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, लेकिन यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके परिणाम सार्थक होने की संभावनाएं सबसे ज्य़ादा हैं। समस्या यह है कि भाजपा के एजेंडे में कश्मीर प्राथमिकता पर नहीं है और कश्मीर समस्या के हल के लिए भाजपा रचनात्मक ढंग से नहीं सोच रही है।

कश्मीर में हाल ही में एक घटना हुई है जिससे भाजपा कुछ सीख ले सकती है। उत्तरी कश्मीर का निवासी एक नवयुवक उमर खालिक मीर उर्फ समीर इसी वर्ष मई में लश्कर में शामिल होकर उग्रवादी बन गया था। इसी 3 नवंबर को सेना जब एक गांव में तलाशी अभियान चला रही थी तो उन्हें एक घर में इस युवक की मौजूदगी की भनक मिली। बहुत प्रयासों के बाद भी जब उमर खालिक समपर्ण के लिए तैयार नहीं हुआ तो सेना के अधिकारियों ने वहां से 5 किलोमीटर दूर स्थित उसके घर में उसकी मां से संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया कि यदि उनका बेटा समर्पण कर देगा तो वे उसके साथ नरमी का व्यवहार करेंगे। मां की अपील पर उमर खालिक ने समपर्ण कर दिया। इसके बाद उभरते हुए फुटबॉल खिलाड़ी मज़ीद अर्शद खान द्वारा मुख्यधारा में लौटने के बाद एक और मां ने अपने बेटे को उग्रवाद की राह छोड़ने के लिए अपील जारी की है। कश्मीर की महिला फुटबॉल खिलाड़ी और कोच अफशाना को भी एक बार ऐसे हालात में घिरना पड़ा जहां वे पुलिस पर पथराव में शामिल हो गईं। पत्थरबाजी करते हुए उनकी तस्वीर वायरल हो गई तब उन्हें समझ आया कि उनसे क्या गलती हुई है। वे मानती हैं कि हिंसा उनके मसले का हल नहीं है। यही नहीं, हाल ही में जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की 13 क्रिकेट टीमों ने एक साथ अपने हुनर का प्रदर्शन किया।

क्या हम खिलाड़ियों को इन भटके युवाओं का आदर्श बना सकते हैं, क्या हम कश्मीर की फिज़ा बदलने के लिए कुछ उदारवादी धार्मिक नेताओं, समाज सेवकों, शिक्षकों और पत्रकारों आदि की सहायता ले सकते हैं, क्या हम कश्मीर में किसी नये नाम से कोई ऐसा संगठन खड़ा कर सकते हैं जो धीरे-धीरे स्थानीय लोगों में पैठ बनाकर उनका विश्वास जीत सके? मोदी जी के लिए गुजरात जीतना जितना अहम मुद्दा है, कश्मीर में शांति स्थापित करना हम भारतीयों के लिए उससे भी ज्य़ादा अहम मुद्दा है। क्या मोदी जी इस ओर ध्यान देंगे?

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं और लगभग हर विषय पर कलम चलाते हैं। संपर्क : pkkhurana@gmail.com

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2019 के अंत तक बंद होंगे 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे!

आज़ादी के 70 साल बाद अभी वर्तमान का यह समय छोटे और मध्यम अखबारो के लिए सबसे कठिन है। यदि सरकार के DAVP पॉलिसी को देखा जाय तो लघु समचार पत्रों को न्यूनतम १५ प्रतिशत रुपये के रूप में तथा मध्यम समाचार पत्रों को न्यूनतम ३५ प्रतिशत रुपये के रूप में विज्ञापन देने का निर्देश है। गौरतलब है कि भारत विविधताओं का देश है यहां विभिन्न भाषाएं हैं। ग्रामीण तथा कस्बाई इलाकों में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। बड़े अखबार समूह की पहुंच वहां तक नहीं है। यदि विज्ञापन के आवंटन में भाषा और मूल्य वर्ग का ध्यान नहीं रखा गया तो निश्चित ही उस विज्ञापन की पहुंच विस्तृत तथा व्यापक नहीं होगी और विज्ञापन में वर्णित संदेश का प्रसार पूरे देश के समस्त क्षेत्रों तक नहीं हो पायेगा। पूर्व मंत्री द्वारा राज्यसभा में एक प्रश्र के उत्तर में नीति के पालन की बात कही गयी थी। परन्तु आज वह बयान झूठ साबित हो रहा है।

