बड़े भाई विजय राय का आख़िरी चरण स्पर्श करते छोटे भाई एडवोकेट प्रदीप राय!



यशवन्त सिंह-
सहारा ग्रुप के अखबार राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक विजय राय का अचानक यूं चले जाना, उनसे जुड़े सभी पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को आज रुला गया। देश के वरिष्ठतम पत्रकारों में शुमार विजय राय राष्ट्रीय सहारा अख़बार में फिलहाल ऐसे इकलौते पत्रकार थे, जिन्होंने स्ट्रिंगर (ट्रेनी रिपोर्टर) से लेकर इस राष्ट्रीय अखबार के समूह संपादक तक का सफर तय किया।
विजय राय इकलौते ऐसे समूह संपादक थे, जो मीडियाकर्मियों की सैलरी में देरी होने पर प्रबंधन से भिड़ जाते थे। हाल ही में जब दो महीनों से सैलरी विलंबित हुई, तो नोएडा कैंपस में कर्मचारियों ने कार्य बहिष्कार कर दिया। मीडिया हेड सुमित राय ने विजय राय को बुलाकर कहा, “देखिए, मामला शांत कराइए।”
विजय राय आए, सभी को समझाया और बोले, “यदि अगले सप्ताह तक सैलरी नहीं आई, तो मैं खुद इस्तीफा दे दूंगा।”
और वाक़ई, दो दिन बाद सैलरी आ गई।
जब भी दिल्ली में सैलरी की फाइल फाइनल होती थी, वह व्हाट्सएप पर सभी को लिखित सूचना भेजते थे—“मस्ती से काम करें, सैलरी आ गई है।” यह छोटी सी बात पूरे दफ्तर में उत्साह भर देती थी।
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में जन्मे विजय राय की पढ़ाई गोरखपुर विश्वविद्यालय और बीएचयू, वाराणसी में हुई थी। वह दिल्ली में राष्ट्रीय सहारा में एक रिपोर्टर के रूप में जुड़े और सैकड़ों लोगों को पत्रकार बनाकर नौकरी दिलाई। लगभग आधा दर्जन लोगों को संपादक बनाया।
रिपोर्टर से शुरुआत कर दिल्ली ब्यूरो के पहले स्टेट ब्यूरो चीफ, फिर नेशनल ब्यूरो चीफ, स्थानीय संपादक, समूह संपादक और सहारा ग्रुप के सेकंड मीडिया हेड बने।
नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने लोकसभा और राज्यसभा की रिपोर्टिंग के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों के साथ कई बार विदेश यात्राएं कर राष्ट्रीय सहारा को जीवंत बनाए रखा।
अपनी मजाकिया शैली के कारण वह हमेशा चर्चित रहते। नोएडा कैंपस में कई बार मीडियाकर्मी उन्हें ‘बॉस’ कहने की औपचारिकता भूल जाते थे।
जब भी मीडियाकर्मियों की कोई समस्या होती, तो सबसे पहले विजय राय को ही याद किया जाता। उनकी बातों में कुछ ऐसा जादू था कि लोग उन्हें तुरंत मान लेते थे।
यदि कभी कर्मचारियों को किसी प्रकार की दिक्कत होती, तो वह हायर मैनेजमेंट से लड़ने में संकोच नहीं करते थे।
पिछले दिनों एक प्रोजेक्ट की मीटिंग में प्रस्ताव आया कि कुछ कर्मचारियों को हटा दिया जाए। इस पर वह भड़क उठे और सुमित राय से कहा, “मैं इस प्रोजेक्ट पर हस्ताक्षर नहीं करूंगा। जिसको लागू करना हो, वह करे।”
उन्होंने कहा, “जब हम किसी की सैलरी बढ़ा नहीं पा रहे हैं, तो हटाने वाले हम कौन होते हैं?”
मीडिया हेड ने नाराजगी में नोटिस भी भेजा, लेकिन विजय राय ने जवाब में कहा, “आप जो कार्रवाई करना चाहें कर सकते हैं, लेकिन मैं कम सैलरी में काम कर रहे कर्मचारियों को निकालने के पक्ष में नहीं हूं। मुझे इसके लिए त्यागपत्र भी देना पड़े, तो दूंगा।”
उनके बारे में एक कहानी और प्रसिद्ध है—जब भी कोई गंभीर रूप से बीमार होता, वह सिर्फ फोन कर हालचाल नहीं पूछते, बल्कि घर जाकर उन्हें सांत्वना देते।
2018 में राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ के संपादक अरुण शाही की तबीयत खराब होने पर वह उन्हें खुद एम्स ले गए और रातोंरात एक लाख रुपये इलाज के लिए भिजवाया, जिससे उनकी जान बच सकी।
इसी तरह मनमोहन नाम के रिपोर्टर की माताजी का देहांत हुआ, तो वह दो दिन बाद खुद लखनऊ जाकर शोक व्यक्त करने पहुंचे।
दिल्ली हो या लखनऊ—किसी भी रिपोर्टर के साथ कोई भी दुर्घटना होती, तो विजय राय पूरे समर्पण से उसके लिए खड़े हो जाते।
आज जब उनके निधन की खबर आई, तो राष्ट्रीय सहारा नोएडा कैंपस में हर आंख नम हो गई।
सभी ने एक स्वर में कहा—
“अलविदा विजय राय जी, आप बहुत याद आयेंगे।”
देखें अंतिम संस्कार की कुछ अन्य तस्वीरें!






