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सुख-दुख

फैजाबाद के वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी और थियेटर आर्टिस्ट गोपाल कृष्ण नहीं रहे!

कुमार रहमान-

गोपाल कृष्ण नहीं रहे. वह फैजाबाद की बड़ी अहम शख्सियत थे. रहस्यों से भरे एक ऐसे राही जिसे मंजिल नहीं सफर की तलाश थी. वह रंगकर्मी थे. थियेटर एक्टर थे. पत्रकार थे. पॉलिटिकल थिंकर थे. इन सबसे अलग बहुत अच्छे दोस्त थे.

बहुत खराब बात थी कि उनके आखिरी वक्त उनका कोई दोस्त नहीं था. मंगलवार को अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली. कभी दोस्तों से घिरे रहने वाले गोपाल जी अपने आखिरी वक्त में नितांत अकेले थे. वह शहरयार थे. हर गली-नुक्कड़ पर उनके दोस्त और परिचित थे. इसके बावजूद आखिरी वक्त में वह नितांत अकेले थे.

उन्हें पूरे जीवन प्रेम की तलाश रही. सच्चे प्रेम की. ज्ञानी गोपाल पूरे जीवन यह समझ ही नहीं सके कि इस संसार में ‘सच्चा प्रेम’ जैसा कुछ होता ही नहीं. सच्चे प्रेम की तलाश में उन्होंने अपने इर्द-गिर्द एक छोटी सी दुनिया सजाई. खूब सारे दोस्तों वाली दुनिया. गोपाल को अकेलेपन से डर लगता था. वह हमेशा दोस्तों से घिरे रहना चाहते थे. यह विडंबना ही है कि मरते वक्त वह नितांत अकेले थे.

एक जमाने में चौक की टेढ़ी गली के एक छोटे से कमरे में हर शाम बीसियों लोग जमा होते. इनमें बड़ी संख्या पत्रकारों, साहित्यकारों और नाटककारों की होती. रेडियो के लोग भी होते. सियासी लोग भी होते. लेफ्ट के लोग, संघ के लोग, बीजेपी के लोग, शिवसेना के लोग, सपा-बसपा और कांग्रेस के लोग. यह गोपाल की ही कलाकारी थी कि इतने किसिम-किसिम के लोग एक जगह पर एक साथ जमा कर लेते. कभी-कहीं कोई विवाद नहीं हुआ. फिर भी मरते वक्त वह नितांत अकेले थे.

‘सच्चे प्रेम’ की तलाश में दोस्तों पर खूब पैसा खर्च किया. यह तयशुदा था कि उन्हें ठगा जाना ही था. वह ठगे गए खूब ठगे गए. बार-बार ठगे गए. सच्चा प्रेम तो मिला नहीं, लेकिन लाखों के कर्जदार हो गए. चार जोड़ कपड़ों में जिंदगी गुजारने वाले गोपाल कृष्ण ने कभी खुद पर पैसे खर्च नहीं किए. उनके पास खुद की साइकिल तक नहीं थी, लेकिन कर्ज लाखों का था. ये कर्ज उन्होंने दूसरों की खुशियों के लिए लिया और उसे आखिरी वक्त तक चुकाते रहे. यह बहुत अहम था कि उनके परिवार ने बिना कोई सवाल किए उनका काफी कर्ज चुकता भी किया.

गोपाल दिल्ली में अन्ना के आंदोलन से जुड़े रहे. जब आम आदमी पार्टी का गठन हो रहा था तो वह उसका भी हिस्सा रहे. पद-प्रतिष्ठा और शोहरत को छोड़कर अचानक फैजाबाद लौट पड़े. मैंने मना किया. समझाया. एक दिन चुपके से निकल गए फैजाबाद. यहां उनके दोस्त थे. उनकी दुनिया थी. मगर मरते वक्त गोपाल नितांत अकेले थे.

इन सबसे पहले गोपाल ने ओशो के विचारों के साथ आसरा तलाशा. ओशो की भरी-पुरी दुनिया में कुछ साल गुजारने के बाद वो अपने संसार में लौट आए. वहां सब कुछ था मगर प्यार नहीं. सच्चा प्रेम नहीं था.

गोपाल जी की मौत एक धीमी आत्महत्या है. वो पिछले पांच साल से मर रहे थे आहिस्ता-आहिस्ता.

अलविदा माई बेस्ट फ्रैंड… बहुत याद आओगे…

कोई दोस्त है न रक़ीब है
तेरा शहर कितना अजीब है
यहां किसका चेहरा पढ़ा करूं
यहां कौन इतना करीब है

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