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वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव को बेटी के साथ लगी अपनी DP क्यों हटानी पड़ी?

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने एक पोस्ट साझा कर बेटी के साथ लगी डिस्प्ले पिक्चर (डीपी) को हटा लेने की जानकारी साझा की है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि वरिष्ठ पत्रकार को यह कदम उठाना पड़ा… ?जानने के लिए नीचे पढ़ें..


अम्बरीश कुमार –

ये राजनीतिक लफंगई का दौर है! राहुल देव हमारे उस जनसत्ता के संपादक रहे जिसके लिखे से देश का हर राजनीतिक दल डरता था. सत्ता में बैठे लोग भी. प्रभाष जोशी क्या लिखेंगे इसका इंतजार होता था. किसी की हैसियत नहीं थी अखबार के किसी पत्रकार के बारे कुछ बोल सके. आज राजनीतिक लफंगई का एक नया दौर है. हमने कांग्रेस को जाते हुए देखा, इंदिरा गांधी को हारते हुए देखा.आडवाणी को हाशिये पर फेंके जाते देखा है. कौन अमृत पीकर आया है ये भी जाएंगे. और गाजे बाजे के साथ.


विनोद कापड़ी-

अभी फ़ेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव जी की ये पोस्ट देखी। बहुत दुख हुआ। किस दौर में पहुँच गए हैं हम!

राहुल देव-

कई लोग बेटी वाली डीपी हटाने की मेरी बात पर तरह-तरह की टिप्पणियाँ कर रहे हैं। कई टिप्पणियाँ ही उनकी मानसिकता बयाँ कर रही हैं। कुछ संदेह कर रहे हैं। अश्लीलताओं के चंद नमूने ढूँढ कर पेश करने में समय लगेगा। लेकिन इस प्रसंग में ही एक देवि की टिप्पणी मेरी बात प्रमाणित कर देती है।



राहुल देव-

एक क्रुद्ध हिंदूवादी मित्र के लिए फ़ेसबुक पर लिखी टिप्पणी।

मतान्धता और दुराग्रह का चश्मा चढ़ी आँखों से ही प्रियदर्शन (प्रसिद्ध लेखक-पत्रकार) की टिप्पणी में कोई हत्यारों और उनके समर्थका के प्रति सहानुभूति देख सकता है। लिखने वाले के नाम से ही जो पढ़ने से पहले ही अपने निष्कर्ष बना लेते हैं यह उनका लक्षण है। बता सकते हैं किस शब्द या वाक्य से आतंकवादियों के प्रति सहानुभूत दिख रही है आपको? दूसरों पर फतवे जारी करने से पहले आप अपनी दृष्टि की निष्पक्षता की कब जाँच करेंगे?

सबसे पहले प्रियदर्शन सहित जो लोग भी धर्मनिरपेक्षता शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं उनसे यह जानकारी अपेक्षित है कि संविधान के आधिकारिक हिंदी पाठ में शब्द पंथनिरपेक्षता है। दोनों शब्दों में भारी, तात्विक अंतर है। Secular शब्द के अर्थों, आशयों और प्रयोगों को भी ठीक से समझे बिना उसकी छीछालेदर की जाती है। कृपया संविधान और अच्छे हिंदी अंग्रेज़ी शब्द कोश देख लें।

धर्म शुद्ध भारतीय शब्द है। इसका हमारे शास्त्रों और व्यवहार में अलग-अलग आशयों-अर्थों-प्रकारों से प्रयोग किया गया है। उसकी विशिष्टता और व्यवहार की व्यापकता को जानते थे हमारे संविधान निर्माता और हिंदी अनुवादक इसलिए उन्होंने धर्मनिरपेक्ष शब्द नहीं रखा। भारत धर्म से निरपेक्ष नहीं हो सकता।

आज़ादी के बाद से polity, राज्य व्यवस्था, अर्थनीति, शिक्षा नीति, ज्ञान-विज्ञान और उनके उत्पादों के भरोसे चल रहे देश में पश्चिम और पूर्व की पुरानी मूर्खतापूर्ण दीवारों की बात करने का आडम्बर यहीं चल सकता है। आप और हम और सारा देश, सारा संसार, जिन यन्त्रों, उपकरणों, वैज्ञानिक तौर तरीकों के प्रयोग के बिना एक दिन चल नहीं सकता उस पश्चिम को हेय, निकृष्ट और स्वयं को संसार में सर्वश्रेष्ठ और विश्वगुरु बताने का महान खोखला बौद्धिक पराक्रम यहीं देखने को मिल सकता है या घोर इस्लामी देशों में।

सच्ची श्रेष्ठता आचरण की चीज़ है, उसमें ही दिखती है, उसके दावों और दंभों में नहीं।

अपनी संस्कृति, शास्त्रों और उनकी विशेषताओं से कुछ यह नाचीज़ भी परिचित है। उन्हें पढ़ना लगभग दैनिक काम है। लेकिन वह ढिंढोरा पीटने की चीज़ नहीं हैं। प्राचीन पुस्तकालय और सारे ब्रम्हाण्ड का ज्ञान हमारे ही पास है, अन्य सभ्यताओं के पास कुछ नहीं, कोई चिंतन नहीं, कोई उपलब्धि नहीं यह भ्रम तभी पाला जा सकता है जब हमारे अध्ययन-मनन का दायरा कुँए के मेंढक की तरह सीमित हो।

अगर आप मानते हैं तो ईश्वर ने या प्रकृति ने, संसार के निर्माण और विकास की प्रक्रिया ने सारी अच्छाईयाँ, सारी श्रेष्ठताएँ, चिंतन क्षमता, सद्गुण, साभ्यतिक और बौद्धिक उपलब्धियाँ किसी भी एक देश, भूभाग, धर्म, सभ्यता, संस्कृति और समुदाय को नहीं सौंपी हैं। जहाँ-जहाँ वे हैं उन्हें पहचानना और सम्मान करना ही बुद्धिमानी और एक उदार, भविष्यपरक दृष्टि का लक्षण है।

