उदय प्रकाश-
दोस्तो, मैं बहुत चिंतित हूँ। कृष्ण कल्पित मेरे फेसबुक फ्रेंड नहीं हैं। उनसे कभी मिला होऊंगा, याद नहीं। उन्होंने अपनी किताब मुझे डेडिकेट की है।
मंगलेश डबराल के गहरे मित्र थे। एक कोई पत्रिका वे मंगलेश डबराल पर संपादित कर रहे थे, तब उन्होंने कई बार संपर्क किया। असद ज़ैदी का उस पत्रिका में सहयोग था। वे सब मित्र थे।
लेकिन मैं उन्हें पढ़ता रहा। वे शायद हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि थे / हैं।
उनका जैसा विरोध जिस भाषा और जिस एकजुटता के साथ हो रहा है, दिल्ली और अन्य राजधानियों के प्रतिष्ठित और संगठित कतिपय ताक़तवर लेखकों द्वारा, वह मुझे गहरी चिता में इसलिए डालता है, क्योंकि ठीक इसी या ऐसे ही समूह द्वारा, एक बार नहीं, कई बार स्वयं मुझे इसी स्थिति के हवाले किया गया है।
याद होगा, अपने भाई की बरखी में मेरे जाने और योगी आदित्यनाथ के साथ दिग्विजयनाथ कॉलेज, गोरखपुर की शोकसभा में, अपनी विधवा भाभी, भतीजी और भतीजे के साथ शोकाकुल मंच पर दिख जाने पर, चेक कर लीजिये, ठीक इसी गिरोह ((गिरोह पद मैं जानबूझकर सोद्देश्य लिख रहा हूँ) ने ठीक ऐसा ही अभियान चलाया था।। एक पंकज नामधारी ने एके रात ३७० ईमेल किये।
मेरा पूरा जीवन, लेखन जिस धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, मानवीयता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों को समर्पित रहा, उसकी गवाह मेरा और मेरे परिवार का जीवन और स्वयं मेरा सतत लेखन रहा है।
मैं पत्रकार भी रहा हूँ। अभी भी पत्रकार हूँ। टाइम्स रिसर्च फाउंडेशन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जन जातीय केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुछ वर्ष पहले मीडिया, जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन का एच ओ डी रहा हूँ, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में हिस्सेदारी करता रहा हूँ।
अभी भी करता हूँ। लेकिन तथाकथित हिंदी के संदिग्ध झंडाबरदारों ने जैसी कुत्सित, अनैतिक, अमानवीय, अलोकतांत्रिक, असभ्य, घृणित, भर्त्सनीय व्यवहार मेरे साथ किया, लगभग वैसा ही इस समय कृष्ण कल्पित के साथ हो रहा है।
मैंने भी कई बार डिप्रेशन में आत्महत्या की बात सोची, लेकिन मुझे मेरे पाठकों ने, जो देश और विदेश की अनगिनत भाषाओं के लेखक, रचनाकार, पाठक थे, ने सबल दिया। उन्होंने शब्दों पर मेरी आस्था और भरोसे को लौटाया।
कृष्ण कल्पित मेरे फेसबुक फ्रेंड नहीं हैं। मैंने आज उनका नंबर हासिल कर उन्हें दो बार फ़ोन किया। मैं कभी किसी को इतनी देर रात फ़ोन नहीं करता।
उधर सन्नाटा था। उनका अंतिम पोस्ट देखा, सारे मुस्कुराते हंसमुख चेहरे डरावने लगने लगे। मुझे कृष्ण कल्पित की फ़िक्र है।
