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सुख-दुख

अब अखबारों और टीवी में विजय राय जैसे साफ तबीयत के लोगों का मिलना दुर्लभ है!

विशाल तिवारी-

एक संपादक जो अभिभावक जैसा था। कैंसर से पीड़ित राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक डॉ विजय राय जी आज अनंत यात्रा पर निकल पड़े। कसया (कुशीनगर) से दिल्ली तक के सफर में जो भी उनसे मिला सभी के पास उनसे जुड़ा कोई न कोई किस्सा जरूर मिलेगा। वो भी ठेठ पूर्वांचली तेवर के साथ।

एक जिंदादिल और जीवट व्यक्ति के रूप आप सदैव स्मृतियों में रहेंगे, जो विषम परिस्थितियों में भी हमेशा अपने साथियों के साथ खड़ा रहता था।

हंसमुख, विनम्र, सरल और मिलनसार व्यक्ति थे जो पहली मुलाक़ात में ही अपनी छाप छोड़ देते थे। अपने करियर की शुरुआत अकादमिक जगत में एक शिक्षक के रूप में की थी। लेकिन पत्रकारिता में रुचि के चलते उन्होंने बतौर पत्रकार राष्ट्रीय सहारा अखबार में संवाददाता के रूप में कार्य करना प्रारंभ कर दिया। खबरों के चुनाव, प्रस्तुतिकरण और चुटीली हेडलाइन्स देने के लिए उन्हें जाना जाता है।


दिलीप चौबे-

प्रिय विजय। आपका जाना ऐसा लगा मानो भरी दुपहरिया में सूर्यास्त हो गया।यह भला कोई जाने कि उम्र थी। परिवार और समाज दोनों को तुम्हारी बहुत जरूरत थी। लेकिन नियति पर किसी का वश नहीं। मेरा वर्षों का व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि सामाजिक सरोकार और परोपकार के मामले में तुम्हारे जैसा न कोई था और न होगा। जहाँ गये हो वहाँ इसी तरह हमेशा मुस्कुराते रहना। याद तो बहुत आओगे। हम सब की स्मृतियों में हमेशा बने रहोगे। सादर नमन।


संजय राय-

विजय राय मेरे बड़े भाई जैसे थे। शुद्ध रूप से पत्रकार। राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, पीएमओ समेत कई बीट की रिपोर्टिंग हमने साथ साथ की है, जिसकी अनेक मधुर स्मृतियां हैं।


एलएन शीतल-

मैं आपका ताबेदार हूँ आज भी! तब मैं सहारा में ‘रोहिंग्या’ था. तभी सहारा के शिखर-पुरुषों ने आपकी बाइज़्ज़त वापसी की थी. मेरी सेवाएँ आपकी सिपुर्दगी में दे दी गयी थीं. शुरू में आप मुझ पर थोड़ा कम यकीन करते थे. वो धीरे-धीरे बढ़ा. वैसे तो आप अपनी फ़ितरत के मुताबिक़ दफ़्तरी प्रोटोकॉल से मुक्त ही रहते हैं, लेकिन मैं अपने साथ आपको कुछ ज्यादा सहज पाता था और आप हमेशा मेरे ‘बड़प्पन’ का मान रखते थे.

वो दिन! मेरे सेल-फोन का ‘स्टाइलस’ कहीं गुम हो गया था और मैं अपनी आदत के मुताबिक़ बहुत बेचैन हो उठा था. तब आप नयी दिल्ली गये थे. मैंने आपको फोन किया और अनधिकार फ़रमाइश कर डाली- आप बाज़ार से स्टाइलस लेते आइएगा. आकर अपने चैम्बर में बैठ गया. अचानक लगा कि आप लौट आये हैं, तो आपके चैम्बर में दाखिल हुआ. ग़ज़ब नज़ारा था! आप बहुत परेशान से उस सोफ़े को उलट-पुलट रहे थे, जिस पर मैं सुबह बैठा था. मैंने देखा कि आपकी मेहनत रंग लायी और स्टाइलस आपके हाथ में था. आपको नहीं मालूम था कि मैं यह सब करते हुए आपको देख रहा हूँ. आपकी चाहत का वह नज़ारा ताउम्र भूल नहीं पाऊँगा मैं!

