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उत्तर प्रदेश

अंधा कानून, बहरी सरकार और गूंगा पत्रकार – व्यवस्था का संपूर्ण महात्मा संस्करण!

पहले ख़बरों का संज्ञान लेकर ग़लतियों को सही किया जाता था मगर अब पूरा ज़ोर “ख़बरों के मैनेजमेंट” पर दिया जाता है-अपराध और भ्रष्टाचार को रोकने पर नहीं! अगर सच्चाई लिखोगे-दिखाओगे तो नौकरी तो जाएगी ही साथ ही फ़ोन सर्विलांस पर, LIU और व्यवस्था तुम्हारे पीछे! नेताओं, रईसों, कानपुर के अखिलेश दुबे और अवनीश दीक्षित जैसे शाकालों के सामने 90 डिग्री का कोण बनाकर झुक जाने वाले वर्दीधारी… गरीब और मध्यम वर्ग के सामने सिंघम की छठी औलाद बनने लगते हैं…

सत्येंद्र कुमार-

गांधी जी के तीन बन्दर आजकल कहाँ हैं? सुना है कि, तीनों बड़े मजे में हैं! जो अंधा था..वो “कानून बन गया” है। इसलिए उसे सच्चाई दिखाई नहीं देती! जो बहरा था… वो “शासन बन गया” है। इसलिए उसे जनता की आवाज सुनाई नहीं देती! और जो गूंगा था..वह “पत्रकार बन गया” है। इसलिए बेचारा कुछ बोल पाता ही नहीं !

CJI पर जूता फेंकने की कोशिश!

पहली घटना ख़बर नहीं बल्कि “धिक्कार” है। घटना बता रही है कि सुप्रीम कोर्ट के “चीफ जस्टिस” गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की गई है। कोर्ट रूम में जूता फेंकने का प्रयास करने वाला व्यक्ति वकील है। उसका नाम राकेश किशोर है, उम्र 71 साल है। वह जस्टिस गवई के उस बयान से आहत था जिसमें CJI ने भगवान विष्णु को लेकर टिप्पणी की थी। जब उसने CJI की तरफ जूता फेंकने की कोशिश की, कोर्ट रूम में मौजूद दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल ने उसे तुरत पकड़ लिया। पुलिस जब उसे कोर्ट रूम से ले जा रही थी उसने जोर से बोला “सनातन धर्म का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान।” अभी पता नहीं क्या-क्या देखना बाक़ी है! ऐसे सिरफिरों की हरकतों से वो दिन दूर नहीं, जब कोर्ट जूता पहनकर कोर्ट में आने पर भी पाबंदी लगा देगा।

दादागिरी पर ऐतराज…..तो बेरहमी से पीटा!

दूसरी तरफ भी खबर नहीं बल्कि एक और “धिक्कार” है! खबर है कि गुंडे-बदमाशों-दंगाइयों की फायरिंग और आगजनी देखकर हिरन हो जाने वाले कानपुर के अक्षय प्रताप सिंह जैसे दरोगा आम नागरिक को पीटकर आनंदित हो रहे हैं! ऐसे पुलिसकर्मी आज तक ब्रिटिशकालीन मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके हैं। ऐसे पुलिसकर्मी ख़ाकी के दामन पर वो दाग हैं जो पुलिस द्वारा दी जा रही तमाम कुर्बानियों पर भारी पड़ रहे हैं। कानपुर में ओवरस्पीडिंग के आरोप में अक्षय प्रताप सिंह और उसके दोस्त अभिषेक दुबे को चौकी प्रभारी अमित विक्रम त्रिपाठी पुलिस चौकी ले गए। जहां अक्षय को पीटा गया, घुटनों से घातक प्रहार किया गया। अभिषेक द्वारा बनाया वीडियो वायरल है जो दरिंदगी की दास्तान कह रहा है। फ़िलहाल इस “मरजाने नक़ली सिंघम” को लाइन हाजिर कर दिया गया है, जो पुलिस महकमे में अति मामूली कार्रवाई होती है। न सस्पेंशन हुआ है अब तक, और न इनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज हुई है! ऐसे पुलिसकर्मियों का अहंकार अक्सर बोलता सुनाई पड़ जाता है कि “जो करते बने कर लेना”

