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दिल्ली

जनता को अधूरा ज्ञान दे रहे दिलीप मंडल की दिलचस्पी सच में नहीं, सनसनी में है!

मनोज अभिज्ञान-

सरकारी पैसे से फ़ोन खरीदने की बात पर उंगली उठाने वाले दिलीप मंडल जी दरअसल जनता को अधूरी जानकारी दे रहे हैं। उन्हें या तो पूरी तस्वीर दिखती नहीं है, या न दिखाना उनका मक़सद है। उनकी दिलचस्पी सच में नहीं, सनसनी में है।

भाजपा के नेतृत्व वाली दिल्ली की रेखा गुप्ता को बतौर मुख्यमंत्री मोबाइल खरीदने के लिए 1.5 लाख रुपये और मंत्रियों को 1.25 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। साथ में कॉल चार्ज, डेटा प्लान, लैंडलाइन बिल, इंटरनेट और ब्रॉडबैंड बिल की भी पूरी सरकारी भरपाई होगी।

लेकिन दिलीप मंडल जी की नज़र सिर्फ़ अरविंद केजरीवाल के iPhone पर गई। उनका फ़ोन पांच साल पुराना है, ये बताकर वे अपनी ईमानदारी का विज्ञापन देते हैं, लेकिन सवाल ये है कि वे अपनी पत्रकारिता में ईमानदारी कब दिखाएंगे?अफ़सोस, सच की पूरी तस्वीर दिखाने में शायद उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है।

सत्ता में बैठा हर व्यक्ति, चाहे वह ‘ईमानदारी’ का दावा करता हो या ‘राष्ट्रसेवा’ का, जब सरकारी खजाने से अपने लिए सुविधा लेने लगता है, तब वह उसी पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है जिसे सिर्फ शब्दों में कोसता है। यह वर्ग का खेल है। इस व्यवस्था में सत्ता में पहुंचते ही आदमी ‘जनता’ नहीं रह जाता, ‘शासक’ बन जाता है।

रेखा गुप्ता हों या अरविंद केजरीवाल—दोनों ही उस संरचना के अंग हैं जो जनहित के नाम पर अपने हित साधती है। दोनों के बीच सत्ता को लेकर संघर्ष हो सकता है, लेकिन मूल प्रवृत्ति दोनों की एक ही है—जनता को भाषण और खुद को सुख-सुविधा।

ऐसी व्यवस्था में नैतिकता सिर्फ़ आवरण है, जिसे चुनावों के समय ओढ़ लिया जाता है और सत्ता में आते ही उतार फेंका जाता है। और यही वह बिंदु है, जहां व्यक्ति नहीं, व्यवस्था को बदलने की बात करनी चाहिए। वरना चेहरे बदलेंगे, मोबाइल के मॉडल बदलेंगे, लेकिन जनता वहीं की वहीं रह जाएगी, किसी पुराने एंड्रॉइड में ‘नेटवर्क सर्च’ करते हुए।

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