अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती, जिन्हें अब उनके साथी सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में सीबीआई से पूरी तरह क्लीन चिट मिल चुकी है, उन पर जो मीडिया ट्रायल हुआ, वह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का सबसे शर्मनाक अध्याय था। आज भी उन्हें उस मीडिया से एक सार्वजनिक माफ़ी मिलनी चाहिए जिसने बिना सबूत, बिना संवेदना और बिना ज़िम्मेदारी के एक युवा महिला को चुड़ैल की तरह पेश किया।
मीडिया ट्रायल का नंगा नाच
गल्फ न्यूज़ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय चैनलों पर दिन-रात रिया को निशाना बनाया गया। एक तरफ़ वह अपने साथी की मौत के दुख में थी, दूसरी तरफ़ टेलीविज़न स्टूडियो में एंकर और रिपोर्टर उसकी निजी ज़िंदगी को नोंच रहे थे। सबसे विचलित करने वाली बात यह थी कि इस मीडिया लिंचिंग में महिला पत्रकार और एंकर सबसे आगे थीं। कोई कह रहा था – “लड़कियाँ पज़ेसिव होती हैं,” तो कोई यह “विश्लेषण” कर रहा था कि “भारतीय घरों में गर्लफ्रेंड को परिवार से दिक्कत होती है।”
रिया पर आरोप लगाए गए कि वह सुशांत को ड्रग्स देती थी, उसे अपने नियंत्रण में रखती थी। उनके भाई को ड्रग पैडलर बताया गया। एक पत्रकार तो “पूरी फाइल” लेकर लाइव शो में पहुंच गईं, जिसमें रिया और दीपिका पादुकोण, सारा अली ख़ान जैसी अभिनेत्रियों के व्हाट्सऐप चैट तक पढ़े गए — बिना किसी प्रमाण के।
“Imma bounce” = “ड्रग कोड”?
मीडिया का स्तर इतना गिरा कि “Imma bounce” (मतलब — मैं जा रही हूँ) जैसे स्लैंग को “ड्रग कोड” बताकर दिखाया गया। एक चर्चित एंकर (अर्नब गोस्वामी) ने तो लाइव शो में चिल्लाते हुए कहा, “मुझे ड्रग दो! मुझे ड्रग दो!”, मानो यह कोई सर्कस हो, न कि न्यूज़ डिबेट। यह सब कोविड महामारी के चरम समय में हो रहा था, जब पूरा देश संकट में था। रिया और आर्यन खान को गिरफ्तार किया गया — बाद में साफ हुआ कि उन्होंने कोई अपराध किया ही नहीं था।
“डायन”, “बंगाली औरत”, “ब्लैक मैजिक”
रिया को टीवी पर “डायन”, “ब्लैक मैजिक करने वाली बंगाली औरत” कहा गया। उनकी जातीय पहचान तक को अपमानजनक तरीके से उछाला गया। किसी ने यह सोचने की ज़रूरत नहीं समझी कि वह एक इंसान है, जिसने अभी-अभी अपने साथी को खोया है। रिया के पिता की तबीयत बिगड़ी, परिवार को घर छोड़ने को कहा गया — फिर भी कोई सहानुभूति नहीं, सिर्फ़ टीआरपी की भूख। सुशांत की मौत को मीडिया ने रियलिटी शो बना डाला।
आज भी माफ़ी नहीं
2020 में एक चैनल ने ट्वीट किया था – “रिया की ड्रग चैट के खुलासे से हुई गिरफ्तारी – 45 दिन, 86 एक्सपोज़ के बाद रिया जेल में।” यह ट्वीट आज भी डिलीट नहीं हुआ, जबकि सीबीआई ने रिया को पूरी तरह बरी कर दिया है।
पत्रकारिता के सिद्धांतों का अपमान
इस पूरे मामले में पत्रकारिता के बुनियादी नियम —
- दोनों पक्ष सुनना,
- साक्ष्य का इंतज़ार करना,
- न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना
- सब कुछ कुचल दिया गया।
भारत में मानहानि के मुक़दमे सालों तक चलते हैं, इसलिए चैनलों को कोई डर नहीं। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई होती है, जिससे मीडिया अपनी सीमाओं को समझता है।
“न्यूज़” नहीं, “ट्रैश”
यह चैनल “न्यूज़” नहीं दे रहे थे, बल्कि फैंटेसी कचरा परोस रहे थे। इन्हें सिगरेट की तरह “स्वास्थ्य चेतावनी” के साथ दिखाया जाना चाहिए — “यह चैनल आपके विवेक के लिए हानिकारक है।” किसी चैनल ने न रिया से माफ़ी मांगी, न दर्शकों से। न कोई पछतावा, न शर्म। वही चेहरे अब किसी और “विच हंट” में जुटे हैं।
दर्शकों के पास अब भी ताकत है
आख़िर में जिम्मेदारी दर्शकों की भी है — रिमोट अब भी हमारे हाथ में है। जैसा कि उद्योगपति राजीव बजाज ने कहा था, “हमने उन चैनलों से विज्ञापन ही बंद कर दिए जो नफ़रत और फिक्शन बेचते हैं।” मैं रिया चक्रवर्ती को याद करता हूं — वह उजली आंखों वाली आत्मविश्वासी युवती — और उम्मीद करता हूं कि वह फिर वही आत्मविश्वास पा सकेगी, जो भारतीय मीडिया ने उससे छीन लिया था।
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