यह ज्ञान-विज्ञान-दर्शन-संस्कृतियों-धर्मों-विचारधाराओं के संगम, सामंजस्य और सहकार का समय है। कोई भी द्वीप बन कर नहीं रह सकता। और हमारी आध्यात्मिक चेतना में तो समस्त जगत और जीवों की एकात्मता का ही बार-बार उद्घोष है।

इन वैचारिक, राजनीतिक, धार्मिक, जातीय, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीस, साम्प्रदायिक संकीर्णताओं, संघर्षों, मतभेदों, षड्यंत्रों और हितों से निपटना ज़रूरी है, उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन अगर हमारे ह्रदयों और चेतना में भारत की सच्ची आध्यात्मिक एकात्मता का भाव नहीं है तो फिर काहे की श्रेष्ठता और उसके बचकाने दावे?

थोड़ा अपने क्षणिक आक्रोश से मुक्त होइए। स्वस्थ और प्रकृतिस्थ होकर विचार करना शुरू कीजिए, मित्रो।

राहुल देव

11:57 AM · Apr 25, 2025
·


प्रियदर्शन की मूल पोस्ट-

1 पहलगाम के आतंकी हमले के बाद अचानक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष माने जाने वाले लोगों से उनकी पहचान और राय पूछी जा रही है। बाकायदा ललकारा जा रहा है कि वे बिल से बाहर आएं।
2 हालांकि प्रगतिशीलता के मानकों पर अपने खरा उतरने पर मुझे संदेह भी रहा है लेकिन बहुत सारे लोग मुझे प्रगतिशील मान लेते हैं। तो चलिए बिल से बाहर आ जाता हूं।
3 लेकिन आप कब अपनी संकीर्णता और धर्मांधता के बिल से बाहर आएंगे? पहलगाम में जो जघन्य आतंकी हमला हुआ, उसकी बस सिहरन महसूस की जा सकती है। उसकी वास्तविक तकलीफ़ चीख-चीख कर नहीं बताई जा सकती, उसे अपनी रगों पर अनुभव किया जा सकता है।
4 पहलगाम के आतंकी लोगों को मारने से पहले उनके कपड़े उतार कर, उनकी पहचान पूछ कर जो हासिल करना चाहते थे, वह उन्होंने कर लिया है। सारा फोकस अब इस बात पर है कि यह हमला भारतीय नागरिकों पर है या हिंदुओं पर, यह साबित करने पर है कि आतंकवाद का एक मजहब होता है।
5 यह सच है कि जो भी तोड़ने वाली ताकतें होती हैं, जो भी विघटनकारी मंसूबे होते हैं, उनका धर्म होता है, उनकी जाति होती है। वे सबसे पहले जाति और धर्म का फर्क ही खोजते हैं। वे ऐसी कहानियों को आगे बढ़ाते हैं जो समाज को तोड़ने वाली हों। वे राशन भी बांटते हैं तो धर्म पूछ कर, वे गोली भी मारते हैं तो धर्म पूछ कर।
6 पहलगाम के हमले की बहुत सारी कहानियां हैं। एक कहानी अगर धर्म पूछ कर गोली मारने की है तो दूसरी कहानी धर्म या पहचान भूल कर अनजान मेहमानों को बचाने की है- बल्कि ऐसी कई कहानियां हैं और अलग-अलग अवसरों पर पूरे देश में पसरी हैं, लेकिन उन्हें देखने वाला कोई नहीं।
7 किसी भी आतंकी घटना का किसी भी सूरत में समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन ऐसी घटनाओं की वजहों को पहचानना ज़रूरी है। यह समझना ज़रूरी है कि हमारे बयानवीर नेता जब ‘कायराना हमले’ का ‘मुंहतोड़ जवाब’ देने की बात कर तोप का मुंह पाकिस्तान की ओर मोड़ देते हैं तो दरअसल वे अपनी ज़िम्मेदारी से भागते हैं, वे इस उलझन भरे सवाल से बचना चाहते हैं कि आख़िर 20-25 मिनट तक आतंकी खूनी खेल खेलते रहे, लेकिन उनसे लोहा ले सकने वाला कोई सुरक्षा-प्रबंध क्यों नहीं था।
8 इसमें शक नहीं कि पाकिस्तान आतंकवाद का निर्यातक रहा है, उसके ख़िलाफ़ लगातार सबूत मिलते रहे हैं, इसको लेकर ठोस कार्रवाई की ज़रूरत भी है,लेकिन पाकिस्तानी करतूतों की आड़ में अपनी नाकामी छुपाना हमारी सरकारों का स्वभाव रहा है।
9 दिल्ली, पटना और रांची में बैठ कर बहादुर बनना आसान है, लेकिन जो पहलगाम में मरते हैं और जो सीमा पर गोली खाते हैं, उनके साथ वास्तव में खड़ा होना मुश्किल। नकली, झाग उगलते गुस्से को स्थगित कर देश और समाज की एकजुटता के बारे में सोचेंगे तो शायद आतंकी और अलगाववादी मंसूबों को ज़्यादा बेहतर ढंग से शिकस्त दे पाएंगे।
10 चूंकि प्रगतिशील मिज़ाज किसी झुंड का नाम नहीं है, इसलिए संभव है मेरी राय से बहुत सारे प्रगतिशील भी असहमत हों, जिसका उन्हें हक़ है। लेकिन ये शोक की घड़ी है- बहुत गहरे शोक की घड़ी- इसे सबको महसूस करना चाहिए।


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