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अर्नब गोस्वामी को क्रिमिनल केस में कर्नाटक हाईकोर्ट से राहत!

र्नाटक हाईकोर्ट ने रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी को बड़ी राहत दी है। मामला मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़ी कथित झूठी खबर प्रसारित करने को लेकर दर्ज किया गया था। कोर्ट ने अर्नब के खिलाफ यह दर्ज आपराधिक मामला खारिज कर दिया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 505(2) के तहत कोई भी अपराध बनता ही नहीं है, यहां तक कि दूर-दूर तक भी नहीं।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकलपीठ ने की। उन्होंने अपने फैसले में राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की और कहा, “सिर्फ इसलिए कि याचिकाकर्ता (अर्नब गोस्वामी) एक प्रसिद्ध पत्रकार हैं, उन्हें बेवजह इस कानूनी जाल में फंसाया गया है। ऐसा केवल इसलिए किया गया ताकि उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने का प्रचार किया जा सके। यह एक गैर-जिम्मेदाराना हरकत है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “याचिकाकर्ता ने कोई अपराध नहीं किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह अर्नब गोस्वामी हैं।”

न्यायालय ने एफआईआर को ‘राजनीतिक बदले की भावना’ से दर्ज की गई करार दिया और इसे सिर्फ “अन्य कारणों से हिसाब चुकता करने का प्रयास” बताया।

पूरा मामला क्या है?

यह मामला एक कांग्रेस नेता की शिकायत पर दर्ज किया गया था। शिकायत में कहा गया था कि रिपब्लिक कन्नड़ न्यूज चैनल ने एक वीडियो प्रसारित किया, जिसमें यह दिखाया गया कि मुख्यमंत्री के काफिले के कारण एम्बुलेंस को ट्रैफिक में इंतजार करना पड़ा।

शिकायतकर्ता के अनुसार, यह खबर झूठी थी और इसका उद्देश्य लोकसभा चुनावों से पहले सरकार के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाना था। इसी आधार पर धारा 505(2) IPC के तहत मामला दर्ज किया गया था।

कोर्ट की दलीलें– कोर्ट ने अपने फैसले में समझाया कि धारा 505(2) IPC उन्हीं मामलों में लागू होती है, जहां किसी खबर, बयान या अफवाह से धार्मिक, जातीय, भाषाई या क्षेत्रीय समूहों के बीच दुश्मनी या घृणा फैलाई जाती है।

न्यायालय ने कहा, “अगर यह मान भी लिया जाए कि उक्त खबर झूठी थी, तो भी इससे धारा 505(2) IPC के तहत अपराध कैसे बनता है? केवल एक प्रसिद्ध पत्रकार होने के कारण उन्हें इस कानूनी पचड़े में फंसाना दुर्भाग्यपूर्ण है।”

न्यायालय ने इस संदर्भ में बिलाल अहमद कालू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997) मामले का भी हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि जब तक किसी बयान से धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर समाज में नफरत नहीं फैलाई जाती, तब तक धारा 505(2) IPC लागू नहीं हो सकती।

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