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उत्तर प्रदेश

एलडीए द्वारा लिस्ट जारी करने के बाद बिल्डर भी पत्रकारों को धमकाने लगे

मोहम्मद सैफ-

लखनऊ | उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में, जहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की नीति की बात की जाती है, वहीं ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ऐसा लगता है कि यह नीति कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और भ्रष्ट अधिकारियों के सामने कमज़ोर पड़ रही है। भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों को उजागर करने वाले निष्पक्ष पत्रकारों को झूठे मुकदमों, धमकियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए खतरा है, बल्कि समाज की सच्चाई की आवाज़ को दबाने की एक सोची-समझी साज़िश का भी हिस्सा है।

लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा कथित तौर पर पत्रकारों की एक सूची जारी किए जाने का मामला सुर्खियों में है। इस सूची के आधार पर निष्पक्ष पत्रकारों को अपराधी ठहराने की कोशिश की जा रही है, जिससे बिल्डरों और भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हो गए हैं। ये बिल्डर अब पत्रकारों को रंगदारी और अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज करने की धमकी दे रहे हैं। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है जो समाज को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। बड़े मीडिया संस्थानों के समर्थन के अभाव में, ईमानदार पत्रकार अकेले ही इस लड़ाई को लड़ रहे हैं, जिससे उनकी छवि धूमिल हो रही है। इसका स्पष्ट उद्देश्य है, पत्रकारों को डराना और जनहित की आवाज़ को कुचलना। पुलिस को ऐसे फर्जी प्रार्थना पत्रों की गहन जांच करनी चाहिए। यदि शिकायतें निराधार पाई जाती हैं, तो बिल्डरों और भू-माफिया के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं।

बाजार खाला क्षेत्र में अबू तैय्यब व अन्य की पांच मंजिला अवैध इमारत इसका जीता-जागता उदाहरण है। बिना पार्किंग और आवश्यक स्वीकृतियों के खड़ी इस इमारत को लेकर एलडीए की सुस्ती चौंकाने वाली है, जिससे अवैध निर्माणकर्ताओं को खुली छूट मिल रही है। हैरानी की बात यह है कि इस मामले को उजागर करने वाले पत्रकारों पर ही रंगदारी जैसे आरोप लगाए गए हैं। इस मामले की निष्पक्षता से जांच होनी चाहिए कि निर्माण कितना वैध है और कितना अवैध। साथ ही, पत्रकारों पर लगाए गए आरोपों और एलडीए अधिकारियों की मिलीभगत की भी जांच ज़रूरी है, क्योंकि यह सब पत्रकारों को फंसाने की सोची-समझी साज़िश का हिस्सा प्रतीत होता है।

बाजार खाला की मोतीझील कॉलोनी में मुबारक अली बिल्डर द्वारा तालाब की ज़मीन पर की जा रही अवैध प्लाटिंग एक और गंभीर मामला है। जब पत्रकारों ने इसकी खबर प्रकाशित की और कुछ पत्रकारों ने दस्तावेज़ मांगे, तो बिल्डरों ने उन्हें ब्लैकमेलर बताकर डीसीपी को शिकायत कर दी। यह स्पष्ट रूप से अवैध कारनामों को छिपाने की चाल थी। हालांकि, डीएम कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी के हस्तक्षेप से इस प्लाटिंग पर रोक लगी, लेकिन यह घटना भू-माफिया के दुस्साहस और उन्हें संरक्षण देने वालों की मिलीभगत को उजागर करती है।

पत्रकार संजय सक्सेना को जान से मारने की धमकी मिलने के बाद एक दबंग शिवम अग्रवाल के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। पत्रकार जल निगम की टूटी पाइपलाइन की खबर कवर कर रहे थे, तभी यह घटना हुई। 6 जुलाई की शाम को पत्रकार तस्वीरें ले रहे थे, तभी क्षेत्रीय दबंग ने उन्हें अपशब्द कहे और जान से मारने की धमकी दी, यहां तक कि गड्ढे में तोपने की बात भी कही। शुरुआती शिकायत पर कार्रवाई न होने के बाद, अखिल भारतीय पत्रकार एसोसिएशन के हस्तक्षेप और आला पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर, बाजार खाला कोतवाली में दबंग के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज किया गया है और जांच जारी है। यह घटना पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल उठाती है।

हजरतगंज क्षेत्र में एक पत्रकार द्वारा अवैध गतिविधियों में लिप्त एक दबंग इमरान हुसैन ने अवैध असलहे के साथ सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल की थी। इस पर पत्रकार ने माननीय मुख्यमंत्री जी को लिखित पत्र के तौर पर शिकायत दर्ज कराई थी। जिस पर संबंधित चौकी इंचार्ज ने दबंग के साथ मिलकर गलत रिपोर्ट लगा दी। पत्रकार ने दोबारा मुख्यमंत्री और पुलिस कमिश्नर को शिकायत की तो संबंधित चौकी इंचार्ज ने पत्रकार पर ही वसूली के झूठे आरोप गढ़ दिए। यह एक खतरनाक चलन है, जहां अधिकारी अपनी अक्षमता या मिलीभगत छिपाने के लिए पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं। इसका उद्देश्य जनहित की आवाज़ को दबाना और भ्रष्टाचार को निर्बाध रूप से जारी रखना है।

पत्रकारों पर हमले और भ्रष्टाचार को उजागर करने की उनकी कोशिशों को दबाने की साज़िश लोकतंत्र के लिए खतरा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और लखनऊ कमिश्नर को तत्काल हस्तक्षेप कर निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। पत्रकारिता की गरिमा और समाज में सच्चाई की आवाज़ को बचाने के लिए यह ज़रूरी है कि पत्रकारों को निर्भीक होकर काम करने का माहौल मिले। यदि इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो न केवल पत्रकारिता, बल्कि समाज का विश्वास भी कमज़ोर होगा।

लखनऊ में पत्रकारों के खिलाफ दर्ज किए जा रहे गंभीर आरोपों और उनके उत्पीड़न के मामलों पर लखनऊ पश्चिम के डीसीपी और अन्य पुलिस आलाधिकारी बेहद संजीदा हो गए हैं. वे इन सभी प्रकरणों की गहनता से जांच कर रहे हैं और साथ ही अपराधियों पर भी पैनी नज़र रखे हुए हैं। पुलिस सिर्फ पत्रकारों पर लगे आरोपों की ही जांच नहीं कर रही, बल्कि शिकायतकर्ताओं की मंशा और उनके द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्रों की सत्यता को भी परखा जा रहा है. डीसीपी खुद इन सभी मामलों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं और इनकी सख्ती से निगरानी कर रहे हैं।

लिस्ट जारी करने की खबर पढ़ें…

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