गांव का सरपंच यदि मजदूरी का भुगतान नहीं करता। पटवारी खसरे की नकल देने में रिश्वत मांगता है। दफ्तर का बाबू हर काम के लिए गरीब को दौड़ाता है। शुद्ध पानी नहीं मिल रहा। बिजली नहीं है। ठेकेदार ने मजदूरी हड़प ली। सड़के टूटी हैं। गन्दगी है। तो ऐसे सवालों के लिए आम जनता बड़े अखबारों के दफ्तर में नहीं पहुंचती है। वह जिंदगी की जद्दोजहद से परेशान अपने गांवों तथा कस्बों से छपने वाले अखबारों के दफ्तरों में पहुंचता है। लेकिन मोदी सरकार तो पूंजीपतियों के इशारे पर चल रही है। उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर एक बार फिर इमरजेन्सी की तलवार लटक रही है। कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा हो रही है। आज़ादी के बाद नेहरू जी ने अखबारों को जगह जगह जमीनें दिया था। अखबारी कागज पर सब्सिडी मिलती थी ताकि चौथा खम्भा जीवित रहे। परन्तु वर्तमान सरकार को ना जाने कौन सलाह दे रहा है कि सिर्फ बड़े मीडिया हाउस पर मेहरबान है यह।

सरकार की डीएवीपी पालिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने के कगार पर हैं, या फिर बंद हो रहे हैं। इसका दूसरा बड़ा कारण कारण है बड़े अखबारों का लागत से 90% कम पर अखबार बेचना या कहें कि एक तरह से फ्री में देना। आज अखबार के सिर्फ एक पेज के कागज का दाम 30 पैसे पड़ता है। इस तरह 12 पेज के अखबार के कागज की कीमत 3.60 रुपये होती है। इसके बाद प्रिंटिंग, सैलरी तथा अन्य खर्च कम से कम प्रति अखबार रु 2.40 आता है। कुल मिलाकर 6 रुपये होता है। इसके बाद हॉकर तथा एजेंट कमीशन, टांसपोर्टशन 50%, यानी 3 रुपये। टोटल 9 रुपये खर्च पर एक पेज की लागत 75 पैसे आती है। इस प्रकार 20 पेज का अखबार का 15 रुपये होता है। जितना ज्यादा पेज उतना ज्यादा दाम होने चाहिए। तब छोटे औऱ मध्यम अखबार बिक सकते हैं और तभी प्रसार बढ़ेगा, नहीं तो असम्भव है।

जैसे छोटे उद्योगों को बचाने लिए सरकार की पॉलिसी है, एन्टी डंपिंग डयूटी, विदेशी कंपनियों से यहां के उद्योग धंधों को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी लगाया जाता है, उसी तरह लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, मोनोपोली कमीशन भी इसमें सहयोग नहीं कर रहा है। जबतक ये नहीं होता है, तबतक कभी भी छोटे और मध्यम अखबार नहीं बिक सकेंगे, क्योंकि इन्हें प्राइवेट विज्ञापन नहीं मिलता है। इसलिए लागत से कम बेचना सम्भव नहीं है। बड़े अखबारों का फर्जी प्रसार सबसे ज्यादा है। अखबार फ्री देकर प्रसार बढ़ाते हैं। सिर्फ इतना ही दाम रखते हैं कि हॉकर रद्दी में बेचे तो उसे नुकसान हो। बड़े अखबारों का ज्यादातर प्रसार बुकिंग के द्वारा होता है। घर की महिलाएं बुकिंग से मिलने वाले गिफ्ट के लिए स्कीम वाले अखबार खरीदती हैं। बुकिंग के बाद हर महीने हॉकर को जो कुछ राशि देनी पड़ती है वो भी अखबार का रद्दी बेचकर निकल जाता है। इस तरह अखबार फ्री में मिलता है। सभी बड़े अखबारों के मालिक बड़े उद्योगपति हैं या बड़े उद्योगपतियों ने इनके शेयर खरीद रखे हैं। उनके प्राइवेट विज्ञापन एक तरह से उनके ही अखबारो में आते हैं। एक तरह से एक जेब से अपना पैसा दूसरे जेब में डालते हैं।

सभी बड़े अखबार एक होकर छोटे और मध्यम अखबार को सरकार की नीतियों में बदलाव करवा कर निबटाने में लगे हैं। इसी का नतीजा है नई डीएवीपी पालिसी और जीएसटी। जो हालात दिख रहा है, उसके मुताबिक 2019 तक 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे। उसके बाद सिर्फ बड़े अखबार रहेंगे और सरकार के गुणगान में लगे रहेंगे। सभी सरकारी विज्ञापन भी उनकी झोली में जायेंगे और उसके मालिक लोग अपने उद्योगों की दलाली करते रहेंगे।

