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सुख-दुख

जनसत्ता में 11 से 5 की नौकरी में HR की हिम्मत नहीं थी कि पत्रकारों को बुला ले!

शंभुनाथ शुक्ला-

हले एक्सप्रेस समूह में पत्रकारों के लिए कार्य के घंटे छह और बीच में आधा घंटे का विराम था। मेरी पहली ड्यूटी पूर्वाह्न 11 से पाँच बजे तक की थी। फिर चार से रात दस तक और आख़िरी ड्यूटी रात आठ से दो की थी।

रात 9 बजते ही हमें घर जाने के लिए गाड़ी मिलती। तब हमें 21 दिन काम करने पर एक सीएल और 11 दिन पर एक पीएल मिलती। साथ ही साल में 15 दिन का चिकित्सकीय अवकाश। फिर LWP भी मिलती।

तब अन्य कर्मचारियों की ड्यूटी आठ घंटे की होती थी। सरकारी विभागों में ड्यूटी ऑवर्स सुबह दस से शाम पाँच तक। इसी में आधा घंटे का लंच। किंतु राजीव गांधी ने हफ़्ते में दो दिन छुट्टी घोषित की और ड्यूटी का समय सुबह 9-30 से शाम 5 तक कर दिया।

उस समय जनसत्ता में मैंने एक लेख लिखा था कि यह कर्मचारियों को ग़ुलामी की ओर ले जाने की शुरुआत है। इसके बाद तो ये घंटे सुबह 9 से साढ़े पाँच कर दिए गए। सरकारी कर्मी अब साढ़े आठ घंटे काम करेंगे।

उधर निजी क्षेत्रों में काम के घंटे बढ़ा कर 9 से 10 घंटे कर दिए गए। धीरे-धीरे कर्मियों की ड्यूटी बढ़ाई गई और छुट्टी कम की गई।

हमारे समय में किसी भी जीएम या कार्मिक प्रबंधक, जिसे एचआर कहते हैं, की यह हिम्मत नहीं थी कि पत्रकारों को बुला ले। मेरे समय में दो महा प्रबंधकों ने यह जुर्रत की तो मैंने कह दिया कि तुम लोग क़ायदे से रहो, वरना मैं नीचे फेंक दूँगा।

अब प्रबंधन हफ़्ते में 70 से 90 घंटे काम करवाने की इच्छा व्यक्त कर रहा है। कर्मचारियो भूल गए शिकागो आंदोलन को। ज़ोर से आह्वान करो- बोल मजूरा हल्ला बोल! अरे कॉर्पोरेट स्लेव्स तुम्हारे पास खोने को गुलामी के ये 90 घंटे हैं और जीतने को पूरा निज़ाम!

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1 Comment

1 Comment

  1. Shahawaz

    January 15, 2025 at 12:31 am

    आजकल के संपादक संपादक रहे कहां, सब दलाल हैं, खुद HR के सामने हाथ जोड़ कर खड़े होते हैं तो कर्मचारियों के हित कहां सोचेंगे

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