जैसा कि मैं कह चुका हूँ, मुझे पत्रकारिता में बाहर भले ही कितना भी सम्मानित माना जाता रहा हो, लेकिन सहारा परिसर में मेरे शिखर-शत्रुओं ने मुझे चिरकुट बना कर रख दिया था. उन तमाम चिरकुटों की औकात मैं जानता था. वे मुझे फूटी आँख नहीं सुहाते थे और उनकी आँखों में मेरे लिए तैरती हिकारत को भी आसानी से समझा जा सकता था. आप भी पूरे सीन से वाकिफ़ थे. इसके बावज़ूद लंच के वक़्त जब भी कोई खान-पान पार्टी होती, आप अनावश्यक होते हुए भी मुझे अवश्य शामिल करते. मैं जानता हूँ कि उन सब कूप-मंडूकों की नापसन्दगी के बावज़ूद मेरा मान रखने के लिए यह सब करते थे आप!

आप मेरी ज़िन्दगी के सबसे अच्छे क़िस्सागो हैं. जब आप क़िस्सागोई में मानव-शरीर के अंग-प्रत्यंगों का बखूबी इस्तेमाल करते हुए सीन को आगे बढ़ाते थे, तो लगता था कि तानसेन की महफ़िल जवां है. लिंग-भेद से ऊपर उठकर सब हाज़रीन डूब जाते थे कथाओं का आनन्द लेने में. अब वो लुत्फ़ कहाँ?

कई बार लंच के वक़्त आप दिल से जुड़े प्रसंग सुनाते थे तो मैं एकात्म हुए बिना नहीं रह पाता था. तब आप मेरे खाने की प्लेट का ध्यान जिस आत्मीयता से रखते थे, वैसा कोई नहीं कर सकता. मुझे याद है जब आपने सीना ठोक कर मुझे कहा था-‘सर! मेरे रहते फ़िक्र करने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं. बिन्दास रहिए, ऐश करिए. और फिर, आपके रहते मैंने ऐश ही की और बिंदास भी रहा!! आपने मेरे ‘भाव’ इस क़दर बढ़ा दिये थे कि जो लोग कभी मुझे अपने पास बिठाने से कतराते थे, वे अब मुझे अपने पास बिठाने को तरसते थे!

बॉस! मैं आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ आपकी उस बेपनाह मुहब्बत के लिए, जो आपने मुझे दी? विजय राय जी! आज आपका जन्मदिन है. मैं इस पाक़ीज मौके पर परमात्मा से केवल यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि आप भरपूर जीयें, आपका यश बढ़े और आपकी अन्यतम सहजता, संवेदनशीलता और विनोद-प्रियता यूँ ही बनी रहे!!

यह पोस्ट मैंने 10/10/18 को श्री विजय राय जी के जन्मदिन पर लिखी थी. हालांकि वह आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनकी रूह आख़िरी साँसों तक हमारे साथ रहेगी।


ओमकारेश्वर पांडेय-

भाई विजय राय नहीं रहे…! यह स्तब्ध कर देने वाली खबर मुझे बहुत देर से मिली। मन भारी हो गया, भीतर कहीं एक गहरी उदासी घर कर गई। आजकल फेसबुक कम देखता हूँ, शायद इसीलिए समय पर पता नहीं चला।

