मोदी राज में बेरोजगारी चरम पर, UPSC एक्जाम देने वालों के लिए भी बुरी खबर, सीटों की संख्या घटी

Ravish Kumar : यूपीएससी देने वाले दस लाख छात्रों के लिए बुरी खबर… सीटों की संख्या घटी… 2018 में यूपीएससी की परीक्षा के लिए सीटों की संख्या छह साल में सबसे कम है। 2018 की यूपीपीएसी परीक्षा के लिए नोटिफिकेशन आ गया है। 782 सीटों के लिए परीक्षा हो रही है। 2017 की तुलना में 198 सीटें कम हैं। यह पिछले छह साल में सबसे कम है। आई ए एस आई पी एस की संख्या कम हो रही है तो सोचिए बाकी अधिकारियों की संख्या में किस स्तर और रफ़्तार से कटौती हो रही होगी।

2017 की यूपीएससी परीक्षा के लिए 980 सीटें थीं। 2016 की तुलना में 99 सीटें कम थीं। तब कहा गया था कि पांच साल में सबसे कम सीटें निकली हैं। 2016 की यूपीपीएससी की परीक्षा के लिए 1079 सीटें रखी गईं थीं। 2015 में यूपीपीएससी की परीक्षा के लिए 1129 सीटें थीं। 2014 में यूपीपीएससी की परीक्षा 1299 सीटें थीं । इस बीच नए राज्य बने, नए नए विभाग बने, नई योजनाएं आईं इसके बाद भी शीर्ष अधिकारियों की सीटों में कटौती हो रही है। तब क्यों आई ए एस, आई पी एस अधिकारियों की संख्या कम हो रही है? फिर सोचिए, बाकी स्तर के अधिकारियों की संख्या में किस रफ़्तार में कटौती हो रही होगी। यह दुखद है।

पूरा देश हिन्दू मुस्लिम टॉपिक पर डिबेट करने में सनका हुआ है। नशे की तरह लोगों को आनंद आ रहा है। इन सब का लाभ उठाकर नौकरियां कम की जा रही हैं। नौकरी में असुरक्षा बढ़ती जा रही है। घटती नौकरी के बीच चैनलों पर हिन्दू मुस्लिम टॉपिक की बहुलता बताती है कि हमारे नौजवानों ने ही जैसे कह दिया हो कि हमें सिर्फ हिन्दू मुस्लिम टॉपिक चाहिए। न नौकरी चाहिए न सैलरी चाहिए। नौजवानों, आपके लिए दुख हो रहा है। पर क्या कर सकता हूं। रेलवे के छात्रों के लिए उम्र सीमा 30 से घटाकर 28 कर दी गई। आप अपने अपने इम्तहानों के खेमें में बंटे रहे। तनाम परीक्षाओं में नौजवान अपने अपने टापू पर फंसे हैं। कोई किसी के लिए नहीं बोल रहा है। रेलवे वाले सिर्फ अपने लिए बोल रहे हैं, कंप्यूटर आपरेटर वाले रेलवे के लिए नहीं बोल रहे हैं, दोनों मिलकर शिक्षा मित्रों के लिए नहीं बोल रहे हैं, इनमें से किसी के लिए यूपीएससी वाले नहीं बोल रहे हैं। लेकिन हिन्दू मुस्लिम टॉपिक दे दो, सब मिलकर बोलेगे। अच्छा है कि कुछ छात्रों को बात समझ आ रही है कि इसके बहाने पर्दे के पीछे क्या खेल खेला जा रहा है मगर अब भी यह नशा उतरा नहीं है।

जब नौजवान धर्म के अफीम में डूबा हो तो तब वह समय नेता बनने का स्वर्ण काल होता है। फर्ज़ी बात ही कहनी होती है, लोग लपक कर गटकने के लिए तैयार बैठे हैं। अब ये फ्राड नेता आपको लेक्चर भी देंगे कि रोज़गार देने वाला बनें। मांगने वाला नहीं। तो फिर खुद मंत्री संत्री बनने के लिए क्यों मारामारी कर रहे हैं, क्यों मंत्री बन रहे हैं, क्यों सांसद बन रहे हैं, क्यों विधायक बन रहे हैं? ख़ुद सरकार में बने रहने के लिए तीन सौ झूठ और प्रपंच रचेंगे और आपको नैतिक शिक्षा देंगे कि सरकारी नौकरी क्यों मांग रहे हो। इसिलए कहा कि ख़ुश रहो कि नौकरियां कम हो रही हैं। सरकार आपको जॉब गिवर बनने का मौक़ा दे रही है।

एनडीटीवी के चर्चित और बेबाक एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

Anil Singh : रोज़गार पर देश भर में बढ़ रहा है हाहाकार! केंद्रीय वित्त मंत्रालय के इतने बड़े फौज-फांटे ने भले ही आर्थिक सर्वे 2018 में बेरोज़गारी की तस्वीर न पेश की हो। लेकिन लोकनीति-सीएसडीएस का ताज़ा सर्वे सारा सच खोलकर सामने रख देता है। यह सर्वे इसी जनवरी माह के दूसरे व तीसरे हफ्ते के दौरान देश के 19 प्रमुख राज्यों में किया गया। सर्वे में भाग लेनेवाले 28 प्रतिशत मतदाता मानते हैं कि देश के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी की है। भाजपा के सत्ता में आने से पहले साल 2013 में यह संख्या 13 प्रतिशत थी। यानी, मोदी सरकार के दौरान यह 15 प्रतिशत चढ़कर दोगुनी से ज्यादा हो गई है। 49 प्रतिशत मानते हैं कि पिछले तीन-चार सालों में उनके लिए अपने क्षेत्र में काम पाना पहले से ज्यादा कठिन हो गया है। ग्रामीण इलाकों के 50 प्रतिशत लोग बताते हैं कि गांवों में काम पाने के अवसर लगातार घटते जा रहे हैं। वहीं, 5-10 लाख आबादी वाले शहरों के 61 प्रतिशत लोगों ने बताया कि पिछले तीन-चार साल में उनका जीवन बद से बदतर होता गया है। शायद अब आपको समझ में आया होगा कि अचानक देश भर में हिंदू-मुस्लिम झगड़े क्यों खड़े किए जाने लगे हैं और कौन इसके पीछे है।

वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संपादक अनिल सिंह की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार ने विनोद राय से पूछा- PNB घोटाले पर क्यों नहीं बोल रहे हैं आप?

Ravish Kumar : आदरणीय विनोद राय जी, विदित हो कि पंजाब नेशनल बैंक में साढ़े ग्यारह हज़ार करोड़ का घोटाला हुआ है। आप शून्य प्रेमी हैं इसलिए इसमें ग्यारह के बाद शून्य ही शून्य है। लेखक जानना चाहता है कि आप इसी फरवरी माह की 26 तारीख़ 2016 को बैंक बोर्ड ब्यूरो के प्रमुख बने थे। प्रधानमंत्री ने आपको गवर्नर या मंत्री वगैरह न बनाते हुए एक बड़ा काम सौंपा कि आप बैंकों की गवर्नेंस में सुधार लाएँ और चेयरमैन से लेकर सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया को ठीक करें।

दो दिन से नीरव मोदी की योग्यता का मारा पंजाब नेशनल बैंक क़राह रहा है और आप बोल ही नहीं रहे हैं। दो साल में आपने पंजाब नेशनल बैंक को लेकर कितनी बैठक की है, क्या सुधार किए हैं, ये सब आपको बताना चाहिए। क्या वाक़ई किसी रिपोर्टर ने इतने बड़े मामले में संपर्क नहीं किया? आप तो ऑडिटर रहे हैं, यही बताते कि मासिक, तिमाही और सालाना ऑडिट के बाद भी कैसे नीरव मोदी ने बिना कलरव किए ग्यारह हज़ार करोड़ का चूना लगा दिया।

आप बोल ही नहीं रहे हैं? फिर कोई किताब लिख रहे हैं क्या सर? टू जी पर आपकी किताब आई, उसके कुछ समय बाद ए राजा ही बाहर आ गए। राजा साहब भी किताब लिख लाए हैं। फिर भी आप चुप हैं । कपिल सिब्बल ने तो आपको चुनौती दी है। फिर भी आप चुप हैं। टू जी मामले में सबूत न मिलने और आरोपियों के बरी होने पर कैसे चुप रह गए? एक लेख तो लिखते, टीवी डिबेट में आते या राजा से माफी ही मांग लेते।

अब बैंक का घोटाला है, आप चुप हैं। कहीं आपका बैंक बोर्ड ब्यूरो सरकार के कॉफी बोर्ड या टी बोर्ड की तरह तो नहीं है? आप तो शून्य अधिपति हैं, आप क्यों नहीं बोल रहे हैं? कम से कम 11000 में दस बीस ज़ीरो ही जोड़ देते। है न सर।

पत्र मिलने पर जवाब दीजिएगा। आप देश की अंतरात्मा की दूसरी डायरी तो नहीं लिख रहे हैं।

सबका,

रवीश कुमार

एनडीटीवी के चर्चित और बेबाक पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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पीएम मोदी का पीएनबी घोटाले के एक आरोपी मेहुल भाई से कनेक्शन! देखें वीडियो

Ravish Kumar : प्रधानमंत्री के हमारे मेहुल भाई और रविशंकर प्रसाद की जेंटलमैन चौकसी… ये शब्द प्रधानमंत्री के हैं- ”कितना ही बड़ा शो रूम होगा, हमारे मेहुल भाई यहां बैठे हैं लेकिन वो जाएगा अपने सुनार के पास ज़रा चेक करो।” ये वाक्य यूट्यूब पर हैं। यूट्यूब पर ”PM Narendra Modi at the launch of Indian Gold Coin and Gold Related Schemes” नाम से टाइप कीजिए, प्रधानमंत्री का भाषण निकलेगा। इस वीडियो के 27वें मिनट से सुनना शुरू कीजिए। प्रधानमंत्री हमारे मेहुल भाई का ज़िक्र कर रहे हैं। ये वही मेहुल भाई हैं जिन पर नीरव बैंक के साथ पंजाब नेशनल बैंक को 11 हज़ार करोड़ का चूना लगाने का आरोप लगा है। उनके पार्टनर हैं।

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रविशंकर प्रसाद काफी गुस्से में प्रेस कांफ्रेंस करने आए थे। उन्हें लगा कि वे जो बोलेंगे वे जज की तरह फैसला होगा। पत्रकार भी सवाल जवाब नहीं कर सके। आज कल चुप रहने वाले लोग पोलिटिकल एडिटर बन रहे हैं, बोलने वाले निकलवा दिए जा रहे हैं। बहरहार रविशंकर प्रसाद दोबारा अपना प्रेस कांफ्रेंस देख सकते हैं। कितने गुस्से में मेहुल चौकसी का नाम लेते हैं जैसे उनकी हैसियत से नीचे की बात हो उस शख्स का नाम लेना। जबकि प्रधानमंत्री उसी मेहुल भाई को कितना आदर से पुकार रहे हैं। हमारे मेहुल आई। अहा। आनंद आ गया। इन्हीं के बारे में रविशंकर प्रसाद कह रहे थे कि इनके साथ कांग्रेसी नेताओं की तस्वीरें हैं मगर वो जारी नहीं करेंगे। क्योंकि ये उनकी राजनीति का स्तर नहीं है। दुनिया भर के विरोधी नेताओं की तस्वीरों और सीडी जारी करने की राजनीति के बाद उनके इस आत्मज्ञान पर हंसी आई। गोदी मीडिया की हालत बहुत बुरी है।

13 जनवरी 2016 को पीटीआई की खबर कई अखबारों में छपी है कि अरुण जेटली 100 उद्योगपतियों को लेकर जा रहे हैं। यह ख़बर फाइनेंशियल एक्सप्रेस में भी छपी है। आप ख़ुद भी देख सकते हैं कि उसमें नीरव मोदी का नाम है। किसी भी बिजनेस अख़बार की ख़बर देखिए, उसमें यही लिखा होता है कि प्रधानमंत्री मोदी इन बिजनेसमैन की टोली का नेतृत्व कर रहे हैं। ज़ाहिर है उन्हें पता था कि भारत से कौन कौन वहां जा रहा है। इसलिए रविशंकर प्रसाद को सही बात बतानी चाहिए थी न कि इसे सी आई आई पर टाल देना चाहिए था। नीरव मोदी 1 जनवरी 2018 को भारत से रवाना हो जाते हैं। उसके एक दिन बाद सीबीआई की जांच शुरू होती है। क्या यह महज़ संयोग था? जांच के दौरान यह शख्स 23 जनवरी को स्वीट्ज़रलैंड के दावोस में प्रधानमंत्री के करीब पहुंचता है, क्या यह भी संयोग था? इतने छापे पड़े, एफ आई आर हुई मगर यह तो मकाऊ में शो रूम का उद्घाटन कर रहा है। क्या ऐसी छूट किसी और को मिल सकती है? 2014 के पहले मिलती होगी लेकिन 2014 के बाद क्यों मिल रही है?

एनडीटीवी की नम्रता बरार की रिपोर्ट है कि नीरव मोदी इस वक्त न्यूयार्क के महंगे होटल में है। सरकार ने कहा है कि पासपोर्ट रद्द कर दिया जाएगा मगर अभी तक तो नहीं हुआ है। इतने दिनों तक उन्हें भागने की छूट क्यों मिली? हंगामा होने के बाद ही सरकार ने ये क्यों कहा जबकि पंजाब नेशनल बैंक ने एफ आई आर में कहा है कि इनके ख़िलाफ़ लुक आउट नोटिस जारी किया जाए। क्यों नहीं तभी का तभी किया? अब ख़बर आई है कि इंटरपोल के ज़रिए डिफ्यूज़न नोटिस जारी किया गया है। इसका मतलब है कि पुलिस जांच के लिए गिरफ्तारी ज़रूरी है। हंगामे के बाद तो सब होता है मगर लुकआउट नोटिस उस दिन क्यों नहीं जारी हुआ जब एफ आई आर हुई, छापे पड़े। 15 फरवरी को नीरव मोदी के कई ठिकानों पर छापे पड़े हैं जिनमें 5100 करोड़ की संपत्ति के काग़ज़ात ज़ब्त हुए हैं। सभी जगह इसे बड़ा कर छापा गया है जिससे लगे कि बड़ी भारी कार्रवाई हो रही है। इस पर मनी कंट्रोल की सुचेता दलाल ने सख़्त ट्वीट किया है। उनका कहना है कि ख़बर है कि सीबीआई और डीआरई ने 5100 करोड़ के जवाहरात ज़ब्त किया है। अगर नीरव मोदी के पास इतनी संपत्ति होती तो उसे फर्ज़ी लेटर आफ अंडर टेकिंग लेकर घोटाला करने की ज़रूरत नहीं होती। दूसरा प्रक्रिया की बात होती है जो इन छापों से जुड़े अधिकारी बता सकते हैं। इतनी जल्दी संपत्ति का मूल्यांकन नहीं होता है। यह सब ख़बरों का मोल बढ़ाने के लिए किया गया है।

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि घोटाला 2011 से शुरु हुआ। लेकिन यह 2017 तक कैसे चलता रहा? क्यों फरवरी 2017 में आठ फर्ज़ी लेटर ऑफ अंडर टेकिंग जारी किए गए? रविशंकर प्रसाद ने यह तथ्य प्रेस कांफ्रेंस में क्यों नहीं कहा? इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि यह घोटाला 17 बैंकों तक भी गया है। 11,300 करोड़ के अलावा भी 3000 करोड़ का घोटाला हुआ है। नीरव मोदी की कई कंपनियां हैं, इन कंपनियों को 17 बैंकों ने 3000 करोड़ रुपये के लोन दिए हैं। एक्सप्रेस ने लिखा है कि नीरव मोदी और उनके रिश्तेदारों की कंपनी को 2011 से 2017 के बीच 150 लेटर आफ अंटरटेकिंग दिए गए हैं। नियम है कि लेटर आफ अंडर टेकिंग से पैसा लेने पर 90 दिनों के अंदर चुका देना होता है। मगर बिना चुकाए भी इन्हें LOU मिलता रहा है। इतनी मेहरबानी किसके इशारे से हुई? इस मामले में बैंक मैनेजर को क्यों फंसाया जा रहा है? LOU की मंज़ूरी बैंक के बोर्ड से मिलती है, बैंक के मैनेजर से नहीं। मगर एफ आई आर बैंक के मैनेजर और क्लर्कों के खिलाफ हुई है। बोर्ड के सदस्यों और चेयरमैन के ख़िलाफ़ क्यों नहीं एफ आई आर हुई?

एक दो LOU बैंक के खाते में दर्ज नहीं हो सकते हैं मगर उसके आधार पर जब दूसरे बैंक ने नीरव मोदी को पैसे दिए तो उस बैंक ने पंजाब नेशनल बैंक को तो बताया होगा। अपने पैसे पंजाब नेशनल बैंक से तो मांगे होंगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन बैंकों से भी पैसे ले लिए गए और वहां भी हिसाब किताब में एंट्री नहीं हुई? इसका जवाब मिलना चाहिए कि पंजाब नेशनल बैंक के बोर्ड ने कैसे LOU को मंज़ूरी दी, बैंक की आडिट होती है क्या उस आडिट में भी 11,000 करोड़ का घपला नहीं पकड़ा गया तो फिर आडिट किस बात की हो रही थी? इसलिए नौटंकी कम हो ज़रा इस पर, जांच जल्दी हो। 2 जी में भी सारे आरोपी बरी हो गए। एक नेता को बचा कर कितने कारपोरेट को बचाया गया आप खुद भी अध्ययन करें। आदर्श घोटाले में भी अशोक चव्हाण बरी हो गए। इटली की कंपनी अगुस्ता वेस्टलैंड से हेलिकाप्टर खरीदने के घोटाले को लेकर कितना बवाल हुआ। पूर्व वायु सेनाध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया मगर इटली की अदालत में सीबीआई सबूत तक पेश नहीं कर पाई। ये सारी मेहरबानियां किस पर की गईं हैं?

बैंक कर्मचारी बताते हैं कि ऊपर के अधिकारी उन पर दबाव डालते हैं। नौकरी बचाने या कहीं दूर तबादले से बचने के लिए वे दबाव में आ जाते हैं। इन ऊपर वाले डकैतों के कारण बैंक डूब रहे हैं और लाखों बैंक कर्मचारी डर कर काम कर रहे हैं। उनकी सैलरी नहीं बढ़ रही है, बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। बैंको पर भीतर से गहरी मार पड़ी है। आप किसी भी बैंक कर्मचारी से पूछिए वो बता देंगे अपना बुरा हाल। उनकी मानसिक पीड़ा समझने वाला कोई नहीं। आप उस महंगी होती राजनीति की तरफ देखिए जहां पैसे से भव्य रैलियां हो रही हैं। वो जब तक होती रहेंगी तब तक बैंक ही डूबते रहेंगे। आखिर बिजनेसमैन भी पैसा कहां से लाकर देगा। इन्हीं रास्तों से लाकर देगा ताकि हुज़ूर रैलियों में लुटा सकें। यह पैटर्न आज का नहीं है मगर इसके लाभार्थी सब हैं।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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भारत के न्यूज़ एंकर रोबोट के पत्रकार बनने से पहले ही सरकार के रोबोट बन गए हैं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : भले मत जागिए मगर जानते रहिए… अमरीका में एक अद्भुत गिनती हुई है। नए राष्ट्रपति ट्रंप ने दस महीने के कार्यकाल में झूठ बोलने के मामले में शतक बना लिया है। ओबामा ने आठ साल के कार्यकाल में कुल 18 झूठ बोले थे। न्यूयार्क टाइम्स ने भारत के प्रधानमंत्री का झूठ नहीं गिना है। यहाँ भी गिना जाना चाहिए। नेताओं के झूठ की गिनती हो रही है।

दुनिया के बीस देशों में मीडिया के प्रति भरोसा घटा है। भारत में भी घटा है। सर्वे ने यह नहीं बताया या पूछा ही नहीं होगा कि भरोसा घटने के बाद भी न्यूज़ चैनल के दर्शकों या अखबार के पाठकों में कोई कमी आई है क्या? weforum पर यह सर्वे आया है।

ब्रिटेन के अख़बार फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है कि ब्रिटेन के अखबार आदमी और रोबोट का लिखा हुआ लेख छापना शुरू कर रहे हैं। पाठक तय करेंगे कि किसका अच्छा है या रोबोट लेख लिख सकता है या नहीं। भारत के न्यूज़ एंकर रोबोट के पत्रकार बनने से पहले ही सरकार के रोबोट बन गए हैं और अच्छा कर रहे हैं। एक दिन इनकी जगह रोबोट आ भी जाएगा तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। गोदी मीडिया की जगह गोदी रोबोट आने वाला है!

