सुजीत सिंह प्रिंस-
प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में मंत्री और अधिकारियों के बीच विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह टकराव एक साल पहले तब शुरू हुआ था, जब समूह ‘ख’ के अधिकारियों को समूह ‘क’ के पद पर पदोन्नति मिली थी। उनकी नई तैनाती और स्थानांतरण को लेकर मंत्री और अधिकारियों में गंभीर मतभेद हैं, जो विभागीय गतिशीलता को प्रभावित करते रहे हैं।
विवाद का विस्तारित परिप्रेक्ष्य और बैकग्राउंड
1. ट्रांसफर नीति में अनियमितताएँ:
हाल ही में जारी ट्रांसफर गाइडलाइनों (दिनांक 06.05.2025) में मेरिट-आधारित स्थानांतरण का निर्देश दिया गया था, लेकिन विभागीय अधिकारी सीनियॉरिटी को प्राथमिकता दे रहे हैं। आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गये पत्र में भ्रष्टाचार और पैसों की डीलिंग पर गंभीर आरोप लगाए गए थे।
भड़ास मीडिया ने विभाग में ट्रांसफर नीति और दबाव में तैनाती जैसे कई मुद्दों को पहले भी उजागर किया था, जहाँ टकराव, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी की बात उठाई गई थी।


वर्तमान हालात
• “स्कूल चलो अभियान” के नाम पर ट्रांसफर पोस्टिंग टालना:
विवाद की वजह से ट्रांसफर सत्र में अधिकारियों की पोस्टिंग इस अभियान को बहाना बनाकर टाल दी गई थी, जिससे प्रक्रिया और ध्रुवीकृत हो गई।
• मंत्री का कैम्पेन और सुनवाई की कमी:
सूत्र बताते हैं कि मंत्री अपने पिता के साथ मुख्यमंत्री और दिल्ली तक लगातार दौरों पर हैं, ताकि विभाग के डायरेक्टर को हटवाया जा सके। लेकिन आरक्षण विवाद और प्राथमिक विद्यालयों के विलय की आलोचनाओं ने उनकी सुनवाई को मुश्किल बना दिया है।
• डायरेक्टर का दबदबा:
फिलहाल विभाग का डायरेक्टर मंत्री की अपेक्षाओं पर भारी दिखाई दे रहा है, और कई बिंदुओं पर वह मंत्री से मजबूत स्थिति में खड़ा है।
यह पूरा प्रकरण शिक्षा विभाग की संरचनात्मक समस्याओं—पारदर्शिता की कमी, भ्रष्टाचार, और राजनीतिक-पूर्णकालिक हस्तक्षेप—की पड़ताल करता है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि भविष्य में किस सुविधा या रणनीति के आधार पर विभाग में सहजता आएगी और विवादों का समाधान हो पाएगा।