अखबार को विज्ञापन लेने का हक है क्योंकि सिर्फ अखबार ही ऐसा माध्यम है जिससे रोजाना 2 से 4 पेज सिर्फ सरकार और उसके सभी अंगों की खबरें, चाहे प्यून से PM या चपरासी से CM, मुखिया से लेकर सभी नेताओं तक, की छपती है। यह किसी अन्य माध्यम में नहीं होता है। फिर भी आज इस चौथे खंभा की आज़ादी पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं। अखबार को विज्ञापन लेने का हक है। कम से कम दो पेज रोजाना। जितना एरिया न्यूज का, उतना कम से कम विज्ञापन का होना चाहिए। पहले सरकार अखबार को प्राइम जगहों पर जमीन देती थी, सब्सिडी पर कागज, अब GST लगाकर वसूली के साथ-साथ इंस्पेक्टर राज। कोई भी आकर लेखा जोखा चेक करने लगेगा।

सरकारें कहती हैं कि सरकार के फेवर में लिखो, विरोध में लिखोगे तो विज्ञापन बंद। जज का वेतन सरकार देती है लेकिन क्या सरकार कहती है कि सरकार के विरोध में जजमेंट दोगे तो वेतन और सुविधा बंद कर दिया जाएगा? यही नहीं, समय समय पर इनके वेतन इत्यादि में वृद्धि होती है। परन्तु आज अखबार के विज्ञापन में कमी की गई और अब इसे खत्म करने की साजिश हो रही है। आज देश में एक दूसरे तरह का संकटकाल है।  बड़े बड़े उद्योगों के मालिक मीडिया के शेयर खरीद रहे हैं और मीडिया उनका गुलाम बनता जा रहा है। अमेरिका की तरह भारत में भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति एक व्यापारी बन सकता है या फिर पाकिस्तान की तरह सेना का कठपुतली प्रधानमंत्री बन सकता है। पाकिस्तान में पहले सेना तख्ता पलट कर देती थी। अब कठपुतली प्रधानमंत्री और सरकार के सभी बड़े पदों के लोग सेना के कठपुतली हैं।

छोटे और मध्यम अखबार से जुड़े लोग सड़क पर आ जायेंगे और बड़े मीडिया हाउस के जुड़े पत्रकार भी परेशान होंगे क्योंकि जब प्रिंट मीडिया के पत्रकार बेरोजगार होंगे तो वो TV ईत्यादि हर जगह नौकरी की लाइन में लगेगा। ऊपर से सरकार पेनाल्टी का केस डाल कर वसूली करने की तैयारी में है। हमें मिलकर सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, इसके लिए दबाव बनाना होगा। अमेरिका में 1 डॉलर (70रु) ब्रिटेन में 1 पौंड (80रु) और पड़ोसी पाकिस्तान में 20 रुपये में अखबार बिक सकता है तो भारत में क्यों नहीं? पाकिस्तान के लोग ज्यादा अमीर हैं? ज्यादा पढ़े लिखे हैं? करांची की आबादी 2 करोड़ है पर उस शहर में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार की प्रसार संख्या कितनी है? पाकिस्तान का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार ‘जंग’ है जिसका पूरे पाकिस्तान में प्रसार 8.5 लाख है। हमारे यहां तो Metro Cities के कुछ अखबार 10 लाख से ज्यादा ABC सर्कुलेशन दिखाते हैं। जब 15-20 या ज्यादा पेज के कारण ज्यादा दाम होगा तब दस लाख सर्कुलेशन दिखाने वाला अखबार एक लाख भी नहीं बिक पायेगा।

दूसरी बात अगर सरकार सचमुच में छोटे और मध्यम अखबार को बचाना चाहती है तो 5000 कॉपी सर्कुलेशन तक के लिए कम से कम 25 रुपये डीएवीपी दर दे और इससे ज्यादा सर्कुलेशन के लिए आरएनआई चेकिंग का नियम बना दे। हर 5000 सर्कुलेशन बढ़ने पर 10% दर बढ़े। साथ ही बिग कैटेगरी के स्लैब की दर में कोई बदलाव नहीं हो, क्योंकि बड़े अखबारो को प्राइवेट विज्ञापन बहुत मिलते हैं।