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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टीएम कृष्णा यानि एक ऐसा शास्त्रीय संगीतकार जो सत्ता और कारपोरेट को चुनौती देता है

Ravish Kumar : टी एम कृष्णा हिन्दी जगत के लिए अनजान ही होंगे। मैं ख़ुद कृष्णा के बारे में तीन चार साल से जान रहा हूं, संगीत कम सुना मगर संगीत पर उनके लेख ज़रूर पढ़े हैं। टी एम कृष्णा कर्नाटिक संगीत के लोकप्रिय हस्ती हैं और वे इस संगीत की दुनिया का सामाजिक विस्तार करने में लगे हैं। उनकी किताब A SOUTHERN MUSIC-THE KARNATIK STORY हम जैसे हिन्दी भाषी पाठकों के लिए दक्षिण भारत के संगीत की दुुनिया खोल देती है। संगीत से लेकर मौजूदा राजनीति के बारे में उन्होंने काफी लिखा है जो इस वक्त TMKRISHNA.COM पर मौजूद भी है। कृष्णा कर्नाटिक संगीत सभा पर ऊंची जाति के वर्चस्व को लेकर काफी मुखर रहे हैं और कोशिश करते रहे हैं कि संगीत की इस दुनिया में दलित प्रतिभाएं भी स्थान और मुकाम पाएं। जिसके लिए उन्हें कर्नाटिक संगीत के पांरपरिक उस्तादों की काफी नाराज़गी भी झेलनी पड़ती है।

मैं यहां पर कृष्णा के एक वीडियो की बात करना चाहता हूं। तमिलनाडु में ennore creek के अतिक्रमण को लेकर काफी विवाद हो रहा है। क्रीक मतलब संकरी खाड़ी जहां कोसास्थलियर नदी आकर समुद्र में मिलती है। इस खाड़ी पर कारखानों का कब्ज़ा हो गया है। यह प्राकृतिक जगह पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। कृष्णा इसके लिए प्रतिरोध का संगीत रचते हैं। क्रीक के बीचों बीच खड़े होकर बदहवास विकास का चेहरा दिखाते हैं। उनके गाने को आप सुन सकते हैं। दृश्य शानदार हैं। अंग्रेज़ी में सबटाइटल है तो दिक्कत नहीं होगी।

कृष्णा इस गाने के लिए पोरंबोक शब्द का इस्तमाल करते हैं। पोरंबोक का मतलब है बिना पट्टे वाली सामूहिक भूमि। एक और मतलब है कि आवारा और लापरवाह जिसकी कोई कदर नहीं। वो गाकर बताते हैं कि कैसे एक शब्द जिसका अर्थ सामूहिकता से है वो लांछन में बदल जाता है। कृष्णा ennore creek से कहते हैं कि तुम्हें पावर प्लांट चाहिए था न देखो, आसमान में राख का अंधेरा है। इस प्लांट ने नदी और समुद्र को अलग कर दिया है, क्योंकि अतिक्रमण हो जाने से नदी अब समुद्र में नहीं मिल पाती है। उसके भीतर प्लांट का राख भर गया है। नदी की गहराई कम हो गई है। कृष्णा कहते हैं कि जब विकास की यह भूख ennore creek को हड़प लेगी तो हमारी तरफ आएगी। हम सबको पोरंबोक समझ हड़प लेगी।

हिन्दी के दर्शकों को अपनी दुनिया का विस्तार करना चाहिए। बहुत लोग करते भी हैं मगर सबको करना चाहिए। टी एम कृष्णा बेहद प्रतिभाशाली और दिलचस्प शख़्स हैं। इस म्यूज़िक वीडियो के ज़रिए अपने ही मिडिल क्लास फैन्स या श्रोता को झकझोर रहे हैं कि जागो, वरना अब तुम्हारा ही अतिक्रमण या कब्ज़ा होना बाकी है। मैंने उत्तर भारत में कम ही शास्त्रीय संगीतकार देखें हैं जो सत्ता और कारपोरेट को चुनौती देता हो। हिन्दी शास्त्रीय जगत के गायक और गायिकाओं को सत्ता की चरणों में लोटते ही देखा है। कभी राष्ट्रवाद के बहाने तो कभी संस्कृति के गौरव के बहाने। कृष्णा शास्त्रीय संगीत की दुनिया को बदल रहे हैं। वे शास्त्रीय संगीत में प्रतिरोध के स्वर पैदा कर रहे हैं, उसे लोक संगीत बना रहे हैं।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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रवीश जी, अगर Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये!

Divakar Singh : रवीश जी, आपने सही लिखा हमारी मीडिया रीढविहीन है. साथ ही नेता भी चाहते हैं मीडिया उनकी चाटुकारिता करती रहे. आप बधाई के पात्र हैं यह मुद्दे उठाने के लिए. पर क्या बस इतना बोलने से डबल स्टैंडर्ड्स को स्वीकार कर लिया जाए? आप कहते हैं कि ED या CBI की जांच नहीं हुई तो कोई मानहानि नहीं हुई. आप स्वयं जानते होंगे कितनी हलकी बात कह दी है आपने. दूसरा लॉजिक ये कि अमित शाह स्वयं क्यों नहीं आये बोलने. अगर वो आते तो आप कहते वो पिता हैं मुजरिम के, इसलिए उनकी बात का कोई महत्त्व नहीं. तीसरी बात आप इतने उत्तेजित रोबर्ट वाड्रा वगैरह के मामले में नहीं हुए. यहाँ आप तुरंत अत्यधिक सक्रिय हो गए और अतार्किक बातें करने लगे. ठीक है नेता भ्रष्ट होते हैं, मानते हैं, पर कम से कम तार्किक तो रहिये, अगर निष्पक्ष नहीं रह सकते.

हालांकि हम जैसे लोग जो आपका शो पसंद करते हैं, चाहते हैं कि आप निष्पक्ष भी रहें. किसी ईमानदार पत्रकार का एक गुट के विरोध में और दूसरे के समर्थन में हर समय बोलते रहना एक गंभीर समस्या है, जिसमें आप जैसे आदरणीय (मेरी निगाह में) पत्रकार हठधर्मिता के साथ शामिल हैं. मोदी सरकार के कट्टर समर्थक मीडिया को आप बुरा मानते हैं, तो कट्टर विरोधी जोकि तर्कहीन होकर आलोचना करने लग जाते हैं, उतने ही बुरे हैं. एक और बात भी आपसे कहना चाह रहा था. आप को शायद बुरा लगा कि भारत की मीडिया कुछ कर नहीं पा रही है और ऑस्ट्रेलिया की मीडिया बहुत बढ़िया है.

क्या आप जानते हैं कि आप जिस इंडस्ट्री में है, उसके लिए भारत में सबसे धाकड़ मीडिया स्तम्भ कौन सा है? कुछ महीने पहले आपने हिंदी मीडिया के कुछ पोर्टल गिनाये थे, कल फिर कुछ गिनाये थे. Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये, जो वो तमाम पत्रकारों के हित में करते हैं. उनको भी थोडा महत्त्व दें जब आप हिंदी मीडिया की बात करते हैं. नहीं तो आप भी मोदी और शाह के लीक में शामिल नहीं हैं जो अपने आलोचक को तवज्जो नहीं देते? तो सर मुख्य समस्या डबल स्टैंडर्ड्स की है. सोचियेगा जरूर. न सोचेंगे तो भी ठीक. जो है सो हईये है.

एक आईटी कंपनी के मालिक दिवाकर सिंह ने उपरोक्त कमेंट एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार के जिस एफबी पोस्ट पर किया है, वह इस प्रकार है—

Ravish Kumar : मानहानि- मानहानि: घोघो रानी, कितना पानी… आस्ट्रेलिया के जिन शहरों का नाम हम लोग क्रिकेट मैच के कारण जानते थे, वहां पर एक भारतीय कंपनी के ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को एडिलेड, कैनबरा, सिडनी, ब्रिसबेन, मेलबर्न, गोल्ड कोस्ट, पोर्ट डगलस में प्रदर्शन हुए हैं। शनिवार को आस्ट्रेलिया भर में 45 प्रदर्शन हुए हैं। अदानी वापस जाओ और अदानी को रोको टाइप के नारे लग रहे हैं। वहां के करदाता नहीं चाहते हैं कि इस प्रोजेक्ट की सब्सिडी उनके पैसे से दी जाए।

अदानी ग्रुप के सीईओ का बयान छपा है कि प्रदर्शन सही तस्वीर नहीं है। स्तानीय लोग महारा समर्थन कर रहे हैं। जेयाकुरा जनकराज का कहना है कि जल्दी ही काम शुरू होगा और नौकरियां मिलने लगेंगी। यहां का कोयला भारत जाकर वहां के गांवों को बिजली से रौशन करेगा। पिछले हफ्ते आस्ट्रेलिया के चैनल एबीसी ने अदानी ग्रुप पर एक लंबी डाक्यूमेंट्री बना कर दिखाई। इसका लिंक आपको शेयर किया था। युवा पत्रकार उस लिंक को ज़रूर देखें, भारत में अब ऐसी रिपोर्टिंग बंद ही हो चुकी है। इसलिए देख कर आहें भर सकते हैं। अच्छी बात है कि उस डाक्यूमेंट्री में प्रशांत भूषण हैं, प्रांजॉय गुहा ठाकुरता हैं।

प्रांजॉय गुहा ठाकुरता ने जब EPW में अदानी ग्रुप के बारे में ख़बर छापी तो उन पर कंपनी ने मानहानि कर दिया और नौकरी भी चली गई। अभी तक ऐसी कोई ख़बर निगाह से नहीं गुज़री है कि अदानी ग्रुप ने एबीसी चैनल पर मानहानि का दावा किया हो। स्वदेशी पत्रकारों पर मानहानि। विदेशी पत्रकारों पर मानहानि नहीं। अगर वायर की ख़बर एबीसी चैनल दिखाता तो शायद अमित शाह के बेटे जय शाह मानहानि भी नहीं करते। क्या हमारे वकील, कंपनी वाले विदेशी संपादकों या चैनलों पर मानहानि करने से डरते हैं?

एक सवाल मेरा भी है। क्या अंग्रेज़ी अख़बारों में छपी ख़बरों का हिन्दी में अनुवाद करने पर भी मानहानि हो जाती है? अनुवाद की ख़बरों या पोस्ट से मानहानि का रेट कैसे तय होता है, शेयर करने वालों या शेयर किए गए पोस्ट पर लाइक करने वालों पर मानहानि का रेट कैसे तय होता है? चार आना, पांच आना के हिसाब से या एक एक रुपया प्रति लाइक के हिसाब से?

पीयूष गोयल को प्रेस कांफ्रेंस कर इसका भी रेट बता देना चाहिए कि ताकि हम लोग न तो अनुवाद करें, न शेयर करें न लाइक करें। सरकार जिसके साथ रहे, उसका मान ही मान करें। सम्मान ही सम्मान करें। न सवाल करें न सर उठाएं। हम बच्चे भी खेलते हुए गाएं- मानहानि मानहानि, घोघो रानी कितना पानी। पांच लाख, दस लाख, एक करोड़, सौ करोड़।
यह सब इसलिए किया जा रहा है कि भीतरखाने की ख़बरों को छापने का जोखिम कोई नहीं उठा सके। इससे सभी को संकेत चला जाता है कि दंडवत हो, दंडवत ही रहो। विज्ञापन रूकवा कर धनहानि करवा देंगे और दूसरा कोर्ट में लेकर मानहानि करवा देंगे। अब यह सब होगा तो पत्रकार तो किसी बड़े शख्स पर हाथ ही नहीं डालेगा। ये नेता लोग जो दिन भर झूठ बोलते रहते हैं,

क्या इनके ख़िलाफ़ मानहानि होती रहे?

अमित शाह एक राजनीतिक शख्स हैं। तमाम आरोप लगते रहे हैं। वे उसका सामना भी करते हैं, जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। वायर की ख़बर में आरोप तो हैं नहीं। जो कंपनी ने रिकार्ड जमा किए हैं उसी का विश्लेषण है। फिर कंपनी रजिस्ट्रार को दस्तावेज़ जमा कराने और उस आधार पर लिखने या बोलने से समस्या है तो ये भी बंद करवा दीजिए।

अमित शाह के बेटे के बारे में ख़बर छपी। पिता पर तो फेक एनकाउंटर मामलों में आरोप लगे और बरी भी हुए। सोहराबुद्दीन मामले में तो सीबीआई ट्रायल कोर्ट के फैसले पर अपील ही नहीं कर रही है। उन पर करप्शन के आरोप नहीं लगे हैं। इसके बाद भी अमित शाह आए दिन राजनीतिक आरोपों का सामना करते रहते हैं। जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। कायदे से उन्हें ही आकर बोलना चाहिए था कि पुत्र ने मेरी हैसियत का कोई लाभ नहीं लिया है। मगर रेल मंत्री बोलने आ गए। मानहानि का फैसला अगर पुत्र का था तो रेल मंत्री क्यों एलान कर रहे थे?

इस ख़बर से ऐसी क्या मानहानि हो गई? किसी टीवी चैनल ने इस पर चर्चा कर दी? नहीं न। सब तो चुप ही थे। चुप रहते भी। रहेंगे भी। कई बार ख़बरें समझ नहीं आती, दूसरे के दस्तावेज़ पर कोई तीसरा जिम्मा नहीं उठाता, कई बार चैनल या अखबार रूक कर देखना चाहते हैं कि यह ख़बर कैसे आकार ले रही है? राजनीति में किस तरह से और तथ्यात्मक रूप से किस तरह से। यह ज़रूरी नहीं कि टीवी दूसरे संस्थान की ख़बर को करे ही। वैसे टीवी कई बार करता है। कई बार नहीं करता है। हमीं एक हफ्ते से उच्च शिक्षा की हालत पर प्राइम टाइम कर रहे हैं, किसी ने नोटिस नहीं लिया।

लेकिन, जब चैनलों ने कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्कार किया तो उन्हें पीयूष गोयल की प्रेस कांफ्रेंस का भी बहिष्कार करना चाहिए था। जब सिब्बल का नहीं दिखाए तो गोयल का क्यों दिखा रहे थे? अव्वल तो दोनों को ही दिखाना चाहिए था। लाइव या बाद में उसका कुछ हिस्सा दिखा सकते थे या दोनों का लाइव दिखा कर बाद में नहीं दिखाते। यह मामला तो सीधे सीधे विपक्ष को जनता तक पहुंचने से रोकने का है। सिब्बल वकील हैं। उन्हें भी अदालत में विपक्ष के स्पेस के लिए जाना चाहिए। बहस छेड़नी चाहिए।
इस तरह से दो काम हो रहे हैं। मीडिया में विपक्ष को दिखाया नहीं जा रहा है और फिर पूछा जा रहा है कि विपक्ष है कहां। वो तो दिखाई ही नहीं देता है। दूसरा, प्रेस को डराया जा रहा है कि ऐसी ख़बरों पर हाथ मत डालो, ताकि हम कह सके कि हमारे ख़िलाफ़ एक भी करप्शन का आरोप नहीं है। ये सब होने के बाद भी चुनाव में पैसा उसी तरह बह रहा है। उससे ज़्यादा बहने वाला है। देख लीजिएगा और हो सके तो गिन लीजिए।

एक सवाल और है। क्या वायर की ख़बर पढ़ने के बाद सीबीआई अमित शाह के बेटे के घर पहुंच गई, आयकर अधिकारी पहुंच गए? जब ऐसा हुआ नहीं और जब ऐसा होगा भी नहीं तो फिर क्या डरना। फिर मानहानि कैसे हो गई? फर्ज़ी मुकदमा होने का भी चांस नहीं है। असली तो दूर की बात है। एबीसी चैनल ने अदानी ग्रुप की ख़बर दिखाई तो

ENFORCEMENT DEPARTMENT यानी ED अदानी के यहां छापे मारने लगा क्या? नहीं न। तो फिर मानहानि क्या हुई?

अदालत को भी आदेश देना चाहिए कि ख़बर सही है या ग़लत, इसकी जांच सीबीआई करे, ईडी करे, आयकर विभाग करे फिर सबूत लेकर आए, उन सबूतों पर फैसला हो। ख़बर सही थी या नहीं। ख़बर ग़लत इरादे से छापी गई या यह एक विशुद्ध पत्रकारीय कर्म था।

एक तरीका यह भी हो सकता था। इस ख़बर का बदला लेने के लिए किसी विपक्ष के नेता के यहां लाइव रेड करवा दिया जाता। जैसा कि हो रहा है और जैसा कि होता रहेगा। सीबीआई, आयकर विभाग, ईडी इनके अधिकारी तो पान खाने के नाम पर भी विपक्ष के नेता के यहां रेड मार आते हैं। किसी विपक्ष के नेता की सीडी तो बनी ही होगी, गुजरात में चुनाव होने वाले हैं, किसी न किसी को बन ही गई होगी। बिहार चुनाव में भी सीडी बनी थी। जिनकी बनी थी पता नहीं क्या हुआ उन मामलों में। ये सब आज से ही शुरू कर दिया जाए और आई टी सेल लगाकर काउंटर कर दिया जाए।

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‘भक्तों’ से जान का खतरा बताते हुए पीएम को लिखा गया रवीश कुमार का पत्र फेसबुक पर हुआ वायरल, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : भारत के प्रधानमंत्री को मेरा पत्र…

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सकुशल होंगे। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य की मंगल कामना करता हूं। आप असीम ऊर्जा के धनी बने रहें, इसकी दुआ करता हूं। पत्र का प्रयोजन सीमित है। विदित है कि सोशल मीडिया के मंचों पर भाषाई शालीनता कुचली जा रही है। इसमें आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के सदस्यों, समर्थकों के अलावा विरोधियों के संगठन और सदस्य भी शामिल हैं। इस विचलन और पतन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दुख की बात है कि अभद्र भाषा और धमकी देने वाले कुछ लोगों को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं। सार्वजनिक रूप से उजागर होने, विवाद होने के बाद भी फोलो करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की सोहबत में ऐसे लोग हों, यह न तो आपको शोभा देता है और न ही आपके पद की गरिमा को। किन्हीं ख़ास योग्यताओं के कारण ही आप किसी को फोलो करते होंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि धमकाने, गाली देने और घोर सांप्रदायिक बातें करने को आप फोलो करने की योग्यता नहीं मानते होंगे।

आपकी व्यस्तता समझ सकता हूं मगर आपकी टीम यह सुनिश्चित कर सकती है कि आप ऐसे किसी शख्स को ट्वीटर पर फोलो न करें। ये लोग आपकी गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। भारत की जनता ने आपको असीम प्यार दिया है, कोई कमी रह गई हो, तो आप उससे मांग सकते हैं, वो खुशी खुशी दे देगी। मगर यह शोभा नहीं देता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को फोलो करें जो आलोचकों के जीवित होने पर दुख जताता हो।

आज जबसे altnews.in पर पढ़ा है कि ऊं धर्म रक्षति रक्षित: नाम के व्हाट्स ग्रुप में जो लोग मुझे कुछ महीनों से भद्दी गालियां दे रहे थे, धमकी दे रहे थे, सांप्रदायिक बातें कर रहे थे, मुझ जैसे सर्वोच्च देशभक्त व दूसरे पत्रकारों को आतंकवादी बता रहे थे, उनमें से कुछ को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं, मैं सहम गया हूं। प्रधानमंत्री जी, इस व्हाट्स अप ग्रुप में मुझे और कुछ पत्रकारों को लेकर जिस स्तरहीन भाषा का इस्तमाल किया गया वो अगर मैं पढ़ दूं तो सुनने वाले कान बंद कर लेंगे। मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपनी सख़्त आलोचनाओं में भी आपका लिहाज़ करूं। महिला पत्रकारों के सम्मान में जिस भाषा का इस्तमाल किया गया है वो शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर आपके प्रति भी अभद्र भाषा का इस्तमाल किया जाता है। जिसका मुझे वाक़ई अफसोस है। लेकिन यहां मामला आपकी तरफ से ऐसे लोगों का है, जो मुझे जैसे अकेले पत्रकार को धमकियां देते रहे हैं। जब भी इस व्हाट्स अप ग्रुप से अलग होने का प्रयास किया, पकड़ इसे, भाग रहा है, मार इसे, टाइप की भाषा का इस्तमाल कर वापस जोड़ दिया गया।

राजनीति ने सोशल मीडिया और सड़क पर जो यह भीड़ तैयार की है, एक दिन समाज के लिए ख़ासकर महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इनकी गालियां महिला विरोधी होती हैं। इतनी सांप्रदायिक होती हैं कि आप तो बिल्कुल बर्दाश्त न करें। वैसे भी 2022 तक भारत से सांप्रदायिकता मिटा देना चाहते हैं। 15 अगस्त के आपके भाषण का भी इन पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हाल हाल तक मुझे धमकियां देते रहे हैं।

अब मेरा आपसे एक सवाल है। क्या आप वाक़ई नीरज दवे और निखिल दधीच को फोलो करते हैं? क्यों करते हैं? कुछ दिन पहले मैंने इनके व्हाट्स अप ग्रुप का कुछ स्क्रीन शाट अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ज़ाहिर कर दिया था। altnews.in के प्रतीक सिन्हा और नीलेश पुरोहित की पड़ताल बताती है कि ग्रुप का सदस्य नीरज दवे राजकोट का रहने वाला है और एक एक्सपोर्ट कंपनी का प्रबंध निदेशक है। नीरज दवे को आप फोलो करते हैं। जब मैंने लिखा कि इतनी अभद्र भाषा का इस्तमाल मत कीजिए तो लिखता है कि मुझे दुख है कि तू अभी तक जीवित है।

व्हाट्स अप ग्रुप का एक और सदस्य निखिल दधीच के बारे में कितना कुछ लिखा गया। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तब निखिल दधीच ने उनके बारे में जो कहा, वो आप कभी पसंद नहीं करेंगे, ये और बात है कि आप उस शख़्स को अभी तक फोलो कर रहे हैं। अगर मेरी जानकारी सही है तो। हाल ही में बीजेपी के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग़लत तरीके से एडिट की हुई मेरे भाषण का वीडियो शेयर किया था। इससे भ्रम फैला। altnews.in ने उसे भी उजागर किया मगर अमित मालवीय ने अफसोस तक प्रकट नहीं किया।

पर सर, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये निखिल दधीच मेरे मोबाइल फोन में आ बैठा है। घोर सांप्रदायिक व्हाट्स अप ग्रुप का सदस्य है जिससे मुझे ज़बरन जोड़ा जाता है। जहां मेरे बारे में हिंसक शब्दों का इस्तमाल किया जाता है। वाकई मैंने नहीं सोचा था कि इस ग्रुप के सदस्यों के तार आप तक पहुंचेंगे। काश altnews.in की यह पड़ताल ग़लत हो। निखिल दधीच की तो आपके कई मंत्रियों के साथ तस्वीरें हैं।

यही नहीं ऊं धर्म रक्षति रक्षित: ग्रुप के कई एडमिन हैं। कई एडमिन के नाम RSS, RSS-2 रखे गए हैं। एक एडमिन का नाम आकाश सोनी है। भारत की दूसरी महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जी, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा जी और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ आकाश सोनी की तस्वीर है। तस्वीर किसी की भी किसी के साथ हो सकती है लेकिन यह तो किसी को धमकाने या सांप्रदायिक बातें करने का ग्रुप चलाता था। आपके बारे में कोई लिख देता है तो उसके व्हाट्स अप ग्रुप के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मैंने ऐसी कई ख़बरें पढ़ी हैं।

क्या आकाश सोनी RSS का प्रमुख पदाधिकारी है? आकाश सोनी ने मेरे सहित अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के फोन नंबर को अपने पेज पर सार्वजनिक किया है। altnews.in की रिपोर्ट में यह बात बताई गई है।

पहले भी आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के नेताओं ने मेरा नंबर सार्वजनिक किया है और धमकियां मिली हैं। मैं परेशान तो हुआ परंतु आपको पत्र लिखने नहीं बैठा। इस बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं जानना चाहता हूं और आप भी पता करवाएं कि क्या इस व्हाट्स ग्रुप के लोग मेरी जान लेने की हद तक जा सकते हैं? क्या मेरी जान को ख़तरा है?
मैं एक सामान्य नागरिक हूं और अदना सा परंतु सजग पत्रकार हूं। जिसके बारे में आज कल हर दूसरा कहकर निकल जाता है कि जल्दी ही आपकी कृपा से सड़क पर आने वाला हूं। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इसका उत्सव भी मनाया गया कि अब मेरी नौकरी जाएगी। कइयों ने कहा और कहते हैं कि सरकार मेरे पीछे पड़ी है। हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को आपकी नापसंदगी के कारण चलता कर दिया गया। इसकी ख़बर मैंने thewire.in में पढ़ी। कहते हैं कि अब मेरी बारी है। यह सब सुनकर हंसी तो आती है पर चिन्तित होता हूं। मुझे यकीन करने का जी नहीं करता कि भारत का एक सशक्त प्रधानमंत्री एक पत्रकार की नौकरी ले सकता है। तब लोग कहते हैं कि थोड़े दिनों की बात है, देख लेना, तुम्हारा इंतज़ाम हो गया है। ऐसा है क्या सर?

