ओम थानवी-
आज प्रभाषजी का जन्मदिन है। वे हमारे बीच रहे होते तो 88 वर्ष के होते। वैसे वे हमारे बीच ही हैं। उनकी उपस्थिति हम ज़िम्मेदार और सरोकारी पत्रकारिता में रोज़ अनुभव करते हैं।
पहली तसवीर उनकी साठवीं वर्षगांठ की है। उनके शहर इंदौर में हमने षष्टिपूर्ति का जश्न मनाया था। मैं तब चंडीगढ़ संस्करण का संपादक था; न चश्मा चढ़ा था, न बाल पके थे। पहचान सकते हों तो पहचानिए।
तस्वीर खींची गई, तब तक कुछ साथी लौट चुके थे। फिर भी बड़ा समूह मौजूद है। इनमें कुछ साथी हमें छोड़ चले। प्रभाषजी के सचिव रामबाबू भी।
दूसरी तस्वीर कुरुक्षेत्र के घाट की। प्रभाषजी की माताजी ने स्नान किया; प्रभाषजी ने भी डुबकी लगाई। हमने ख़ास चश्मे धारण कर सूर्यग्रहण देखा। हमारे साथ अपरा और मिहिर, उनकी माता, बलवंत तक्षक, डॉ चतर सिंह, रोहित परिहार आदि मित्र भी थे।
भोपाल का माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय प्रभाषजी की देन है। जब मैं चंडीगढ़ में था, उन्होंने मुझे उस विवि का ज़िम्मा (तब महानिदेशक का पद हुआ करता था) संभालने को कहा था। मुझे संपादक का काम अधिक सुहाया। हाल में कुलपति का ज़िम्मा निबाह कर मेरी वह धारणा और पुष्ट हुई है।
बहरहाल, भोपाल के पत्रकारिता विवि में प्रभाषजी ने एक विचार-गोष्ठी करवाई थी। तीसरी तसवीर उस वक़्त की है। फ़ोटो में रमेशचंद्र शाह, नामवर सिंह, श्रीलाल शुक्ल, ज्योत्सना मिलन, निर्मल वर्मा, केदारनाथ सिंह और नाचीज़। अफ़सोस कि बीच के पाँच लोग अब हमारे बीच नहीं।
अंतिम तसवीर: जब षष्टिपूर्ति ग्रंथ की स्नेहप्रति उन्होंने हमें प्रदान दी। (गुड्डी प्रेमलताजी का घर का नाम है)। हमारे दौर के महान संपादक को स्मृतिनमन।
रविवारी में अच्छी रचनाएँ हम दे सके, क्योंकि हमें पाये के लेखक मिले। ‘मैगज़ीन’ के संपादन में भी मंगलेश डबराल, प्रियदर्शन, प्रमोद द्विवेदी, रजनी नागपाल, पारुल शर्मा, संगम पांडेय, रामजन्म पाठक जैसे सहयोगी संलग्न रहे।
अभी कल वयोवृद्ध आलोचक और हड़प्पा सभ्यता पर विशद ग्रंथों के लेखक भगवान सिंह कह रहे थे कि प्रभाषजी के समय की गरिमा को हमने क़ायम रखा। प्रभाषजी ने तो जनसत्ता शुरू किया था, उन्होंने ही स्थापित किया। उनके काम के सामने हमारा काम कुछ नहीं। प्रबंधन से उतने प्रभावी संबंध भी हमारे लिए संभव नहीं थे। स्टाफ़ की बड़ी किल्लत रही। अच्छे संवाददाता हमारे यहाँ थे, पर बड़े-बड़े अख़बारों से हम परिमाण और दायरे के मामले में मुक़ाबला नहीं कर सकते थे।
हमने विचार और संवाद को ज़्यादा जगह देकर अलग पहचान बनाए रखने की कोशिश की। इसमें हमें सफलता भी मिली। कृष्णा सोबती पहले पन्ने पर छपीं। निर्मल वर्मा और रामकुमार ने लिखा। अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, विष्णु खरे, कृष्ण कुमार, राजकिशोर, मृणाल पांडे, सैयद मुबीन ज़ेहरा, पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुधीश पचौरी, सुधीर चंद्र, नंदकिशोर आचार्य, आनंद स्वरूप वर्मा, अपूर्वानंद, के बिक्रम सिंह, विनोद भारद्वाज, वर्षा दास, कुलदीप कुमार, देवेंद्र राज अंकुर आदि हमारे स्तंभकार रहे। यशदेव शल्य, केदारनाथ सिंह, रमेशचंद्र शाह, विष्णु नागर जैसे नियमित लेखक मिले। भगवान सिंह, शंभुनाथ, आशुतोष कुमार, अजय सिंह आदि ने बहसों में शिरकत की। श्रेष्ठ कवियों ने अपनी कविताएँ दीं। पुस्तक समीक्षा को हम जितनी जगह देते थे, शायद ही किसी अख़बार ने दी हो। हमारे समीक्षकों में विश्वनाथ त्रिपाठी, नित्यानंद तिवारी, मधुरेश, सुरेश पंडित, शंभू गुप्त, रोहिणी अग्रवाल, गोपेश्वर सिंह, सदानंद शाही, वीरेंद्र यादव जैसे लोग शामिल रहे।