ये घटना तो कैमरे पर आ गई…लेकिन के सोचिए कि इस आदमी ने अपने करियर में इस तरह के या फिर इससे भी संगीन कितने वाकए अंजाम दिए होंगे! आखिर उनका हिसाब कौन देगा? जब कैमरा पकड़ेगा और शोर मचेगा तब कुछ दिन के लिए लाइन से अलग कर दिया जाएगा, और शोर थमने के बाद फिर मेन लाइन से जोड़ दिया जाएगा! बस इसी तरह पुलिसिया अभयदान के संजीवनी पर्वत से “संजीवनी बूटी” का छिड़काव होता रहेगा।

ग़लतफ़हमी की बयार पर सवार अफसरों को पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि… धड़ाधड़ फर्जी FIR कराकर प्रदेश में अमन चैन ले आएंगे। यदि ऐसा है तो इस बयार से उतरिये, और मुंगेरीलाल के ख्वाब देखना बन्द करिये। इन्हीं फर्जी मुकदमों के बाढ़ का परिणाम है कि NCRB ने फिर से एक बार यूपी को बढ़ते हुए अपराध के कटघरे में खडा कर दिया। एक अनुमान के मुताबिक इस देश में 10 करोड़ मुकदमे लंबित है….अब सोचिये इस देश का भविष्य? 10 करोड़ मुकदमे का मतलब 40 करोड़ लोग प्रभावित है, और देश की लगभग आधी आबादी इन मुकदमों की जद में है। 2014 से पहले इन मुकदमों की संख्या 7 करोड़ थी.. और आज छोटी-छोटी बातों पर मुकदमा दर्ज होता है…जिसमें 50 % मुकदमे फर्जी बनाये जाते हैं। न्यायपालिका इन फर्जी मुकदमों के बोझ तले कराह रही है.. जेलें ओवरलोडेड चल रही हैं और व्यवस्था है कि अपने आलम में “झूम बराबर झूम शराबी” कर रही है!

पहले ख़बरों का संज्ञान लेकर ग़लतियों को सही किया जाता था मगर अब पूरा ज़ोर “ख़बरों के मैनेजमेंट” पर दिया जाता है-अपराध और भ्रष्टाचार को रोकने पर नहीं! अगर सच्चाई लिखोगे या दिखाओगे तो नौकरी तो जाएगी ही साथ ही फ़ोन सर्विलांस पर, और LIU और व्यवस्था तुम्हारे पीछे…! नेताओं, रईसों, कानपुर के अखिलेश दुबे और अवनीश दीक्षित जैसे शाकालों के सामने 90 डिग्री का कोण बनाकर झुक जाने वाले वर्दीधारी… गरीब और मध्यम वर्ग के सामने सिंघम की छठी औलाद बनने लगते हैं… जबकि सिंघम के चरित्र और कर्तव्यपरायणता का रत्ती भर भी चंद वर्दीधारियों पास नहीं है।

दुर्भाग्य यह है कि, व्यवस्था ने अपनी नाकामियों को छिपाने का पहले जो तरीक़ा निकाला था, उसी को रोल मॉडल बनाते हुए अन्य अफसर भी उसका अनुसरण आज धड़ल्ले से कर रहे हैं। किसी भी चीज में अति का खामियाजा तो भुगतना ही पड़ता है… और इस अव्यवस्था तथा भ्रष्टाचार का ख़ामियाज़ा, यदि आने वाले वक्त में सरकार को उठाना पड़े ..तो इससे ज्यादा अफसोसजनक और क्या हो सकता है?

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