ऐसा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। परंतु ऐसा मत होने दीजिएगा। मेरे लिए नहीं, भारत के महान लोकतंत्र की शान के लिए वरना लोग कहेंगे कि अगर मेरी आवाज़ अलग भी है, तल्ख़ भी है तो भी क्या इस महान लोकतंत्र में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है? एक पत्रकार की नौकरी लेने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के स्तर से होगा? ऐसी अटकलों को मैं व्हाट्स अप ग्रुप में दी जाने वाली धमकियों से जोड़कर देखता हूं। अगर आप इन लोगों को फोलो नहीं करते तो मैं सही में यह पत्र नहीं लिखता।

मेरे पास अल्युमिनियम का एक बक्सा है जिसे लेकर दिल्ली आया था। इन 27 वर्षों में ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया मगर वो बक्सा आज भी है। मैं उस बक्से के साथ मोतिहारी लौट सकता हूं, लेकिन परिवार का दायित्व भी है। रोज़गार की चिन्ता किसे नहीं होती है। बड़े बड़े कलाकार सत्तर पचहत्तर साल के होकर विज्ञापन करते रहते हैं ताकि पैसे कमा सकें। जब इतने पैसे वालों को घर चलाने की चिन्ता होती है तो मैं कैसे उस चिन्ता से अलग हो सकता हूं। मुझे भी है।

आप मेरे बच्चों को तो सड़क पर नहीं देखना चाहेंगे। चाहेंगे ? मुझसे इतनी नफ़रत? मेरे बच्चे तब भी आपको दुआ देंगे। मुझे सड़क से प्यार है। मैं सड़क पर आकर भी सवाल करता रहूंगा। चंपारण आकर बापू ने यही तो मिसाल दी कि सत्ता कितनी बड़ी हो, जगह कितना भी अनजान हो, नैतिक बल से कोई भी उसके सामने खड़ा हो सकता है। मैं उस महान मिट्टी का छोटा सा अंश हूं।

मैं किसी को डराने के लिए सच नहीं बोलता। बापू कहते थे कि जिस सच में अहंकार आ जाए वो सच नहीं रह जाता। मैं ख़ुद को और अधिक विनम्र बनाने और अपने भीतर के अंतर्विरोधों को लेकर प्रायश्चित करने के लिए बोलता हूं। जब मैं बोल नहीं पाता, लिख नहीं पाता तब उस सच को लेकर जूझता रहता हूं। मैं अपनी तमाम कमज़ोरियों से आज़ाद होने के संघर्ष में ही वो बात कह देता हूं जिसे सुनकर लोग कहते हैं कि तुम्हें सरकार से डर नहीं लगता। मुझे अपनी कमज़ोरियों से डर लगता है। अपनी कमज़ोरियों से लड़ने के लिए ही बोलता हूं। लिखता हूं। कई बार हार जाता हूं। तब ख़ुद को यही दिलासा देता कि इस बार फेल हो गया, अगली बार पास होने की कोशिश करूंगा। सत्ता के सामने बोलना उस साहस का प्रदर्शन है जिसका अधिकार संविधान देता है और जिसके संरक्षक आप हैं।

मैं यह पत्र सार्वजनिक रूप से भी प्रकाशित कर रहा हूं और आपको डाक द्वारा भी भेज रहा हूं। अगर आप निखिल दधीज, नीरज दवे और आकाश सोनी को जानते हैं तो उनसे बस इतना पूछ लीजिए कि कहीं इनका या इनके किसी ग्रुप का मुझे मारने का प्लान तो नहीं है। altnews.in का लिंक भी संलग्न कर रहा हूं। पत्र लिखने के क्रम में अगर मैंने आपका अनादर किया हो, तो माफ़ी मांगना चाहूंगा।

आपका शुभचिंतक

रवीश कुमार

पत्रकार

एनडीटीवी इंडिया

रवीश कुमार का उपरोक्त पत्र फेसबुक पर लाखों की संख्या में शेयर, लाइक और कमेंट हासिल कर चुका है..

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बिकने के बाद भी एनडीटीवी में काम करेंगे रवीश कुमार?

Ashwini Kumar Srivastava :  ”अब तेरा क्या होगा रवीश कुमार…” एनडीटीवी पर भी कब्जा कर चुके मोदी-अमित शाह और उनके समर्थक शायद ऐसा ही कुछ डॉयलाग बोलने की तैयारी में होंगे। जाहिर है, रवीश हों या एनडी टीवी के वे सभी पत्रकार, उनके लिए यह ऐसा मंच था, जहां वे बिना किसी भय के सरकार की आलोचना या खामियों की डुगडुगी पीट लेते थे। उनकी इसी डुगडुगी को अपने लिये खतरा मानकर संघ और भाजपा के समर्थकों की नजर में ये पत्रकार और एनडीटीवी सबसे बड़े शत्रु बने हुए थे।

कौन नहीं जानता कि लोकतंत्र में पक्ष से कहीं ज्यादा जरूरी विपक्ष होता है और मीडिया के जरिये पत्रकार भी विपक्ष की ही भूमिका निभाते हैं। हालांकि यह मामूली सी समझ भी केवल उनको ही हो सकती है, जिन्हें वास्तव में देश और लोकतंत्र से प्यार होगा। सरकार के खिलाफ भी बेबाकी से बोलने एनडी टीवी जैसे मीडिया का भी यदि देश में अभाव होगा, तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में लोकतंत्र सिर्फ यादों में जीवित रह जायेगा। लोकतंत्र की क्या अहमियत है, यह मोदी-अमित शाह के समर्थकों को शायद तभी पता चल पाएगा, जिस दिन उनके नेता लोकतंत्र की समस्त संस्थाओं को एनडीटीवी की ही तरह खुद या अपने कारिंदों द्वारा एक एक करके निगल जाएंगे। तब तक यूं ही अच्छे दिनों के आने का जश्न मनाते रहिये… (लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.)

Uday Prakash : तो अब एनडीटीवी भी बिक गया? ख़बर प्रामाणिक है। स्पाइस जेट मालिक अजय सिंह, जो २०१४ के चुनाव अभियान में भाजपा के सहयोगी रहे हैं, वही अब सारे सम्पादकीय अधिकारों के साथ एनडीटीवी के मालिक होंगे। (जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.)

Nitin Thakur : कितना सच और कितना झूठ ये नहीं मालूम लेकिन बीजेपी के समर्थक और मोदी की कैंपेनिंग में जुटी कोर टीम के मेंबर, प्रमोद महाजन के पूर्व सचिव और स्पाइसजेट नाम की सस्ती और सर्विस में बकवास (मेरी निजी राय) एयरलाइंस चलानेवाले अजय सिंह ने एनडीटीवी खरीद लिया है. अब उनके एनडीटीवी में सबसे ज़्यादा शेयर हैं. उनके पास चैनल के संपादकीय अधिकार सुरक्षित होंगे और वही तय करेंगे कि एनडीटीवी कौन सी खबर किस एंगल से चलाए. अगर वो कायदे के इंसान हुए तो एकाध परसेंट चांस ही हो सकता है कि दखलअंदाज़ी से बचें. (सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से)

Om Thanvi : एनडीटीवी को ख़रीदने वाले अजय सिंह कौन हैं? वही जिन्होंने नारा गढ़ा था- अबकी बार मोदी सरकार। जी हाँ, अजय सिंह 2014 के चुनाव में भाजपा अभियान समिति के सदस्य थे। नारा सुझाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने में अजय भाजपा के सामान्य सेवक थे, प्रमोद महाजन के क़रीबी। महाजन ने उन्हें अपना ओएसडी बनाया, नई संचार नीति बनाने का ज़िम्मा सौंपा। मोदी के पदार्पण पर वे उनके साथ हुए। सौदेबाज़ी और तकनीकी ‘बुद्धि’ की जितनी पहचान महाजन को थी, मोदी को उनसे कम नहीं। अजय सिंह को साथ लेकर और अब चैनल ख़रीद में आगे खड़ा उन्होंने यही साबित किया है। (वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.)

Priyabhanshu Ranjan : NDTV का भावी मालिक – अजय सिंह (भाजपाई)। News18 के अंग्रेजी और हिंदी न्यूज चैनल के अलावा पूरा ETV नेटवर्क- मुकेश अंबानी (मोदी जी का जिगरी यार)।  आजतक, India Today और ABP News —- महीने में 28 दिन ‘मोदी-मोदी’ जपेंगे और दो-तीन दिन इधर-उधर के भाजपाइयों के खिलाफ खबरें दिखाएंगे, ताकि ‘बैलेंस’ बना रहे और लोगों की नजरों में ये ‘निष्पक्ष’ बने रहने का ढोंग कर सकें। Doordarshan की तो खैर, क्या ही बताऊं। लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी में भी मोदी जी और RSS के ‘चेले’ सेट कर दिए गए हैं। Times Now, Republic, Zee News और सुदर्शन न्यूज़ के आगे तो दूरदर्शन और अंबानी के चैनल भी शर्मा जाएं। अब आप खुद तय कर लें कि असल खबरें देखने के लिए आपको कौन सा चैनल देखना है! (पीटीआई के तेजतर्रार पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.)

Dilip Khan : पूरा मीडिया ग़लत लिख-बोल रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिख दिया तो देखा-देखी सारे अख़बार, सारी वेबसाइट्स ने छाप दिया कि “अब की बार मोदी सरकार” का नारा स्पाइसजेट वाले अजय सिंह ने लिखा था। सच ये है कि ये नारा पीयूष पांडेय का लिखा हुआ है। “अच्छे दिन आने वाले हैं” का नारा अनुराग खंडेलवाल ने दिया था। “सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं झुकने दूंगा” प्रसून जोशी ने लिखा था। अजय सिंह कैंपेन में शामिल था, लेकिन लिखा क्या, ये मैं भी जानना चाहता हूं। अब शायद NDTV के लिए ही कुछ लिखे। एक नारा छूट रहा है। अजय सिंह चाहे तो उसपर क्लेम कर सकते हैं। शंकराचार्य वगैरह के नाक-भौं सिकोड़ने के बाद बनारस में नारे को डाइल्यूट कर दिया गया था। नारा था- हर-हर मोदी, घर-घर मोदी। इसके लेखक को मैं नहीं जानता। वेबसाइट्स वाले भेड़चाल चलने लगे हैं। देखा-देखी छापते हैं। फैक्ट्स चेक नहीं करते। (टीवी जर्नलिस्ट और सोशल मीडिया के चर्चित लेखक दिलीप खान की एफबी वॉल से.)

Yashwant Singh : एनडीटीवी का बिकना दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसे दौर में जब सत्ता की पोलखोल वाली खबरों की सर्वाधिक जरूरत है, एनडीटीवी पर छापे मार मार कर उसे घुटनो के बल बैठने के लिए मजबूर करना और बिक्री के रास्ते पर ले जाना यह बताता है कि सत्ता से ताकतवर कोई चीज नहीं होती. लोकतंत्र में इस किस्म का रवैया बेहद निराशाजनक है. एनडीटीवी और प्रणय राय से मेरे लाख मतभेद रहे हों, पर एनडीटीवी का मुंह बंद करने के लिए उसे पहले डराना धमकाना फिर बिक्री के लिए दबाव डालना चौथे स्तंभ के लिए खतरनाक है. ये नए किस्म का आपातकाल ही है. ये नए किस्म का फासिज्म ही है. (भड़ास संपादक यशवंत की एफबी वॉल से.)

मूल खबर….

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‘पेट्रो लूट’ का पैसा चुनावों में आसमान से बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा : रवीश कुमार

Ravish Kumar : सजन रे झूठ मत बोलो, पेट्रोल पंप पर जाना है… पेट्रोल के दाम 80 रुपये के पार गए तो सरकार ने कारण बताए।  लोककल्याणकारी कार्यों, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए सरकार को पैसे चाहिए। व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी और सरकार की भाषा एक हो चुकी है। दोनों को पता है कि कोई फैक्ट तो चेक करेगा नहीं। नेताओं को पता है कि राजनीति में फैसला बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा के बजट या प्रदर्शन से नहीं होता है। भावुक मुद्दों की अभी इतनी कमी नहीं हुई है, भारत में।

बहरहाल, आपको लग रहा होगा कि भारत सरकार या राज्य सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च कर रही होंगी इसलिए आपसे टैक्स के लिए पेट्रोल के दाम से वसूल रही हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता है। आप किसी भी बजट में इन मदों पर किए जाने वाले प्रावधान देखिए, कटौती ही कटौती मिलेगी। स्वास्थ्य सेवाओं के बजट पर रवि दुग्गल और अभय शुक्ला का काम है। आप इनके नाम से ख़ुद भी करके सर्च कर सकते हैं।

भारत ने 80 के दशक में स्वास्थ्य सेवाओं पर अच्छा ख़र्च किया था, उसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखा लेकिन नब्बे के दशक में उदारवादी नीतियां आते ही हम 80 के स्तर से नीचे आने लगे। स्वास्थ्य सेवाओं का बजट जीडीपी का 0.7 फीसदी रह गया। लगातार हो रही इस कटौती के कारण आम लोग मारे जा रहे हैं। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा महंगे इलाज पर ख़र्च हो रहा है।

यूपीए के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के कारण हेल्थ का बजट वापस जीडीपी का 1.2 प्रतिशत पर पहुंचा। इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधन तो बने मगर डाक्टरों और कर्मचारियों की भयंकर कमी के कारण यह भी दम तोड़ गया। अब तो इस योजना में भी लगातार कमी हो रही है और जो बजट दिया जाता है वो पूरा ख़र्च भी नहीं होता है। तो ये हमारी प्राथमिकता का चेहरा है।

12 वीं पंचवर्षीय योजना में तय हुआ कि 2017 तक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हेल्थ बजट होगा। मोदी सरकार ने कहा कि हम 2020 तक 2.5 प्रतिशत ख़र्च करेंगे। जब संसद में नेशनल हेल्थ राइट्स बिल 2017 पेश हुआ तो 2.5 प्रतिशत ख़र्च करने का टारगेट 2025 पर शिफ्ट कर दिया गया। ये मामला 2022 के टारगेट से कैसे तीन साल आगे चला गया, पता नहीं। रवि दुग्गल कहते हैं कि हम हकीकत में जीडीपी का 1 फीसदी भी स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च नहीं करते हैं। सरकार के लिए स्वास्थ्य प्राथमिकता का क्षेत्र ही नहीं है। ( डी एन ए अख़बार में ये विश्लेषण छपा है)

गोरखपुर में कई सौ बच्चे मर गए। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में अभय शुक्ला और रवि दुग्गल ने एक लेख लिखा। कहा कि यूपी ने जापानी बुखार और एंसिफ्लाइटिस नियंत्रण के लिए 2016-17 में केंद्र से 30.40 करोड़ मांगा, मिला 10.19 करोड़। 2017-18 में तो मांगने में भी कटौती कर दी। 20.01 करोड़ मांगा और मिला मात्र 5.78 करोड़। तो समझे, बच्चे क्यों मर रहे हैं।

रही बात कुल सामाजिक क्षेत्रों के बजट की तो अभय शुक्ला ने हिन्दू अख़बार में लिखा है कि 2015-16 में जीडीपी का 4.85 प्रतिशत सोशल सेक्टर के लिए था, जो 2016-17 में घटकर 4.29 प्रतिशत हो गया। प्रतिशत में मामूली गिरावट से ही पांच सौ हज़ार से लेकर दो तीन हज़ार करोड़ की कटौती हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं के हर क्षेत्र में भयंकर कटौती की गई।

महिला व बाल विकास के बजट में 62 फीसदा की कमी कर दी गई। ICDS का बजट 2015-16 में 3568 करोड़ था, ,2016-17 में 1340 करोड़ हो गया। जगह जगह आंगनवाड़ी वर्करों के प्रदर्शन हो रहे हैं। हर राज्य में आंगनवाड़ी वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं।

मिंट अख़बार ने लिखा है कि यूपीए के 2009 में सोशल सेक्टर पर 10.2 प्रतिशत ख़र्च हुआ था। 2016-17 में यह घटकर 5.3 प्रतिशत आ गया है, कटौती की शुरूआत यूपीए के दौर से ही शुरु हो गई थी। सर्व शिक्षा अभियान, इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम, मिड डे मील का बजट कम किया या है।

वही हाल शिक्षा पर किए जा रहे ख़र्च का है। आंकड़ों की बाज़ीगरी को थोड़ा सा समझेंगे तो पता चलेगा कि सरकार के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा महत्वपूर्ण ही नहीं हैं। बीमा दे दे और ड्रामा कर दो। दो काम है। 31 मार्च 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स की ख़बर है कि संघ ने शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट कम करने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की है। सरकार ने इन क्षेत्रों में बजट बढ़ाया होता तो समझा भी जा सकता था कि इनके लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम हमसे आपसे वसूले जा रहे हैं।

दरअसल खेल ये नहीं है। जो असली खेल है, उसकी कहानी हमसे आपसे बहुत दूर है। वो खेल है प्राइवेट तेल कंपनी को मालामाल करने और सरकारी तेल कंपनियों का हाल सस्ता करना। ग़रीब और आम लोगों की जेब से पैसे निकाल कर प्राइवेट तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। दबी जुबान में सब कहते हैं मगर कोई खुलकर कहता नहीं। इसका असर आपको चुनावों में दिखेगा जब आसमान से पैसा बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा। चुनाव जब महंगे होंगे तो याद कीजिएगा कि इसका पैसा आपने ही दिया है, अस्सी रुपये पेट्रोल ख़रीदकर। जब उनका खजाना भर जाएगा तब दाम कम कर दिए जाएँगे। आप जल्दी भूल जाएँगे । इसे ‘control extraction of money and complete destruction of memory’ कहते हैं।

एनडीटीवी इंडिया न्यूज चैनल के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार के लिए रवीश कुमार ने कहा- ”असफल योजनाओं की सफल सरकार, अबकी बार ईवेंट सरकार”

Ravish Kumar : असफल योजनाओं की सफल सरकार- अबकी बार ईवेंट सरकार… 2022 में बुलेट ट्रेन के आगमन को लेकर आशावाद के संचार में बुराई नहीं है। नतीजा पता है फिर भी उम्मीद है तो यह अच्छी बात है। मोदी सरकार ने हमें अनगिनत ईवेंट दिए हैं। जब तक कोई ईवेंट याद आता है कि अरे हां, वो भी तो था,उसका क्या हुआ, तब तक नया ईवेंट आ जाता है। सवाल पूछकर निराश होने का मौका ही नहीं मिलता।

जनता को आशा-आशा का खो-खो खेलने के लिए प्रेरित कर दिया जाता है। प्रेरना की तलाश में वो प्रेरित हो भी जाती है। होनी भी चाहिए। फिर भी ईमानदारी से देखेंगे कि जितने भी ईवेंट लांच हुए हैं, उनमें से ज़्यादातर फेल हुए हैं। बहुतों के पूरा होने का डेट 2019 की जगह 2022 कर दिया गया है। शायद किसी ज्योतिष ने बताया होगा कि 2022 कहने से शुभ होगा। ! काश कोई इन तमाम ईवेंट पर हुए खर्चे का हिसाब जोड़ देता। पता चलता कि इनके ईवेंटबाज़ी से ईवेंट कंपनियों का कारोबार कितना बढ़ा है। ठीक है कि विपक्ष नहीं है, 2019 में मोदी ही जीतेंगे, शुभकामनाएं, इन दो बातों को छोड़ कर तमाम ईवेंट का हिसाब करेंगे तो लगेगा कि मोदी सरकार अनेक असफल योजनाओं की सफल सरकार है। इस लाइन को दो बार पढ़िये। एक बार में नहीं समझ आएगा।

2016-17 के रेल बजट में बड़ोदरा में भारत की पहली रेल यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव था। उसके पहले दिसंबर 2015 में मनोज सिन्हा ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया था। अक्तूबर 2016 में खुद प्रधानमंत्री ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया। सुरेश प्रभु जैसे कथित रूप से काबिल मंत्री ने तीन साल रेल मंत्रालय चलाया लेकिन आप पता कर सकते हैं कि रेल यूनिवर्सिटी को लेकर कितनी प्रगति हुई है।

इसी तरह 2014 में देश भर से लोहा जमा किया गया कि सरदार पटेल की प्रतिमा बनेगी। सबसे ऊंची। 2014 से 17 आ गया। 17 भी बीत रहा है। लगता है इसे भी 2022 के खाते में शिफ्ट कर दिया गया है। इसके लिए तो बजट में कई सौ करोड़ का प्रस्ताव भी किया गया था।

2007 में गुजरात में गिफ्ट और केरल के कोच्ची में स्मार्ट सिटी की बुनियाद रखी गई। गुजरात के गिफ्ट को पूरा होने के लिए 70-80 हज़ार करोड़ का अनुमान बताया गया था। दस साल हो गए दोनों में से कोई तैयार नहीं हुआ। गिफ्ट में अभी तक करीब 2000 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं। दस साल में इतना तो बाकी पूरा होने में बीस साल लग जाएगा।

अब स्मार्ट सिटी का मतलब बदल दिया गया है. इसे डस्टबिन लगाने, बिजली का खंभा लगाने, वाई फाई लगाने तक सीमित कर दिया गया। जिन शहरों को लाखों करोड़ों से स्मार्ट होना था वो तो हुए नहीं, अब सौ दो सौ करोड़ से स्मार्ट होंगे। गंगा नहीं नहा सके तो जल ही छिड़क लीजिए जजमान।

गिफ्ट सिटी की बुनियाद रखते हुए बताया जाता था कि दस लाख रोज़गार का सृजन होगा मगर कितना हुआ, किसी को पता नहीं। कुछ भी बोल दो। गिफ्ट सिटी तब एक बडा ईवेंट था, अब ये ईंवेट कबाड़ में बदल चुका है। एक दो टावर बने हैं। जिसमें एक अंतर्राष्ट्रीय स्टाक एक्सचेंज का उदघाटन हुआ है। आप कोई भी बिजनेस चैनल खोलकर देख लीजिए कि इस एक्सचेंज का कोई नाम भी लेता है या नहीं। कोई 20-25 फाइनेंस कंपनियों ने अपना दफ्तर खोला है जिसे दो ढाई सौ लोग काम करते होंगे। हीरानंदानी के बनाए टावर में अधिकांश दफ्तर ख़ाली हैं।

लाल किले से सांसद आदर्श ग्राम योजना का एलान हुआ था। चंद अपवाद की गुज़ाइश छोड़ दें तो इस योजना की धज्जियां उड़ चुकी हैं। आदर्श ग्राम को लेकर बातें बड़ी बड़ी हुईं, आशा का संचार हुआ मगर कोई ग्राम आदर्श नहीं बना। लाल किले की घोषणा का भी कोई मोल नहीं रहा।

जयापुर और नागेपुर को प्रधानमंत्री ने आदर्श ग्राम के रूप में चुना है। यहां पर प्लास्टिक के शौचालय लगाए गए। क्यों लगाए गए? जब सारे देश में ईंट के शौचालय बन रहे हैं तो प्रदूषण का कारक प्लास्टिक के शौचालय क्यों लगाए गए? क्या इसके पीछ कोई खेल रहा होगा?

