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टीवी पत्रकारों के लिए सबक हैं संदीप और दिबांग, लोकतंत्र भक्ति से नहीं सवालों से चलता है, देखें वीडियो

भारत सूरज-

वरिष्ठ पत्रकार दिबांग जो कह रहे हैं उसको बहुत संजीदगी से सुनने और समझने की ज़रूरत है. पहलगाम हमले को 4 दिन बीत चुके हैं. इस दौरान देश ने बहुत कुछ देखा और सुना है. लेकिन सबसे अजीब केंद्र सरकार का ये कहना है कि उन्हें और उनकी एजेंसियों को इस बात की ख़बर ही नहीं थी कि बैसरन घाटी पर्यटकों के लिए खुली हुई है. ऐसे समय में सरकार का ये कहना अपनी जनता के साथ विश्वासघात करने जैसा है.

पूरे देश ने इस बार सरकार का साथ दिया है, विश्वास किया है. अब सवाल accountability का है , जो सरकार को लेना ही चाहिए. देश पीएम से प्रेस कॉन्फ्रेंस की मांग नहीं करता लेकिन एक विशेष संसद सत्र में तो सरकार जनता के सामने सारी बात रख ही सकती है.


अपूर्व भारद्वाज-

तीन मिनट का वीडियो हर भारतीय पत्रकार को देखना चाहिए।

दिबांग और संदीप ने कुछ नया नहीं किया… बस सत्ता से सवाल पूछे। और वही सवाल सरकार की नाकामी की परतें उधेड़ गए।

पहलगाम हमले को 4 दिन बीत गए। देश ने सरकार पर भरोसा किया, साथ दिया। अब सरकार कह रही है — “हमें खबर ही नहीं थी कि बैसरन घाटी खुली थी।”

ये चूक नहीं, विश्वासघात है। Accountability कौन लेगा? देश प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं मांग रहा, लेकिन एक विशेष संसद सत्र तो बनता है! प्रधानमंत्री जवाब दें।

दिबांग ने दिखा दिया — पत्रकार वो नहीं जो सरकार के गुण गाए, पत्रकार वो जो सत्ता से सवाल पूछे।

यहाँ सवाल ऐसे नहीं थे —

  • “आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर?”
  • “आपमें इतनी ऊर्जा कहां से आती है?”
  • “आप तो फकीरी की मिसाल हैं!”

सवाल थे —

  • “हमले के वक़्त एजेंसियां कहां थीं?”
  • “बैसरन घाटी पर किसकी निगरानी थी?”
  • “जनता की जान की जिम्मेदारी किसकी थी?”

देश के गोदी पत्रकारों के लिए सबक है — भक्ति से नहीं, सवालों से लोकतंत्र बचता है।

वीडियो देखें…

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