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डीडी न्यूज इतना खूँखार, नफरती और क्रूर कभी नहीं रहा, जैसा अब है!

राहुल देव-

टल जी की सरकार में प्रसार भारती के तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी CEO राजीव रत्न शाह ने स्वयं चयन/निर्णय करके मृणाल पांडे और मुझे उस समय तक अभूतपूर्व पारिश्रमिक पर डीडी न्यूज़ के प्राइम टाइम एंकरों के रूप में अनुबंधित किया था। हम दोनों का रिकॉर्ड स्वतंत्र पत्रकारिता और संपादकत्व का रहा था। हमें इसीलिए लिया गया था कि दूरदर्शन समाचारों को हम एक सरकारी सेवक वाली छवि से निकाल कर स्वतंत्र, सम्मानित प्रतिष्ठा दिला सकें।

उन दो-ढाई साल में हमें एक बार भी सरकार से कोई आदेश-निर्देश नहीं मिला। अपने विवेक के आधार पर चर्चा करने, विश्लेषण करने-बोलने की पूरी स्वतंत्रता थी। हालाँकि एक अनकहा अप्रत्यक्ष सत्य यह था कि सरकार के सीधे विरुद्ध जाने वाली बात हम नहीं कहेंगे। हम दोनों ने उस मर्यादा को निभाया।

यह भी लगे हाथ बता दूँ कि डीडीन्यूज़ का विचार मेरा था। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री रवि शंकर प्रसाद के कक्ष में उनके, तत्कालीन प्रसार भारती अध्यक्ष एम वी कामथ और प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार सुधीन्द्र कुलकर्णी के साथ बैठक में मैंने बाकायदा लैपटॉप पर प्रेज़ेन्टेशन (PPT) बना कर उन्हे दिखाया था। मेरा सुझाव था कि जब नेशनल चैनल पर मुख्यतः मनोरंजन धारावाहिक आदि सामग्री प्रसारित की ही जा रही थी तो दूसरे मनोरंजन चैनल डीडी मेट्रो को बदल कर 24 घंटे का संपूर्ण डीडीन्यूज़ बना दिया जाए।

सुझाव स्वीकार किया गया और डीडीन्यूज़ अस्तित्व में आया। उसके बाद क्या हुआ वह अन्तर्कथा कभी और।

अटल जी के उसी दूसरे कार्यकाल में उनका हिंदी सूचना सलाहकार बनने का भी प्रस्ताव प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र से आया था। हमारी भेंट हुई और कुछ सोच विचार के बाद मैंने फोन पर उन्हें सहमति दे दी।

ईमानदारी से यह कहना ज़रूरी है कि इस स्वीकृति के पीछे उस महत्वपूर्ण पद का, सत्ता के उस सर्वोच्च स्तर पर काम करने के अनुभव का प्रलोभन था। आज लगता है कि ईश्वर की ऐसी कृपा हुई कि उसने मुझसे ही ऐसी मूर्खता करवा दी कि वह प्रस्ताव कार्यान्वित न हो सका। सत्ता के सान्निध्य के लालच में लिया गया निर्णय अगर सफल हो जाता तो मेरी सारी पत्रकारिता और स्वायत्तता का रिकॉर्ड लांछित हो जाते।

डीडी न्यूज़ के उन दिनों मृणाल जी और मुझे अपने विवेक और समझ के अनुसार काम करने का जो अवसर मिला वह आज सपने जैसा लगता है। प्रसार भारती तब भी सरकारी प्रभाव में था, उसके व्यापक उद्देश्यों की पूर्ति का प्रयास करता था लेकिन उसमें एक अच्छी पत्रकारिता का द्वीप भी था। हम पर कभी दबाव नहीं बनाया गया। वह सरकार और उसके तौर-तरीके, चिंतन और कार्य शैली भी इतना अलोकतांत्रिक, नफरती, क्रूर, असहिष्णु और विभाजक नहीं थे।

अशोक श्रीवास्तव के पिता जी से अपने संबंधों का उल्लेख नहीं करना चाहते। वे सज्जन थे। अशोक भी तब सौम्य था। अब का खूँखार, नफरती और धार्मिक-राजनीतिक शत्रुता से भरा हुआ नहीं था। उसके जैसे कुछ और रत्न भी अब डीडी न्यूज़ में स्थापित हैं, खुले आम मुस्लिम घृणा, भाजपा के राजनीतिक विरोधियों और उसके सांप्रदायिक संकीर्णता आधारित ‘राष्ट्रवाद’ से असहमत लोगों को गद्दार कहने के लिए अभय-प्राप्त।

अपने जन्म से ही प्रसार भारती एक श्रेष्ठ, विश्वस्तरीय (बीबीसी हमेशा उसके सपनों का आदर्श रहा है), विश्वसनीय, प्रामाणिक लोक प्रसारक बनने के उद्देश्यों के विपरीत तत्कालीन सरकारों का भोंपू रहा है। किसी भी सरकार ने उसे कभी सच्ची स्वायत्तता नहीं दी भले ही उसका लोक पर प्रभाव निरंतर क्षीणतर ही होता गया है। इसलिए इसके लिए अकेली भाजपा सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता। हर सरकार ने जनता के पैसे से चलने वाले इस ‘राष्ट्रीय संपदा’ संस्थान का अपने सीमित हितों के लिए उपयोग किया है।

लेकिन आज जैसा विषैला, विभाजक, कुरूप वह कभी नहीं रहा है।

इस सरकार और प्रसार भारती बोर्ड को यदि ज़रा भी, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय छवि की चिंता हो, दिखावे के लिए ही उसको सम्मानित बनाए रखना हो तो उसको सरकारी बनाए रखते हुए भी अशोक ऐसे मीडिया अपराधियों को बाहर करना चाहिए। यह भारत के लोक प्रसारक की गरिमा और प्रतिष्ठा का सवाल है।

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