बनारस में क्योटो के नाम पर हेरिटेज पोल लगाया जा रहा है। ये हेरिटेज पोल क्या होता है। नक्काशीदार महंगे बिजली के पोल हेरिटेज पोल हो गए? ई नौका को कितने ज़ोर शोर से लांच किया गया था। अब बंद हो चुका है। वो भी एक ईवेंट था, आशा का संचार हुआ था। शिंजो आबे जब बनारस आए थे तब शहर के कई जगहों पर प्लास्टिक के शौचालय रख दिए गए। मल मूत्र की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं हुई। जब सड़ांध फैली तो नगर निगम ने प्लास्टिक के शौचालय उठाकर डंप कर दिया।

जिस साल स्वच्छता अभियान लांच हुआ था तब कई जगहों पर स्वच्छता के नवरत्न उग आए। सब नवर्तन चुनते थे। बनारस में ही स्वच्छता के नवरत्न चुने गए। क्या आप जानते हैं कि ये नवरत्न आज कल स्वच्छता को लेकर क्या कर रहे हैं।

बनारस में जिसे देखिए कोरपोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी का बजट लेकर चला आता है और अपनी मर्ज़ी का कुछ कर जाता है जो दिखे और लगे कि विकास है। घाट पर पत्थर की बेंच बना दी गई जबकि लकड़ी की चौकी रखे जाने की प्रथा है। बाढ़ के समय ये चौकियां हटा ली जाती थीं। पत्थर की बेंच ने घाट की सीढ़ियों का चेहरा बदल दिया है। सफेद रौशनी की फ्लड लाइट लगी तो लोगों ने विरोध किया। अब जाकर उस पर पीली पन्नी जैसी कोई चीज़ लगा दी गई है ताकि पीली रौशनी में घाट सुंदर दिखे।

प्रधानमंत्री के कारण बनारस को बहुत कुछ मिला भी है। बनारस के कई मोहल्लों में बिजली के तार ज़मीन के भीतर बिछा दिए गए हैं। सेना की ज़मीन लेकर पुलवरिया का रास्ता चौड़ा हो रहा है जिससे शहर को लाभ होगा। टाटा मेमोरियल यहां कैंसर अस्पताल बना रहा है। रिंग रोड बन रहा है। लालपुर में एक ट्रेड सेंटर भी है।

क्या आपको जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट याद है? आप जुलाई 2014 के अख़बार उठाकर देखिए, जब मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में जलमार्ग के लिए 4200 करोड़ का प्रावधान किया था तब इसे लेकर अखबारों में किस किस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए गए थे। रेलवे और सड़क की तुलना में माल ढुलाई की लागत 21 से 42 प्रतिशत कम हो जाएगा। हंसी नहीं आती आपको ऐसे आंकड़ों पर।

जल मार्ग विकास को लेकर गूगल सर्च में दो प्रेस रीलीज़ मिली है। एक 10 जून 2016 को पीआईबी ने जारी की है और एक 16 मार्च 2017 को। 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि पहले चरण में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया के बीच विकास चल रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि वाराणसी से हल्दिया के बीच जलमार्ग बन रहा है। इलाहाबाद कब और कैसे ग़ायब हो गया, पता नहीं।

2016 की प्रेस रीलीज़ में लिखा है कि इलाहाबाद से वाराणसी के बीच यात्रियों के ले जाने की सेवा चलेगी ताकि इन शहरों में जाम की समस्या कम हो। इसके लिए 100 करोड़ के निवेश की सूचना दी गई है। न किसी को बनारस में पता है और न इलाहाबाद में कि दोनों शहरों के बीच 100 करोड़ के निवेश से क्या हुआ है।

यही नहीं 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ सेवा शुरू होने का ज़िक्र है। क्या किसी ने इस साल पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ चलते देखा है? एक बार क्रूज़ आया था, फिर? वैसे बिना किसी प्रचार के कोलकाता में क्रूज़ सेवा है। काफी महंगा है।

जुलाई 2014 के बजट में 4200 करोड़ का प्रावधान है। कोई नतीजा नज़र आता है? वाराणसी के रामनगर में टर्मिनल बन रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि इस योजना पर 5369 करोड़ ख़र्च होगा और छह साल में योजना पूरी होगी। 2014 से छह साल या मार्च 2017 से छह साल?

प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि राष्ट्रीय जलमार्ग की परिकल्पना 1986 में की गई थी। इस पर मार्च 2016 तक 1871 करोड़ खर्च हो चुके हैं। अब यह साफ नहीं कि 1986 से मार्च 2016 तक या जुलाई 2014 से मार्च 2016 के बीच 1871 करोड़ ख़र्च हुए हैं। जल परिवहन राज्य मंत्री ने लोकसभा में लिखित रूप में यह जवाब दिया था।

नमामि गंगे को लेकर कितने ईवेंट रचे गए। गंगा साफ ही नहीं हुई। मंत्री बदल कर नए आ गए हैं। इस पर क्या लिखा जाए। आपको भी पता है कि एन जी टी ने नमामि गंगे के बारे में क्या क्या कहा है। 13 जुलाई 2017 के इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा है कि दो साल में गंगा की सफाई पर 7000 करोड़ ख़र्च हो गए और गंगा साफ नहीं हुई। ये 7000 करोड़ कहां ख़र्च हुए? कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा था क्या? या सारा पैसा जागरूकता अभियान में ही फूंक दिया गया? आप उस आर्डर को पढ़ंगें तो शर्म आएगी। गंगा से भी कोई छल कर सकता है?

इसलिए ये ईवेंट सरकार है। आपको ईवेंट चाहिए ईवेंट मिलेगा। किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे रिकार्ड ख़राब है।

नोट: इस पोस्ट को पढ़ते ही आईटी सेल वालों की शिफ्ट शुरू हो जाएगी। वे इनमें से किसी का जवाब नहीं देंगे। कहेंगे कि आप उस पर इस पर क्यों नहीं लिखते हैं। टाइप किए हुए मेसेज अलग-अलग नामों से पोस्ट किए जाएंगे। फिर इनका सरगना मेरा किसी लिखे या बोले को तोड़मरोड़ कर ट्वीट करेगा। उनके पास सत्ता है, मैं निहत्था हूं। दारोगा, आयकर विभाग, सीबीआई भी है। फिर भी कोई मिले तो कह देना कि छेनू आया था।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार ने बलात्कारी राम रहीम और निकम्मे मनोहर लाल खट्टर की डट कर ख़बर ली

Dayanand Pandey : रवीश कुमार सिर्फ़ लाऊड, जटिल और एकपक्षीय ही नहीं होते, कभी-कभी स्मूथ भी होते हैं और बड़ी सरलता से किसी घटना को तार-तार कर बेतार कर देते हैं। आज उन्होंने एक बार फिर यही किया। एनडीटीवी के प्राइम टाइम में हरियाणा के पंचकुला में बलात्कारी राम रहीम के कुकर्मों और उन पीड़ित दोनों साध्वी की बहादुरी का बखान करते हुए खट्टर सरकार की नपुंसकता की धज्जियां उड़ा कर रख दीं।

योगेंद्र यादव के साथ उनकी शालीन बातचीत ने सारी बात को प्याज की तरह बेतरह बेपर्दा कर दिया। बिना किसी चीख़ पुकार के पूरे घटनाक्रम को शीशे में उतार दिया। इस बाबत पत्रकार छत्रपति की हत्या और सीबीआई के डीएसपी की जांबाजी को भी रेखांकित किया। दोनों साध्वियों को सलाम भेजा और सारी राजनीतिक पार्टियों की सलीके से मज़म्मत की। पंचकुला हिंसा, बलात्कारी राम रहीम और निकम्मे मनोहर लाल खट्टर की डट कर ख़बर ली। योगेंद्र यादव और रवीश कुमार आज बहुत दिनों बाद पूरी निष्पक्षता से थे और फुल फार्म में।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की मीडिया रिपोर्ट.

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न्यूज़ चैनल आपकी चेतनाओं की हत्या करने के प्रोजेक्ट हैं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : 2010 के साल से ही न्यूज़ चैनलों को लेकर मन उचट गया था। तभी से कह रहा हूँ कि टीवी कम देखिये। कई बार ये भी कहा कि मत देखिये मगर लगा कि ऐसा कहना अति हो जाएगा इसिलए कम देखने की बात करने लगा। मैंने इतना अमल तो किया है कि न के बराबर देखता हूँ। बहुत साल पहले कस्बा पर ही डिबेट टीवी को लेकर एक लेख लिखा था ‘जनमत की मौत’।

मैं टीवी में रहते हुए टीवी से बहुत दूर जा चुका हूँ। जब कभी समीक्षा करना होती है तभी देखता हूँ वरना जब मेरा कार्यक्रम भी चल रहा होता है तो वो भी नहीं देखता। पांच छह अपवादों को छोड़ दीजिये तो कई सालों से अपने कार्यक्रम को भी कभी शेयर नहीं किया। कुछ लोगोँ को व्यक्तिगत रुप से लिंक ज़रूर भेजता हूँ । अगर ठीक ठीक कहूं तो पूरे महीने में कोई दो दिन आधे एक घंटे के लिए देखता हूँ। आफिस में चारों तरफ टीवी है तो दिख जाता है।

मेरी बातों और करनी में ये सब थोड़े बहुत अंतर्विरोध हैं मगर इसके बाद भी ये कहना चाहता हूँ कि न्यूज़ चैनल मत देखिये। ये वाक़ई आपकी चेतनाओं की हत्या करने के प्रोजेक्ट हैं। क्या आप ख़ुद से कभी नहीं पूछेंगे कि क्या देख रहे हैं और क्यों देख रहे हैं? न्यूज चैनल भले आज गोदी मीडिया हो गए हैं मगर जब ये पूरी तरह गोदी नहीं थे तब भी उतने ही ख़राब थे।

आप एक दो उदाहरणों से न्यूज़ चैनलों की प्रासंगिकता साबित करते रहिए लेकिन काफी सोच विचार के बाद मैं यह पोस्ट कर रहा हूँ। जिनके घर में बच्चे हैं वहाँ कनेक्शन कटवाना आसान नहीं है। मगर आप न्यूज चैनल के कनेक्शन तो कटवा ही सकते हैं या देखना छोड़ सकते हैं।

यह कोई मामूली जोखिम नहीं है। इस तरह की बातें करने से इस क्षेत्र में अपनी संभावनाओं पर कुल्हाड़ी ही मार रहा हूँ। नौकरी किसे नहीं चाहिए। मुझे भी चाहिए। फिर भी जो बात दिमाग़ में जम गई है उसे नहीं कहना भी ख़ुद के साथ बुरा करना है। मैं इस वक्त जो महसूस कर रहा हूँ वो आपसे कहना चाहता हूँ। बाकी आप मालिक हैं ।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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लोग मुझ पर हंस रहे हैं कि अब तुम्हारी नौकरी चली जाएगी : रवीश कुमार

Ravish Kumar : यूपी के शिक्षामित्रों सुनिये मेरी भी बात… सुबह से यूपी के शिक्षा मित्रों ने मेरे फोन पर धावा बोल दिया है। मेरा एक तरीका है। जब अभियान चलाकर दबाव बनाने की कोशिश होती है तो मैं दो तीन महीने रूक जाता हूँ। स्टोरी नहीं करता। मैं समझता हूं आपकी पीड़ा और परेशानी। कुछ साथियों के आत्महत्या करने की ह्रदयविदारक ख़बर देखी है। विचलित भी हूँ। सोच भी रहा था कि कुछ करता हूँ।

अकेला आदमी हूं विषय को पढ़ने समझने में न्यूज की डेडलाइन जैसी पात्रता ख़त्म हो जाती है फिर भी ध्यान में था ही। बात ये है कि किस हक से फोन पर धावा बोला गया? क्या मुझे शिक्षा मित्रों ने सांसद चुना है? विधायक चुना है? जिनको चुना है उनसे क्यों नहीं पूछते पहले। मैंने तो नहीं देखा इनमें से कभी किसी को मेरे लिए बोलते हुए। बल्कि ज़्यादातर गाली ही देते होंगे या जब गालियों से मुझे धमका कर चुप कराया जा रहा था तब चुप रहते होंगे। इस तरह से आप जनता ने ही पहले इस लोकतंत्र को कमज़ोर किया। सरकार से पूछने पर जब आप मुझे कमज़ोर करेंगे तो जब आप सरकार से पूछेंगे तो आपको कोई कमजोर कैसे नहीं करेगा।

पूरा जीवन लगाकर मैं यही कहता रहा कि सरकार चुनने के बाद मतदाता बन जाइये। किसी चिरकुट का फैन मत बनिये। न पत्रकार का न नेता का। आप किसी नेता का फैन बनकर खुद का विलय सरकार और विचारधारा में करेंगे तो जनता नहीं रह जाएंगे। आपका जनता के रूप में सरकार पर प्रभाव और दबाव ख़त्म हो जाता है। जैसे ही आप सरकार के समक्ष खड़े होंगे, आपको अल्पसंख्यक बना दिया जाएगा। अल्पसंख्यक होना धर्म से मुसलमान या सिख होना नहीं है। यह प्रक्रिया है उस आवाज़ को कुचलने की, जो अपनी मांग को लेकर सरकार के सामने खड़ी होती है।

बार-बार कहा मगर आप या आप जैसे लोग नहीं माने।गाय बकरी को लेकर जनता तेज़ी से जनता होने की अपनी पहचान छोड़ कर पार्टी विचारधारा में समाहित होती चली गई। जनता अल्पसंख्यक बनती चली गई । इसी के लिए अब विचारधारा की सरकार का मॉडल चलाया जा रहा है। पार्टी और सरकार की विचारधारा एक हो गई है। इस मॉडल में जनता के पास विचारधारा से अलग होने का अवसर नहीं रहता। गुजरात में जब पटेल समाज को पुलिस ने पीटा तो बाकी जनता इसलिए चुप रही कि विचारधारा की सरकार कमज़ोर न हो जाए। पटेल के पैसे और समर्थन से भाजपा ने राज ज़रूर किया मगर वे पुलिस से इसलिए पीट गए क्योंकि वे जनता नहीं रहे। वो पीटने के बाद भी विचारधारा में ही रहेंगे। जैसे ही आप मेजारिटी की ताकत कायम करते हैं, माइनॉरिटी बन जाते हैं।

इसलिए सूरत के कपड़ा व्यापारियों का आंदोलन बड़ी संख्या के बाद भी संघर्ष का मनोरंजन बन गया और बेअसर रहा। वो विरोध की जगह भजन करने लगे। सविनय अवज्ञा की जगह अनुनय-विनय करने लगे। आप समझते हैं कि हिंदू हिंदुत्व के लिए गोलबंद हो रहे हैं लेकिन असलीयत में आप जनता होने की पहचान खो रहे हैं। जब जनता अपनी हैसियत खो देती है तो सरकार को अथॉरिटेरियन बनने की छूट मिल जाती है। सेवक सेवक बोल कर सरकार मास्टर हो जाती है। पिछले तमाम आंदोलन और आवाज़ की यही हालत हुई है। सूरत के कपड़ा व्यापारी हों या मंदसौर के किसान या यूपी के शिक्षा मित्र। सब लड़कर थक गए मगर मिला कुछ नहीं।

मेरे पास कोई सीएमओ पीएमओ नहीं है।

अकेले ही आपके फोन उठाता हूँ, रोज़ बीस पत्रों के जवाब देता हूं और इतने ही पत्र पढ़ता हूँ। गोदी मीडिया का विज्ञापन भकोस कर आपने मुझे और सवाल पूछने की पंरपरा को कमज़ोर होने दिया। जब आपकी बारी आई तो कोई मीडिया आपके लिए नहीं है। यह कैसा समाज है कि लोग मुझ पर हंस रहे हैं कि अब तुम्हारी नौकरी चली जाएगी? आप क्यों तब चुप रहते हैं?

मैं आपके मसले को समझने में लगा हूँ। मैं ही उम्मीद हूँ, कहकर मेरा भावनात्मक शोषण न करें। मुझे आपकी पीड़ा का अहसास है। जो बात कह रहा हूँ पहले समझिये। अगर आप वाक़ई एक लाख हैं तो सड़क पर आकर दिखाइये। लड़िए। हिन्दू मुस्लिम टापिक पर लड़ लड़ कर आपने समाज को पगला दिया है, उसे ठीक कीजिए। मुझे फोन करने से कुछ नहीं होगा।

आपकी उम्मीद,

रवीश कुमार

एनडीटीवी से जुड़े एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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अमित शाह की संपत्ति और मीडिया का भय

Ravish Kumar : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की संपत्ति में तीन सौ फ़ीसदी की वृद्धि की ख़बर छपी। ऐसी ख़बरें रूटीन के तौर पर लगभग हर उम्मीदवार की छपती हैं जैसे आपराधिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि की ख़बरें छपती हैं। कुछ मीडिया ने अमित शाह की ख़बर नहीं छापकर और कुछ ने छापने के बाद ख़बर हटा कर अच्छा किया। डर है तो डर का भी स्वागत किया जाना चाहिए। इससे समर्थकों को भी राहत पहुँचती है वरना प्रेस की आज़ादी और निर्भीकता का लोड उठाना पड़ता। जो लोग चुप हैं उनका भी स्वागत किया जाना चाहिए। बेकार जोखिम उठाने से कोई लाभ नहीं।

हम सब इसी तरह से डर का डर दिखाकर डराते रहें तो एक दिन डर का राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का डरवाद सफ़लतापूर्वक क़ायम हो जाएगा। मुझे आपत्ति सिर्फ एक बात से है। कहीं इस ख़बर पर पर्दा डालने के लिए धर्मनिरपेक्षता का इस्तमाल तो नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं हुआ तो चिंता की बात नही वरना बिहार में फिर शपथ ग्रहण समारोह होने लग जाएगा।

मुझे लगता है कि बीजेपी और अमित शाह को बदनाम करने के लिए दो अख़बारों ने इस ख़बर को छापकर हटाया है। कई बार जायज़ कारणों से भी संपत्ति बढ़ती है। इसका जवाब यही है कि ये ख़बर बीजेपी के नेता ख़ुद ट्वीट कर दें। अपनी वेबसाइट पर लगा दें। ट्रेंड करा दें। मेरा भरोसा करें, संपत्ति में तीन सौ से लेकर हज़ार फीसदी वृद्धि की ख़बरों से जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता है। रूटीन की ख़बर है ये। करोड़पतियों के पास अपनी कार नहीं होती और वे पर्यावरण की रक्षा के लिए महँगी कार से ही चलते नज़र आते हैं, साइकिल से नहीं!

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी से हटाए जाने वाले मीडियाकर्मियों की संख्या 100 के पार हो गई

एक बड़े मीडिया संस्थान में मीडियाकर्मियों की छंटनी की जा रही है और पूरा मीडिया जगत चुप्पी साधे है. खासकर वो लोग भी जो दूसरों जगहों पर छंटनी या बंदी के सवालों पर मुखर होकर अपने यहां स्क्रीन काली कर प्राइम टाइम दिखाते थे. एनडीटीवी के लोग इस छंटनी के पक्ष में भांति भांति के तर्क दे रहे हैं लेकिन सवाल यही है कि क्या दूसरों को नसीहत देने वालों को अपना घर ठीक-दुरुस्त रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

सवाल और भी हैं…

क्या छंटनी ही एकमात्र रास्ता था.