सरकार ये नियम भी बनाये कि जो भी व्यक्ति अखबार या कोई मीडिया हाऊस चलाता हो, वो कोई धंधा नहीं करे या दूसरा बड़ा काम नहीं करे या छोटे-छोटे धंधे जो पूर्व से संचालित है, उसे 75 लाख टर्नओवर की लिमिट कर दे क्योंकि इससे कोई अखबार किसी का सपोर्ट या विरोध नहीं करेगा, उसका हित प्रभावित नहीं होगा। जज जिस कोर्ट से रिटायर होता है उसे उस कोर्ट में वकील के रुप मे प्रैक्टिस करने की मनाही होती है। समाचार पत्र अब जीएसटी के चलते बन्द हो जायेंगे। पं. दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के कथनी करनी में अन्तर स्पष्ट दिख रहा है।

एक छोटे अखबार के प्रकाशक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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चार महीने पहले रेल टिकट कटाने वाले इंजीनियर का दिवाली पर घर जाने का सपना ‘वेटिंग’ ही रह गया!

Yashwant Singh : हरिद्वार में कार्यरत इंजीनियर गौरव जून महीने में तीन टिकट कटाए थे, दिल्ली से सहरसा जाने के लिए, अपनी बहनों के साथ। ट्रेन आज है लेकिन टिकट वेटिंग ही रह गया। चार्ट प्रीपेयर्ड। लास्ट मोमेंट में मुझे इत्तिला किया, सो हाथ पांव मारने के बावजूद कुछ कर न पाया। दिवाली अपने होम टाउन में मनाने की उनकी ख्वाहिश धरी रह गई। दिवाली के दिन अपने जिला-जवार में होने की चार महीने पहले से की गई तैयारी काम न आई।

धन्य है अपना देश। धन्य है भारतीय रेल। हां, सत्ता के नजदीकियों के चिंटू पिंटू मिंटू जब चाहें टिकट कटा कर सीधे रेल मंत्रालय से कन्फर्म करा सकते हैं। सरकार चाहें कांग्रेसियों की हो या संघियों की, इस देश में दो देस होने का एहसास बना रहेगा।

भड़ास एडिटर यशवंत की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Dushyant Rai प्रभु ने जुलाई में वेटिंग खत्म करने की बात कभी नहीं की थी।वाजपेयी सरकार के मालगाड़ियों के लिए अलग लाइनों (DFC)को अगर यूपीए सरकार ने पूरा किया होता तो आज किसी को टिकट के लिए रोना नहीं पड़ता। इस सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।मालगाड़ी में अधिकतम लोडिंग करने से पुरानी पटरियों की भी हालत गंभीर हो गई थी।हजारों किलोमीटर के ट्रैक पर 2 करोड़ यात्रियों को ढोते हुए भी यह सरकार अगले साल से कई रूटों पर DFC शुरू कर देगी। लगभग 3 साल में सबको बर्थ मिलने लगेगी और यात्रा का समय भी काफी कम हो जाएगा।

Rajiv Tiwari दूर तक साफ दिखाने वाला चश्मा लगाइए, मोदी लेंस को बदलकर।

Dushyant Rai अलीगढ़ से कानपुर की यात्रा ट्रेन यात्रा आम आदमी बन कर कीजिए, काम की गति और क्वालिटी देखकर आप को अपने कमेंट के लिए बड़ी शर्म आएगी।

Rajiv Tiwari शर्म आती है दुष्यंत जी, आप जैसे अंध समर्थकों पर, जो यह मानते है भारत निर्माण केवल 3 वर्षों में हुआ है। वरना पहले तो विशाल बियाबान जंगल था यहां। ट्रेन तो लोगों ने देखी ही नहीं थी…हैं ना सही बात।

Yashwant Singh भाई Rajiv Tiwari, दुष्यंत जी अपने पुराने मित्र और खरे आदमी हैं। रेल मंत्रालय से जुड़े हैं। हम लोगों को इनकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। दूसरा पक्ष हमेशा महत्वपूर्ण होता है। मालगाड़ी और यात्री रेल की लाइन अलग किए जाने की व्यवस्था से निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।

Rajiv Tiwari सहमत हूँ यशवंत भाई, लेकिन पक्ष को संतुलित तरीके से रखना भी एक कला होती है।

Sanjaya Kumar Singh दुष्यंत राय जी, दो नहीं तीन मोर्चों पर कहिए। यूपीए सरकार ने बुलेट ट्रेन भी चला दी होती तो मोदी जी को उसपर भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मेट्रो चलाया था तो उसका किराया बढ़ाकर खुश होने का मौका भी नहीं मिलता।

