
विकास मिश्रा-
क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर इन पांच तत्वों में विलीन होकर गुरुदेव प्रोफेसर रामजी लाल जांगिड अनंत में समा गए। कभी एशिया के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता संस्थान माने जाने वाले आईआईएमसी में जांगिड सर ने हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत की थी। दिल्ली के अंग्रेजीमय एकेडमिक माहौल में जांगिड सर हिंदी की सबसे प्रबल आवाज थे। उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की नहीं थी, बल्कि उनकी एक ही आवाज में डंका बजा देने की ताकत थी।
अगस्त 1994 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए करके मैं आईआईएमसी पहुंचा था। कठिन इम्तिहान पास करके पहुंचा था। जब कक्षाएं शुरू हुईं तो आंखें चौंधिया गईं। हम हिंदी वाले तो जैसे हाशिये पर थे, जबकि अंग्रेजी पत्रकारिता और एड एंड पीआर के छात्रों को देखकर लगता था जैसे वे किसी और दुनिया से आए हैं। बॉडी लैंग्वेज ही अलग थी। अध्यापकों का जोर भी उन्हीं पर था। जब भी कोई शिक्षक पढ़ाने आता तो कोर्स के लिए चार किताबों के नाम बताता, उनमें से एक भी किताब हिंदी की नहीं होती थी। हर अध्यापक यही कहकर जाता कि हिंदी की पत्रकारिता के लिए अंग्रेजी का बेहतरीन ज्ञान अनिवार्य है। बात उतनी गलत नहीं थी, लेकिन एहसास ऐसा करवाया जाता था जैसे कि हिंदी वाले कूड़ा-कर्कट हैं और अंग्रेजी वालों में हीरे-मोती जड़े हैं।
ऐसे अंधेरे में रोशनी की किरण लेकर क्लास में आते थे हमारे जांगिड सर। हिंदी वालों का सिर ऊंचा करने, हिंदी वालों के दिलों में जोश भरने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। कहते थे-अंग्रेजी पत्रकारिता तो नरीमन प्वाइंट की पत्रकारिता है। भारत की आत्मा तो भारतीय भाषाओं में बसती है, भारत की पत्रकारिता तो भारतीय भाषाओं में ही संभव है। पढ़ाते थे तो भारतीय इतिहास, स्मृति, पुराणों के संदर्भों की झड़ी लगा देते थे।
जब हम लोग वहां पढ़ते थे तो एक बात और थी। संस्थान के डायरेक्टर थे- डॉक्टर जेएस यादव। वही अंग्रेजी पत्रकारिता के हेड भी थे। उनसे जांगिड सर की बनती नहीं थी। यादव सर का केबिन फर्स्ट फ्लोर पर था और जांगिड सर का ठीक उस केबिन के ऊपर सेकेंड फ्लोर पर।
जांगिड सर अक्सर व्यंग्य में मुस्कुराते हुए कहते- अंग्रेजी वालों की हैसियत ही क्या है तुम लोगों के आगे, उसका डायरेक्टर तो तुम्हारे डायरेक्टर के जूतों के नीचे बैठता है।
जांगिड सर का अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं था। अक्सर अंग्रेजी का विरोध वो लोग करते हैं, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, लेकिन जांगिड सर के मामले में तो ठीक उलटा था। उनकी अंग्रेजी बहुत ही शानदार थी। वे अंग्रेजी के अखबार को बोलकर हिंदी में पढ़ते थे। ऐसा लगता था जैसे हिंदी अखबार ही पढ़ रहे हों। कहते थे कि यह उनके आशु अनुवाद का अभ्यास है।
ये जांगिड सर की ही देन थी कि साल दर साल हिंदी पत्रकारिता के छात्र संस्थान में सीना तानकर चलते रहे। वरना वहां के अंग्रेजीमय माहौल में तो तमाम हिंदी वाले बीच कोर्स ही कैंपस छोड़ जाते। आज ही एक साथी ने एक वाकया बताया। एक प्रोफेसर साहब ने उनकी शिकायत यादव सर से की। बताया कि ये उनकी क्लास अटेंड नहीं करता। यादव सर के यहां पेशी हुई, उन्होंने पूछा- क्यों इनकी क्लास में नहीं जाते। उन साथी ने उत्तर दिया- सर इनकी क्लास में कुछ समझ में नहीं आता। यादव सर बोले- नहीं यह गलत है, तुम मेरी भी क्लास में नहीं दिखते। उस साथी ने कहा- सर तो क्या आपको लगता है कि आपका पढ़ाया हमें समझ में आ जाता है? जब यह बात जांगिड सर के पास पहुंची तो बोले- तुमने दूसरे सवाल का जवाब और भी बढ़िया दिया है।
