रामधनी द्विवेदी-
आज की दोपहर अच्छी बीती। ‘अमृत प्रभात’ के पुराने साथियों से मिलन हुआ और साथ भोजन किया गया। दरअसल ‘अमृत प्रभात’ के पूर्व संपादक और निदेशक श्री केबी माथुर जी का आग्रह था कि हम लोग कभी साथ बैठें। वह लगभग एक साल से कनाडा से आने के बाद यहीं थे और अब उनका वापस जाने का समय आ गया है। वह चाहते थे कि सभी लोग थोड़ी देर बातें करेंगे।
दो दिन पहले उन्होंने फोन किया कि शनिवार को दिल्ली प्रेस क्लब आ सकते हो, वहां कई पुराने साथी मिलेंगे और थोड़ी देर हम लोग आपस में बातें करेंगे। मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी। मैं तैयार हो गया।
तय हुआ कि मैं दोपहर पौने बारह बजे उनके वैशाली स्थित आवास पर पहुंचूं और वहां से उनके साथ प्रेस क्लब चलूं। मैं सही समय पर वहां पहुंचा। वहां ‘अमृत प्रभात’ के पूर्व दिल्ली ब्यूरो प्रमुख दिनेश शर्मा भी थे। हम तीनों लोग लगभग एक बजे, दिल्ली का जाम झेलते हुए प्रेस क्लब पहुंचे। वहां ‘अमृत प्रभात’ के पुराने पूर्व पत्रकार परमानंद पांडेय पहुंच गए थे। वह इलाहाबाद के बाद दिल्ली आए और यहीं के हो कर रह गए। आज कल सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिश कर रहे हैं।
थोड़ी देर में शिवशंकर गोस्वामी भी आ गए। उनके पैर में कुछ दिक्कत थी तो साथ में छोटी बेटी भूमिका भी आ गई। वह जापान की एक कंपनी में ला एडवाइजर है।
सब लोग मिले। काफी देर तक बातें हुईं। सबने अपने परिवार के सदस्यों के बारे में बताया। जो लोग काफी दिनों से इलाहाबाद से कट गए थे, उन्होंने ‘अमृत प्रभात’ के पुराने साथियों के बारे जानना चाहा। सबके परिवार और स्वास्थ्य के बारे में जिसे जानकारी थी, उसने बताया। कई लोग अब हमारे बीच नहीं हैं, उनके बारे में भी बात हुई।
बात घूम फिर कर ‘अमृत प्रभात’ के अच्छे दिनों पर केंद्रित हो गई। सबने अपने-अपने अनुभव सुनाए। पत्रिका समूह के मालिकों की अच्छाइयों और कमियों पर भी बात हुई। सबने यह स्वीकार किया कि ‘अमृत प्रभात’ में काम की जो छूट थी, वैसी किसी अखबार में नहीं है।
माथुर साहब ने अपने अनुभव बताए कि कैसे जब उनके ऊपर कोई राजनीतिक दबाव पड़ता था तो मालिक राजनेताओं के सामने चाहे जो कहें, बाद में कहते थे माथुर साहब,यह बात यहीं खत्म हो गई, आप वही कीजिएगा जो उचित होगा। किसी दबाव में पड़ने की जरूरत नहीं। आज तो राजनेताओं की शिकायत पर पत्रकारों की नौकरी चली जाती है।
इस बीच भोजन भी आ गया। सबने अपनी रुचि के अनुसार भोजन किया। प्रेस क्लब में भीड़ बहुत थी और लंच का समय था। सभी मेजें भरीं थीं। काफी शोर भी हो रहा था। लगभग दो घंटे तक हम लोग पुराने दिनों की याद में खोए रहे और अच्छे दिनों को याद करते रहे। आज ऐसा कम होता है कि अपने संस्थान को छोड़ने के दशकों बाद लोग मिलें और उसकी चर्चा करते रहें। प्रकारांतर से पत्रकारों के आज के हालात पर भी चर्चा हुई।
इसी बीच इलाहाबाद के पुराने साथी वरिष्ठ पत्रकार जय शंकर गुप्त भी दिखे और हम लोगों को देखकर पास आए। उनसे भी थोड़ी देर बात हुई। वह अपने परिवार के साथ आए थे। इसी बीच वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप माथुर भी आ गए। वह अपने कुछ मित्रों के साथ लंच के लिए आए थे। उनसे भी थोडी देर बात हुई। हम लोग तीन बजे के आसपास वहां से निकले।
माथुर साहब के सौजन्य से आयोजित यह बैठक बहुत ही सुखद ही रही और सुस्वादु भोजन मिला। जितनी देर हम लोग रहे, सभी नॉस्टैल्जिक अनुभव करते रहे। पुराने दिन की बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। बाद में सब लोग अपने आवास को निकले। सभी के कुछ न कुछ काम थे। माथुर साहब ने मुझे मेरे आवास के पास छोड़ा और वैशाली अपने आवास पर गए। उनके कनाडा जाने के पहले एक बार और मुलाकात की बात भी हुई। कुछ बात है कि ‘अमृत प्रभात’ दिल और दिमाग से निकलता नहीं है।


