शशि नाथ दुबे-
मुख्यमंत्री के सूचना विभाग में करोड़ों का चूना लगाते विभाग के अधिकारी, विवेक के नाम पर भ्रष्टाचार, कब ध्यान दोगे मुख्यमंत्री जी…
देहरादून। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जब से प्रदेश के मुख्य बने है तब से आज तक श्री धामी प्रदेश के अधिकारियों को कर्तव्य बोध करा रहे है। एक ही सपना भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड हो अपना।
मुख्यमंत्री के इस अभियान में हम भी लगातार लिखते आ रहे है। वहीं किसी अन्य विभाग की बात तो अलग है मुख्यमंत्री के पास सूचना विभाग है जिसके श्री धामी जी स्वयं मंत्री है और सूचना विभाग के अधिकारी उनके भ्रष्टाचार मुक्त अभियान में पलीता लगा रहे है। सूचना विभाग में कथित भ्रष्टाचार रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
ऐसे समाचार पत्रों को करोड़ों रुपए के विज्ञापन आवंटित कर दिए गए जो ना तो उत्तराखंड में सूचीबद्ध है और ना ही किसी का आरएनआई नंबर है, इतना ही नहीं कई समाचार पत्र तो ऐसे है जिसके तीन या चार अंक ही प्रकाशित हुए हैं ऐसे ऐसे समाचारों पत्रों को लाखों का विज्ञापन जारी कर देना यह भ्रष्टाचार का सूचक है।
पाठकों के उन सभी समाचार पत्रों के लिस्ट जल्द ही प्रकाशित की जाएगी जिसमें बाहरी समाचार पत्र या उत्तराखंड से प्रकाशित ऐसे समाचार पत्र जो विभाग में सूचीबद्ध ही नहीं है या जिनके आरएनआई नंबर भी नहीं है को करोड़ों रुपयों के विज्ञापन की बंदर बाट की गई है।
अब सवाल यह उठता है कि विभाग में ऐसा कौन अधिकारी है जो इस विभाग को भ्रष्टाचार मुक्त कर सकता है विभाग के पूर्णकालिक वरिष्ठतम अधिकारी “कार्यालयकाध्यक्ष” आशीष त्रिपाठी ऐसे एक मात्र अधिकारी है जिनके पास कलम की पावर और कलम की ताकत है लेकिन बावजूद इसके सूचना विभाग में “व्यावसायिक दर पर विज्ञापन” के नाम पर हो रही बड़ी धांधली और कथित भ्रष्टाचार पर श्री त्रिपाठी को उनके दायित्व का बोध होना आवश्यक है।
आपको बता दे सूचना विभाग में समाचार पत्रों को सूचीबद्ध करने के लिए एक पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है,ओर कई मीटिंग होने के पश्चात समाचार पत्र विभागीय दर या डीएवीपी दर पर सूचिबद्ध होते है बावजूद इसके विभाग कई गुना विभागीय दर से अधिक व्यावसायिक दर पर विज्ञापन धड़ल्ले से जारी किए जा रहे हैं। इस मामले में सूचना विभाग के सभी अधिकारियों का एक ही तर्क या यूं कहे रटा रटाया शब्द रहता है कि नियमावली में ऐसा प्रावधान है कि मुख्यमंत्री की स्वीकृति से व्यावसायिक दर पर विज्ञापन दिया जा सकता है।
आपको बता दे सही मायने में नियमावली में कहीं भी विवेक जैसे शब्द का उल्लेख है ही नहीं। कही ना कही इस तरह का तर्क देते हुवे विभागीय अधिकारी अपने पदीय दायित्व को पूरी तरह भूल जाते हैं।
यही नहीं उत्तराखंड से बाहर के उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी किया जाता है जो कमीशन तय कर लेते है खास कर लखनऊ, कानपुर, रायबरेली, प्रयागराज, के समाचार पत्र को जारी विज्ञापन में एक उपनिदेशक तथा एक पत्रकार की भूमिका चर्चा में है ये पत्रकार लखनऊ के एक समाचार पत्र का देहरादून प्रतिनिधि बताया जाता है, जो सीधे ५०%कमीशन लेता है वहाँ किसको देता है वही जाने?
फ़िलहाल अगर आप महानिदेशक से लिखवा भी लिया तो पत्र पड़ा रहेगा फ़ाइल चलेगी तो उपनिदेशक से वार्ता लिखके वापस आ जायेगी, वार्ता का मतलब कुछ लोग प्रकाशक से तय करने की उम्मीद बताते है, वार्ता सफल नहीं तो फ़ाइल डंप।