वे कोई कदम ऐसा न उठायें, जो इस हिंदी के माथे पर कलंक का एक टीका और लगा दे। मैं भारतीय सरकार से आग्रह करता हूँ कि वे राजधानियों के गैंगस्टर्स से एक विलक्षण कवि की हिफ़ाज़त करें।
आधुनिक हिंदी खड़ीबोली के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था – ‘हिंदी समाज, छोटे (संकीर्ण/ घटिया) चित्त (चेतना) का समाज है। इस समाज को, जल्द से जल्द नोबेल, ज्ञानपीठ या पद्म या अकादमी पुरस्कार दे कर इसकी जठराग्नि को शांत करें।
लेकिन कृष्ण कल्पित को बचायें। हम सब को बचायें, जो कास्ट कैटेगरीज में कहीं नीचे हैं। मैंने कृष्ण कल्पित को ब्लॉक कर दिया था। फिर भी उसके एसएमएस आते रहे। उसने कविताएँ लिखीं।
अपनी किताब मुझे सपर्पित की। अभी दुलाराम सहारण को कॉल किया। सब खामोश। कल्पित की जाति जाननी है। उनकी भी, जो इस गैंगस्टरिज्म में शामिल हैं।
ऋतु तिवारी- लेखक/कवि उदय प्रकाश ने अपने पोस्ट में चिंता जाहिर की है कि कवि कहीं आवेग में आकर कोई गलत कदम न उठा लें। उनका कहना है कि वो कवि उनके मित्र नहीं हैं लेकिन उदय प्रकाश सर को इतनी बेचैनी हुई कि उन्होंने उस चरित्रहीन कवि का नंबर जुगाड़ करके फ़ोन किया कई मर्तबे। लेकिन रचनाकार उदय प्रकाश ने एक बार भी सर्वाइवर के प्रति कोई चिंता अपने पोस्ट में नहीं जताई।और उसमें जाति का रंग भी भर दिया फिर वो शानदार आइसिंग ऑन द केक जैसी फिनिश आ गई पोस्ट में । और मैंने देखा कि मेरे कई मित्र साथी उनके पोस्ट पर उनसे आग्रह कर रहे हैं कि “सर आप महान रचनाकार हैं,आपका बहुत सम्मान है साहित्य नागरिक जगत में।प्लीज़ ऐसे पोस्ट न लिखें। क्या उदय प्रकाश,जो इतने बड़े रचनाकार हैं, हिंदी साहित्य उनके बिना शायद अधूरा हो, उन्हें इतनी समझ नहीं कि बिना पूरी बात जाने प्रतिक्रिया न दें। इसे ब्रदरहुड कहते हैं…भाई लोग! पेट्रियाक सोसाइटी में हर रंग को देखिये और समझिये कि खेल क्या है। रविवार की गुड मॉर्निंग!
शालिनी श्रीनेत- उदय प्रकाश जी को पूरा प्रकरण मालूम नहीं है। मानवता के नाते आये कृष्ण कल्पित के बचाव में,
अब घटना की पूरी जानकारी दे गयी है, देखते हैं क्या करते हैं वो तो उनकी मर्जी पर है। पर मुझे पूरा भरोसा है कि वो इस पर एक बार विचार जरूर करेंगे और पूरी उम्मीद भी है कि इसकी संवेदनशीलता को समझते हुए अपना पक्ष तय करेंगे । वो बहुत पढ़ने लिखने वाले व्यक्ति हैं,उनके साथ एक घंटे बैठ जाइए तो लगता है ज्ञान भंडार के बीच में बैठ गये हैं । कितनी समृद्ध है इनकी दुनिया, किसी भी बात पर उदाहरण देते हुए कितनी सारी किताबों का हवाला दे देते हैं। हमारी पीढ़ी को उनसे सीखना चाहिए वो फेसबुकिया पचड़े में समय खराब नहीं करते। वो पढ़ते हैं लिखते हैं। लिख कर हमें समृद्ध करते हैं। उनके बारे में कोई गलतफहमी ना पालें वो एक विद्वान व्यक्ति हैं, मैं उन्हें इसी रूप देखती हूं, वो आगे जो भी करेंगे, वो लड़की के हित का जरूर सोचेंगे और हम स्त्रियों की गरिमा का भी। उदय प्रकाश जी की पोस्ट पर मेरी टिप्पणी यूँ है-
