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सियासत

होलोडोमोर त्रासदी : इस अनसुने व्यापक नरसंहार के बारे में जानेंगे तो काँप उठेंगे!

विजय सिंह ठकुराय-

साल 1932-33 में यूक्रेन में एक भीषण अकाल पड़ा था, जिसे “होलोडोमोर त्रासदी” कहते हैं। इस अकाल की सबसे खास बात यह है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक मानवनिर्मित अकाल था। या यूं कहिए – एक व्यापक नरसंहार का अस्त्र, जिसका उद्देश्य सुनियोजित रूप से यूक्रेन की आधी आबादी का सफाया करना था।

1930 के दशक की शुरूआत में सोवियत नेता स्टालिन ने यूक्रेन में कृषि का सामूहिकीकरण आरंभ किया था। अर्थात – भूमि का स्वामित्व अपराध करार दिया गया। समस्त भूमि राज्य की संपत्ति घोषित हुई और भूमि के मालिकों को अपनी ही जमीन का मजदूर बनने पर बाध्य किया गया। 1932 में “पांच डंठल कानून” पास किया गया, जिसके अंतर्गत खेत से एक गाजर तोड़ने पर भी जेल भेजने अथवा गोली मारने तक का आदेश था, भले ही चोर कोई बच्चा ही क्यों न सही। गांव-गांव में अनाज उत्पादन के लक्ष्य दिये गए। जो लक्ष्य प्राप्त करने में असफल रहते, उस पूरे गांव को घेर के सैनिक घर-घर की तलाशी लेते और मिट्टी खोद कर, चूल्हे फोड़ कर, दीवारें तोड़ कर कोई भी छुपा हुआ भोजन अपने कब्जे में लेकर गांव की घेराबंदी रखते, जब तक कि पूरा गांव एक कब्रिस्तान में न बदल जाए।

इस कानून के लागू होने से लेकर महज एक वर्ष में 54645 लोगों पर भोजन चुराने का मुकदमा चलाया गया और 2000 को फांसी पर लटका दिया गया। समकालीन सोवियत पुलिस अभिलेखों में भूख से तिलतिल कर मरते, और नरभक्षण पर जिंदा यूक्रेनी किसानों की अपार पीड़ा और निराशा के मार्मिक वर्णन पढ़ कर आप शायद कुछ समय के लिए अवसाद में चले जाएं।

यहाँ गौरतलब है कि जब यूक्रेन के लोग भूख से मर रहे थे, तब सोवियत रिकॉर्ड के अनुसार यूक्रेन से 1932-33 में 4.27 मिलियन टन अनाज की उपज हुई थी, जो 1 करोड़ से अधिक लोगों को एक वर्ष खिलाने के लिए पर्याप्त थी। फिर भी, सोवियत अभिलेखों और जनसांख्यिकी अध्ययन के आधार पर उस वर्ष यूक्रेन की आबादी 50 से 70 लाख कम हो गयी। यूरोप की “ब्रेडबास्केट” कही जाने वाली बेहद उपजाऊ भूमि यूक्रेन पर ये अजूबा क्यों हुआ, इसे समझने के लिए इतिहास की शरण में जाना होगा।

1933 में यूक्रेन की राजधानी का एक दृश्य

1917 में रूसी क्रांति के बाद इतिहास में ऑस्ट्रिया तथा रूस के साझे कब्जे में रहे यूक्रेन में राष्ट्रवाद का उदय हुआ और उसने स्वतंत्रता की घोषणा की। पर 4 साल बाद ही बोल्शेविक आर्मी द्वारा सैन्य दमन के सहारे यूक्रेन को जबरिया सोवियत संघ का एक अंग बना दिया गया। प्रारंभ में सोवियत संघ के शक्ति केंद्र “मास्को” की तरफ से यूक्रेन को संघ के भीतर एक गणराज्य के रूप में पर्याप्त स्वतंत्रता और उसकी सांस्कृतिक पहचान के प्रति सहिष्णुता बरतने का आश्वासन दिया गया था। पर वह साम्यवादी शासन ही क्या, जो अपनी बात से पलटी न मार जाए। और समय के साथ रूस ने यूक्रेन का दोहन और दमन आरंभ कर दिया। बदले में यूक्रेन में भी अपनी भिन्न सांस्कृतिक पहचान के प्रति राष्ट्रवादी भावनाएं और रूसी शासन के प्रति विद्रोह भावना पनपने लगी।

1930 की शुरुआत तक यूक्रेन में रूसी साम्राज्य के प्रति विद्रोह के 4000 पुलिसिया मामलें दर्ज किए जा चुके थे। इन दिनों सत्ता में आये स्टालिन ने इस विद्रोह के दमन तथा यूक्रेनियन राष्ट्रवादी अभिजात्य वर्ग के सर्वनाश के लिए “भोजन” का सहारा लिया। किसानों से जमीनें छीनी। भोजन छीना। भूमि पर दावा करने वालों को स्टेट का दुश्मन घोषित किया। जबरिया बंधक बना कर फसलें उपजाई, जिसका प्रयोग रूस के औद्योगिक विकास और आयात के लिए किया जाता। जो फसल उपजा रहे थे, उन्हें दो टाइम की रोटी नसीब नहीं थी। जो गांव फसल की टारगेट पूर्ति में असफल रहते, उनकी सैन्य घेराबंदी कर के तड़प-तड़प कर मरने पर मजबूर किया जाता। यूक्रेनियन किसानों के यूक्रेन छोड़ने अथवा कहीं भी यात्रा करने पर रोक लगा दी गयी, ताकि कोई भाग भी न सके।

