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पहलगाम अटैक: भारत को गोल्डा मायर जैसों की जरूरत है!

प्रमोद द्विवेदी-

गलबजना प्रधानमंत्री नहीं गोल्डा मायर की जरूरत है। जिन्हें 1972 के म्यूनिख ओलंपिक की याद है, उन्हें इजराइली खिलाड़ियों के कत्लेआम की घटना भी याद होगी। ब्लैक सेप्टेंबर नामक संगठन के फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने खेलगांव में घुसकर इन खिलाड़ियों की हत्या की थी।

तब पूरी दुनिया के इस्लामिक गुंडे बड़े खुश हुए, वैसे ही जैसे आज पहलगाम जनसंहार पर अपने देश के कुछ सुअर मगन दिख रहे हैं। या तटस्थता का ज्ञान दे रहे हैं।

म्यूनिख हत्याकांड से पूरा इजरायल मातम में डूबा था। मृतकों के परिजनों ने कोई स्यापा नहीं किया। उन्हें अपनी प्रधानमंत्री गोल्डा मायर पर भरोसा था। मायर हर मातमजदा घर में गईं और भरोसा दिलाया कि एक भी फिलस्तीनी कसाई बचेगा नहीं।

इस मकसद को अंजाम देने का जिम्मा मोसाद को दिया गया। अभियान का नाम रखा गया रैथ आफ गौड। कहा गया, कोई डेडलाइन नहीं। जहां तक धरती का छोर है, वहां से ढूंढकर इन हत्यारों को मौत दी जाए। मोसाद का यह अभियान पूरे बीस साल चला और हत्याकांड का मास्टरमाइंड सरगना अबु दाऊद ही बच पाया।

मौत के डर से उसने अपने को जिंदा ही मार दिया और ताउम्र छिपा रहा। बाकी सारे कुत्ते की मौत मारे गए। एक मजबूत, अभिमानी प्रधानमंत्री ही यह करवा सकता था।

मोसाद के इस रोमांचक अभियान पर ही म्यूनिख फिल्म है जिसे स्पीलबर्ग ने एक किताब से लिया। अब अपने पास वह गुस्सा और उत्तेजना तो है, पर ना तो गोल्डा मायर या इंदिरा गांधी जैसा प्रधानमंत्री है, ना मोसाद जैसा इंतकामी संगठन।

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