क्या सेलरी कटौती या फिर उन्हें नए कामों में लगाकर उनके परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता था.

क्या यह कहीं नियम बना हुआ है कि अपने घर की गंदगी / उपद्रव / छल / छंटनी / फ्राड / चीटिंग आदि पर बिलकुल बात नहीं करनी है और दुनिया भर के मामलों में मुंह फाड़ कर चिल्लाना है.

एनडीटीवी के भीतरी सूत्र बताते हैं कि छंटनी से प्रभावित होने वालों की संख्या कुल सौ के पार जा चुकी है. ये छंटनी एनडीटीवी ग्रुप के अंग्रेजी और हिंदी समेत सभी न्यूज चैनलों से की गई है. दिल्ली और मुंबई आफिस को मिलाकर अब तक सौ लोग निकाले जा चुके हैं. एनडीटीवी के दिल्ली आफिस की बात करें तो यहां से कुल 35 इंजीनियर्स हटाए गए हैं. 25 कैमरापर्सन्स पर भी गाज गिरी है. 7 असिस्टेंट हटाए गए हैं. वीडियो एडिटर कुल छह हटाए गए हैं. एमसीआर से आठ लोगों की बलि ली गई है. दो ड्राइवरों को पैदल कर दिया गया है.

एनडीटीवी के मुंबई आफिस से खबर है कि 13 कैमरापर्सन्स प्रणय राय की छंटनी नीति की भेंट चढ़ाए गए हैं. यहां भी इंजीनियरों पर गाज गिरी है जिनकी संख्या तीन है. एक एंकर अनीश बेग को भी हटाए जाने की सूचना है. छंटनी और बर्खास्तगी के घटनाक्रम से ठीक एक रोज पहले हालात की नजाकत भांपकर 6 इंजीनियरों ने खुद ही जाब छोड़ दिया था. इस तरह सारे नंबर्स को जोड़ लें तो संख्या सौ के पार जा रही है.

देखना है कि रवीश कुमार एनडीटीवी के इस कोहराम पर कब प्राइम टाइम करते हैं और दुनिया भर के मीडिया संस्थानों में छंटनी के ट्रेंड पर प्रकाश डालते हुए जनसंचार के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विद्वानों को उद्धृत करते हुए कब विषय विशेषज्ञों से बहस कर जनता की चेतना को जाग्रत करने का काम करते हैं ताकि जनता भी मीडिया की अर्थनीति और कूटनीति से दो-चार होकर मीडिया के प्रति अपने नजरिए सरोकार को रीडिफाइन कर सके.

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एनडीटीवी ने 70 कर्मचारियों को निकाला, रवीश कुमार ने चुप्पी साधी

हर मसले पर मुखर राय रखने वाले पत्रकार रवीश कुमार अपने संस्थान एनडीटीवी के घपलों-घोटालों और छंटनी पर चुप्पी साध जाते हैं. ताजी सूचना के मुताबिक एनडीटीवी ने अपने यहां से छह दर्जन से ज्यादा मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. इनमें से ज्यादातर तकनीकी कर्मी हैं. करीब 35 तो कैमरामैन ही हैं. बाकी टेक्निकल स्टाफ है. वे कैमरामैन में जो पहले एडिटोलियल टीम के सदस्य थे, अब एचआर ने उन्हें टेक्निकल स्टाफ में कर दिया है.

ये सभी ग्रुप के अंग्रेजी हिंदी व अन्य चैनलों में काम करते थे. संपादकीय विभाग के अन्य लोगों पर भी गाज गिर सकती है. सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं क्या रवीश कुमार भी इस छंटनी के मसले पर कुछ बोलेंगे… क्या वे इस मामले में मुंह खोलेंगे. उल्लेखनीय है कि सीबीआई रेड पड़ने पर एनडीटीवी के पक्ष में तमाम बुद्धिजीवी खड़े हो गए थे. अब एनडीटीवी से 70 लोग निकाले गए हैं तो इनके परिवारों के पक्ष में कोई दो लाइन लिखने के लिए आगे आने वाला नहीं है.

आउटलुक मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार एनडीटीवी प्रबंधन ने अपने यहां से 70 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ज्ञात हो कि पिछले कुछ दिनों से एनडीटीवी ने MoJo यानि मोबाइल जर्नलिज्म शुरू किया है. इसके बाद ही माना जा रहा था कि कैमरामैन निकाल दिए जाएंगे. मोजो जर्नलिज्म के प्रयोग के बाद अब रिपोर्टर के साथ कैमरामैन नहीं जाता है. रिपोर्टर खुद मोबाइल से वीडियो बनाता है. एनडीटीवी भी कहता है कि वह मोजो यानी मोबाइल बेस जर्नलिज्म की ओर बढ़ रहा है.

इस छंटनी को लेकर फेसबुक पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं :

राजीव राय : एनडीटीवी से तकरीबन 60 लोगों को बाहर निकाल दिया गया है. उम्मीद है Ravish Kumar जी! इसपर भी कोई ब्लॉग या पोस्ट लिखेंगे और अपने साथी पत्रकारों के लिए ठीक वैसे ही आवाज़ बुलंद करेंगे जैसे अपने मालिक प्रणाॅय राॅय के लिए किया था.
Mayank Saxena : 6 महीने पहले ही जब एनडीटीवी ने अपने रिपोर्टर्स को मोबाइल दे कर उससे स्टोरी और लाइव करने को कहा था…तभी मुझे लग गया था कि छंटनियां होने वाली हैं…कैमरापर्सन्स ही सबसे ज़्यादा होंगे, मेरे हिसाब से इन 70 लोगों में…
Rajat Amarnath : NDTV ने सफेद हाथियों की सैलरी कम करने की जगह अपने करीब100 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला किया है (ज्यादातर टैक्निकल स्टाफ है). इस मौके पर एक प्राइम टाईम तो बनता है- “जुबां पे सच,दिल में इंडिया… NDTV इंडिया”
Ajay Prakash : एनडीटीवी ने की 70 कर्मचारियों की छंटनी… देखना होगा कि कौन से नेता और बुद्धिजीवी बाहर किये जाने वाले लोगों के समर्थन में आकर जंतर—मंतर पर प्रदर्शन करते हैं.

इस बीच, एनडीटीवी समूह ने एक बयान जारी कर कहा है- ‘दुनियाभर के अन्य न्यूज ब्रॉडकास्टर की तरह एनडीटीवी भी मोबाइल जर्नलिज्म पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने न्यूज रूम और रिसोर्सेज का पुनर्गठन कर रही है। एनडीटीवी ने हमेशा प्रारंभिक स्तर पर ही नई टेक्नोलॉजी को ग्रहण किया है और हम (एनडीटीवी) देश का पहला नेटवर्क है, जिसने मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर खबरों को शूट करने के लिए अपने पत्रकारों को प्रशिक्षित किया है। यह सिर्फ कॉस्ट-कटिंग नहीं है, बल्कि यह निश्चित रूप से हमारे लिए किसी भी अन्य बिजनेस की तरह या यूं कहें कि ऑपरेशंस का महत्वपूर्ण फैक्टर है।”

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सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा क्यों न करें, बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा मत करिए. ये पेड लोग हैं. ये दोनों अपने-अपने मालिकों के धंधों को बचाने-बढ़ाने के लिए वैचारिक उछल कूद करते हुए आपको बरगलाएंगे, भरमाएंगे, डराएंगे, अपने पक्ष में खड़े होने के लिए उकसाएंगे और इसके लिए देर तक व दूर तक ब्रेन वाश करते चलते जाएंगे…

रवीश कुमार को हर पत्रकार डरपोक दिखने लगा है. उन्हें दिल्ली में डर लगने लगा है. हर किसी का फोन टेप होता दिखने लगा है…लोकतंत्र में सारा सत्यानाश हुआ दिख रहा है…ये दौर भाजपा राज का है सो एनडीटीवी को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और रवीश कुमार सुर ताल भिड़ाकर गाने में जुटे हैं- ”अंधेरे में जो बैठे हैं, नजर हम पर भी तुम डालो…. अरे ओ रोशनी वालों…”

कुछ ऐसा ही हाल तब जी ग्रुप का था, जब कांग्रेस राज में उगाही के मामले में सुधीर चौधरी उठाकर जेल भेज दिए गए थे और सुभाष चंद्रा प्राण बचाए भागते फिर रहे थे. तब जी न्यूज को सब कुछ खराब होता हुआ, हर ओर अराजकता की स्थिति, अभिव्यक्ति की आजादी का गला घुटा हुआ, आपातकाल सरीखा माहौल दिख रहा था… तबके जी न्यूज के एंकर सुर ताल भिड़ाकर कुछ वैसा ही गीत गाए बकबकाए जा रहे थे.

दोस्तों, भारत अदभुत देश है. यहां कोई मोदी आए या कोई मनमोहन, जनता को बहुत फरक नहीं पड़ता. भारत वाले बहुत संतोषी और मस्त जीव हैं. जब हम सब अंग्रेज को सौ साल तक झेल गए जो कि बाहरी और विदेशी थे, फिर ये मनमोहन, मोदी तो अपने ही देश के हैं. मनमोहन ने क्या बना-बिगाड़ दिया था और मोदी ने क्या रच-उखाड़ लिया है…तब भी अंबानी बिरला लूट रहे थे, सत्ता के प्रिय बने हुए थे… आज भी अंबानी अडानी बिरला सब लूट रहे हैं, सत्ता के प्रिय बने हुए हैं… तब भी जो ‘अप्रिय’ थे उन्हें ठीक करने के लिए ढेर सारे सरकारी कुकर्म किए जाते थे, आज भी जो ‘अप्रिय’ हैं, उनकी हंटिंग होती रहेगी…

कांग्रेस के जमाने में जो आर्थिक नीति थी, वही भाजपा के जमाने में है बल्कि भाजपा वाले कांग्रेस से कुछ ज्यादा स्पीड से उनकी सारी पालिसिज लागू कर रहे हैं.. जीएसटी से लेकर फारेन इनवेस्टमेंट और प्राइवेटाइजेशन को देख लीजिए… इसलिए उनके नाम पर डराकर इनके पाले में करने का खेल वही नहीं समझेगा जो वाकई दिमाग से पैदल होगा…

धर्म जाति की पालिटिक्स हर वक्त थी. 1857 की क्रांति से लेकर किसान विद्रोहों तक में धर्म जाति के आधार पर गोलबंदियां की गई थीं. आजादी के इतने सालों बाद भी गोलबंदियां इसी आधार पर होती रही हैं. कांग्रेस वाले धर्म-जाति-क्रांति आदि के समस्त पैकेज का इस्तेमाल रणनीतिक तौर पर समय व माहौल देखकर करते रहते हैं, बिलकुल ‘निर्दोष’ अंदाज में.. पर भाजपाई और अन्य पार्टियां वही काम खुलकर ‘भदेस’ तरीके से कर रही हैं..

जनता चेतनासंपन्न होती जाएगी तो उनके सोचने विचारने और वोट देने का पैर्टन बदलता जाएगा. इसमें कोई घबड़ाने वाली बात नहीं है. हम मनुष्य आज जहां तक पहुंचे हैं, वहां तक किसी पैराशूट से हमें नहीं लाया गया है बल्कि हम क्रमिक विकास और इवोल्यूशन की हजारों लाखों करोड़ों साल की यात्रा करके आए हैं… ये यात्रा जारी है और सब कुछ बेहतर होगा, ये उम्मीद करते रहना चाहिए…

जो लोग भाजपा से डराकर हमको आपको कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करना चाहते हैें उनको बताना चाहता हूं कि कांग्रेस ने सबसे ज्यादा कम्युनिस्ट नौजवान अपने राजकाज के दौरान मरवाए हैं. वो चाहे पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलने का काम रहा हो या पूरे देश में कांग्रेसियों द्वारा चलाए गए नक्सल-कम्युनिस्ट विरोधी अभियान के जरिए बड़े पैमाने पर छात्रों, किसानों-मजदूरों का सफाया करवाना रहा हो.

इसी कांग्रेस ने लाखों सिखों का कत्लेआम पूरे देश में अपने नेताओं के नेतृत्व में कराए. सारे पाप इन कांग्रेसियों ने कराए और सिखाए हैं. इसलिए भाजपा का डर दिखाकर आपको जिनके पक्ष के सपने दिखाए जा रहे हैं, जिनके पक्ष में हमें गोलबंद करने को उत्तेजित-उत्प्रेरित किया जा रहा है, वे ज्यादा बड़े पापी हैं. भाजपा वाले तो बड़े पापियों से थोड़ा बहुत सबक सीखकर आए हैं और इसका समय समय पर नौसिखियों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और इस प्रक्रिया में पकड़े भी जा रहे हैं. कांग्रेस के जमाने में भी सीबीआई का रोजाना गलत व मनमाफिक इस्तेमाल होता था, आज भाजपा के राज में भी हो रहा है. सत्ता में आपने पर सबका चरित्र एक-सा हो जाता है, इसे समझ लीजिए क्योंकि सत्ता खुद में एक संस्था होती है जो सबसे ज्यादा मजबूत और सबसे ज्यादा संगठित होती है. सत्ता में भाजपाई आएं या कांग्रेसी या कम्युनिस्ट या सपाई या बसपाई या कोई और… सबकी कार्यशैली अंतत: सत्ता परस्ती वाली यानि बड़े लोगों के पक्षधर वाली हो जाती है… जनता तो बेचारी जनता ही बनी रहती है, थोड़ी कम, थोड़ी ज्यादा… वो अपने मित्र जेपी त्रिपाठी एक जगह लिखते हैं न- ”बाबू हुए तुम, राजा हुए तुम, आदमी बेचारे के बेचारे हुए हम…”

भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि इत्यादि ढेरों पार्टियां जो हैं.. .ये सब पावर की लालची हैं, सत्ता की लालची हैं, पैसे की लालची हैं, पूंजीपरस्त हैं, झूठे और मक्कार हैं. जनविरोधी हैं… ब्लैकमनी के केंद्र हैं… हरामीपने और उपद्रव की कुंजी हैं… इनके चक्कर में न फंसिए. इन पार्टियों ने अब अपने अपने टीवी चैनल गढ़ लिए हैं. जो सत्ता मेंं होता है, उसकी तरफ मीडिया परस्ती ज्यादा होती है, उसकी तरफ न्यूज चैनल ज्यादा झुके रहते हैं. जैसे सूरज की तरफ सारे फूल पौधे और वनस्पतियां झुकी होती हैं. रीयल जर्नलिज्म अगर कोई कर रहा है तो वह सोशल मीडिया मे थोडा बहुत हो रहा है, वेबसाइटों और ब्लागों के जरिए थोड़ा बहुत हो रहा है. ये बाजारू मीडिया वाले, ये एनडीटीवी और जी न्यूज वाले तो बस टर्नओवर जोड़ रहे हैं, फायदे देख रहे हैं…

चिदंबरम की गोद में बैठकर जब प्रणय राय टूजी स्कैम के पैसे के ब्लैक से ह्वाइट कर रहे थे तो रवीश कुमार को दिल्ली में घना अंधेरा नहीं दिख रहा था… जब एनडीटीवी और चिदंबरम के स्कैम को उजागर करने वाले ईमानदार आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को पागलखाने भिजवा गया था तो रवीश कुमार की संवेदना नहीं थरथराई और उनको मनुष्यता व लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर नहीं दिखा. अब जब उनके मालिक की चमड़ी उनके काले कारनामों के चलते उधेड़ी जा रही है तो उन्हें सारी नैतिकता और दुनिया भर के सारे आदर्श याद आने लगे हैं… उनका बस चैनल की स्क्रीन पर फूट फूट कर रोना ही बाकी रह गया है..

अरे भइये रवीश कुमार, तू अपनी सेलरी भर पूरा पैसा वसूल एक्टिंग कर ले रहा है… उसके बाद आराम से रह.. चिल्ल कर… एक्टर वैसे भी दिल पर नहीं लेते… रोल खत्म, पैसा हजम… उसके बाद घर परिवार और मस्ती…इस अदभुत देश को और यहां की फक्कड़ जनता को कुछ नहीं होने जा रहा… बहुत आए गए शक हूण कुषाण मुगल अंग्रेज और ढेरों आक्रांता… देश नहीं मरा न मरेगा… आप कृपा करके एनडीटीवी के शेयरों का भाव डबल दिखाकर बैंक को चूतिया बनाकर कर्ज लेने के फर्जीवाड़े की सच्चाई पर एक प्राइम टाइम डिबेट करिए जिसमें बैंक के प्रतिनिधि समेत सभी पक्षों को लाकर स्टूडियो में बैठाइए बुलाइए और दूध का दूध पानी पानी कर दीजिए… आप जरा एनडीटीवी-चिदंबरम के सौजन्य से पागलखाने भिजवाए गए आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को भी बुला लीजिएगा पैनल में जो सुना देंगे आपके एनडीटीवी चैनल और इसके मालिक प्रणय राय की चोरी की 100 कहानियां…

रवीश जी, युवाओं को भरमाना छोड़िए… सच्ची पत्रकारिता का नाटक बंद करिए… हां, पेट पालने के लिए आपको सेलरी की जरूरत पड़ती है और प्रणय राय को एक ऐसे एंकर की जरूरत पड़ती है जो उनको डिफेंड कर सके तो आप दोनों की जोड़ी ‘जेनुइन’ है, उसी तरह जैसे सुधीर चौधरी और सुभाष चंद्रा की है. कांग्रेस राज में जिस तरह संघिये सब डराते थे कि जल्द ही भारत में कांग्रेस के सहयोग से मुस्लिम राज आने वाला है, उसी तरह भाजपा के राज में एनडीटीवी वाले डरा रहे हैं कि बस सब कुछ खत्म होने वाला है क्योंकि मोदिया अब सबका गला ही घोंटने वाला है…

अरे यार बस करो… इतना भी हांका चांपा न करो… प्रणय राय की थोड़ी पोल क्या खुल गई, थोड़ी चड्ढी क्या सरका दी गई, आप तो अपने करियर का ‘द बेस्ट’ देने पर उतारू हो गए… पोलैंड से लेकर न्यूयार्क टाइम्स और ट्रंप से लेकर प्रेस कार्प की नैतिकता के पत्र के जरिए प्रणय राय को दूध से नहलाकर पवित्र कहने को मजबूर करने लगे….

हम लोगों को यकीन है कि जितनी चिरकुटई कांग्रेस शासन के राज मेंं हुई, उससे काम ही भाजपा के राज में होगी क्योकि भाजपाइयों को अभी संपूर्ण कांग्रेसी चिरकुटई सीखने में वक्त लगेगा… हां, ये पता है कि दोनों ही पूंजीपतियों को संरक्षण देकर और उनसे आश्वस्ति पाकर राज करते हैं इसलिए इनके शासनकालों में जनता का बहुत भला न होने वाला है.. और, जनता बहुत बुरे में भी या तो मस्त रहती है या फिर मारपीट करती है या फिर सुसाइड कर लेती है. उसे अपने रास्ते पता हैं… उसके लिए नए रास्ते न तो आपके प्राइम टाइम लेक्चर से खुल सकते हैं और न ही मोदी जी के ‘देश बदल रहा है’ के जुमलों से…

रवीश भाई और सुधीर चौधरी जी, लगे रहिए… आप दोनों को देखकर यकीन होने लगा है कि एक कांग्रेस और दूसरा भाजपा का प्रवक्ता कितना दम लगाकर और कितना क्रिएटिव होकर काम कर रहे हैं… बस इतना कहना चाहूंगा कि ये देश इस छोर या उस छोर पर नहीं जीता है और न जीता रहा है… इस देश का अदभुत मिजाज है… वह कोई नृप होए हमें का हानि की तर्ज पर अपने अंदाज में अपनी शैली में जीवित रहा है और जीवित रहेगा.. पहाड़ से लेकर मैदान तक और रेगिस्तान से लेकर समुद्र तटीय इलाकों तक में फैले इस देश में अंधेरा लाने की औकात न किसी मोदी में है और न किसी मनमोहन में हो सकी…

फेसबुक के साथियों से कहना चाहूंगा कि इस छोर या उस छोर की राजनीति-मीडियाबाजी से बचें.. दोनों छोर बुरे हैं… दोनों निहित स्वार्थी और जनविरोधी हैं.. सारा खेल बाजारू है और इसके उपभोक्ता हमकों आपको बनाया जा रहा है, जबरन… आप रिएक्ट न करें.. आप मस्त रहें… जीवन में राजनीति-मीडिया के अलावा ढेर सारा कुछ है लिखने करने पढ़ने देखने को… इस भयानक गर्मी में जाइए घूम आइए पहाड़… चढ़ जाइए हिमालय की उंचाई और अपनी आत्मा तक को पवित्र और मस्त कर आइए… देह के पार देख आइए और रुह संग बतिया आइए… ये रवीश कुमार और सुधीर चौधरी तो लाखों रुपये लेता है, जैसा मालिक कहता है, वैसा स्क्रिप्ट पढ़ता है… एक का मालिक कांग्रेस के गोद में बैठा रहता है, दूसरे का भाजपा की गोद में… इनके चक्कर में अपनी नींद, उर्जा और धैर्य बर्बाद न करिए… जाइए, हिमाचल उत्तराखंड आपको बुला रहा है… किसी जाती हुई सामान्य सी सरकारी बस पर बैठ जाइए और चार पांच सौ रुपये में पहाड़ की बर्फ से ढकी चादर को हिला आइए…

जाइए अपनी जिंदगी जी आइए और भटक मरने से बच जाइए…. ध्यान रखिएगा, सारा प्रपंच यह तंत्र आपको भटकाने और मुर्दा बनाने के लिए रचता है… ताकि आपका खून पीकर वह अपने को अमर रख सके…

वो कहते हैं न कबीर… साधो ये मुर्दों का गांंव… और ये भी कि… भटक मरे न कोई….

