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मोदी के अफसर अखबार मालिकों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर रहे हैं!

केन्द्र सरकार के प्रमुख विभाग पीआरजीआई, सीबीसी, पीआईबी आदि द्वारा देश में लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों पर रोज नई-नई जटिलताएं उत्पन्न करने, नया प्रेस सेवा पोर्टल बनाकर क्षमता से अधिक आपत्तिजनक प्रक्रियाओं की पूर्ति का दबाव व अनेकों कठिन मानदंडों का सृजन कर प्रकाशकों पर किये जा रहे अत्याचार और उसमें बेतहाशा वृद्धि को लेकर लघु एवं मध्यम समाचार पत्र प्रकाशकों का वर्ग न केवल अत्यधिक परेशान हो गया है बल्कि समाचार पत्र प्रकाशन बन्द कर देने की विवशता के कगार पर पहुंच गया है।

उत्पन्न विसंगतियों को सरलीकरण करने की मांग को लेकर देश के शीर्ष व भारतीय प्रेस परिषद से अधिसूचित संगठनों में आल इण्डिया स्माल एण्ड मीडियम न्यूजपेपर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष व भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य श्री गुरिंदर सिंह, महासचिव व पूर्व सदस्य भारतीय प्रेस परिषद श्री अशोक कुमार नवरत्न, भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य श्री एल.सी. भारतीय, अखिल भारतीय समाचार पत्र एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश चन्द्र शुक्ल, एसोसिएशन ऑफ स्मॉल एण्ड मीडियम न्यूजपेपर्स ऑफ इंडिया के उत्तर प्रदेश राज्य के अध्यक्ष व भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य श्री श्याम सिंह पंवार, इण्डियन एसोसिएशन ऑफ प्रेस-एन-मीडियामेन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री पवन सहयोगी, महासचिव डॉ. दीन दयाल मित्तल आदि ने केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय के सचिव, भारत के प्रेस महापंजीयक से एक शिष्टमंडल के रूप में अनेकों बार भेंट वार्ता कर ज्ञापन दिये जिस पर आपत्तिजनक प्राविधानों में अपेक्षित संशोधन का प्रबल आश्वासन दिया गया। किन्तु खेद है कि बावजूद इसके अब तक कोई अपेक्षित संशोधन न करना सरकार व सन्दर्भित अधिकारियों की उदासीनता का कुत्सित मानसिकता का ज्वलंत प्रमाण है।

सरकार के उत्तरदायी अधिकारी प्रकाशकों को सड़कों पर उतरने के लिए अनावश्यक मजबूर कर रहे हैं। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रकाशकों की समस्याओं पर कोई ठोस रणनीति बनाकर कर अग्रिम कदम उठाने की नितान्त आवश्यकता है।

सरकार की कार्यप्रणाली से स्पष्ट है कि सरकार देश के लघु व मध्यम समाचार पत्रों को खत्म कर सिर्फ बड़े समाचार पत्र संस्थानों के सहारे अपना साम्राज्य चलाना चाहती है। क्योंकि बड़े संस्थान येन केन प्रकारेण सरकार के मापदंडों और उत्पीड़न, अत्याचार से बच जाते हैं, किन्तु परेशान सिर्फ वही लघु व मध्यम अखबार होते हैं जिन्होंने ईमानदारी और समर्पण भाव से देश एवं राष्ट्र की जनता के हित में जन सामान्य की निष्पक्ष पारदर्शी पत्रकारिता करने के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।

आज स्थिति यह है कि आजाद भारत में सरकार किसी की भी हो उसे बड़े और व्यवसायिक समाचार पत्र संस्थानों की अपेक्षा लघु और मध्यम समाचार पत्र संस्थानों से निष्पक्ष व सही प्रकाशन का भय अधिक रहता है। वर्तमान परिस्थितियों में समय और हालातों को समझ तत्काल सकारात्मक निर्णय लेना अत्यन्त आवश्यक व अपरिहार्य हो गया है।

वर्तमान में पीआरजीआई ने एक एडवाइजरी जारी कर समाचार पत्रों के प्रकाशन को निश्चित समय सीमा के भीतर अपलोड करने की बाध्यता कर दी है। इसके पूर्व भी इस तरह का फरमान जारी किया जा चुका है। देश के सभी समाचार पत्र विधि विहित नियमों का सम्मान करते हैं किन्तु नियमों के परिपालन में आ रही जटिलताओं का समाधान भी सरकार का प्रमुख दायित्व है किन्तु सरकार लगातार अनदेखी करती जा रही है जिसका परिणाम भयावह ही है।

लघु व मध्यम समाचार पत्रों का भविष्य निराशाजनक दिन प्रतिदिन होता जा रहा है जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है। यदि समय रहते समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो शीघ्र ही नयी दिल्ली में सभी सम्बन्धित पदाधिकारियों की बैठक बुलाकर कारगर व ठोस कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ेगा।

देश के सभी लघु व मध्यम समाचार पत्रों के प्रकाशक मित्र हर सम्भव सहयोग व संघर्ष के लिए तैयार रहें। अन्यथा सरकारी मशीनरी अपने कुचक्र में सफल हो जाएगी। अब समय आ गया है कि किसी भी रूप में आकर सरकारी मशीनरी के अत्याचार को रोकने के लिए आंदोलनात्मक कदम उठाने के लिए तैयार होना होगा।

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