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2014 से पहले न्यूज चैनलों का तेवर याद है? सरकारी विज्ञापन तब भी मिलता था

अजीत अंजुम-

2014 के पहले भी सरकार थी. तब भी सरकारी विज्ञापन चैनलों को मिलते थे लेकिन क्या मनमोहन सिंह की फोटो लगाकर सवाल नहीं पूछे जाते थे?

क्या यूपीए सरकार पर लगे तमाम आरोपों को सामने रखकर प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट से सवाल नहीं पूछे जाते थे?

उस दौर में तो सीधे पीएम की फोटो लगाकर तीखे सवाल पूछे जाते थे. तब तो विज्ञापनों का ऐसा डर नहीं था कि सब जाकर सरकार की गोद में बैठ जाएं.

2011 -2014 के दौर को याद कीजिए. चैनलों के तेवर को याद कीजिए. सारे जवाब मिल जाएंगे. अर्णब गोस्वामी तो मनमोहन सिंह से सवाल पूछ पूछकर ही स्टार बने थे. यहां तक कि पीएम आवास पर हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में तीखे सवाल पूछे गए थे. विज्ञापन तो तब भी सरकार से मिलता था.

मेरे कहने का ये मतलब नहीं है कि सरकारों का दबाव नहीं होता है. हर दौर में होता है. उस दौर में कई बार दबाव आए होंगे. सत्ता का ये चरित्र होता है लेकिन इस दौर में दबाव की परिभाषा का इतना सरलीकरण ठीक नहीं. तथ्य से मुँह छिपाना है. आड़ लेना है.

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