तो दोस्तों, मुर्दों से दिल लगाना बंद कर दीजिए और भटक मरने से बचने की तरकीब ढूंढने में लग जाइए… शायद जीवन का मतलब मकसद समझ में आ जाए…

जैजै
यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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न्यूज़ एंकर हमारे समय का थानेदार है, गुंडा है और बाहुबली है : रवीश कुमार

एक ऐसे वक्त में जब राजनीति तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर रही है, सहनशीलता को कुचल रही है, अपमान का संस्कार स्थापित कर रही है, उसी वक्त में ख़ुद को सम्मानित होते देखना उस घड़ी को देखना है जो अभी भी टिक-टिक करती है। दशकों पहले दीवारों पर टिक टिक करने वाली घड़ियां ख़ामोश हो गई। हमने आहट से वक्त को पहचानना छोड़ दिया। इसलिए पता नहीं चलता कि कब कौन सा वक्त बगल में आकर बैठ गया है। हम सब आंधियों के उपभोक्ता है। लोग अब आंधियों से मुकाबला नहीं करते हैं। उनका उपभोग करते हैं। आंधियां बैरोमीटर हैं, जिससे पता चलता है कि सिस्टम और समाज में यथास्थिति बरकरार है। …

(दोनों तस्वीरें कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने अपने मोबाइल से उतारीं, इसलिए फोटो श्रेय उन्हीं को.)

असली डिग्री बनाम फ़र्ज़ी डिग्री के इस दौर में थर्ड डिग्री नए नए रूपों में वापस आ गई है। न्यूज़ एकंर हमारे समय का थानेदार है। टीवी की हर शाम एक लॉक अप की शाम है। एंकर हाजत में लोगों को बंद कर धुलाई करता है। एंकर हमारे समय का गुंडा है। बाहुबली है। हुज़ूर के ख़िलाफ़ बोलने वाला बाग़ी है। हुज़ूर ही धर्म हैं, हुज़ूर ही राष्ट्र हैं, हुज़ूर ही विकास हैं। प्राइम टाइम के लॉक अप में विपक्ष होना अपराध है। विकल्प होना घोर अपराध है। तथ्य होना दुराचार है। सत्य होना पाप है। इसके बाद भी आप सभी ने एक न्यूज़ एंकर को पहले पुरस्कार के लिए चुना है यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया में (पुरस्कार देने का) जोखिम उठाने वाले अब भी बचे हुए हैं। हम आपके आभारी हैं। …

गांधीवादी, अंबेडकरवादी, समाजवादी और वामपंथी। आंधियां जब भी आती हैं तब इन्हीं के पेड़ जड़ से क्यों उखड़ जाते हैं। बोन्साई का बाग़ीचा बनने से बचिये। आप सभी के राजनीतिक दलों को छोड़कर बाहर आने से राजनीतिक दलों का ज़्यादा पतन हुआ है। वहां परिवारवाद हावी हुआ है। वहां कोरपोरेटवाद हावी हुआ है। उनमें सांप्रदायिकता स लड़ने की शक्ति न पहले थी न अब है। फिर उनके लिए अफसोस क्यों हैं। अगर ख़ुद के लिए है तो सभी को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। मैंने राजनीति को कभी अपना रास्ता नहीं माना लेकिन जो लोग इस रास्ते पर आते हैं उनसे यही कहता हूं कि राजनीतिक दलों की तरफ लौटिये। सेमिनारों और सम्मेलनों से बाहर निकलना चाहिए। सेमिनार अकादमिक विमर्श की जगह है। राजनीतिक विकल्प की जगह नहीं है। राजनीतिक दलों में फिर से प्रवेश का आंदोलन होना चाहिए। …

न्यूज़ रूम रिपोर्टरों से ख़ाली हैं। न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट में अच्छे पत्रकारों को भर्ती करने की जंग छिड़ी है जो वाशिंगटन के तहखानों से सरकार के ख़िलाफ़ ख़बरों को खोज लाएं। मैं न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट की बदमाशियों से भी अवगत हूं, लेकिन उसी ख़राबे में यह भी देखने को मिल रहा है। भारत के न्यूज़ रूम में पत्रकार विदा हो रहे हैं। सूचना की आमद के रास्ते बंद है। ज़ाहिर है धारणा ही हमारे समय की सबसे बड़ी सूचना है। एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त है। वो पत्रकार नहीं है। सरकार का सेल्समैन है। .. प्रेस रिलीज तो पहले भी छाप रहे थे। फर्क यही आया है कि अब छाप ही नहीं रहे हैं बल्कि गा भी रहे हैं। यह कोई मुंबई वाला ही कर सकता है। चाटुकारिता का भी इंडियन आइडल होना चाहिए। पत्रकारों को बुलाना चाहिए कि कौन किस हुकूमत के बारे में सबसे बढ़िया गा सकता है। …

न्यूज़ चैनल और अख़बार राजनीतिक दल की नई शाखाएं हैं। एंकर किसी राजनीतिक दल में उसके महासचिव से ज़्यादा प्रभावशाली है। राजनीतिक विकल्प बनाने के लिए इन नए राजनीतिक दलों से भी लड़ना पड़ेगा। नहीं लड़ सकते तो कोई बात नहीं। जनता की भी ऐसी ट्रेनिंग हो गई है कि कई लोग कहने आ जाते हैं कि आप सवाल क्यों करते हैं। स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और स्याही से लिखने वाले प्रोपेगैंडा कर रहे हैं। पत्रकारिता का वर्तमान प्रोपेगैंडा का वर्तमान है। …

नैयर सम्मान से सम्मानित किए जाने के दौरान एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार द्वारा दिए गए वक्तव्य का कुछ अंश.

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एक लाख रुपये वाला ‘कुलदीप नैयर सम्मान’ पत्रकार रवीश कुमार को देने की घोषणा

Om Thanvi : भाषाई पत्रकारिता के लिए स्थापित पहला कुलदीप नैयर सम्मान संजीदा पत्रकार रवीश कुमार को दिया जाएगा। प्रेस क्लब, दिल्ली में इसकी घोषणा आज सम्मान समिति के अध्यक्ष आशीष नंदी ने की। इस मौक़े पर कुलदीप नैयर भी मौजूद थे। सम्मान में प्रशस्ति के साथ एक लाख रुपए की राशि दी जाएगी।

सम्मान का आयोजन गांधी शांति प्रतिष्ठान के तत्वावधान में हुआ है। प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने बताया कि यह सम्मान हर वर्ष दिया जाएगा। सुपात्र का निर्णय सात सदस्यों की समिति करेगी। रवीश कुमार को हार्दिक बधाई।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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‘बागों में बहार है’ के लिए रवीश को सज़ा..?

टीवी एंकर रवीश कुमार के भाई पर यौन शोषण का आरोप क्या लगा मानों कुछ गुमनाम पत्रकारों को अपने नाम को सुर्खियों में लाने का मौका मिल गया…रवीश कुमार पर इन पत्रकारों के हमले से मुझे जलन की बू आ रही है…वो इसलिए कि… शायद रवीश के साथ जिन पत्रकारों ने अपना सफर तय किया था उन्हें वक्त के साथ उतनी शोहरत नहीं मिली जितनी उन्होंने ख्वाहिश पाल रखी थी… और रवीश ने रोज नए- नए मकाम हासिल कर अपनी एक अलग पहचान बनाई…

मैं ना तो रवीश का समर्थक हूं और ना ही आपका आलोचक,,,लेकिन मियां कुछ छुठभैय्ये पत्रकार तो मानों रवीश के पीछे एसे पड़ गए हैं जैसे दोषी रवीश हो उसका भाई नहीं….एक वो इंडिया टीवी वाले दीन दययाल उपाध्याय,,औहो माफ किजिएगा अभिषेक उपाध्याय जी… आप तो उसके पीछे एसे पड़ गए जैसे रवीश ने आपका बचपन में मेमना (बकरी का बच्चा) खोल लिया हो,,अरे अभिषेक भाई रामायण में कुभंकरण जब राम के हाथों मरने जा रहा था उसने कहा था की भाई भाई की भुजा (हाथ) होता है…लेकिन कोई अपना पेट कैसे नंगा करके दिखा दे…

मैं पूछना चाहता हूं उन पत्रकारों से जो पानी पी पी कर रवीश को कोस रहे हैं कि… अगर उनका भाई- बाप या रिश्तेदार कुछ गलत करता है,,,तो वो उतनी सच्चाई से उस खबर को दिखाएंगे जितनी ईमानदारी से रवीश पर निशाना साध रहे हैं….हां… संपादक की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन अगर रवीश के भाई ने कुछ गलत किया है तो उसकी सजा उसे कानून देगा,, इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं कि अगर किसी पत्रकार का भाई कहीं चोरी करता पकड़ा जाए तो पत्रकार भी चोर बन जाए,,,अब क्या… भाई की गलती ‘जिसे अभी साबित करना भी बाकी है’ की सजा रवीश को दी जाए… आप ये कह रहे हो? या फिर नैतिकता के आधार पर रवीश पत्रकारिता छोड़ दें ? क्या यही आपकी नैतिकता है…?

भई ऐसा है…अगर नैतिकता की बात की जाए तो पहले उस नैतिकता की तरफ भी झांक लें, जो कम-से-कम आप में भी नहीं दिखाई दे रही है…और अगर इसे गलत माना जाए तो फिर उनका क्या… जो पिछले कुछ महीनों ‘या फिर साल भी कह सकते हैं’ से  पत्रकारिता के सारे उसूलों को दरकिनार कर अपने फायदे का सौदा कर रहे हैं। आप समझदार हैं मेरा इशारा अच्छी तरह समझ गए होंगे…धन्यवाद 

राजेश कुमार
एंकर
चैनल वन न्यूज
rajesh.targotra@gmail.com

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रवीश कुमार सब करने ही लगेगा तो नंगों के बीच बदनाम कब होगा!

प्राइम टाइम को रामजस कॉलेज में बदलना खेल नहीं था

-रवीश कुमार-

गुरुवार सुबह नौ बजे जब हम मूलचंद फ्लाईओवर से एंड्र्यूज गंज केंद्रीय विद्यालय की तरफ उतर रहे थे, तभी कार की खिड़की से देखा कि थोड़ी दूर एक बुज़ुर्ग अपना नियंत्रण खोते हैं और स्कूटर से गिर जाते हैं। टक्कर कैसे लगी, यह तो नहीं देखा, मगर काफी तेज़ थी। वे सर के बल गिरते हैं और तभी ठीक पास से एक कार गुज़रती है। देखने से लगा कि कार ने सर कुचल दिया। मगर ऐसा नहीं हुआ। उनकी मदद के लिए वही कार सबसे पहले रूकती है। पल भर में वहाँ भीड़ बन जाती है और मेरी कार को रुकने के लिए जगह नहीं बनती है। काफी आगे जाकर हम रूकते हैं और दौड़ कर घटनास्थल की तरफ आते हैं।

टीवी वाला हूँ। हर समय टाइम के फ्रेम में रहता हूं। रामजस कॉलेज पर शो रिकार्डिंग करनी थी, एक दिमाग़ इसमें उलझा था कि इन सबमें उलझा तो शो के लिए टाइम नहीं मिलेगा। वापस चलते हैं, यहाँ लोग हैं वो अस्पताल ले जायेंगे। तब तक महसूस हुआ कि लोग देरी कर रहे हैं। सबने बुज़ुर्ग को घेर तो लिया था मगर पुलिस को किसी ने फोन नहीं किया। एंबुलेंस को फोन किसी ने नहीं किया। घायल के आसपास भीड़ बड़ी होती जा रही थी।

मुझे अपना टाइम छोड़ गोल्डन टाइम का ख़्याल आया। अगर आधे घंटे से कम समय के भीतर अस्पताल पहुँचा दिया जाए तो जान बच सकती है। बस अब मैं अपने ड्राईवर को पुकारने लगा। भीड़ के कारण गाड़ी काफी दूर थी। वो गाड़ी को बैक भी नहीं कर सकता था। हम इन्हें अस्पताल लेकर चलते हैं। देर मत कीजिये। उठाइये और कार तक ले चलिए। मैं मेडिकल कारण से उठा नहीं सकता था। दिमाग़ रास्ता खोज रहा था कि इतना भारी शरीर कार तक कैसे ले जायेंगे। तभी एक सैंट्रो कार जगह बनाती हुई वहाँ रूकती है। महिला चालक उतरती हैं। किसी तरह उन्हें कार में लादा गया और मैंने उन्हें ज़ोर से कहा कि मूलचंद अस्पताल ही ले जाना है। यही पास में है।

तब तक कार और बाइक की भीड़ इतनी बढ़ गई कि रास्ता बंद। अगर लोग भीड़ न बनाते तो मैडम अपनी कार ग़लत साइड से चलाकर दो मिनट के भीतर अस्पताल पहुँचा सकती थीं। उन्हें यू टर्न लेकर वापस जाना पड़ा। अब इस आपाधापी में उनसे एक ग़लती होने से रह गई। वे वापस मूलचंद फ्लाईओवर पर चढ़ने वाली थीं मगर मेरे ड्राइवर ने मना किया कि अभी मैं खुद किसी को लेकर इस रास्ते से अस्पताल गया था। मैडम ने उसकी बात मान ली वर्ना अस्पताल ले जाने में बीस मिनट लग जाते क्योंकि बहुत आगे जाकर यू ट्रर्न लेकर आना पड़ता। सबक है कि ऐसे मामलों में रास्ते को लेकर सजग रहें।

मगर मैंने वही ग़लती की जो मेरे ड्राईवर ने मैडम को नहीं करने दिया। मैं पीछे से अपनी कार चलाकर पहले अपनी पत्नी को छोड़ा और फिर अस्पताल आया। इसमें दस मिनट का समय लगा मगर एक अच्छी बात हुई। गोल्डन समय में अस्पताल पहुँचाने के कारण घायल की जान बच गई। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में डाक्टरों ने शांति से उन्हें भरती कर लिया। मुस्कुराते हुए एक सरदार जी डाक्टर मिले। बताया कि काफी चोट हैं मगर ठीक हैं। सब मुस्तैदी से लगे थे मुझे तो लगा था कि वे नहीं बचेंगे मगर बिस्तर पर अवाक लेटे थे। दर्द से क़राह रहे थे लेकिन जान बच गई थी। उनके ही फोन से बेटे अमित भाटिया को बता दिया कि आपके पिताजी ठीक लग रहे हैं मगर उनका एक्सीडेंट हुआ है। वे नोएडा से रवाना हुए तो कहा कि सावधानी से आइयेगा। हड़बड़ी में आपके साथ न कुछ हो जाए।

इस घटना के बारे में इसलिए लिखा क्योंकि हम कई ग़लतियाँ करते हैं। किसी की दुर्घटना हो तो तमाशा देखने के लिए कभी न रूकें। इरादा करके रूकें कि पल भर में अस्पताल पहुँचा देना है। बाकी लोग रूक कर आगे पीछे भीड़ न बनायें। इससे घायल को काफी नुक़सान हो सकता है। बाइक चलाते हैं तो ज़रा तमीज़ से चलायें। याद रखें कि आप सबसे कम सुरक्षित हैं। कई बार मन करता है कि बाइकर्स का वीडियो बनाकर उनके घर भेज दूँ। हेल्मेट अच्छा पहनें। मैंने साफ साफ देखा था कि वे सर के बल गिरे थे। जब किसी ने उनका हेल्मेट लाकर दिया तो उसमें कुछ नहीं हुआ था। उनकी जान बचने में हेल्मेट का बहुत बड़ा योगदान रहा होगा।

पुलिस और एंबुलेंस को फोन करें। मैंने देखा कि किसी ने नहीं किया है। सौ नंबर पर फोन किया। फोन उठाने वाले ने काफी अच्छे से बात की और पल भर में पुलिस के फोलो अप फोन आने लगे। किसी ने मुझे पुलिसिया अंदाज़ में नहीं पूछा। दोस्त की तरह अच्छे से बात कर रहे थे।

इन सबमें एंबुलेंस वाले का फोन तब आया जब मैं पत्नी को छोड़ अस्पताल के लिए लौट रहा था। तब तक गोल्डन टाइम का अच्छा ख़ासा हिस्सा निकल चुका था। दिल्ली के जाम में एंबुलेंस कितनी जल्दी आएगा, इसका हिसाब लगाना चाहिए। ये फैसला आपको घटनास्थल पर करना होगा। अदालत कहती है कि आप घायल को अस्पताल पहुँचायें। आपसे पुलिस कुछ नहीं पूछेगी। हममें से किसी से नहीं पूछा। तो आप इस पहलू से बेख़ौफ़ किसी की भी मदद कीजिये । अस्पताल तक ले जाने वाली महिला भी डाक्टर थीं। जल्दी में हम नाम पूछना भूल गए मगर यह क्या कम है कि दिल्ली में लोग मदद के लिए रूकते हैं।

इन सब बातों को लिखने का एक मक़सद है। ताकि पढ़कर उन तमाम ग़लतियों को जान सकें जो अक्सर सभी दुर्घटनास्थल के आसपास करते हैं। वहाँ रूकने वाले सभी लोग बुरी नीयत से नहीं रूकते होंगे। मगर सब अच्छी नीयत के साथ अपराधबोध से भी रूकते हैं कि मदद के लिए नहीं रूकें। चार पाँच लोग रूक गए तो बाकी को आगे बढ़ जाना चाहिए मगर चार पाँच वहीं रुकें जो मदद करना चाहते हों। दिल्ली की सड़क कारों से भर गई है। इसमें न पुलिस समय से आ सकती है न एंबुलेंस।

ख़ैर भाटिया जी बच गए। मेरे समय का भयंकर नुक़सान हुआ। उसी दिन कोर्ट फिल्म के एक्टर वीरा साथीदार जी मिलने आए थे। कोर्ट एक शानदार फिल्म है। उनसे काफी कुछ बात करनी थी मगर दो चार लाइन की मुलाकात के बाद मैंने हाथ खड़े कर दिये कि आपको जाना होगा। मैं उन्हें सुन रहा था और अपनी स्क्रिप्ट लिख मिटा रहा था। फिर लगा कि नहीं होगा तो साथीदार जी से माफी मांग ली कि सर नहीं बात कर सकता। मुझे शो के लिए लिखना है। रिसर्च करना है। एक घंटे में रिकार्डिंग है।

मैंने इतने महान कलाकार और लोगों के लिए लड़ने वाले को इतनी सहजता और विनम्रता से जाते नहीं देखा। वे किसी आदिवासी महिला के इंसाफ़ के लिए आए थे जिसे पहले पुलिस अगवा करके ले गई फ़िर जो लोग महिला को बचाने के लिए आगे गए उन्हें ही पुलिस ने महिला के अगवा करने के आरोप में बंद कर दिया। कहानी भी सुनाई और लिखकर दिया भी। दो मिनट इस पर भी बात हो गई कि आप आदिवासी महिला के लिए दिल्ली आ गए मगर कोई पत्रकार दिल्ली से वहाँ नहीं जाएगा। क्योंकि सबको सरकार के प्रमुख की सेवा करनी है। फ़र्ज़ी फ़र्ज़ी एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने होते हैं। भयानक कहानी थी वो। आदिवासी महिलाएँ शायद भारत माता की कैटेगरी की नहीं हैं वर्ना इस कहानी को लेकर आंदोलन हो रहे होते। अब सब तो रवीश कुमार नहीं करेगा न। सब करने ही लगेगा तो नंगों के बीच बदनाम कब होगा। मीडिया का विकल्प बने फेसबुक के एक्टिविस्ट क्या करेंगे। मेरी जाति खोजने के अलावा भी तो कुछ कर सकते हैं।

बहरहाल, अब जब प्राइम टाइम को रामजस कालेज बनाने की तरफ मुड़ा तो घड़ी ने हाथ खड़े कर दिये। सारा समयनिकल चुका था। दो दो बार रिकार्डिंग का टारगेट मिस कर गया। इसी अफ़रातफ़री में शो का फार्मेट भी सोच रहा था, बात कर रहा था और लिख रहा था। कुछ याद आ रहा था, कुछ भूल रहा था। की बोर्ड पर उँगलियाँ राकेट की तरह भाग रही थीं। प्रिया इधर से कुछ बता रही थी तो उधर से कुछ। फुटेज देख रही थी तो किसी से बात कर रही थी। दो बजे और चार बजे की रिकार्डिंग की डेडलाइन मिस करने के कारण स्टुडियो की बुकिंग हाथ से चली गई। कोई स्टुडियो ख़ाली नहीं था।

इस बीच स्क्रिप्ट लिख लिया। कोई पंद्रह मिनट भी नहीं लगा होगा स्क्रिप्ट लिखने में। सुशील महापात्रा भाग भाग कर लोगों का इंटरव्यू ले आया। दो लोगों की रिकार्डिंग नहीं मिली क्योंकि जाम में फँसने के कारण सुशील उन तक नहीं पहुँच सका। इससे शो की टाइमिंग ख़राब हो गई। फिर पूरी स्क्रीप्ट पलट दी। ताकि बाद में आने वाली चीज़ें बाद में जोड़ी जा सकें। तभी ख़्याल आया कि विक्रमादित्य से व्हाट्स अप पर रिकार्डिंग मँगा लेते हैं।रोहिणी पहुँचना संभव नहीं है। साँस अटक गई थी। क्योंकि साढ़े चार बजे के लिए जहाँ कैमरा तैयार था वो हाथ से चला गया। वहाँ किसी और शो की रिकार्डिंग शुरू हो चुकी थी। अब लगा कि रामजस कॉलेज नहीं हो पाएगा।