Yashwant Singh और ये भी सच है कि 60 साल में कांग्रेस अगर सबको यात्रा सुविधा प्रदान नहीं कर पाई तो प्राइमरी अपराधी हाथ का पंजा ही है। हां, bjp चीजों को ठीक करने के नारे के साथ आई थी तो इससे उम्मीद ज्यादा है और फिलहाल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी है। हो सकता है सही नीति पर अमल करके आगे चीजें ठीक कर दी जाएं, जिसका हम सबको इंतज़ार है।

Rajiv Tiwari संजय जी, बुलेट ट्रेन आने से देश का चहुँमुखी विकास हो जाने वाला है, जैसा पहले की सरकारों ने मेट्रो लाकर किया। चारों ओर सुख शांति, कहीं कोई परेशान नहीं, सर्व सुविधाओं की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और हर देशवासी उसमें गोते लगाकर पुण्य बटोर रहा है।

Rajiv Tiwari ठीक कहा आपने यशवंत भाई, कांग्रेस ने 60 साल में जो कुछ किया उसका परिणाम उसके सामने है। लेकिन 3 साल में 6 दशकों पुरानी मैली गंगा साफ करने का दावा करने वाले ये बातों के शेर खुद कहाँ खड़े हैं।

Sanjaya Kumar Singh मूल मुद्दा ये है Yashwant Singh जी कि वेटिंग लिस्ट लेने की भी तमीज नहीं है। जब तीन या चार महीने पहले बुकिंग शुरू होती है और छठ के लिए महीने भर बाद ही वेटिंग शुरू हो जाता है तो ये तय होना चाहिए कि वेटिंग कितना बुक करना है, कब तक और जो बुक हो जाए उसे कंफर्म मिलना ही चाहिए। वैसे भी अब जब अंतिम समय पर कैंसल कराने वालों को नहीं के बराबर पैसे मिलते हैं तो कुछ सीटें खाली रह जाएं पर तीन महीने पहले बुक कराने वालों को अंतिम दिन पता चले कि कंफर्म नहीं हुआ और उसे डिफेंड किया जाए कि फलाने ने वो नहीं किया और ढिमाके ने वो नहीं किया – खरा आदमी होना तो नहीं हो सकता। नौकरी हो रही है – उससे मुझे कोई एतराज नहीं है।

Dushyant Rai भाई साहब रेल का नेटवर्क इतना विशाल और इतने बोझ से दबा है कि नई सरकार रेल लाइन बिछाने, विद्युतीकरण और पुरानी लाइन सुधार में लगभग तीन गुना गति से काम कर रही है फिर भी अभी तीन साल लगेगा जनता को अपेक्षित सुविधा मिलने में।

Sanjaya Kumar Singh आप ठीक कह रहे हैं। फिर भी, जब अंतिम समय में कैंसल कराने वाले को टिकट नहीं मिलता है तो क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए (जैसे भी और उसमें छठ स्पेशल ट्रेन में वैकल्पिक आरक्षण मिलने पर चाहिए कि नहीं पूछ लेना शामिल है) कि तीन महीने पहले अपनी जरूरत बताने वाले को निराश नहीं किया जाए। क्या इस जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रेलवे की लाचारी को डिफेंड किया जाए? निश्चित रूप से यह लाचारी 130 करोड़ की आबादी के कारण है और हर कोई नरेन्द्र मोदी होता तो यह स्थिति नहीं आती। पर ये कर दूगां, वो कर दूंगा – कहने से पहले भी यही स्थिति थी।

Shyam Singh Rawat मैं ट्रेन नंबर 15035 व 15036–उत्तरांचल सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस का इसकी शुरुआत से ही नियमित यात्री हूं जो काठगोदाम-दिल्ली रूट पर चलती है। यह ट्रेन पहले ISO 9000 तथा ISO 2001-2008 द्वारा प्रमाणित एक अच्छी सेवा थी। अभी 25 सितंबर को इस ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ (Coach No.D-9), गाड़ी की हालत बहुत बुरी है। समय-पालन, डिब्बे के भीतर सफाई, कैटरिंग, पानी आदि सब चौपट। यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग सुविधा भी खत्म। 4 अक्टूबर को इसी ट्रेन नं.–15036 से वापस आने के लिए जब दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो नैशनल ट्रेन इक्वायरी सिस्टम पर इसका आगमन-प्रस्थान निर्धारित समय-सारणी के अनुसार ही क्रमश: 15.25 और 16.00 बजे दिखाया जा रहा था। जबकि सच्चाई यह थी कि यह ट्रेन 16.05 पर प्लेट फार्म सं―5 पर पहुंची और वहां से 16.35 पर काठगोदाम के लिए चली। यह ट्रेन अपने गंतव्य पर डेढ़ घंटा विलंब से पहुंची। इसकी शिकायत नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से उनके फेसबुक पेज पर की जिसे कुछ ही पलों में डिलीट कर दिया गया था। शायद यह मोदी सरकार की कपटपूर्ण नीति के अनुसार ‘आल इस वैल’ दिखा कर देश में भ्रम का वातावरण बनाने का एक हिस्सा है।

