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सुख-दुख

कई लड़के तो सिर्फ प्रेस कार्ड पाने भर के लिए मीडिया के दफ्तरों में घुसते हैं!

कैलाश सिंह-

लखनऊ/वाराणसी। सोशल मीडिया के बढ़ते वर्चस्व में एक स्तंभ के रूप में ‘डिजिटल मीडिया’ उभरकर सामने आया है, तभी तो बड़े अखबार और न्यूज चैनलों को भी डिजिटल के क्षेत्र में आकर अपनी टीआरपी बनाए रखने के लिए डेमो देना पड़ रहा है। यूपी में दूसरे प्रांत के दो बड़े अखबार दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने वर्तमान दशक में डिजिटल मीडिया में अपने बैनर -प्लेटफार्म की पहुँच को ब्लाक स्तर तक बनाने को स्ट्रिंगर- संवाददाताओं की नियुक्ति शुरू कर दी है, जबकि यूपी के अन्य बड़े अखबार अभी तक अपने पीडीएफ को मोबाइल पर डालकर रीडर खोजने की जद्दोजहद में लगे हैं।

सोशल मीडिया के आने से अखबारों को नए रीडर नहीं मिल रहे हैं और पुराने तो कोरोना काल में ही आधे से ज्यादा छोड़ दिये। इसी के साथ पत्रकारिता वाले कॉलेजों में छात्रों की संख्या भी घट रही है, जो पढ़ रहे उन्हें ढंग के शिक्षक भी नहीं मिल रहे हैं।

हम बात कर रहे हैं फर्जी पत्रकारों की। इसमें बानगी जौनपुर की होगी जो यूपी के सभी जिलों के लिए सैंपल का काम करेगी। सोशल मीडिया के बढ़ते वर्चस्व में बमुश्किल 10 फीसदी वह पत्रकार हैं जो यू ट्यूब अथवा पोर्टल के जरिये आमजन तक सरकार और राजनेताओं के साथ नौकरशाहों की खामियां उजागर कर रहे हैं। उनके शब्द विन्यास, ठोस तथ्यों और बेहतरीन प्रस्तुति से रीडर और दर्शक खिंचे आ रहे हैं, लोगों को लगता है कि वह जो पढ़ या सुन रहे हैं उनके ही मन की भड़ास है।

दरअसल आमजन के साथ पत्रकारों की पीड़ा को वरिष्ठ पत्रकार ‘यशवंत सिंह’ ने करीब दो दशक पूर्व ही भांप लिए थे। बीएचयू से पत्रकारिता की डिग्री लेने वाले श्री सिंह ने लगभग दो दशक तक कई बड़े और आधुनिक वेन्चर में नीचे से लेकर ऊंचे ओहदों तक काम किया। इस दौरान अपने आसपास से लेकर ग्रामीण इलाकों तक पत्रकारों के हो रहे शोषण को महसूस किया। खुद अब तक नौकरी किये तो किसी से दबे नहीं। उनके व्यक्तित्व की उन्मुकता की झलक उनकी खबरों में दिखती रही, जिसे वह खुद लिखे या सम्पादित किए रहते।

ये जानकारी इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि कुछ वर्षों तक अमर उजाला के वाराणसी संस्करण में हम दोनों साथ काम किये हैं। आज से 17 साल पूर्व उन्होंने मई 2008 में ‘भड़ास 4 मीडिया’ पोर्टल की स्थापना की। शुरुआती दौर में ही इस डिजिटल मीडिया ने सुर्खियां हासिल कर ली क्योंकि उसके निशाने पर वह मीडिया संस्थान रहे जो पत्रकारों का शोषण करते रहे हैं, शोषण आज भी जारी है लेकिन उनमें बेहतरीन प्रशिक्षित पत्रकार काफी कम हैं। ग्रामीण व जिलों में पत्रकारों की फौज में शामिल तमाम स्ट्रिंगर ऐसे हैं जो केवल ‘आई कार्ड’ के लिए इसमें कदम रखे हैं।

भड़ास 4 मीडिया के निशाने पर भ्रस्ट नौकरशाह, राजनीतिज्ञ, सरकारें भी रहती हैं। इसके लिए एक ही फार्मूला होता है- पीड़ित को न्याय और शोषक की तंद्रा को भंग करना। इसके लिए संस्थापक संपादक यशवंत सिंह को बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

अब देखिए फर्जी पत्रकारों के आने के रास्ते। किसी भी शहर या राजधानी के अखबारों में जिला मुख्यालयों के लिए संवाददाता का कार्ड हासिल करना। कार्ड मिलते ही वह जिले के सभी ब्लॉकों, बाजारों में स्ट्रिंगर (संवाद सूत्र) बनाकर उन्हें अपनी तरफ़ से ‘कास्ट पर कार्ड’ देकर कमाई करते हैं।

कुछ तो अपने अखबार निकालकर गांवों के विकास वाले वह टेंडर छापते हैं जिसका विज्ञापन ब्लॉक वाले मोटे कमीशन पर देते हैं। दिलचस्प तो ये है कि वह टेंडर कब किसके नाम का खुलता है, किसी अन्य को पता ही नहीं होता। ऐसे तमाम अखबारों में पत्रकारों की वह ‘पोस्ट यानी पद’ नजर आते हैं जिसे पाने वाला बड़ा पत्रकार महानगरों में अपना जीवन खपा देता है।

खैर कार्ड लेने वाले खबरों के स्थान पर सूचना देते हैं और बदले में वहीं बने रहने की गारन्टी संस्थानों से लेते हैं। वेतन नहीं लेते हैं बल्कि विज्ञापन देते हैं। इनमें से जिनके पास कोई धंधा नहीं है वह थानों, ब्लॉकों, तहसीलों से कमाई करते हैं, यानी दलाली और ब्लैक मेलिंग से। ऐसे ही तमाम पत्रकार हैं जो नेताओं और बड़े व्यापारियों, चिकित्सकों के लिए रील बनाने, उनके विरोधियों को ब्लैकमेल करने या परेशान करने में लगे हैं।

सोशल मीडिया आने के बाद गांवों तक फर्जी पत्रकारों की फ़ौज चक्रमण करती है। अफसरों की प्रेसवार्ता में इनकी भीड़ से आयोजक दहल जाते हैं। असली पत्रकारों के पास तो टाइम ही नहीं होता है। पिछले हफ्ते 13 जुलाई को जौनपुर कोतवाली में एक कथित पत्रकार के खिलाफ कई धाराओं जैसे रंगदारी, पैसे और शारीरिक शोषण के लिए धमकी और ‘फर्जी काल’ से ब्लैकमेलिंग का मुकदमा एक महिला चिकित्सक की तहरीर पर लिखा गया है।

दिलचस्प तो ये है कि यह कथित पत्रकार एक ऐसे चिकित्सक का पालतू है जो खुद अवैध जमीन पर अस्पताल और बगीचे की जमीन पर फार्म हाउस बनाया है। अपनी फ्रेंचाइजी कम्पनी की दवाओं पर 50 गुना अधिक मूल्य की खुद की एमआरपी वाली दवाएं ऐसे ही दलालों को खपाने को देता है, लेकिन जब गुर्गा फंसा तो वह किनारा कर गया है।

लेखक तहलका न्यूज नेटवर्क के राजनीतिक संपादक हैं।

मूल खबर…

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