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सुख-दुख

गाज़ीपुर के वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र नाथ शुक्ला जी को डॉक्टरों ने “नो मोर” कह दिया!

अंकित मिश्रा-

हिंदी दैनिक “आज” के ब्यूरोचीफ एवं वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र नाथ शुक्ला जी नहीं रहे..

आपकी ख़बरों को पढ़ता था और आपसे सीखने को बहुत कुछ मिला सर…. ईश्वर श्री चरणों में जगह दें। ॐ शांति


कृष्णदेव नारायण-

शुक्ला जी नहीं रहे…. गाजीपुर के वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र नाथ शुक्ल जी का आज सोमवार को वाराणसी में निधन हो गया। हम उन्हें शुक्ला जी के सम्बोधन के साथ ही याद करते थे।

मेरे कार्यकाल के दौरान ‘आज’ में पूर्वांचल के नौ जनपदों जितने भी ब्यूरो प्रमुख रहे, उनमें सादगी एवं विनम्रता में शुक्ला जी का स्थान शीर्ष पर रहा। सीधे, सरल स्वभाव के शुक्ला जी दिन को दिन और रात को रात लिखने वाले पत्रकार रहे।

सत्येंद्र नाथ शुक्ला

आज सुबह मैं स्नान -ध्यान में लगा रहा तभी शुक्ला जी का दो बार फोन आया, मैं उठा न सका। काल बैक किया तो बहुत सहज ढंग से उन्होंने कहा, -‘भैय्या! तबियत ज्यादा खराब है, बनारस आ रहा हूं। ओपेल हॉस्पीटल में डाक्टर प्रदीप राय को दिखाना है।’

मैंने कहा- ‘ठीक है, अस्पताल पहुंच कर फोन कीजिएगा, मैं डाक्टर साहब से बात कर लूंगा आप को कोई असुविधा नहीं होगी।’ उन्होंने कहा -‘हम साढ़े ग्यारह बजे तक पहुंच जायेंगे।’

डाक्टर साहब को फोन मिलाया पर बात नहीं हुई। सोचा चलो शुक्ला जी का अस्पताल से जब फोन आयेगा तो बात हो जायेगी।

दोपहर मैंने फिर शुक्ला जी को फोन किया तो उनकी आवाज में खरखराहट थी – ‘कहे अस्पताल में हूं, पर्चा बनवाने कोई ऊपर गया है, पर डाक्टर प्रदीप राय को नहीं, डाक्टर जिंदल को दिखाना है। संयोग से डाक्टर जिंदल भी परिचितों में हैं। मैंने शुक्ला जी का नाम बताया तो उन्होंने कहा – ‘ठीक है, राय साहब मैं देख लेता हूं।’

कुछ अनहोनी सी बात न लगी। थोड़ी देर बाद उन्हीं के मोबाइल फोन पर बात हुई। उनके भांजे ने बताया कि डाक्टर साहब ने जांच के लिए लिखा है, रिपोर्ट देखकर ही तय करेंगे कि आगे क्या करना है। रिपोर्ट दो-तीन घण्टे में आ जायेगी। आगे जाने क्या हुआ, लोग सर सुन्दर लाल चिकित्सालय बीएचयू भागे, शायद दिल का दौरा पड़ा था, बीएचयू में अंतत: उन्हें ‘नो मोर’ कह दिया गया। शुक्ला जी के भांजे ने पूरी बात बतायी और कहा -‘अब हम कागज बनवा रहे हैं वापसी के लिए…..’

मैं समझ गया- शुक्ला जी नहीं रहे।’ कुछ देर गमगीन होने के बाद सोचा सम्बंध बनाये रखना बहुत बड़ी बात होती है। कुर्सी से हटते ही लोग भूल जाते हैं। पांच साल पहले अखबार को अलविदा कह दिया था, पर पुराने साथी आय करते रहते हैं। शुक्ला जी ने चलते-चलाते एक बार फिर मुझे याद किया। ईश्वर शुक्ला जी को आत्मा को शान्ति प्रदान करें एवं शोक संतप्त परिवार को कष्ट सहन करने की शक्ति दें।

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