‘राष्ट्रीय सहारा’ में विजय जी और मैं एक ही ब्यूरो में साथ-साथ काम करते थे। फिर जब आदरणीय सहारा श्री ने मुझे सीनियर ग्रुप एडिटर की जिम्मेदारी सौंपी, तब भी विजय जी के साथ हमने मिलकर कई अहम कामों को अंजाम दिया। पत्रकारिता से इतर भी, जब भी कोई मसला उठता, हम देर तक बात करते। हर बातचीत में उनकी तीव्र बुद्धिमत्ता, गंभीर चिंतन और व्यापक जानकारी की झलक मिलती। हमने वर्षों तक साथ संसद की रिपोर्टिंग की, फिर ‘सहारा समय’ टीवी नेटवर्क में अरुप घोष के साथ भी साथ रहे।

आज अफसोस से कहना पड़ रहा है कि पत्रकारिता की दुनिया का यह तेजस्वी सितारा इतनी जल्दी अस्त हो गया। राष्ट्रीय सहारा के हमारे साथी और मौजूदा स्थानीय संपादक श्री रत्नेश मिश्र से विस्तार से जानकारी मिली कि भाई विजय राय पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। कई महीने पहले मेरी उनसे बात हुई थी। न तब उनकी आवाज़ में कोई थकान थी, न ही उन्होंने बीमारी का कोई ज़िक्र किया। वे बहुत संयमित और संकोची स्वभाव के थे।

आज तड़के उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने अंतिम साँस ली। वे मात्र 58 वर्ष के थे — मुझसे एक साल छोटे, पर पहले चले गए। यही जीवन की नीयति है। हमारे दशकों पुराने संबंध थे। ये मेरे लिए निजी क्षति है।

रत्नेश जी ने बताया कि उनकी अंतिम यात्रा रविवार शाम नोएडा के सेक्टर-94 स्थित मोक्षधाम से निकली, जहाँ पत्रकारों, नेताओं, अधिकारियों, अधिवक्ताओं और समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने नम आँखों से उन्हें विदाई दी। उनके छोटे भाई विनय राय ने मुखाग्नि दी। उनके एक और भाई, श्री प्रदीप राय, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और एपीएन न्यूज़ चैनल के स्वामी हैं।

राजस्थान के राज्यपाल श्री कलराज मिश्र, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव, भाजपा अध्यक्ष श्री भूपेंद्र सिंह चौधरी, कांग्रेस नेता श्री अशोक गहलोत सहित अनेक नेताओं ने विजय राय जी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया।

डॉ. विजय राय का जन्म उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुआ था। उन्होंने अपनी पत्रकारिता की यात्रा एक साधारण संवाददाता के रूप में शुरू की और अपनी प्रतिभा, ईमानदारी व सौम्य स्वभाव के बल पर राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक तक पहुँचे। वे पहले नेशनल ब्यूरो चीफ बने, फिर ‘सहारा समय’ टीवी की जिम्मेदारी संभाली और अंततः पूरे ‘राष्ट्रीय सहारा’ समूह के शीर्ष संपादक बने।

विजय जी अपने पीछे पत्नी श्वेता राय, बेटी शिवि राय, माता-पिता, भाइयों और एक भरे-पूरे परिवार को छोड़ गए हैं। उनके शोकसंतप्त परिजनों के प्रति मेरी गहन संवेदनाएं।

जाना तो हम सभी को है, पर आप पहले चले गए। विजय जी, मेरे पास शब्द नहीं हैं। अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!


विभूति नारायण चतुर्वेदी-

क्या बाबा! बनारस में सब टाइट? जब भी फोन आता, पहली लाइन यही होती थी उनकी। सहारा मीडिया में रिपोर्टर से लेकर समूह संपादक तक का सफर तय करने वाले श्री विजय राय का दुनियावी सफर भले ही खत्म हो गया हो, पर हम जैसों के जीवन पर ताउम्र का असर छोड़ गये हैं। खबर हो, खबर का शीर्षक हो या फिर कोई समस्या। साथ ही छोड़ गये हैं अपनी संवाद शैली, मस्तमौलापन, तामझाम से दूरी, प्रोटोकॉल से अरुचि।