जांगिड सर अपने हर छात्र के मन में निडरता भरते थे। कहते थे कि जो निडर- निर्भीक नहीं है, उसे पत्रकार नहीं बनना चाहिए। उन्होंने सिखाया-परिस्थितियां चाहे जो हों, डगमगाना मत, लड़खड़ाना मत, डरना मत। वे खुद बहुत ही निर्भीक थे, अक्सर रार ठान बैठते थे। उनमें किसी प्रकार का लोभ नहीं था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उन्हें राजस्थान से लोकसभा का टिकट देना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था।
हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता की उन्नति के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया। अपनी भाषा पर गर्व करना उन्होंने ही सिखाया। तीन दशक की पत्रकारिता में मैंने कभी भी अंग्रेजी में मेल नहीं लिखा। आज भी हिंदी में मेल लिखता हूं, व्हाट्सएप संदेशों का हिंदी में जवाब देता हूं तो इसके प्रति गौरव भाव का श्रेय जांगिड सर को ही है।
जांगिड सर निःसंतान थे। गुरुमाता का कुछ साल पहले देहांत हो गया था। जांगिड सर के पास कुछ पैतृक संपत्ति भी थी, जिसकी तरफ उन्होंने कभी देखा नहीं। वे अपनी पूंजी अपने पढ़ाए छात्रों को ही मानते थे। पूरे अधिकार भाव से अपने शिष्यों को बुलाते थे, आदेश देते थे।
अंतिम समय तक वे पूरी तरह सक्रिय रहे। साध्वी प्रज्ञा भारती को उन्होंने नातिन माना था, तो उन्होंने भी अपने नाना जी की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। पिछले कुछ सालों में कई बार उनकी तबीयत बिगड़ी थी, लेकिन हर बार गुरुदेव मौत को मात देकर लौट आए थे। कुछ दिन पहले फिर अस्पताल से लौटे थे। आदेश देकर मुझे बुलाया था। पहुंचने के बाद बोले थे-मेरे चरणों के पास आकर बैठो। फिर काफी देर तक बतियाते भी रहे। मैंने उनसे मुलाकात पर पोस्ट लिखी, तस्वीरें डालीं तो देश विदेश से उनके शिष्य उन्हें देखने पहुंच गए। अनुरंजन झा लंदन में थे, जैसे ही उन्होंने पोस्ट देखी, दिल्ली का टिकट कटवा लिया और गुरुदेव को देखने पहुंच गए। इतने सारे शिष्यों से मिलकर गुरुदेव हरे भरे होने लगे थे, लेकिन 86 साल की उम्र में उनकी काया जर्जर हो चुकी थी। अपने अंदाज में मनमाने तरीके से जीवन जीने वाले जांगिड सर कब तक इस जर्जर काया के बंधन में रहते। शनिवार दोपहर में उन्होंने पिंजरा खाली कर दिया, अनंत की ओर प्रयाण कर गए।
आज गुरुदेव की अंतिम यात्रा में उनके ढेर सारे शिष्य जमा थे। हमारे बैच से टीवी डुटे के न्यूज डायरेक्टर सुप्रिय प्रसाद, पीटीआई की एडिटर संगीता तिवारी, एनडीटीवी के एडिटर राजीव रंजन, आजतक के ईपी अमन कुमार आए थे।


आईआईएमसी के पूर्व डीजी संजय द्विवेदी जी भी आए थे। वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत, उमेश चतुर्वेदी, मनोरंजन भारती, ब्रजेश सिंह, राजश्री राय, निभा सिन्हा, संजय कुमार, दुर्गानाथ स्वर्णकार समेत उनके दर्जनों शिष्य उपस्थित थे। उनके शिष्यों ने ही उन्हें कंधा दिया। कंधा देने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ।
अपनी नातिन साध्वी प्रज्ञा भारती के हाथों जांगिड सर को मुखाग्नि मिली, कुछ ही देर में चिता धधक उठी। चिता की लपटें आसमान छूने को जैसे बेताब थीं… और होती भी क्यों नहीं, जिसकी चिता की वे ज्वालाएं थीं, उस शख्स का कद भी तो हमारी नजरों में आसमान से कम ऊंचा नहीं था। जांगिड सर का तन भले ही अग्नि में राख हुआ है, वे हमारे दिलों में जीवन भर धड़कते रहेंगे। मुझे यकीन है कि जांगिड सर स्वर्ग में भी हिंदी पत्रकारिता का कोई विभाग खोलेंगे, ताकि वहां भी हिंदी वाले हम लोगों की तरह सीना तानकर चलें।
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