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टीवी, अखबारों और एजेंसियों के हजारों गुमनाम पत्रकारों को लोग नहीं जानते!

विमल कुमार-

नडीटीवी की निधि कुलपति के रिटायर होने पर कई लोगों की पोस्ट देखी तो याद आया। हिंदी के पत्रकार अपना बखान तो खूब करते हैं चाहे वह टेलीविजन के हो या अखबार के, चाहे वह रिपोर्टर हो या एंकर लेकिन हिंदी में गुमनाम पत्रकारों को कोई नहीं याद करता यहां तक की जनता भी नहीं, चाहे वे एजेंसी के पत्रकार हो या कस्बे और दूर दराज इलाके के स्ट्रिंगर हो जो खबर ब्रेक करते हैं और देशभर में खबरों को फैलाते हैं।

आपने ऐसे पत्रकारों के रिटायर होने पर चर्चा सुनी। नहीं। 5 साल पहले रिटायर मैं भी हुआ हूँ।

अखबारों के पत्रकारों का तो नाम छपता खबरों में लेकिन एजेंसी के पत्रकारों का नाम खबरों में कहीं नहीं होता है क्योंकि एजेंसी के पत्रकारों का नाम छपता नहीं है, इसलिए उन्हें कोई नहीं जानता। पीटीआई और uni के रिपोर्टर वर्षों से खबर देते रहे। अखबारों में टेलीप्रिंटर पर लोग इंतज़ार करते रहे कि पीटीआई-यूएनआई ने क्या खबर दी है। उन खबरों को देखने के बाद ही अखबारों के रिपोर्टर खबर लिखते थे या उसमें कुछ जोड़कर अपनी रिपोर्ट बनाते थे। कई बार तो चुरा लेते रहे, टीपते रहे, कॉपी पेस्ट करते रहे लेकिन गुमनामी में हम जैसे पत्रकार रहे।

जो एंकर कभी संसद नहीं गए कभी प्रेस कांफ्रेंस नहीं गए वे आज स्टार हैं। पूरी दुनिया उनको जानती है। लेकिन बीस साल संसद जाने के बाद हजारों प्रेस कांफ्रेंस जाने के बाद हम लोग गुमनामी में रहे।

1986 में मैं भी पत्रकार रहा एक न्यूज एजेंसी में। खबरें कैसे लिखी जाएं। यह आदर्श एजेंसी ने सिखाया। निष्पक्ष वस्तुपरक संतुलित खबरें। खबर लिखना बहुत कठिन काम है। अच्छे अच्छे लोग खबर लिख नहीं पाते। उनके हाथ पांव फूल जाते हैं।

एंकर से अधिक मेहनत रिपोर्टर करता है। रिपोर्टर भी लिख नहीं पाता। डेस्क के लोग सम्पादित करते हैं। लेकिन डेस्क के लोगों को कोई नहीं जानता।

प्रभाष जोशी ने कितने बड़े लोगों की कापी लाल रंग से रंग दी। इसका उदाहरण मैंने भी देखा है। एजेंसी आपको ठोक पीटकर पत्रकार बनाती है लेकिन वे गुमनाम पत्रकार होते हैं। गुमनाम पत्रकारों को गोयनका अवार्ड, चमेलीदेवी अवार्ड, प्रेम भाटिया अवार्ड नहीं मिलते इसलिए लोग उनको नहीं जानते।

टीवी चैनल की दुनिया तो 90 में फूली फली। लेकिन इस दुनिया का हर पत्रकार तुर्रम खान समझता है। कितनी खराब समझ दृष्टि और ज्ञान उनके पास है मगर कितना अहंकार उनके पास। लगता है देश वही चला रहे। नेताओं अधिकारियों की चापलूसी करते हमने भी देखा इनको।

निधि जी बहुत शालीन हैं इसमें कोई शक नहीं। उनके ज्ञान के भी किस्से हमने सुने हैं। निधि जी को मुबारक। वे अंजना और श्वेता सिंह से हर माने में बहुत बढ़िया हैं।

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1 Comment

1 Comment

  1. Sheela

    May 28, 2025 at 8:01 pm

    ये बताओ की कई बार मोची भी जबरदस्त जूते बना देता है। सफाई करने वाले भी बहुत सुंदर तरीके से गटर साफ कर देते हैं तो उनका नाम सुना तुमने कभी वह अपने काम में ईमानदार है तो तुम क्या मानते हो काम में ईमानदारी या पद के अनुरूप।।।।

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