बनारस आते, चले जाते, फिर पहुंचकर बताते कि आया था, अगली बार बताकर आउंगा। बनारस से कोई खबर होती तो पूछते क्या एंगल ले रहे हो? शीर्षक लगकर खबर गयी हो तो फोन कर बोलते कि आपके शीर्षक में एक शब्द जोड़ दिया है। सुलभता इतनी कि सभी फोन उठा लेते या कर लेते। स्ट्रिंगर हो, ब्यूरो प्रमुख हो, ड्राइवर हो , चपरासी हो या फिर और। उसकी बात सुनते। पलटकर फोन करते और कहते कि फलाने की समस्या है, उसकी मदद कर दो। मैं कहता कि बदमाशी करता है तो कहते ठीक है, आप अपनी अच्छाई क्यों छोड़ोगे। मैं सिर्फ यही कहता ठीक है।

शीर्ष पद पर आपको ऐसे व्यक्तित्व विरले ही मिलेंगे। एक बात और जिसके साथ खड़े होते तो डिगते नहीं थे। एक बार नियुक्ति प्रक्रिया चल रही थी। किसी ने मिसफीडिंग कर दी। फोन करके भड़क गये। अपनी कहकर फोन रख दिया। कुछ सुना नहीं। हम भी कहीं गलत नहीं थे, सो छुट्टी का मेल कर घर बैठ गये। जिस दिन छुट्टी खत्म हुई और सोच ही रहा था कि छुट्टी बढ़ा लेता हूं कि उनके निजी सहायक का फोन आया कि आप कहां हैं? मैंने कहा घर। उन्होंने कहा – मेल भेजे हैं? मैंने कहा- आप ग्रुप एडिटर वाली आईडी चेक कर लीजिए। फिर उन्होंने कहा कि सर ने एक जानकारी मांगी है वह सूचना आज ही मेल कर दीजिए।

दरअसल यह विजय सर की तरफ से ऑफिस ज्वाइन करने का संदेश था। फिर उनका फोन आया कि कुछ कह देता हूं तो छुट्टी लेकर बैठ जाते हो, अरे भाई मेरी कोई दूसरी दुकान नहीं है, जो है यही है। लेकिन सर! आपने दूसरी दुकान खोल ली, ठीक वैसे ही जैसे कहते थे अगली बार बताऊंगा। विनम्र श्रद्धाजंलि

(पुनःश्चः बीएचयू कनेक्शन के बावजूद हमारा पहला परिचय 2001 में हुआ जब मैं यूएनआई-वार्ता और आप राष्ट्रीय सहारा में थे। सूत्रधार थे श्री नीरज वाजपेई जिनसे मिलने विजयजी यूएनआई आते और कैन्टीन का कभी-कभी लुत्फ उठाते।)


दया शंकर राय-

आज अभी थोड़ी देर पहले ही राष्ट्रीय सहारा के समूह सम्पादक विजय राय जी के न रहने की मनहूस खबर मिली..! यह अविश्वसनीय और स्तब्ध कर देने वाली खबर थी। पता चला कि उन्हें कैंसर था..! इधर करीब 10 महीने से उनसे बात नहीं हुई थी इसलिए यह जानकारी भी नहीं थी।

राष्ट्रीय सहारा में काम करने के मेरे अजब-गजब के अनुभव हैं..! अनेक तरह के लोग रहे, उन पर लिखने का यह वक़्त नहीं..! कभी लिखूंगा तो बहुत दिलचस्प होगा..! सहारा ग्रुप में उठापटक विलक्षण किस्म की थी..! विजय जी भी इसके शिकार होते रहते थे! मैं तो अपने अड़ियल मिज़ाज के चलते सहारा की इस संस्कृति का कभी लुत्फ़ नहीं ले पाता था न ही उसमें कभी रम पाया पर विजय तो थोड़ा बहुत लुत्फ़ लेते रहते थे..! लेकिन उनकी एक खूबी थी जिसकी वजह से ग्रुप में वह औरों से अलग थे। और वह था उनका बिंदास और याराना अंदाज..!