जनसत्ता से मैं 36 साल पहले चंडीगढ़ संस्करण के संपादक के नाते जुड़ा था। जब कई बातें भूलने लगा, सहसा आपने पुरानी यादें जगा दीं। शुक्रिया, राजेशजी।

प्रवीण दुबे-
आज प्रभाष जोशी जी का जन्मदिन है…ये तस्वीर संभवतः 2006 की है. मेरे बगल में बैठे Jayant Singh Tomar दादा तब ग्वालियर के लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय में पत्रकारिता डिपार्टमेंट में थे. किसी कार्यक्रम में उन्होंने बुला लिया और जयंत दादा ने शेर और बकरी यानी प्रभाष जी और मुझे एक साथ एक मंच पर बुलाया.
माखनलाल यूनिवर्सिटी के पुष्पेन्द्र पाल सिंह जी यानी PP सर भी थे.. प्रभाष जी की तुलना में मैं बहुत अल्पज्ञ था. प्रभाष जी का कागद कारे बेशक पढ़ता मैं तब भी था. जनसत्ता अख़बार में हिंदी के साथ उन्होंने जितने प्रयोग सरलीकृत करने में किए, उसे भी बेशक शुरूआती दिनों से देखता भी था और सीखता भी था…
ग्वालियर के कार्यक्रम में मैं डरा हुआ था इतने बड़े आदमी के बराबर मुझे बैठा दिया गया. हालांकि, बहुत प्रेम से मिले वो…जब संबोधन की मेरी बारी आई तो उन्होंने पूरा सुना. मेरी भाषा शैली की तारीफ़ की. कुछ शब्द चयन में सुधार भी करवाया. और बोले नर्मदा तट के हो बाबू…लहज़ा ही बता रहा है आपका.
प्रभाष जी ख़ुद नर्मदा तट के थे. मैं भी क्रिकेट का शौक़ीन उनकी ही तरह हूँ. और लिखने में कई बार क्रिकेट की शब्दावली का इस्तेमाल मैं भी करता हूँ…थोड़ा सा कुछ सूरज और दीपक बराबर साम्य मिला और कुछ उनके स्वभाव की सौम्यता ने मुझे कभी अहसास ही नहीं होने दिया कि मैं उम्र, पद, अनुभव, ज्ञान सभी में उनसे बहुत कमतर हूँ.
वैसे आज प्रभाष जी के संदर्भ में एक बात कहना चाहूंगा कि हम लोग संभवतः पत्रकारिता की आख़िरी सौभाग्यशाली पीढ़ी होंगे, जिन्हें अपने संपादक और बाहर के वरिष्ठों से बेहतर लिखना, बोलना, पढ़ना सीखने को मिलता था.
आजकल सिखाने वाली प्रजाति तकरीबन विलुप्त होती जा रही है..आजकल के जो ज्यादातर बॉस होते हैं वे आत्ममुग्ध हैं (मैं भी इसी बीमारी की चपेट में आता जा रहा हूँ )…आज के दौर की बात करें तो, कुछ अपवादों को छोड़कर…जिनके नाम के आगे सम्पादक लिखा है, वही ठीक से लिखना या बोलना नहीं जानते. इस पद पर पहुँचने की योग्यताएं भी परिवर्तित हो गईं. मगर वे बिना नागा अपने अधीनस्थों को बोध बहुत कराते हैं कि देश में जितनी भी पत्रकारीय क्रांतियाँ हुई हैं, उनकी मशाल प्रज्ज्वलित रखने में महती भूमिका उन्हीं की रही है…
ये और बात है कि उनके चेले भी उनके लिए यही गुनगुनाते हैं कि “उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी, ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया” खैर…. प्रसंग था तो प्रभाष जी याद आ गए.. उनके चरणों में विनम्र श्रृद्धांजलि…