भइया शायद आप इस पूरे प्रकरण से अवगत नहीं है। नहीं तो आप ऐसी पोस्ट नहीं लिखते । ये कवि इससे पहले अनेक स्त्रियों के नाम से सोशल मीडिया पर चरित्र हरण कर चुके हैं। अगर उस लड़की से मेरी बात नहीं हुई रहती तो शायद मैं भी नाम से पोस्ट नहीं लिखती। इन्होंने उस लड़की के साथ शारिरिक जबरदस्ती की है। उसके प्रतिरोध किया और कहा कि मैं आर्गनाइजेशन में शिकायत करूंगी तो कवि साहब ने कहा कि जाओ कह दो कौन मानेगा तुम्हारी बात, बहुत सी लड़कियां महिलाएं खुद आती हैं मेरे पास। लड़की के शिकायत करने पर आर्गनाइजेशन ने जल्दी से इन्हें वहां से भगा दिया कि मामला बढ़े न। पर किसी तरह ये बात पब्लिक में आ गयी और कवि की कलई खुल गयी। इन्होंने सोशल मीडिया पर अनामिका दी और बाबूषा कोहली का नाम लिख कर जो चरित्र हरण किया शायद आप उससे भी अवगत नहीं है। जिन स्त्रियों ने वहां कमेन्ट किया उनको भी इन्होंने बुरा भला कहा। पिछले एक दशक से इनका इतिहास उठा देखेंगे तो पता चलेगा कि ये स्त्री विरोधी व्यक्ति हैं। मुझे मालूम है आप बहुत पढ़ते लिखते हैं सोशल मीडिया के भसड़ से दूर रहते हैं। कई बार आपको भी यहां ट्रोल किया गया पर मुझे पूरा भरोसा रहा कि आप अनैतिक नहीं कर सकते। कई बार गलतफहमियों की वजह से भी आपको परेशान किया गया। लेकिन सभी जानते हैं आपको। आपकी छवि अलग लेवल की है। उस लड़की के साथ कृष्ण कल्पित द्वारा अभद्रता के बाद अगर आप साथ खड़े हो रहे हैं तो हमारे जैसे हजारों हजार लोगों का भरोसा टूटेगा आपकी छवि बेकार में धूमिल की जायेगी। मैं आपसे हर मामले जूनियर हूं! आपसे बस आग्रह कर सकती हूं कि अनैतिकता का साथ मत दीजिए। मुझे पूरा भरोसा है कि आप एक बार इस पर विचार जरूर करेंगे।
रंगनाथ सिंह- सर, यौन अपराध के आरोप और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर टारगेट करने के मामले की तुलना करना अतार्किक और अनैतिक है। आप इमोशनल लेखक हैं, शायद इसलिए ऐसा कर गये। केवल कुछ समान लोगों द्वारा टारगेट किए जाने के संयोग मात्र से आपकी सहानुभूति आरोपी के प्रति बन गयी है। सच कहूँ तो आपके किसी भी विचार से मैं इससे ज्यादा दुखी एवं आहत नहीं हुआ था। आपकी इस सेप्टिक टैंक में कूदने सरीखी पोस्ट के बाद हम अपने दुर्भाग्य पर रोने के अलावा क्या कर सकते हैं!