बेहद जिंदादिल और पेट के अंदर कोई भी बात न रखने वाले इनसान थे। उनकी जैसी हंसी और खुले ठहाके शायद ही ग्रुप में किसी के अंदर थी। पेट के अंदर बात न रखने पर याद आया कि मौके-बेमौके सहारा के मालिकानों पर भी अपने अंदाज में चुटकी लेने से बाज नहीं आते थे..! वे ग्रुप एडिटर थे और मैं दो तीन केंद्रों पर स्थानीय संपादक रह चुका हूँ। बाद में ग्रुप से मेरे अलग हो जाने के बाद भी कभी-कभार फोन पर उनसे बात हो जाया करती थी।

वे समूह संपादक थे पर उम्र के लिहाज़ से मेरे लिए अनुजवत थे। कई बार फोन न उठने पर बाद में काल कर खुद हंसते हुए अपने अंदाज में भइया प्रणाम करते हुए माफी मांगते..! अब अखबारों में सम्पादक तो छोड़िए साफ तबियत के लोगों का मिलना भी दुर्लभ है..! इस लिहाज से विजय राय जी स्मृतियों में रहेंगे अपनी बिंदास हंसी और ठहाकों के साथ..! उनका इस तरह असमय जाना बहुत सालने वाला है..! विनम्र नमन उन्हें…


आनंद राय-

बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई,
इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया!

ॐ शांति———— आज सुबह बहुत ही मनहूस खबर आयी। राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक डॉ विजय राय का असमय निधन हो गया। कुशीनगर से बनारस और फिर दिल्ली तक उन्होंने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व की छाप छोड़ी। आज उनके निधन से एक बड़ी रिक्तता महसूस हो रही है। बीएचयू के दिनों में मनोज तिवारी (अब सांसद) और विजय भाई के क्रांतिकारी तेवर की लंबी कहानी है। वह अक्सर उन दिनों की बात करते और दो तीन और साथियों का नाम लेते। उनके जरिये ही उन सभी लोगों से संपर्क भी बना।

भोजपुरी गायन के क्षेत्र में मनोज तिवारी का शुरुआती माहौल बनाने में मुझे डॉ विजय राय और दिवंगत पत्रकार धर्मेंद्र पांडेय की अहम भूमिका हमेशा याद रहेगी। वे किसी की पैरवी बहुत जिद और अपनापन से करते। स्वभाव से विनम्र, दिल-दिमाग़ से बहुत ही मजबूत अपने प्रिय भाई को श्रद्धांजलि देते हुए मन बहुत आहत है। आना-जाना तो सतत प्रक्रिया है, लेकिन अचानक उनकी इस यात्रा ने बहुत कुछ खाली कर दिया। क्रूर नियति ने हम सबसे एक योद्धा छीन लिया।

वाकई विजय भाई बहुत बहादुर थे। कैंसर जैसी बीमारी से अपनी आदत के अनुसार हंसते हुए लड़े। जैसे पुलिस महकमे में रहते हुए उनके पिताजी भी दबंगों और माफिया को दुरुस्त करने में कभी पीछे नहीं रहे। उन्हें यह तेवर तो विरासत में मिला और अंत तक कायम रहा। बेमिसाल विजय भाई की यादें हमेशा जिंदा रहेंगी!

ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें और शोक संतप्त परिवार और मित्रों को इस अपार दुख से उबरने की शक्ति दें। सादर नमन!


दुर्गेश उपाध्याय-

हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे.

एक ज़िंदादिल इंसान, हँसमुख व्यक्तित्व के स्वामी और यारों के यार!! दिल के साफ़ और ज़ुबान के पक्के व्यक्ति थे.

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