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भारत में पत्रकारिता इतनी आज़ाद है कि हर सवाल पूछने से पहले वकील से सलाह लेनी पड़ती है!

आज विश्व प्रेस फ्रीडम डे (World Press Freedom Day) है। लेकिन क्या आज सचमुच प्रेस को पूरी फ्रीडम है। जवाब है नहीं। फिर… ऐसे में कैसे मीडिया की आजादी पर लहालोट हुआ जा सकता है। आज के समय सरकार से सवाल करना तो भूल ही जाइये, आप यदि किसी थाने-चौकीदार से सवाल कर लें तो वही आपको लतिया सकता है, गरिया सकता है, जुतिया सकता है। यह सब एक दिन में नहीं हुआ… बल्कि सालों साल लगे हैं भारत को पत्रकारिता की रैंकिंग में 180 देशों में 151वीं कटेगरी तक घसीटकर लाने में। नीचे कुछ टिप्पणियों को समेटा गया है, देखें प्रेस फ्रीडम डे को लोग किस तरह से व्यक्त कर रहे हैं…. पढ़ें।


प्रशांत टंडन-

प्रेस फ़्रीडम डे की क्या ही बधाई दें. नेहा सिंह राठौर और डॉ मेडुसा (माद्री काकोटी) पर सोशल मीडिया पोस्ट्स की वजह से FIR हैं, 4PM चैनल बंद करा दिया गया, कुणाल कामरा पर इतने मुकदमे कर दिये गये कि उन्हे अपना राज्य छोड़ कर तमिलनाडु में रहना पड़ रहा है.

बोलने की आज़ादी की संवैधानिक गारंटी है लेकिन कानून एक भी नहीं है. जब सरकार अंकुश लगाती है तब सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देकर बचाव करना पड़ता है.


अवधेश ठाकुर-

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 151 है क्योंकि भारतीय मीडिया..

  • सच को दबाती है
  • झूठ को फैलाती है
  • सत्ता को सवालों से बचाती है
  • विपक्ष से अनर्गल सवाल करती है
  • अपने ज़मीर को बेचती है
  • समाज को तोड़ती है

हमें तो यही बताया गया था कि पत्रकार की कलम, न अटकनी चाहिए, न भटकनी चाहिए।

उम्मीद है भारतीय मीडिया इस बात की अहमियत को समझे। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की सभी सच्चे पत्रकारों को हार्दिक शुभकामनाएं।


एडवोकेट रत्नेश-

प्रेस फ्रीडम….. पेरिस स्थित इंटरनेशनल NGO रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RWB) के ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स- 2025’ में भारत को 180 देशों में 151वीं रैंकिंग पर रखा गया है, और हम लोग इसी मीडिया को सर आंखों पर बिठाएं हुए हैं और उन पर अपनों से भी ज्यादा भरोसा करते हैं।

इंडेक्स में इरीट्रिया सबसे निचले पायदान पर और नॉर्वे पहले पायदान पर है जबकि चीन की हालत अफगानिस्तान से भी नीचे है।


पवनजीत कश्यप-

भारत में कहने को तो प्रेस स्वतंत्र है। लेकिन प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों की सूची में भारत 151वें स्थान पर है।

इसका अर्थ यह है कि भारत में प्रेस/न्यूज़ चैनल स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं हैं। क्योंकि इनके धनकुबेर मालिक किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़े हुए हैं। इनमें कुछ न्यूज़ चैनलों की अधिकतर खबरें और रिपोर्ट्स प्लांटेड होती हैं जो कि लोगों को बरगलाती हैं। कहने को तो कुछ न्यूज़ चैनल खुद को नम्बर 1 कहते हैं लेकिन वो चापलूसी, मक्कारी और अफवाहें फैलाने में ही नम्बर 1 हैं।


फिरोज अहमद-

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2025 देखकर लगता है कि अब कलम भी डर-डर कर चलती है। भारत में पत्रकारिता इतनी आज़ाद है कि हर सवाल पूछने से पहले वकील से सलाह लेनी पड़ती है।


सुचेंद्र मिश्रा-

आज वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे है और यह हांगकांग के 10 पत्रकार हैं जिन्हें चीन की सरकार ने जेल में डाल रखा है। गुनाह केवल इतना है कि हांगकांग की चीनी सरकार की जन विरोधी नीतियों का विरोध। हमारे यहां यह समय नहीं आता क्योंकि हम इससे एडवांस वर्जन पर काम करते हैं। हमारे यहां पर सरकारें पत्रकारों को परेशान नहीं करतीं बल्कि मालिकों के सामने ही हड्डियां डाल दिया करती हैं। और कोई फिर भी फ्रीडम- फ्रीडम करें तो उसके लिए अलग-अलग विभाग हैं..!!

यही कारण है कि जब से प्रेस फ्रीडम इंडेक्स शुरू हुआ है तब से भारत उसमें अपनी अब तक की सबसे निचली पायदान पर है But who cares …!!

यदि आपकी बात का कोई विरोध नहीं करता तो समझ लीजिए कि आप जीबी रोड के “पत्रकार” हैं, आपने अपने जीवन में अब तक सभी को “खुश” ही किया है.. जबकि आपका काम खुशी परोसना नहीं था..!!

राजनीतिक आधारों पर सच और झूठ का निर्णय करने वाले लोग यह कभी नहीं समझेंगे कि उन्हें किस तरह से ब्रेक के बाद खबरों में यू टर्न लेना पड़ता है..!!


हेमंत कुमार-

मितरों! ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ पर केक-वेक काट लिया हो। गिफ्ट सिफ्ट सहेज लिया हो। प्रशस्ति पत्र समेट लिया हो तो मध्य प्रदेश में पत्रकारों की पिटाई की खबर भी पढ़ लो।

खबर है कि भिंड के एसपी साहब ने पत्रकारों को घर से उठवाकर अपने आवास पर मंगवाया फिर लाठियों और लात घूसों की बौछार करा दी।

ऐसे समय में राहत इंदौरी साहब की कहीं बात भी याद कर लो…. लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।’

प्रेस फ्रीडम डे की ताकत बढ़ाती ये खबर भी पढ़ें…

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