Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

वेब-सिनेमा

पत्रकारिता का कालनेमी काल; जिम्मेदारी से ज्यादा वायरल होने की भूख!

हरीश मिश्रा-

भारत आज़ादी के अमृत काल में प्रवेश कर चुका है — लेकिन इसी दौर में भारतीय पत्रकारिता अपने सबसे गहरे संकट से गुजर रही है। कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली यह संस्था अब धीरे-धीरे संवेदनहीनता, स्वार्थ और सत्ता की निकटता की गिरफ्त में जाती दिख रही है।

आजकल पत्रकारिता में विचार से अधिक वायरल होने की भूख है, नैतिकता से अधिक नेटवर्क की ताकत और सत्य से अधिक सत्ता के सुर में सुर मिलाने की कला को महत्व मिल रहा है।

जब पत्रकारिता ‘पेशे’ से ‘उद्योग’ बन जाए

पहले पत्रकारिता एक जिम्मेदारी थी — आज यह एक ब्रांडिंग प्लेटफॉर्म बन चुकी है। जिस पेशे का मूल उद्देश्य समाज को दिशा देना था, वह अब व्यक्तिगत पहचान, फॉलोअर्स और प्राइम टाइम की टीआरपी का साधन बन गया है।

भोपाल से लेकर दिल्ली तक, छोटे-बड़े शहरों में पत्रकारिता अब खुला दरवाज़ा है — जहाँ प्रवेश के लिए न योग्यता चाहिए, न नैतिकता। बस एक प्रेस कार्ड और थोड़ी पहुंच हो, तो कोई भी “पत्रकार” बन सकता है।

यहीं से शुरू होती है पतन की कहानी। जब शिक्षा, अनुशासन और प्रशिक्षण के बिना कोई भी व्यक्ति कलम या कैमरा उठा लेता है, तो स्याही और स्क्रीन — दोनों ही समाज के चेहरे पर कालिख बन जाती हैं।

टीवी स्टूडियो में ‘राष्ट्रवाद’ का कारोबार

पत्रकारिता का सबसे बड़ा बाजार आज टीवी स्टूडियो बन गया है। यहां सवाल नहीं पूछे जाते, स्क्रिप्ट पढ़ी जाती है। जहां कभी एंकर सत्ता से जवाब मांगते थे, अब वही एंकर सत्ता के प्रवक्ता की भूमिका निभाने लगे हैं।

प्राइम टाइम डिबेट्स अब लोकतंत्र के संवाद नहीं, बल्कि सत्तामंत्र के प्रसारण में बदल चुके हैं। एंकरानियां भावनाओं को आंसुओं में बदलती हैं, एंकर जोश में ललकारते हैं — लेकिन यह सारा जोश सत्ता के हित में होता है, सत्य के नहीं।

वे कैमरे की रोशनी में राष्ट्रभक्ति की मुद्रा में खड़े दिखते हैं, लेकिन असल में वे वही कहते हैं जो सत्ता सुनना चाहती है। यह दौर “पत्रकारिता” का नहीं, “प्रचारकिता” का है।

‘कालनेमी पत्रकार’ : जो साधना को साध्य बना बैठे

रामायण का कालनेमी राक्षस हनुमान को भ्रमित करने के लिए माया रचता था। आज के मीडिया परिदृश्य में भी ऐसे ‘कालनेमी पत्रकार’ मौजूद हैं — जो पत्रकारिता की साधना को साध्य बना चुके हैं। उनके लिए यह पेशा नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच और सौदेबाजी का मंच है। वे विज्ञापन, ठेकेदारी और सत्ता की चापलूसी के बीच पत्रकारिता की आत्मा को मार रहे हैं।

प्रेस काउंसिल की भूमिका और पत्रकार की आत्मसंयमता

अब समय आ गया है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया केवल नाम का प्रहरी न रहे, बल्कि पत्रकारिता की नैतिक सीमाएँ तय करे। पत्रकार बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता, प्रशिक्षण और आचार संहिता अनिवार्य की जाए। स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में फर्क समझना जरूरी है — क्योंकि असीमित स्वतंत्रता भी अराजकता का ही दूसरा नाम है।

लेकिन यह नियंत्रण सरकार का नहीं होना चाहिए। पत्रकारों का आत्मनियंत्रण ही पत्रकारिता का सबसे बड़ा प्रहरी है। पत्रकारों को यह सीखना होगा कि हर बात ‘छापने योग्य’ नहीं होती और हर राय ‘सत्य’ नहीं होती।

खबर नहीं, जिम्मेदारी लिखिए — दिखाइए भी

खबर का अर्थ अब ‘सबसे पहले’ नहीं बल्कि ‘सबसे सही’ होना चाहिए। तथ्य आधारित, प्रमाणित और निष्पक्ष रिपोर्टिंग ही पत्रकारिता को फिर से विश्वसनीय बना सकती है। मीडिया की तरंगें और स्पेस सार्वजनिक संपत्ति हैं — इनका उपयोग लोकहित में होना चाहिए, लोकलाभ में नहीं।

अंत में — कलम और कैमरा दोनों साधना बनें

पत्रकारिता साधना है, साध्य नहीं। यह कमाई का जरिया नहीं, समाज का दर्पण है। पत्रकार वही सच्चा है जो सत्ता से नहीं, सत्य से संवाद रखता है।

आज जब कलम बिकती है और कैमरा झुकता है, तो लोकतंत्र की आवाज़ धीमी पड़ जाती है।

जरूरत बस इतनी है कि पत्रकार फिर से अपने भीतर झांके — क्योंकि जब कलम और कैमरा दिशाहीन हो जाएं, तो राष्ट्र का विवेक अंधकार में चला जाता है।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन