भारतीय मीडिया के इतिहास में रिया चक्रवर्ती केस वो आईना है, जिसमें पत्रकारिता नहीं, भेड़चाल, प्रोपेगेंडा और टीआरपी की भूख नज़र आती है। पाँच साल पहले, एक अभिनेत्री को बिना सबूत ‘कातिल’, ‘डायन’ और ‘गोल्ड डिगर’ कहकर सार्वजनिक रूप से फाँसी दी गई — अदालतों से पहले न्यूज़ स्टूडियो में। यह वही दौर था जब चैनलों ने कैमरे को हथियार बना दिया था और सच्चाई को सनसनी में बदलकर बेच दिया था।
आज जब हर एजेंसी — सीबीआई तक — रिया को निर्दोष ठहरा चुकी है, तो सवाल यह है कि क्या मीडिया अपने अपराधबोध से कभी जूझेगा? शायद नहीं। क्योंकि हमारे न्यूज़रूम अब न्याय नहीं, नाटक रचते हैं — और सच्चाई सिर्फ तब दिखाते हैं जब उसका TRP वैल्यू खत्म हो चुका होता है।
इस मसले पर वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र नाथ मिश्रा ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा है-
अंतत: रिया चक्रवर्ती आधिकारिक रूप से हर जांच एजेंसी से बरी कर दिया गया। सीबीआई ने भी। ठीक पांच साल इसी बिहार चुनाव से पहले माहौल बनाने के लिए जिस तरह रिया चक्रवर्ती के साथ मॉब-सिस्टम-टीआरपी- लिचिंग की गयी थी वह एक काला अध्याय है।
टीआरपी के चक्कर में सुशांत की मौत को बेचने के लिए एक परिवार को किस तरह परेशान,जलील किया गया,वह मीडिया के इतिहास का में सबसे धब्बे अध्याय के रूप में पढ़ा जाएगा।
यह मामला टीवी प्रोपेगंडा और “एजेंडा “ के लिए किसी को टारगेट करने का सबसे घिनौने मिसाल में एक है । खैर इतनी तमीज तो नहीं होगी कि रिया चक्रवर्ती से कोई माफ़ी माँगेंगे लेकिन इतिहास में यह टीवी न्यूज़ के सबसे काले चैप्टर में एक होगा। पत्रकारिता के इतिहास में इस केस की मिसाल दी जाएगी कि इस पेशे में कोई कितना गिर सकता है।
जिस परिस्थिति में सोशल-मीडिया-पॉलिटिकल लिंच के बीच रिया ने खुद को मजबूत रखा, संयम और ग्रेस से हालात का सामना किया वह बेमिसाल था।टूटना रिया के सामने सबसे आसान विकल्प था लेकिन उसने कठिन विकल्प चुना।मजबूती से
“काला जादू करने वाली डाइन”, “रिया तूने क्यों मारा” जैसे शब्दों से देश के जनमानस में यह बात डाल दी गयी कि रिया ने ही सुशांत को मारा। बिना किसी सबूत या सब्सटेंस के। क्योंकि किसी को रिया पसंद नहीं था। सिस्टम-मीडिया को यूज करने की यह अब तक की सबसे बड़ी मिसाल है और इनके बीच मजबूत टिके रहने के जज्बे की भी जो सालों तक याद रखा जाएगा




