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औरंगज़ेब पर यह स्टोरी अमर उजाला के सभी संस्करणो में 10 फरवरी 1991 को छपी थी!

अरविंद कुमार सिंह-

औरंगजेब की कब्र कैसी है..?

अयोध्या आंदोलन आरंभ हुआ तो औरंगजेब का नाम विश्व हिंदू परिषद के रजिस्टर में लिख उठा। गनीमत ये है कि मुगल बादशाहों के द्वारा किए गए अकूत निर्माणों की तरह औरंगजेब ने कुछ वैसा बनवाया नहीं जिसे घृणा अभियान का हिस्सा बनाया जा सके।

अपनी कब्र भी खुद तो कोई बनवाता नहीं, लेकिन उसके लिए औरंगजेब ने जो निर्देश दिया था उसी हिसाब से बहुत सीमित धन में उनकी जो कब्र बनी वह बादशाह तो दूर नवाबों की कब्र जैसी भी नहीं। एक आदमी की कब्र जैसी है। उसे संगमरमर का कर्टेन बना कर निजाम हैदराबाद ने थोड़ा ठीक कराया पर उनकी मौत के बहुत बाद में।

हिंदुओं में ये प्रथा ही है कि बुरा से बुरा आदमी भी मर जाता है तो उसकी बुराई नहीं की जाती। उसकी श्रद्धांजलि सभा में बड़ी लच्छेदार बातें होती हैं। लेकिन आदमी दूसरे धर्म का हो तो उसकी कब्र को भी नहीं छोड़नी है, ये रिवाज अच्छी बात नहीं है।

इतिहास सबका लेखा जोखा करता है।

आज भारत में लोकतंत्र है। इस दौर में जयचंद, मीर जाफर या औरंगजेब ने क्या किया यह अर्थहीन है। राजा जय सिंह ने शिवाजी महराज के साथ क्या किया, ये सवाल भी आज मायने नहीं रखता। अंग्रेजी राज में जिन लोगों ने क्रांतिकारियों की मुखबिरी की, उसका बदला आज हम उनकी संतानों से तो नहीं ले सकते।

फिलहाल औरंगजेब की खुल्दाबाद में जो कब्र है, उस पर अपनी लिखी एक स्टोरी साझा कर रहा हूं। वास्तविक तथ्यों को उससे जानने में मदद मिलेगी।

यह स्टोरी अमर उजाला के सभी संस्करणो में 10 फरवरी 1991 में छपी थी। उस दौरान विश्व हिंदू परिषद ने औरंगजेब के प्रति अपना स्नेह दिखाना आरंभ कर दिया था।

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