तभी पाँच बजे हमारी प्रोड्यूसर को एक तरकीब सूझी। स्पोर्ट्स एंकर अफशां को दूसरे चैनल के स्टुडियो में भेज दिया और उनकी जगह मैं अपने स्टुडियो में। सब भयंकर तनाव में। मुझे बीस मिनट का ही समय मिला। एक ही डायरेक्टर अफशां को भी डायरेक्ट कर रहा था और मेरी रिकार्डिंग भी। समझिये एक डायरेक्टर एक ही समय में दो फ़िल्में डायरेक्ट कर रहा हो। हम साथ साथ ग्राफिक्स एनिमेशन की कमियों को भी ठीक कर रहे थे। जो लिखा था वो उसी भाव से पढ़ना भी था।

पढ़ ही रहा था कि किसी ने बताया कि सुमंगला दामोदरन आफिस आ रही हैं। वो आकर अपनी रिकार्डिंग देंगी और छह मिनट का कर लेंगे। चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई। यही कि अब शो हो जाएगा। वरना शो में कुछ और रिपोर्ट शामिल करनी पड़ जाती तब पूरा शो रामजस कॉलेज नहीं बन पाता। इस भागीदौड़ी में बहुत सी बातें भूल गया। कई वीडियो देख भी नहीं पाया। शायद उनका बेहतर इस्तमाल हो सकता था।

सुबह नौ बजे से साढ़े पाँच बजे तक हम बेख़ुदी के आलम में रहे। पता ही नहीं चला कि हमने क्या किया। मैं अपने शो के बारे में कम बात करता हूँ। बहुत कम याद रखता हूँ। काम साधारण ही होते हैं और मैं यूँ ही चलते चलते करके घर निकल जाता हूँ। इस बार लिख रहा हूँ ताकि आपको पता चले कि प्राइम टाइम को रामजस कालेज बना देने की कल्पना तरकीब से नहीं आती है। ज़िद और जुनून से आती है। एक फिल्मी संवाद है। दिल पर मत लीजियेगा। “कह देना कि छेनू आया था।” यही मैं हूँ। हारूँगा भी तो हुकूमत की ताकत से। ये क्या कम बड़ी बात है कि हुकूमत की साँस फूल जाती है।वो अफवाहों की फौज से मुझसे लड़ती है। दारोग़ाओं की फौज से लड़ती है। मेरी बातों और सवालों को सुनकर उसके होश उड़े रहते हैं। उसके समर्थक बेहोश हो जाते हैं। बाकी मार तो मच्छर भी दिया जाता है दुनिया में। मेरी हार होगी तो यही मेरी जीत होगी। जीत जाऊंगा तो उनकी हार होगी ही होगी।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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बालभोगी बनाम भुक्तभोगी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े रहे एक छात्रनेता पर छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन (NSUI) से जुड़े छात्रनेता ने एक नारा उछाला। बालभोगी, बालभोगी। विद्यार्थी परिषद के लोगों ने दूसरा नारा निकाल लिया। भुक्तभोगी, भुक्तभोगी। जब तक बालभोगी का आरोप था वो मजे का विषय था। परिषद में काम करने वाले उस समय के हर कार्यकर्ता का मजाक ये कहकर उड़ाया जा सकता था।

यहां तक कि संघी के नाम पर अभी भी बहुत से- सामान्य और चरित्रहीन टाइप के भी- बुद्धिजीवी ये आरोप लगाकर दांत चियार देते हैं। संघी होने भर से लोगों पर ऐसे आरोप ये तथाकथित बुद्धिजीवी लगा देते थे और त्याग, संयम से जीने वाले प्रचारकों का मजाक उड़ा देते थे। संघियों की सरकार आने के बाद थोड़ा ठिठकते हैं, डरते हैं, ये कहने से। और वही संघी जब पलटकर बालभोगी का आरोप लगाने वाले को भुक्तभोगी साबित करने पर जुट जाता है, तो चिट चिट की आवाज सुनाई देने लगती है।

ऐसा ही कुछ पत्रकार रवीश कुमार के भाई पर सेक्स रैकेट में शामिल होने के आरोपों पर भी दिख रहा है। बड़का-बड़का पत्रकार, बुद्धिजीवी लोग रवीश पर आरोप न लगाने की बात कर रहे हैं। इससे मैं भी सहमत हूं कि पत्रकार रवीश कुमार की पत्रकारिता अपनी जगह और उनके भाई ब्रजेश पांडे की कांग्रेसी नेतागीरी अपनी जगह। लेकिन, दुनिया के लिए आइना लेकर घूमने पर कभी तो आइना आपकी भी शक्ल उसमें दिखा ही देगा। रवीश जी को ये बात समझनी चाहिए। बस इत्ती छोटी सी ही बात है। और तो जो है सो तो हइये हैं।

कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने यह टिप्पणी अपने एफबी वॉल पर प्रकाशित की है.

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रवीश कुमार को बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांग देना चाहिए!

Nitin Thakur : मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा है कि ये सरकार रवीश कुमार को इतनी मोहलत क्यों दे रही है। उन्हें तो बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांगा जाना चाहिए। आखिर किसी पत्रकार के भाई का नाम सेक्स रैकेट चलाने में आए और फिर भी पत्रकार को खुला घूमने दिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है? पहले तो उनके भाई ब्रजेश पांडे ने लहर के खिलाफ जाकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली.. ऊपर से टिकट लेकर विधायकी लड़ने का जुर्म किया.. इसके बाद भी ना ब्रजेश पांडे में राष्ट्रवाद ने उफान मारा और ना ही उन्हें देश के हिंदुओं की कोई फिक्र हुई.. कांग्रेस में ही उपाध्यक्ष का पद लेकर राजनीति जारी रखी।

किसी पत्रकार का भाई राजनीति करे ये भले गैर कानूनी ना हो लेकिन पत्रकार की नौकरी के लिए मुफीद नहीं। इससे पत्रकार पर ठप्पा लगना तय है, भले वो ज़िंदगी भर उसी पार्टी की लेनी देनी करता रहा हो। पत्रकार के रिश्तेदारों को ठेकेदारी भी नहीं करनी चाहिए और ना ही ऊंची नौकरी में जाना चाहिए.. हो ना हो ज़रूर पत्रकार ही ठेके दिलवा रहा होगा.. और वो ही नौकरी की भी सिफारिश कर रहा होगा। इस सबके बाद अगर पत्रकार का कोई दूर या पास का रिश्तेदार किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए.. फिर चाहे वो छोटा हो या बड़ा तो भी ये पत्रकार की ही गलती है।

आखिर उसके घर के सभी लोग संस्कारी क्यों नहीं हैं ? क्या हक है किसी ऐसे आदमी को पत्रकारिता करने का जिसके घरबार-परिवार में किसी का नाम किसी कानूनी मामले में आ जाए? इस देश में बिज़नेस, सरकारी नौकरी और राजनीति भले किसी नैतिक दबाव से मुक्त हो कर की जा सकते हों लेकिन पत्रकारिता करने के नियम बेहद कड़े हैं और मई 2014 के बाद तो ये और भी मुश्किल हो गए हैं। खैर, नया फैशन ये है कि जो पत्रकार आपके रुझान के मुफीद ना पड़ता हो और लड़कीबाज़ी से लेकर कमीशनखोरी तक के इल्ज़ाम उस पर ना टिकते हों तो फिर पत्रकार के रिश्तेदारों का कंधा सीधा कीजिए और उस पर बंदूक रखकर पत्रकार को गोली मार दीजिए।

यहां टीवी पर फिरौती लेते पत्रकार देखे गए हैं.. नकली स्टिंग चलाकर चैनल बैन करवा डालने वाले पत्रकार देखे गए हैं.. और ना जाने कहां-कहां क्या-क्या करनेवाले पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान भी देखे गए हैं (लिस्ट बनानी शुरू करूं तो वो भी शर्मसार होंगे जो कल अपनी पोस्टों में नैतिक ज्ञान बघार रहे थे.. उनके संस्थानों में लड़कियों के साथ क्या कुछ होता रहा है इन करतूतों की अधिक जानकारी के लिए Yashwant भाई का भड़ास पढ़ा जा सकता है)। इस देश ने फिरौती वसूलने के बाद कई साल तक अपनी इमेज मेकिंग के लिए अति राष्ट्रवादी और धार्मिक उन्माद फैलानेवाली पत्रकारिता करनेवालों को माफ किया है पर मैं देश की जनता से मांग करता हूं कि ऐसे पत्रकार को माफ ना किया जाए जिसका भाई अपने प्रदेश में मर चुकी एक पार्टी से राजनीति तो करता ही है, साथ में उस पर किसी नेता की ही बेटी आरोप लगा दे। वैसे मामला और निशाना दोनों समझनेवाले सब समझ रहे हैं लेकिन दिक्कत दो तरह के लोगों के साथ है। एक तो वो हैं जो किसी भी हाल में महिलावादी या दलितवादी दिखने को मजबूर हैं ( वजह वो ही जानें) और दूसरे वो जिन्हें मामले में दिलचस्पी कम बल्कि पत्रकार के चीर हरण में आनंद ज़्यादा आ रहा है (वजह सबको पता है)।

किसी को डिफेंड करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन रवीश को करूंगा। उन्हें इसलिए नहीं करूंगा कि मैं उनका कोई फैन-वैन हूं बल्कि इसलिए करूंगा क्योंकि एजेंडेबाज़ी का ये खेल यहीं नहीं थमनेवाला। अगर रवीश कुमार को गिराए जाने में कायमाबी मिल गई तो फिर इस्टेब्लिशमेंट के सामने खड़ा हर पत्रकार इसी रणनीति से गिराया जाएगा। अपने यारों,दोस्तों, रिश्तेदारों के कारनामों से अपना चरित्र जज होने से बचाने के लिए हर छोटे- बड़े पत्रकार को करियर की शुरूआत में ही अखबार में विज्ञापन निकलवाना पड़ेगा। उसमें पत्रकार घोषित करेगा कि, ”आज और अभी से मैं अपने सभी नाते-रिश्तेदारों से सारे संबंध खत्म कर रहा हूं। इनके किए-अनकिए के ज़िम्मेदार यही होंगे, मैं नहीं। मेरी निष्ठाओं को इनकी करतूतों पर ना परखा जाए।” ये घोषणा भले इस मुल्क के नेताओं को करने के लिए मजबूर ना होना पड़े.. नौकरशाहों से ना कराई जाएं लेकिन पत्रकारों से ज़रूर करवाएं.. आखिर देश के सारे फैसले वो ही तो लेेते हैं और आपकी ज़िंदगी के ना जाने कितने फैसले पत्रकार ही प्रभावित कर रहे हैं! पत्रकार ना हों तो देश आज ही चांद पर कॉलोनी बना ले। आपके खातों में 15 लाख भी आ जाएँ। समाजवाद का सपना ये पत्रकार प्रजाति ही रोक कर खड़ी है।

अब अंत में एक और बात.. लड़की ने आरोप लगाए हैं तो उसकी एफआईआर भी दर्ज हुई.. तुरंत कार्रवाई करते हुए मामला सीआईडी के हाथों में दिया गया। एसआईटी ने जांच करते हुए लड़की के आरोपों को सही भी पाया। नीतीश कुमार की पुलिस की तारीफ होनी चाहिए। इतनी जल्दी कार्रवाई गुजरात के कच्छ में नहीं हुई जहां पर एक लड़की ने बीजेपी के कई आला नेताओँ पर लड़कियां सप्लाई करने का आरोप लगाया था और बाकायदा अपनी वीडियो क्लिप के साथ सामने आई थी। उसने रैकेट के बारे में सबूत भी दिए थे। यहां मसला और ही कुछ है।

लड़की ने 22 दिसंबर को एफआईआर में एक लड़के निखिल, उसके पिता और भाई का नाम डलवाया। भाई पर जातिसूचक गाली देने के आरोप भी लगाए।याद रहे कि आरोप छेड़छाड़ के थे, रेप के नहीं। यहां तक ब्रजेश पांडे कहानी में नहीं हैं। खैर, पुलिस एक हद तक दबाव डालकर अक्सर एफआईआर हल्की करा देती है इसलिए बाद में मजिस्ट्रेट के सामने अकेले में बयान लिए जाते हैं और वही आखिरी माने भी जाते हैं। दो दिन बाद कोर्ट में यही लड़की धारा 164 के तहत बयान देती है और निखिल नाम के मुख्य अभियुक्त पर शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप लगाती है। यहां भी ब्रजेश पांडे का नाम कहीं नहीं है। 30 दिसंबर को सीआईडी ने मामला हाथ में लिया मगर पीड़िता ने बार-बार बयान देने के बावजूद ब्रजेश पांडे का नाम नहीं लिया। सीआईडी ने जो एसआईटी बनाई उसकी जांच में एक महीने के बाद लड़की ने एक पार्टी में ब्रजेश पांडे से मिलने और छेड़छाड़ के इल्ज़ाम लगाए।

बिहार के टीवी पत्रकार Santosh Singh ने मामले की तफ्तीश की है। सारे कागज़ निकलवाए और मामले की प्रक्रिया देखी। उन्होंने फेसबुक पर ही सारी जानकारी तारीख के हिसाब से दी है और ये भी लिखा है कि पीड़िता ने ब्रजेश पांडे को फेसबुक पर देखा कि ये निखिल की फ्रेंड लिस्ट में हैं। पीड़िता का कहना है कि इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो। पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है। पहली बार उन्होनें ब्रजेश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया, निखिल की अवारागर्दी की चर्चा खूब की। उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई। और इस बार उसकी गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ, जिसमें उन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी, निखिल ने पीड़िता को कोल्डड्रिंक पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे …मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है। लेकिन उसने ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है, ऐसा बयान नही दिया।

वैसे मैंने भी शिकायतकर्ता लड़की के आरोप सुने हैं। पत्रकार ने पूछा कि सैक्स रैकेट चलाने वाली बात कैसे कह सकती हैं तो उसने कहा कि चूंकि निखिल ने मुझे ब्रजेश के साथ दिल्ली जाने को कहा था तो मुझे उससे लगता है। लड़की ने जो पत्रकार से कहा उससे ये भी मालूम चलता है कि वो निखिल से शादी करना चाहती थी और जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तब वो उसके पिता से मिलने पहुंची थी। वैसे लड़की की पहचान नहीं खोलनी चाहिए लेकिन अब चूंकि वो खुद मीडिया में इंटरव्यू दे रही है और बीजेपी नेताओं ने काफी हद तक पहचान खोल दी है तो इतना तो जान ही लीजिए कि उसका बैकग्राउंड कमज़ोर कतई नहीं है, अच्छा खासा पॉलिटिकल है तो संभावनाएं और आशंकाएं खूब हैं। बहरहाल लड़की का मीडिया ट्रायल करना गलत है, भले वो खुद मीडिया तक आई है.. लेकिन उतना ही गलत उस पत्रकार का मीडिया ट्रायल भी है जो खुद इसमें कहीं से शामिल नहीं। हां, अगर किसी को मज़ा ही रवीश कुमार को फंसाने में आ रहा हो तो बात अलग है। केजरीवाल को काबू करने के सिलसिले में जब केंद्र उनके खिलाफ कुछ ना ढूंढ सका तो विधायकों को जिस बेशर्मी से औने-पौने मामलों में जेल भेजा गया वो सबके सामने है.. ये अलग बात है कि ऐसे ही मामलों में फंसे होने के बावजूद ना स्मृति ईरानी को छेड़ा गया और ना ही निहालचंद को।

सोशल मीडिया के चर्चित और जनपक्षधर लेखक नितिन ठाकुर की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

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रवीश के इस प्राइम टाइम शो को हम सभी पत्रकारों को देखना चाहिए

एनडीटीवी इंडिया पर कल रात नौ बजे प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश कुमार ने पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर एक परिचर्चा आयोजित की. इस शो में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी और प्रकाश के रे के साथ रवीश ने मीडिया और पत्रकार पर जमकर चर्चा की.

आजकल भारत में जब सत्ता परस्त रिपोर्टिंग को ही पत्रकारिता माना जाने लगा है और सरकार पर सवाल करने वालों को संदेह की नजर से देखा जाता है, रवीश का यह शो हम सभी को एक बार फिर से पत्रकारिता की मूल भावना, मूल आत्मा की तरफ ले जाने का काम किया है और अपने भीतर झांकने को प्रेरित किया है. यह चर्चित प्राइम टाइम डिबेट देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=eDUADSnA7so

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर क्या कहते हैं, पढ़िए….

Nitin Thakur : रवीश कुमार अकेले हैं जो टीआरपी को ताक पर रख दर्शक और पाठक को भी ऑन एयर और ऑन मंच लताड़ सकते हैं। इसके लिए जो चाहिए उसे ‘ईमान’ कहते हैं। ये सुविधा हर किसी को नहीं मिलती। इसे हासिल करना पड़ता है मेहनत करके।

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बरखा दत्त और रवीश कुमार का ईमेल व ट्वीटर एकाउंट हैक

रवीश कुमार ने ईमेल-ट्वीटर एकाउंट हैक किए जाने को लेकर अपने ब्लाग नई सड़क पर एक पोस्ट का प्रकाशन किया है, जो इस प्रकार है…

हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे..

रवीश कुमार

मेरे हमसफ़र दोस्तों….

किसी को मेरे ईमेल और फोन में क्या दिलचस्पी हो सकती है वो हैक करने की योजना बनाएगा। शनिवार की मध्यरात्रि मेरी वरिष्ठ सहयोगी बरखा दत्त का ईमेल हैक कर लिया गया। उनका ट्वीटर अकाउंट भी हैक हुआ। उसके कुछ देर बाद मेरा ट्वीटर अकाउंट हैक कर लिया गया। उससे अनाप शनाप बातें लिखीं गईं। जब मैंने एक साल से ट्वीट करना बंद कर दिया है तब भी उसका इतना ख़ौफ़ है कि कुछ उत्पाति नियमित रूप से गालियां देते रहते हैं। ये सब करने में काफी मेहनत लगती है। एक पूरा ढांचा खड़ा किया जाता होगा जिसके अपने ख़र्चे भी होते होंगे। ढाई साल की इनकी मेहनत बेकार गई है मगर उस डर का क्या करें जो मेरा नाम सुनते ही इनके दिलों दिमाग़ में कंपकपी पैदा कर देता है। ज़रूर कोई बड़ा आदमी कांपता होगा फिर वो किसी किराये के आदमी को कहता होगा कि देखता नहीं मैं कांप रहा हूं। जल्दी जाकर उसके ट्वीटर हैंडल पर गाली दो। दोस्तों, जो अकाउंट हैक हुआ है उस पर मेरा लिखा तो कम है, उन्हीं की बदज़ुबान और बदख़्याल बातें वहां हैं। मैं चाहता हूं कि वे मुझसे न डरें बल्कि मेरा लिखा हुआ पढ़ें।

मेरी निजता भंग हुई है। मेरा भी ईमेल हैक हुआ है। बरखा दत्त की भी निजता भंग हुई है। मैं सिर्फ रवीश कुमार नहीं हूं। एक पत्रकार भी हूं। कोई हमारे ईमेल में दिलचस्पी क्यों ले रहा है। क्या हमें डराने के लिए? आप बिल्कुल ग़लत समझ रहे हैं। ये आपको याद दिलाया जा रहा है कि जब हम इन लोगों के साथ ऐसा कर सकते हैं तो आपके साथ क्या करेंगे याद रखना। पत्रकारों को जो भी ताकतें डराती हैं दरअसल वो जनता को डराती हैं। अगर हमारी निजता और स्वतंत्रता का सवाल आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है तो याद रखियेगा एक दिन आपकी भी बारी आने वाली है। जिस लोकतंत्र में डर बैठ जाए या डरने को व्यापक मंज़ूरी मिलने लगे वो एक दिन ढह जाएगा। आपका फर्ज़ बनता है कि इसके ख़िलाफ़ बोलिये। डरपोकों की बारात बन गई है जो किसी मुख्यालयों के पीछे के कमरे में बैठकर ये सब काम करते हैं। अभी तो पता नहीं है कि किसकी हरकत है। जब राहुल गांधी के बारे में ठोस रूप से पता नहीं चल सका तो हम लोगों को कौन पूछ रहा है। आख़िर वो कौन लोग हैं, उन्हें किसका समर्थन प्राप्त है जो लगातार हमारे ट्वीटर अकाउंट पर आकर गालियां बकते हैं। अफवाहें फैलाते हैं। आपको बिल्कुल पता करना चाहिए कि क्या यह काम कोई राजनीतिक पार्टी करती है। ऐसा काम करने वाले क्या किसी राजनीतिक दल के समर्थक हैं। पता कीजिए वर्ना आपका ही पता नहीं चलेगा।

आप सोचिये कि आपका पासवर्ड कोई चुरा ले। आपके ईमेल में जाकर ताक झांक करे तो क्या आपको ठीक लगेगा। क्या आप ऐसी साइबर और राजनीतिक संस्कृति चाहेंगे? आपका जवाब हां में होगा तो एक दिन आपके साथ भी यही होगा। हैकरों ने बता दिया है कि भारत साइबर सुरक्षा के मामले में कमज़ोर है। हैकिंग पूरी दुनिया में होती है लेकिन यहां की पुलिस भी इसके तार को जोड़ने में अक्षम रहती है। साइबर सुरक्षा के नाम पर अभी तक दो चार चिरकुट किस्म के नेताओं के ख़िलाफ़ लिखने वालों को ही पकड़ सकी है। वो नेता चिरकुट ही होता है जो अपने ख़िलाफ़ लिखी गई बातों के लिए किसी को अरेस्ट कराता है या अरेस्ट करने की संस्कृति को मौन सहमति देता है। जब हम लोगों के अकाउंट हैक किये जा सकते है तो ज़रूरत है कि लोगों को बेहतर तरीके साइबर सुरक्षा के मामले में जागरूक किया जाए। गांव देहात के लोगों के साथ ऐसा हुआ तो उन पर क्या बीतेगी। हमारा तो लिखा हुआ लुटा है, अगर ग़रीब जनता की कमाई लुट गई तो मीडिया ही नहीं जाएगा। ज़्यादा से ज्यादा किसी रद्दी अख़बार के कोने में छप जाएगा जिसके पहले पन्ने पर सरकार का ज़रूरत से ज़्यादा गुणगान छपा होगा।