प्रणय कुमार- आपकी ही जमात के लोगों अर्थात वामपंथियों ने आपकी फ़जीहत की, बिलकुल नहीं करनी चाहिए थी। पर वामपंथ ऐसी ही अराजकता के लिए (कु) ख्यात है। आपकी व्यथा-कथा अपनी जगह ठीक है, पर कृष्ण कल्पित पर यौन शोषण का आरोप लगा है, आरोप लगाने वाली उनसे प्रेरित-प्रभावित और जुड़ी रही हैं, ऐसे में आपको जाति का कोण कैसे दिख गया? विचार करें कि जिन वामपंथियों ने एक वामपंथी लेखक यानी आपकी ऐसी लानत-मलामत की, वे विचारधारा से परे लिखने वाले साहित्यकारों के साथ मान-हनन और लानत-मलामत का कैसा खेल खेलते होंगें? सवाल यह भी है कि क्या कृष्ण कल्पित ने महिला की जाति पूछ और जानकर उनसे अभद्रता की थी? मान्यवर, जाति और सेकुलरिज़्म की आड़ में भारत में कोई भी पाप किए जा सकते हैं, छुपाए जा सकते हैं? ये दोनों आज “पापियों-अपराधियों” के अभेद्य आवरण हैं।
निवेदिता झा- प्रिय Uday Prakash जी, आपका पोस्ट पढ़ के लगा कोई कितना भी बड़ा संवेदनशील लेखक हो पर अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही रहता है। अगर आपको सच में पटना में हुई शर्मनाक घटना की चिंता होती तो आप पूरे मामले की छानबीन करते। पता करते मामला क्या है। एक युवा साथी के साथ जबरन यौन हिंसा करने की कोशिश की गई और आप हिंसा करने वाले के पक्ष में खड़े हैं। मेरे जैसे लोग जो आपको हमेशा न्याय के पक्ष में खड़े देखते रहे हैं उनके लिए आपका ये स्टैंड सदमा भरा है। स्त्रियों के प्रति आपका ये रवैया बेहद शर्मनाक है। मैं इस अपराधी को खूब जानती हूं । जब दूरदर्शन में थे उस समय भी कई लड़कियों ने उन पर आरोप मढ़े थे। ये इस देश का दुर्भाग्य है कि सामाजिक कारणों से महिलाएं अपने ऊपर हुए हमले और यौन हिंसा के खिलाफ कानून का सहारा कम ले पाती हैं। ये मर्दवादी दुनिया उन्हें ही दोषी करार देती है। आप एक संवेदनशील लेखक हैं। बिना पक्ष जाने कैसे एक अपराधी के साथ खड़े हैं। हिंसा और बलात्कार के खिलाफ खड़े होने के लिए भी हिम्मत की जरूरत है। नहीं तो बलात्कारियों की पूजा तो हमारी संस्कृति में होती रही है। बिल्किस बानो के बलात्कारियों को कोर्ट ने रिहा किया और बीजेपी की महिलाओं ने उन्हें माला पहनाया। क्या आप उसी संस्कृति को बढ़ावा देंगे। आपको अगर सच में न्याय की चिंता है तो आप पहले मामले की तह तक जाएं फिर कोई फैसला लें। आपका ये बयान पूरे साहित्य जगत के लिए शर्मनाक है जो यौन हिंसा के समर्थन में दिखता है।
दयाशंकर शुक्ल सागर-
‘दोस्तो, मैं भी बहुत चिंतित हूँ।’
नए दौर के अति संवेदनशील माने जाने वाले सह्रदय कवि-लेखक उदय प्रकाश एक कवयित्री के यौन उत्पीड़न के इल्जाम में घिरे वयोवृद्ध कवि कृष्ण कल्पित का रक्षा कवच बन जाते हैं। वे प्रमाणपत्र जारी करते हैं और कल्पित जी उसे अपनी फेसबुक की दीवार पर टांग देते हैं। कहते हैं-‘शुक्रिया उदय प्रकाशजी!’
उदय प्रकाश जी मेरे बहुत पुराने मित्र हैं। बहुत भावुक इंसान हैं। वे अपनी पोस्ट में लिखते हैं कि ‘मैंने भी कई बार डिप्रेशन में आत्महत्या की बात सोची।’ फिर आगे लिखते हैं-‘मुझे कृष्ण कल्पित की फ़िक्र है।’ आपको उस युवा स्त्री कवि की जरा भी फ़िक्र नहीं।
ये सब लिखते हुए आप एक बार भी नहीं सोच रहे होते कि यौन उत्पीड़न की शिकार उस युवा स्त्री कवि की इस वक्त क्या मनोदशा होगी? उसका साहित्यिक सफ़र तो अभी बस शुरू हुआ है। एक कल्पित गैंग उस पर हमले कर रहा है। आप उस पर हमला नहीं करते लेकिन आरोपी के डिफेंस में उतर आते हैं। क्योंकि उसने अपनी किताब आपको डेडीकेट कर दी। ्र्र
मैं जिस उदय प्रकाश की कथाओं का मुरीद हूं, ये वो उदय प्रकाश तो नहीं हो सकते।
देख रहा हूं, कल्पित प्रकरण में आप बेतरह ट्रोल हो रहे हैं। मुझे तो बस आपकी बहुत फ़िक्र है।