परिणामस्वरूप इतिहास में “होलोडोमोर” नामक वह पन्ना दर्ज हुआ, जिसकी इबारतें पचास लाख से ज्यादा यूक्रेनियन के खून से लिखी हैं। इस बाबत आप गूगल कर सकते है। हजारों रिपोर्ट्स और किताबें मिल जाएंगी।

इस नरसंहार के बाद यूक्रेनियन राष्ट्रवाद का जिन्न कई दशकों के लिए वापस बोतल में चला गया। इस घटना को रूसी इतिहास में सेंसर कर दिया गया। जो किसी तरह रूस से भाग कर दूसरे देशों में शरण पा सकें, उन्होंने किस्सों, कहानियों, स्मृतियों और किताबों के सहारे इस नरसंहार की यादों को अक्षुण्ण बनाये रखा। जब अंततः सोवियत यूनियन का विघटन हुआ तो बंद अभिलेखागार खुले और यूक्रेनियन अस्मिता के दमन की खूनी कहानियां विश्व के सामने प्रकट होनी शुरू हुईं।

आज जब यूक्रेन “नाटो – नाटो” करता है तो आपको यह समझना पड़ेगा कि इस जिद के पीछे दशकों का भय, अत्याचार, नस्लीय संहार है, जो यूक्रेन ने झेला है। यूक्रेन ने तो शांति के लिए अपने 2000 नाभिकीय हथियार तक सरेंडर कर दिए थे, पर फिर भी शांति उसे हासिल न हुई और रूस ने कई बार उस पर हमले किये। सोचिए, अगर यूक्रेन ने अपने नाभिकीय हथियार त्यागने की सदाशयता न दिखाई होती तो आज किसी की हिम्मत थी, जो उसे आंख दिखाता? क्या हासिल हुआ उसे? आखिर यूक्रेन अपनी सुरक्षा के प्रति सशंकित क्यों नहीं होगा?

अगर आप इस युद्ध में रूस का यह कह कर समर्थन करें कि रूस हमारा पारंपरिक सहयोगी है तो बात समझ मे आती है। अगर आप इसलिए रूस का समर्थन करें, क्योंकि आपको जेलेन्सकी को मूर्ख बता कर अपने किसी नेता के नंबर बढाने हैं, तो भी बात समझ में आ ही जाती है।

पर अगर आप यूक्रेन पर रूस द्वारा ढाए गए ऐतिहासिक अत्याचारों को जाने बिना ही यह वकालत करते हैं कि शक्तिशाली ही कमजोर पर शासन करता है, यूक्रेन को रूस के सामने घुटने टेक देने चाहिएँ, अथवा पश्चिम के प्रभाव में यूक्रेन खामख्वाह ही यह जंग लड़ रहा है तो मुझे यह पता जरूर चल जाता है कि सदियों तक हमारा मुल्क आक्रांताओं का गुलाम क्यों रहा होगा।

कभी कभी तो शक होने लगता है कि अपनी अस्मिता के लिए घास की रोटी खाने वाले महाराणा प्रताप वाकई इसी देश में जन्में थे या नहीं?

एक बेहद मजे की बात सुनिए। पुतिन दुनिया में भले ही यह शिगूफा फैलाएं कि उन्होंने नाटो के भय से यूक्रेन पर हमला किया है पर अपने देश की जनता को कैसे चूतिया बनाते? जनता पूछती कि – अबे, यूक्रेन को आज तक किसी नाटो देश ने यह आश्वासन दिया ही नहीं कि उसे नाटो की सदस्यता दी जाएगी तो उस पर युद्ध कर के तू काहे कू देश के संसाधन खराब कर रहा है? अब देश को चूतिया बनाना था तो पुतिन साहब ने on record यह बोल कर हमला किया है कि वे यूक्रेन को “नाजीवाद” से मुक्त करना चाह रहे हैं।

अब यूक्रेन में नाजीवाद का क्या लॉजिक? यूक्रेन में एक पूजित नेता हैं, जिन्होंने सेकंड वर्ल्ड वार में यूक्रेन को आजाद कराने के लिए नाजी जर्मनी से मदद मांगी थी। आज यूक्रेन इन नेता का बड़ा सम्मान करता है। इस लॉजिक के आधार पर पुतिन ने यूक्रेन के नाजी प्रभाव में जाने की घोषणा कर के युद्ध कर दिया। अब सोचिए, हमारे एक नेता सुभाष चंद्र बोस भी हिटलर से मदद मांगने गए थे। हम आज उन्हें पूजते हैं तो कोई इस लॉजिक के आधार पर भारत को नाजीवादी घोषित कर सकता है क्या?

चीन हो या भारत, या पाकिस्तान, या रूस – हर जगह चरमपंथी इसी तरह चूतिया बना कर अपने देश को युद्ध में झोंकते हैं। कहीं राष्ट्रवाद के नाम पर, कहीं गजवा के हुक्म के नाम पर, कहीं “वन चाइना” का सब्जबाग दिखा कर तो कहीं हिटलर से घृणा को कैश कर नाजीवाद से लड़ने के नाम पर।

पता नहीं पब्लिक चूतिया बनना कब छोड़ेगी।

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