मैं ढाई साल से इस आनलाइन सियासी गुंडागर्दी के बारे में लिख रहा हूं। आख़िर वे कितने नकारे हो सकते हैं जो किसी का ईमेल हैक होने पर खुशी ज़ाहिर कर रहे हैं। क्या अब हमारी राजनीति और फोकटिया नेता ऐसे ही समर्थकों के दम पर घुड़की मारेंगे। ये जिस भी दल के समर्थक या सहयोगी है उसके नेताओं को चाहिए कि अपने इन बीमार सपोर्टरों को डाक्टर के पास ले जाएं। इनकी ठीक से क्लास भी लें कि ये ढाई साल से मेरे पीछे मेहनत कर रहे हैं और कुछ न कर पाये। अगर किसी नेता को दिक्कत है तो ख़द से बोले न, ठाकुर की फौज बनाकर क्यों ये सब काम हो रहा है। अगर इतना ही डर हो गया है तो छोड़ देंगे। लिखा तो है कि अब छोड़ दूंगा। ऐश कीजिए। चौराहे पर चार हीरो खड़ा करके ये सब काम करने वाले इतिहास के दौर में हमेशा से रहे हैं। इसलिए भारतीय साहित्य संस्कृति में चौराहा बदमाश लंपटों के अड्डों के रूप में जाना जाता है। हमारी भोजपुरी में कहते है कि लफुआ ह, दिन भर चौक पर रहेला। ज़ाहिर है अकाउंट हैक होने पर इन जश्न मनाने वाले लोगों के बारे में सोच कर मन उदास हुआ है।ये घर से तो निकलते होंगे मां बाप को बता कर कि देश के काम में लगे नेताओं का काम करने जा रहे हैं। लेकिन वहां पहुंच कर ये गाली गलौज का काम करते हैं। आई टी सेल गुंडो का अड्डा है। दो चार शरीफों को रखकर बाकी काम यही सब होता है। लड़कियां ऐसे लड़कों से सतर्क रहें। इनसे दोस्ती तो दूर परिचय तक मत रखना। वो लोग भी बीमार हैं जो ऐसे लोगों का समर्थन करते हैं।

तो दो बाते हैं। एक तो किसी का भी अकाउंट हैक हो सकता है। हैक करने वाला अक्सर दूर देश में भी बैठा हो सकता है। आई टी सेल इस तरह का काम करने वालों को ठेका भी दे सकता है. आपको ताज़िंदगी मालूम न चलेगा। मैं तो यह भी सोच कर हैरान हूं कि आख़िर वो कौन लोग होंगे जो बरखा दत्त का ईमेल पढ़ना चाहेंगे। मेरा ईमेल पढ़ना चाहेंगे। अगर इतनी ही दिलचस्पी है तो घर आ जाइये। कुछ पुराने कपड़े हैं, धोने के लिए दे देता हूं। जाने दीजिए, समाज में ऐसे लोग हमेशा मिलेंगे लेकिन आप जो खुद को चिंतनशील नागरिक समझते हैं, इस बात को ठीक से समझिये। हमारे बाहने आपको डराया जा रहा है। हमारा क्या है। फिर से नया लिख लेंगे। आप नहीं पढ़ेंगे तो भी लिख लेंगे। हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे। हम लकीर हैं। जहां खींच जाते हैं और जहां खींच देते हैं वहां गहरे निशान पड़ जाते हैं। सदियों तक उसके निशान रहेंगे। मैं किसी के बोलने देने का इंतज़ार नहीं करता हूं। जो बोलना होता है बोल देता हूं। कुलमिलाकर निंदा करते हैं और जो भी भीतर भीतर गुदगुदा रहे हैं उन्हें बता देते हैं कि आप एक बेहद ख़तरनाक दौर में रह रहे हैं। आपके बच्चे इससे भी ख़तरनाक दौर में रहेंगे। पासवर्ड ही नहीं, राजनीतिक निष्ठा भी बदलते रहिए। साइबर और सियासत में सुरक्षित रहने के लिए आप इतना ही कर सकते हैं। इतना कर लीजिए।

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गुंडों का रवीश कुमार को धमकाना… एबीपी न्यूज-आजतक जैसे चैनलों को पब्लिक का दुःख न दिखना

Virendra Yadav : तीन दिनों से लगातार देख रहा हूँ एनडीटीवी पर. रवीश कुमार अपनी टीम के साथ बैंकों के सामने लगी कतारों, नोटों को लेकर अफरा तफरी और आम जनता की तकलीफों को ग्राऊंड जीरो से प्राईम टाईम रिपोर्ट में पेश कर रहे हैं. हर कहीं दो चार लोग आकर उन्हें धमकाते हुए यह कहते दीखते हैं कि ‘जनता खुश है, सब ठीक है आप गलत रिपोर्ट पेश कर रहे हो’. आज बुलन्दशहर की रिपोर्टिंग के दौरान यही हुआ. उद्विग्न रवीश को एनडीटीवी के दर्शकों से यह कहना पड़ा कि ‘अगर यही सब चलता रहा तो जल्द ही टीवी पर आप सच्चाई नहीं देख पायेंगे’. सच का गला घोंटने की यह दबंगई हिटलर के दौर के उन ‘ब्राउन शर्ट’ दस्तों की याद दिलाती है जो फासीवाद के सफरमैना की भूमिका में थे. सचमुच हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. इन पदचापों को न सुनने की भूल आत्मघाती होगी.

शम्भूनाथ शुक्ल : कल प्राइम टाइम में बुलंदशहर की दुर्दशा देख दिल दहल उठा। आम लोग परेशान हैं कोई अफसर, नेता या अमीर नहीं। दिन-दिन भर लाइन लगाते हैं और नंबर आने पर कैश ख़तम। ऊपर से कुछ गुंडे आकर रवीश कुमार को वहां से जाने पर विवश कर देते हैं। ज़ी, एबीपी और आजतक पता नहीं कौन-सी रिपोर्टिंग कर रहे हैं जो उन्हें पब्लिक का दुःख दिखता नहीं।

Sarvapriya Sangwan : इस बीच जब ये खबर आ रही है कि यूपी सरकार ने कल रवीश कुमार की प्राइम टाइम रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए खोड़ा के एसबीआई बैंक में काउंटर बढ़ा दिए और मोबाइल एटीएम का इंतज़ाम किया है तब मैं पिछले दो दिन की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव को लिखने बैठी हूँ। बुधवार को खोड़ा में रवीश कुमार के साथ मैं भी रिपोर्टिंग पर गयी थी। वहां हमने देखा और रवीश ने भी कई बार दोहराया कि जैसे ही कोई नोटबंदी की वजह से आ रही परेशानियों पर कुछ कहता है तो कहीं से एक दबंग आवाज़ आती है कि क्या हो गया परेशानी है तो, मोदी जी ने ठीक किया। लोग अपनी बात फिर से संकोच के साथ शुरू करते हैं कि हां, हम भी साथ हैं लेकिन खाने को पैसे नहीं हैं। कल जब शूट खत्म हुआ तो दो बाइक सवार आये और रवीश से बोले कि आप ही के चैनल पर भीड़ दिख रही है बैंकों के सामने, कुछ और भी दिखाइए। उसका बोलना आरोप जैसा लग रहा था। 93% गाँवों में बैंक ही नहीं है, देश की बैंकिंग सिस्टम की हालत साफ़ नज़र आ रही है और फिर भी पता नहीं कौनसे सुहाने सपने दिखाने की उम्मीद कर रहे हैं ऐसे लोग। क्या मीडिया जनता का माइक नहीं होनी चाहिए? क्या वो सिर्फ सरकार और राजनीतिक दलों को प्रेस कांफ्रेंस दिखाने के लिए है? मैं नहीं जानती कि ऐसे लोग एक न्यूज़ चैनल पर और क्या देखना चाहते हैं। शायद, बागों में बहार, वो भी बेमौसम।

आज बुलंदशहर पहुंचे। जिस बैंक में गए, वो 16 गाँवों में अकेला बैंक था, लोग शिकायत करने लगे। हमारी गाड़ी के पीछे एक गाड़ी खड़ी थी जिस पर वीआईपी का स्टीकर लगा था। लोग अपनी समस्या कह ही रहे थे तभी एक व्यक्ति वहां आया जो पहले से उस भीड़ में नहीं था। उसने रवीश को कहा कि परेशानी है तो क्या हुआ, बॉर्डर से ज़्यादा नहीं है, बॉर्डर पर 80% जाट मरते हैं और मैं भी जाट हूँ। कल आरोप की तरह बात की गयी और आज ये व्यक्ति धमकाने लगा, अपने साथ कुछ लड़कों को लाया था और उनके साथ मिलकर मोदी मोदी चिल्लाने लगा। हम बिगड़ते हालात को देख कर वहां से निकल गए और ये व्यक्ति भी बिना पैसा लिए या बैंक की लाइन में लगे वहां से अपनी स्कूटी पर चला गया।

वक़्त कुछ ऐसा ही है कि जान कोई दे रहा है और उसकी जान की कीमत उसकी जाति के लोग घर बैठे वसूल रहे हैं। बिना कुछ किये। गुंडागर्दी करते हुए आप बता रहे हैं कि जाट हैं तो आप उस जाति की बेइज़्ज़ती ही कर रहे हैं।  फिर हम एक अनाजमंडी पहुंचे, जहाँ लोग यूरिया खरीदने के लिए लाइन लगाये हुए थे, किसी ने बताया कि उसने अभी धान बेचा और नकद मिला जिसमें पुराने 500 और 1000 के नोट हैं लेकिन यूरिया इन पैसों से नहीं मिल रहा। मुझे उन लोगों में पीछे खड़ा हुआ एक 22-23 साल का एक लड़का दिखा जो उस भीड़ से अलग ही लग रहा था। Leather jacket, चश्मा लगाया हुआ था। उसने जाकर किसी को फ़ोन मिलाया, मैं उसे नोट कर रही थी। अचानक उस मंडी का कोई पल्लेदार आया और रवीश के ऊपर चिल्लाने लगा कि आप किसलिए 500 के नोट दिखा रहे हैं, हमने तो दिए नहीं, आप खुद दे रहे हैं।

बिना किसी वजह के इस तरह का हमला औचक था। रवीश को और कैमरामैन को घेरने की कोशिश की, लेकिन वो और टीम के लोग गेट से पैदल बाहर निकल गए, पल्लेदार ने अपने लोगों के साथ मिलकर गेट बंद कर दिया और हमारी गाड़ी अंदर ही रह गयी। कैमरामैन से भी बदसलूकी करने लगे। मैं पहले ही थोड़ा अलग हो गयी थी और एक छोटे गेट से निकल आई। हम कुछ मीटर पैदल चले जब तक गाड़ी बाहर नहीं निकली। हमने पुलिस को बुलाया। वो लड़का जो मंडी में दिखा था, वो अपने साथी के साथ बाइक पर लगातार पीछा कर रहा था। मैं नंबर नोट कर चुकी थी और पुलिस को दे दिया। उसके बाद भी जब हम दिल्ली की तरफ निकले तो एक और वीआईपी स्टीकर वाली गाड़ी ने काफी दूर तक पीछा किया। लग रहा था मानो हम किसी निगरानी में हैं।

मैं फैसला नहीं कर पा रही हूँ कि ग्राउंड रिपोर्टिंग का कोई मतलब अब बचा है या नहीं। मौका ढूँढा जा रहा है कि किसी तरह एक आवाज़ को ख़त्म कर दें किसी भी तरीके से। चाहे ट्विटर पर ट्रेंड करा कर या मार-पीट तक पहुंचा कर। ये जनता नहीं है। जो असल जनता है वो कतारों में खड़ी है, बाकी बाइकों पर धमकी देते घूम रहे हैं। रवीश कुमार ने खोड़ा पर रवीश की रिपोर्ट पहले भी की है, दिल्ली के कई इलाकों में कांग्रेस सरकार के दौरान रिपोर्ट की है, लेकिन तब क्या इसी तरह देश में देशद्रोही साबित करने का ट्रेंड था? अरे नहीं, राजनीतिक दलों के आईटी सेल कहाँ बने थे तब। अगर किसी योजना के लागू होने में दिक्कतें आ रही हैं और लगातार कई दिन से आ रही हैं तो क्या किया जाना चाहिये,एक कीर्तन मंडली बैठा देनी चाहिए चैनल पर जो भजन गाती रहे। काफी ‘कंस्ट्रक्टिव’ होगा देश के लिए।  अच्छी बात के साथ ख़त्म करती हूँ। खोड़ा में आज डीएम, और कई अधिकारी आ गए, 2 मोबाइल एटीएम भी आ गए। आज काफी लोगों को पैसा मिला। बाकी, तुहमतें चंद अपने ज़िम्मे धर चले..जिस लिए आये थे हम, सो कर चले।

सौजन्य : फेसबुक

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रवीश जैसे पत्रकार का ये हाल है तो बाकी रिपोर्टर्स और स्थानीय पत्रकारों का क्या होता होगा?

Rakesh Srivastava : रवीश को धमकाने का काम प्रायोजित है ऐसा मुझे नहीं लगता। बैंको के बाहर की हर लाईन में बहुत लोग प्रधानमंत्री के इस कदम की सराहना करने वाले भी मिलते हैं, इस सच्‍चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन, यह भी अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है कि मोदी जी के समर्थक टाईप अधिकांश लोग बुली करने टाईप ही क्‍यों होते हैं। दो चार बुली करने वाले दसियों साधारण लोग की आवाज़ को दबा देते हैं। ऐसा सब जगह हो रहा है। इस प्रवृति को एक्‍सपोज कर रवीश ने अच्‍छा किया।

Nitin Thakur : एक अपील है। पत्रकारों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए। रवीश कुमार बुलंदशहर जाते हैं तो उनकी गाड़ी के पीछे लगातार एक गाड़ी घूमती है। जहां रिपोर्टिंग के लिए रुकते हैं वहां अचानक से बाइक सवार फोन करके ना जाने किसे-किसे बुलाने लगते हैं…. क्या ये सब पिछली सरकार के शासन में भी हो रहा था? आपको याद हो ना हो लेकिन मैंने तो उस वक्त भी रवीश समेत ना जाने कितने पत्रकारों को सरकार की आलोचना करते हुए ग्राउंड रिपोर्ट भेजते देखा था पर यूं पत्रकारों का पीछा होते देखा-सुना नहीं कभी। सरकारों में बैठी पार्टियां हर काम कानून बनाकर ही नहीं करती बल्कि कुछ काम बिना कानून बनाए भी अंजाम दिए जाते हैं। अगर रवीश जैसे पत्रकार का ये हाल है जिसकी टीवी पर अपनी धमक है तो बाकी रिपोर्टर्स और स्थानीय पत्रकारों का तो क्या ही हाल होता होगा?

इस वक्त आवाम के बड़े तबके को यही समझ नहीं आ रहा कि पत्रकार के हाथ में कोई बंदूक नहीं होती। वो जो दिखा, सुना या बोल रहा है उसे बहस करके या लिखकर आसानी से काउंटर किया ही जा सकता है। ऐसे पत्रकारों की जान पर खतरा बनकर मंडराएंगे तो कोई ये नौकरी नहीं करनेवाला। उतनी ऊंची तन्ख्वाहें, पेंशन और मरने पर सरकारी मुआवज़े नहीं मिलते कि हर कोई जान दे दे। आप अपने हाथों से मीडिया को खत्म कर रहे हैं। वो लाख बुरी हो लेकिन उसे ज़िंदा रखना लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। जैसे राजनीति कितनी ही बुरी हो मगर वो व्यवस्था की आवश्यक बुराई है। सरकार में बैठी पार्टियों को वो चाहे जो भी हों, उन्हें भी अपने भक्तों, प्यादों, मुरीदों वगैरह वगैरह को समझाना चाहिए कि हिंसा बुरी होती है, कम से कम उसके साथ तो बहुत ही बुरी जो अपने हाथ में डंडा तक ना रखकर अनजान जगहों पर जा घुसता है ताकि अपनी नौकरी कर सके और आपका ज्ञानवर्धन अथवा मनोरंजन। (आज के संदर्भों में) शुक्रिया।

Ajay Anand : मेरे पिताजी कहते थे अगर आपको डालडा खाने की आदत लग गई तो शुद्ध देशी घी नहीं पचेगी । यही आज के दौर में पत्रकारिता के साथ लागू होती है; क्योंकि पत्रकारिता के नाम पर हमें चाटुकारिता देखने/पढ़ने की आदत लग गयी गयी है इसलिए रवीश का रिपोर्ट हजम नहीं हो रहा है। लगतार तीनों दिन रवीश को धमकाया जाना अच्छे संकेत नहीं है… कल के प्राइम टाइम का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

प्राइम टाइम : एक तो बैंक कम, ऊपर से इंतज़ाम अधूरे

सौजन्य : फेसबुक

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रवीश और उनकी टीम को मुट्ठी भर मोदी भक्त नुमा असामाजिक तत्व धमकाने में जुटे!

Tarun Vyas : मैं रवीश के दीवानों वाली सूची में शामिल नहीं हूं और न होना चाहता हूं। लेकिन रवीश कुमार की पत्रकारिता के अंदाज़ से प्रभावित ज़रूर हूं। रवीश का गुरुवार और शुक्रवार का प्राइम टाइम जिस किसी ने भी देखा मैं उन से दो सवाल पूछना चाहता हूं। क्या बैंकों में लगी कतारें और कतारों में भूखे प्यासे आंसू बहाते लोग झूठे हैं? और क्या नरेंद्र मोदी का रुंधा गला ही देशभक्ति का अंतिम सत्य है ? मेरे सवाल आपको नकारात्मक लग सकते हैं क्योंकि जब दाल 170 रुपए ख़ामोशी के साथ ख़रीदी जा रही हो तो इस तरह के सवालों का कोई मोल नहीं होता।

लेकिन उसके साथ ही हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जनता से सत्ता है, सत्ता से जनता नहीं है। कोई पत्रकार देश की जनता के दिल दिमाग़ पर बिछाए जा रहे जाल को तोड़कर देश की जनता की सोच को आज़ाद रहने के लिए अगर कुछ प्रयत्न कर रहा है तो वो देशद्रोही कैसे हो सकता है। मौजूदा दौर में रवीश कुमार की पत्रकारिता और ख़ुद रवीश ग़द्दार देशद्रोही और न जाने क्या क्या घटिया आरोप झेल रहे हैं। और सुधीर चौधरी जैसे अपराधी देशभक्ति के मील का पत्थर बनते जा रहे हैं।

बीते दो प्राइम टाइम में कुछ असामाजिक तत्वों ने रवीश को और उनकी टीम को धमकाने का प्रयास किया है। बदतमीज़ी की और रिपोर्टिंग प्लेस से निकल जाने तक की धमकी दे डाली। जहां एक ओर बीजेपी मार्का न्यूज़ चैनल्स और अख़बारों को बैंकों में खड़े लोग दिखना बंद हो गए हैं। 34 लोगों की मौत बदलते देश का नया उदाहरण बन गई हो तो ऐसे हालातों में रवीश कुमार का बैंकों की भीड़ और मर रहे लोगों पर सवाल करना कौनसा अपराध है? क्या हम इसे स्वीकारलें कि अब राजनीतिक दलों के गुंडे पत्रकारों को धमकाएंगे और इस पर भी चुप्पी साधना होगी?

आम जनता भले न समझे मग़र पत्रकारों को तो समझना चाहिए इन हालातों को। आज बीजेपी का सिक्का है कल कांग्रेस का होगा। तो जो पत्रकार बीजेपी की ग़ुलामी कर रहे हैं उनके साथ क्या इस तरह के बर्ताव का ख़तरा नहीं हैं। सत्ता की शरण स्वीकार कर चुके पत्रकारों ने क्या ये मान लिया है इस लोकतंत्र में 2014 का लोकसभा चुनाव आख़री चुनाव था? क्या अब दूसरे दलों की सरकारों का बनना बिगड़ना नहीं होगा? जो अपने अस्तित्व पर हो रहे हमलों पर ख़ामोशी बरती जा रही है। मैं यहां रवीश कुमार की वक़ालत नहीं कर रहा हूं मग़र कुछ ही पत्रकार हैं जो लिख रहे हैं दिखा रहा हैं उनमें रवीश कुमार सबसे आगे नज़र आते हैं। इसलिए हमें ऐसे पत्रकरों को दबाए जाने के लिए आवाज़ उठनी चाहिए।

इस समय हो रहे घटनक्रम यूं ही नहीं हैं। ये आने वाले समय के गहरे अंधेरे की दस्तक है। जिसे न समझने दिया जा रहा है और न ही समझ चुके लोगों को बोलने दिया जा रहा है। जितना हो सके हमें इस ख़तरनाक महौल से बचना चाहिए। हमारे आपके आस पास देशभक्ति का ऐसा आवरण बनाया जा रहा है जिसके विरोध में आप कुछ भी न कह सकें। लेकिन हमें बोलना होगा। देशभक्ति और देशभक्तों के विरुद्ध खड़े होना होगा। क्योंकि ये एक झूठ है जिसका असलियत से कोई वास्ता नहीं। ये सिर्फ़ कुर्सी पर बने रहने के लिए फ़ैलाया जा रहा डर है। जिसका शिकार आज रवीश कुमार जैसे ढेरों लोग हैं।

सत्ता के इस अंधकाल में कुछ भी बोलना ख़तरे से खाली तो नहीं है। लेकिन जो जोखिम उठाकर किसी भी माध्यम से सच को महसूस करा रहे हैं हमें उनके साहस का सम्मान करना होगा। वरना इतिहास हमारा पीछा कर ही रहा है। हालातों को देखिए महसूस कीजिए इंदिरा इज़ इंडिया इंडिया इस इंदिरा आप भूले नहीं होंगे। 1975 से 77 तक की हवाओं का एहसास कराया जा रहा है। बस तरीका थोड़ा अलग है। तब घोषित तानाशाही थी अब अघोषित है।

लेखक तरुण व्यास इंदौर के युवा सोशल मीडिया जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके एफबी वॉल से लिया गया है.

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