Prashant M Kumar ऐसे में बस यही लगता है कि अपना देश भी परदेस हो गया

Sarwar Kamal इस देश मे दो देश होने का अहसास बना रहेगा

निखिलेश त्रिवेदी भारतीय रेलवे जैसी थी और है वैसी ही आगे भी रहेगी। कायाकल्प की उम्मीद नहीं है।

Pramod Patel यह सरकार भी फेल. . . जनता ने मौका दिया और जनता को ही लुट लिया. . .

Pankaj Kumar अरे बाबा, मैने खुद कोलकाता से मोतिहारी जाने के लिये आज से तीन महीने पहले दो टिकट एसी टू टियर की ली थी। वेटिंग 1 और 2 मिला था। आज तक सीट कंफर्म नहीं हुआ हैं। परिवार को ले जाना है इस हताशे से फ्लाइट से दूसरे रूट से टिकट लिया। जो सबकुछ मिलाकर करीब करीब चौगुना बजट बढ़ गया। सभी रेलवे के मिनिस्टर , अधिकारी कहते फिरते है कि रेलवे घाटे में चल रही है, कोई आदमी बतावें कि जिस दिन उसे यात्रा करना है और उस दिन टिकट उसे आराम से मिल जाये। सभी ट्रेनें सालों भर फ़ूल रहती है। ट्रेन की सीटों से ज्यादा रेलवे के कर्मचारी है। जो दिनभर ऑफिस में गप व डींगें हाँकते और मारते है। सैलरी लेते है सबसे ज्यादा। आखिर क्यों न रेलवे घाटे में जाये।

Sushant Saurav Kya kahein iske liye bjp se jyada congg jimmedar h agar 50 salon m Cong Kam krti to bjp aati hi nhi

Gajendra Kumar Singh प्रभु जी तो जुलाई से वेटिंग खत्म करने की घोषणा की थी । अब तो खुद ही खिसक गये ।

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क्या वाकई नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है?

Dilip Khan : हार्ड वर्क वाले अर्थशास्त्री मोदी जी जब सत्ता में आए तो इन्होंने आर्थिक सलाह परिषद को ख़त्म कर दिया। जब अर्थव्यवस्था की बैंड बजने लगी तो दो दिन पहले यूटर्न लेते हुए परिषद को फिर से बहाल कर दिया। अर्थशास्त्री नरेन्द्र मोदी ने आंकड़ों को ‘खुशनुमा’ बनाने के लिए GDP गणना के पुराने नियम ही ख़त्म कर दिए। लेकिन गणना के नए नियमों के मुताबिक़ भी GDP दर तीन साल के न्यूनतम पर आ गई है। पुराना नियम लागू करे तो 3% का आंकड़ा रह जाता है।

अनुपम खेर समेत कई सहिष्णु अर्थशास्त्रियों ने जब नोटबंदी का समर्थन किया तो मोदी-जेटली फूलकर कुप्पा हो गए। अब ख़ुद सरकारी एजेंसियां दावा कर रही है कि इससे अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है। अमित शाह भले ही ‘तकनीकी कारण’ का जुमला फेंके, देश का सबसे बड़ा बैंक SBI परेशान है। खुलेआम अपना दयनीय हाल बता रहा है। निर्यात गिर गया, विनिर्माण क्षेत्र बैठ गया, रोज़गार पांच साल के निचले स्तर पर है। लघु-मध्यम उद्योग वाले रो रहे हैं। छोटे कारोबारी खस्ताहाल हैं। जो नोटबंदी से रह गई थी, वो कसर जीएसटी ने पूरी कर दी।

