देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी विज्ञापनों पर पिछले पाँच सालों में 1001 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए हैं। यह रकम प्रदेश की आबादी और संसाधनों के हिसाब से चौंकाने वाली है। विज्ञापन मशीनरी पर यह खर्च औसतन हर दिन 55 लाख रुपये बैठता है।
सूत्रों के मुताबिक, इस अवधि में जितना पैसा विज्ञापनों पर खर्च हुआ, वह मिड-डे मील जैसी योजनाओं पर हुए खर्च से भी ज्यादा है।
धामी सरकार में विज्ञापन खर्च का उछाल
न्यूज़लॉंड्री में प्रकाशित बसंत कुमार की रिपोर्ट के अनुसार, आँकड़े बताते हैं कि जुलाई 2021 में पुष्कर सिंह धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद विज्ञापन खर्च में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई। 2020-21 में, जब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री थे, सरकार ने विज्ञापनों पर 77 करोड़ रुपये खर्च किए। अगले साल, जब धामी ने सत्ता संभाली, यह राशि बढ़कर 227 करोड़ रुपये पहुँच गई। 2024-25 में यह खर्च और बढ़कर 290 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
पाँच वित्तीय वर्षों में कुल 1001.07 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर खर्च हुए। इसमें से लगभग 923 करोड़ रुपये धामी कार्यकाल के चार सालों में खर्च किए गए।
टीवी पर सबसे ज्यादा खर्च
- इन वर्षों में सबसे बड़ा हिस्सा टीवी चैनलों को गया।
- कुल खर्च में से लगभग 402 करोड़ रुपये केवल टीवी विज्ञापनों पर खर्च हुए।
अखबारों पर 129.6 करोड़, डिजिटल पर 61.9 करोड़, रेडियो पर 30.9 करोड़, फिल्म प्रचार पर 23.4 करोड़, एसएमएस पर 40.4 करोड़, आउटडोर पर 49.5 करोड़, पुस्तिकाओं पर 56 करोड़ और विज्ञापन एजेंसियों को 128.7 करोड़ रुपये दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश और चिंताएँ
2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार विज्ञापन केवल जनहित से जुड़े और तथ्यात्मक होने चाहिए, न कि राजनीतिक प्रचार के औज़ार।
इसके बावजूद कई राज्यों की तरह उत्तराखंड के भी विज्ञापन: प्रदेश से बाहर छपते हैं, समाचार की तरह छपकर पेड न्यूज़ का रूप ले लेते हैं, चुनावों से पहले अचानक बढ़ जाते हैं, और नेताओं की तस्वीरों के साथ व्यक्तिगत छवि निर्माण का माध्यम बनते हैं।
दिसंबर 2021 में नियमों में बदलाव
- धामी सरकार ने दिसंबर 2021 में विज्ञापन मान्यता नियमों में बड़े बदलाव किए।
- पहले चैनलों को 16 घंटे प्रसारण और 80 मिनट बुलेटिन की शर्त पूरी करनी होती थी, अब केवल तीन बुलेटिन (30 मिनट के) दिखाने की बाध्यता है।
विस्तृत जाँच प्रक्रिया भी आसान कर दी गई। अब केबल ऑपरेटर प्रमाणपत्र और सूचना विभाग की सिफारिश ही पर्याप्त है।
मुख्यमंत्री के पास छूट देने के विशेषाधिकार वैसे ही बरकरार रहे। इन नियमों के बदलने के बाद विज्ञापनों की बाढ़ आ गई।
किन चैनलों को मिला कितना पैसा?
पिछले चार वर्षों में राष्ट्रीय चैनलों को कुल 105.7 करोड़ रुपये मिले। इनमें न्यूज़18 इंडिया सबसे आगे रहा। रिलायंस के स्वामित्व वाले नेटवर्क-18 को अकेले 2024-25 में 5.69 करोड़ रुपये, जबकि चार सालों में 9.49 करोड़ रुपये से ज्यादा मिले। टाइम्स नाउ को 2024-25 में 4.79 करोड़ रुपये और आजतक समेत टीवी टुडे नेटवर्क को 4.62 करोड़ रुपये दिए गए। इसी साल अडानी समूह के अधिग्रहण के बाद पहली बार एनडीटीवी को भी उल्लेखनीय राशि – 2.88 करोड़ रुपये – मिली।
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत लिखती हैं-
- पुष्कर धामी सरकार में दिनदहाड़े लूट
- युवाओं के लिए नौकरियां नहीं
- पेपर लीक करके उन्हीं पर लाठियाँ बरस रहीं
- पत्रकार मारे जा रहे हैं
पर उत्तराखंड की सरकार ने 1000 करोड़ रुपये अपनी छवि चमकाने के लिए विज्ञापनों पर फूंके = 55 लाख रुपए रोज़


