कृष्ण पाल सिंह-
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा जातिगत पहचान के सार्वजनिक प्रदर्शन को सीमित करने के लिए हाल ही में एक शासनादेश जारी किया गया था। लेकिन इसके तुरंत बाद उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक का अपने सजातियों के कार्यक्रम में शामिल होना और विप्र कल्याण बोर्ड की गठन की मांग को बल देना—क्या उनके इस आचरण को औचित्यपूर्ण कहा जा सकता है?
जब शासन का ही एक अंग मुख्यमंत्री के आदेश की अवमानना करे तो उस सरकार का इकबाल कैसे बरकरार रहेगा? सवाल यह भी उठता है कि क्या मुख्यमंत्री अपने ही मंत्रिमंडल पर नियंत्रण रखने में सक्षम हैं? यदि उनके सहयोगी मंत्री उनकी नीतियों से असहमत हैं, तो यह उनके नेतृत्व की मजबूती पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
हाईकोर्ट से प्रेरित थी योगी की पहल
दरअसल, मुख्यमंत्री ने यह शासनादेश अपने मन से नहीं, बल्कि हाईकोर्ट के परामर्श के आधार पर जारी किया था। अदालत ने सरकार से कहा था कि सरकारी दस्तावेज़ों में व्यक्ति की जाति का उल्लेख बंद किया जाए, पुलिस रिकॉर्ड में जातिगत पहचान केवल एससी-एसटी उत्पीड़न मामलों तक सीमित रखी जाए, जाति विशेष के नाम पर लगाए गए बोर्ड-बैनर हटवाए जाएं और वाहनों पर जातिगत प्रतीकों के प्रदर्शन पर रोक लगाई जाए।
योगी आदित्यनाथ पर स्वयं जाति-आधारित झुकाव के आरोप लगते रहे हैं। संभव है कि उनके मन में यह भावना रही हो कि इस आदेश से उनके ऊपर लगे पूर्वाग्रह धुल सकेंगे। लेकिन इस आदेश की जल्दबाजी में जारी करना उन्हें समाज और राजनीति, दोनों मोर्चों पर जटिल स्थिति में ला खड़ा कर गया।
सहयोगी दलों का भी विरोध
मुख्यमंत्री के शासनादेश का विरोध केवल बृजेश पाठक ने ही नहीं किया। कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने भी कहा कि जातिगत पहचान मिटाने से उनकी जैसी शोषित जातियों के सामाजिक न्याय की प्रक्रिया बाधित होगी। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री को हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करनी चाहिए थी।
हालांकि संजय निषाद भाजपा के अनुशासन में नहीं बंधे हैं और अपनी पार्टी के प्रमुख होने के कारण असहमति प्रकट करने का अधिकार रखते हैं, लेकिन बृजेश पाठक को ऐसी छूट नहीं दी जा सकती।
योगी का नारा, मोदी की जुबान
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान नारा दिया था — “बटोगे तो कटोगे”, जो हिंदू समाज की एकता का संदेश था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस नारे का समर्थन किया था।
यदि इस नारे की सार्थकता सिद्ध करनी थी, तो योगी को हाईकोर्ट के आदेश का इंतज़ार नहीं करना चाहिए था। उन्हें स्वयं पहल करनी चाहिए थी जिससे हिंदू एकता के भाव में जातिगत पहचान का विलय होता। फिर भी, देर आए दुरुस्त आए — उन्होंने जो पहल की, वह सराहनीय कही जा सकती है। लेकिन पार्टी के अन्य नेताओं को भी इस नीति को मजबूत करना चाहिए, न कि उसकी जड़ों में मट्ठा डालना।
जातिगत उत्पीड़न को झुठलाने की कोशिश
आज भी दलित दूल्हे के घोड़ी चढ़ने या दलित राष्ट्रपति के मंदिर प्रवेश पर आपत्तियाँ होती हैं। क्या किसी सवर्ण के साथ ऐसा तिरस्कार संभव है?
यह तर्क देना कि “उत्पीड़न तो सवर्णों का भी होता है” — सामाजिक यथार्थ से आँख मूंदने जैसा है। सवर्णों पर अन्याय व्यक्तिगत स्तर पर होता है, जबकि दलितों और वंचित जातियों के साथ यह सामुदायिक होता है। यही वजह है कि संविधान निर्माताओं ने सवर्णों के लिए अलग से कोई बोर्ड बनाने की जरूरत नहीं समझी।
जब तक जाति व्यवस्था रहेगी, तब तक निष्पक्ष प्रशासन और न्यायपालिका भी अपने निर्णयों में प्रभावित होती रहेंगी।
सशक्त जातियों की ऐतिहासिक भूमिका
इतिहास गवाह है कि सशक्त जातियों के ही कुछ प्रबुद्ध नेताओं ने कमजोर जातियों के उत्थान और संरक्षण के लिए प्रयास किए। इनमें ब्राह्मण समाज की भूमिका हमेशा अग्रणी रही है।
बृजेश पाठक से अपेक्षा की जाती है कि वे इस परंपरा को आगे बढ़ाएं और समाज को जातिविहीन भारत की दिशा में ले जाने में योगदान दें। दूसरी ओर, पिछड़ी जातियों के नेताओं का संदेह भी स्वाभाविक है — क्योंकि अतीत में उनके साथ छल होता रहा है।
अब यह योगी आदित्यनाथ और ब्रजेश पाठक पर निर्भर है कि वे साबित करें — जातिगत पहचान को पीछे छोड़ने से सामाजिक न्याय में कोई कमी नहीं आएगी। अगर वे ऐसा कर सके, तो जाति-मुक्त समाज की दिशा में यह एक निर्णायक कदम होगा।