RBI में लगभग 100% नोट जमा हो गए। इसका क्या मतलब निकाला जाएगा? अनुमान के मुताबिक़ देश में क़रीब 6% कालाधन कैश में था। ज़्यादातर बड़े नोटों में। अब, जब क़रीब-क़रीब सारा पैसा जमा होकर एक्सचेंज हो गया है तो ज़ाहिर है कि ये कालाधन वैध धन बन गया। यानी नोटबंदी ने बाक़ी नुकसानों के साथ-साथ सबसे बड़ा काम ये किया कि कालेधन को वैध बना दिया। जो चालाक थे, उन्होंने सेटिंग कर कई खातों में पैसे जमा करवाए, कई लोगों के मार्फ़त पैसे बदले। जो कच्चे थे, उन्होंने अपने खाते में पैसे डाल लिए। पैसे से यहां मेरा मतलब कालाधन से है। अब क्या हो रहा है? ऐसे कई लोग आयकर विभाग की निगरानी में हैं। आयकर इंस्पेक्टर इनसे मिलकर घूस खाकर ओके कर दे रहा है। यानी कालाधन तो सफ़ेद हुआ ही, भ्रष्टाचार भी बढ़ गया। और मोदी जी ने जो इंस्पेक्टर राज ख़त्म करने की बात कही थी, वो वादा अरब सागर में डूब गया।

इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने का जुमला फेंकने वाले प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के बाद आयकर इंस्पेक्टरों को सांढ़ बना दिया है। जिसके खाते में हेर-फेर है, सब आयकर अधिकारियों से सेटिंग कर रहे हैं। नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने की बात कही गई थी, देख लीजिए बढ़ गया है। काला धन ख़त्म करने की बात कही गई थी। लगभग 100% पुराने नोट बैंक पहुंचकर अब वैध करेंसी बन गए हैं। मोदी जी, और डुबोइए देश को। काम पूरा नहीं हुआ है।

Chandan Srivastava : इंडियन एक्सप्रेस में आज यशवंत सिन्हा का जो आर्टिकल छपा है, वह पढ़ा जाना चाहिए। रोहिंग्या, बीएचयू, जेएनयू आदि तो ठीक है लेकिन अर्थव्यवस्था ही दम तोड़ देगी तो क्या बचेगा? अरूण जेटली को लेकर भाजपा का कोर वोटर कभी कम्फर्टेबल नहीं रहा। लेकिन उन्होंने मोदी को भाजपा का चेहरा बनने में सहयोग किया था, यही वजह है कि उनका हर पाप मोदी जी गले लगाने को तैयार हैं। लेकिन पापी को किसी भी प्रकार का समर्थन करने वाला और यहां तक कि उसके कृत्यों से नजरें फेर लेने वाला भी बराबर का पापी होता है। कुछ ऐसा ही कृष्ण ने गीता में भी कहा था जब अर्जुन भीष्म, द्रोण आदि के प्रति आसक्त हो रहे थे।

यशवंत सिन्हा से कांग्रेस जैसी पार्टियों को सीखना चाहिए कि आलोचना कैसे की जाती है। रोहिंग्या और भारत तेरे टुकड़े होंगे का समर्थन करके वे कभी मोदी से पार नहीं पा सकते। इतनी साधारण सी बात न जाने क्यों कांग्रेस के पल्ले नहीं पड़ रही। बहरहाल बात यशवंत सिन्हा के लेख की। पूर्व वित्त मंत्री लिखते हैं कि निजी निवेश में आज जितनी गिरावट है उतनी दो दशक में नहीं हुई। औद्योगिक उत्पादन का बुरा हाल है, कृषि क्षेत्र परेशानी में है, बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला निर्माण उद्योग भी संकट में है। नोटबंदी फेल रही है, गलत तरीके से GST लागू किए जाने से आज कारोबारियों के बीच खौफ का माहौल है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं।

वह आगे लिखते हैं, पहली तिमाही में विकास दर गिरकर 5.7 पर पहुंच गई जो तीन साल में सबसे कम है। सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से मंदी नहीं आई, वो सही हैं क्योंकि इस मंदी की शुरुआत पहले हो गई थी। नोटबंदी ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया। आर्टिकल के अंत में वह एक पंच लाइन देते हैं, ‘pm claims dat he has seen poverty from close quarters. His fm is working over time to make sure dat all indians also see itfrom equally close quarters.’ माने- ‘प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने काफी करीब से गरीबी देखी है। अब उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं कि देश का हर नागरिक भी करीब से गरीबी देखे।’

Vikas Mishra : 27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था- ”मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।” उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी। घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था। फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी। जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है।
मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे। देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए। एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया। पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है।

मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा। हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया। दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा। देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा। कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा। ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया।

तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा? क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे? क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को? ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे। तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा। मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी। उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा। मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया। राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था।

दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’। वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे। तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी। देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी। महंगाई चरम सीमा पर थी। मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा। विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे। मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था। जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं। नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे। देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया। अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी। 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई। उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी।

2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली। कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची। मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई। लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया।ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था। लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए। बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए।

यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया। घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी। पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए। चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया। मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई। तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे। ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे। जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली।

मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए। मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है। इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा। उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी। वैसे बता दें कि आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन है।

तीन पत्रकारों दिलीप खान, चंदन श्रीवास्तव और विकास मिश्र की एफबी वॉल से. दिलीप खान राज्यसभा टीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. चंदन श्रीवास्तव लखनऊ में पहले पत्रकार थे और अब वकालत कर रहे हैं. विकास मिश्र आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं.

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गोरों की तरह बदमाश है भारत में कालों की सरकार!

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों… तो क्या ऐसा ही वतन आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों ने हमारे हवाले किया था, जैसा हमने इसे बना दिया है? क्या ऐसे ही वतन के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने हंसते हंसते फांसी का फंदा चूमा था? देश को आजाद कराने के लिए हिंदुओं की ही तरह मुसलमानों ने भी आपस में मिलकर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था। गोरों की सरकार ने अपनी फौज के माध्यम से हिंदुओं, सिखों, मुसलमानों आदि पर बेइंतिहा जुर्म ढाये। ईसाई अंग्रेजों के अत्याचार की चपेट में इसलिए नहीं आये कि वे खुद ईसाई व इससे मिलती-जुलती कौम के थे।

आज देश की सबसे बड़ी आबादी हिंदुओं का अल्पसंख्यक ईसाइयों के प्रति उतना आक्रोश घृणा नफरत नहीं है जितना अल्पसंख्यक मुसलमानों के प्रति। कमोबेश यही हालत मुसलमानों में हिंदुओं के प्रति है। आखिर क्यों? मुगल शासकों ने हिंदुओं पर शासन किया और शासन के लिए अत्याचार किया। अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों पर शासन किया और इसके लिए जुल्म भी दोनों पर ढाये। आज न हिंदुओं का और न ही मुसलमानों का गुस्सा अंग्रेजों या अंग्रेजी कौम के प्रति है। हिंदुओं के लिए मुसलमान और मुसलमानों के लिए हिंदू कट्टर दुश्मन हो गए हैं, लेकिन ईसाई और अंग्रेज कतई नहीं। आज स्थिति यह है कि पाकिस्तान ही नहीं सारे मुस्लिम देश हमारे आंख की किरकिरी हैं लेकिन ब्रिटेन नहीं।

अपने ही देश में आज स्थिति ऐसी पैदा कर दी गई है कि हिंदू बहुल मोहल्ले से गुजर रहे मुसलमान को एक गेंद लग जाए या मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में बारिश से बचने के लिए किसी छत के नीचे खड़े मुसलमान के सिर पर लिंटर की ईंट लग जाए तो दंगा हो जाए। आजादी की लड़ाई में हर जाति, हर धर्म और संप्रदाय के लोगों ने हिस्सा लिया। इन सबने अपने-अपने सामर्थ्य के हिसाब से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध किया। अलग-अलग जाति और धर्म को मानने के बाद भी सबका लक्ष्य एक था देश की आजादी। हां, यह जरूर कहते हैं कि आर.एस.एस. ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया। जिन आरएसएस के लोगों ने हिस्सा लिया उन्होंने यातना न सह पाने के लिए अंग्रेजों से माफी मांगी और फिर छूटने के बाद वायदे के अनुसार अंग्रेजों की मदद की।

गोरों के समय में जो हालात थे कमोबेश वही हालात हम कालों के समय में भी है। तब भी जरा-जरा सी बात पर हम मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे। आज भी हो जाते हैं। तब भी एक कौम दूसरे कौम से लड़ना नहीं चाहती थी बल्कि उसे लड़ाया/लड़वाया जाता था। आज भी लड़ना नहीं चाहती है लेकिन उसे लड़वाया जाता है। पहले अंग्रेज लड़वाते थे ताकि ये लड़ते रहें और वो शासन करते रहें पर आज कौन लड़वा रहा है और क्यों लड़वा रहा है? पहले ब्रिटिश सरकार ने गाय और सूअर की चर्बी की आड़ में लड़ाने का प्रयास किया आज तीन तलाक, धर्म परिवर्तन / घरवापसी के नाम पर लड़ाने का प्रयास कर रहे हैं। मुझे तो लगता है गोरों की सरकार से ज्यादा बदमाश है कालों की सरकार।

अरुण श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार

देहरादून

संपर्क : 7017748031 , 8881544420 , arun.srivastava06@gmail.com

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