सिद्धार्थ ताबिश-
संतान पैदा करना और पालना कभी किसी को भी “सुख” नहीं देता है.. चूंकि संतान के लालन पालन को आपके समाज ने “बहुत ऊंचे दर्जे के सुख” की श्रेणी में रखा है और उसे बहुत अधिक महिमामंडित किया है इसलिए आपका मस्तिष्क उसे “सुख” मानने के लिए बचपन से प्रोग्राम्ड हो जाता है।
मानव मस्तिष्क को हम किसी भी तरह से प्रोग्राम्ड कर सकते हैं.. बद से बदतर स्थिति को हम उसे सुख और सही साबित करवा सकते हैं।
एक बच्चा जब पैदा होता है तो माँ जिस पीड़ा से गुज़रती है वो माँ ही जानती है.. बच्चा पैदा होने के बाद सिर्फ़ और सिर्फ़ पीड़ा, परेशानी और दुख ही शुरू होते हैं, सुख नहीं.. बच्चा सारी रात जगाता है और ये जागने जगाने का सिलसिला लगभाग 7 से 8 साल तक चलता है.. एक बच्चा होने के बाद माता और पिता दासियों साल तक पूरी नींद नहीं ले पाते हैं.. फिर उसके साथ साथ उसकी बीमारी, चोट और तमाम तरह की सुरक्षा और असुरक्षा आपको परेशान करती रहती है.. और जैसे ही वो बड़ा होता है तो फिर स्कूल शुरू.. अब जो नींद पूरी नहीं हो रही थी वो अलग रह गया, अब तो सुबह सुबह जागना है भले रात में देर से सोए हों.. सेहत की आपकी ऐसी वाट लगती है कि ये अब तो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है कि शादी शुदा और बच्चे वाले लोगों की उम्र अकेले जीने वालों से कहीं कम होती है।
तो ये कैसा सुख है जो आपकी उम्र घटा दे, आपको वक़्त से पहले बूढ़ा कर दे और जीवन भर सिवाय दुख, पीड़ा और मुसीबत के कुछ न दे? ये सुख नहीं है, ये बस आपको “बताया” और “समझाया” गया सुख है.. ये बिल्कुल धर्म वाला “सुख” है.. जहां है कुछ नहीं बस सब कुछ मस्तिष्क में है।
मैं ये नहीं कह रहा हूं कि आपको बच्चा पैदा करना है तो उसे न पैदा करें.. मेरे कहने का ये सीधा सा अर्थ है कि बच्चा पैदा करने और उसे पालने को “सुख” न बताएं.. बच्चा होना सुख नहीं “दुख और मुसीबत” की श्रेणी की घटना होती है.. आपको वो मुसीबत उठानी है, शौक से उठाएं मगर उसकी गलत धारणा और परिभाषा न गढ़ें.. न तो शादी में कोई सुख है और न ही संतानोत्पत्ति में.. आपको वंश आगे बढ़ाना है, वारिस लाना है, चिराग़ लाना है घर का तो कीजिए पैदा मगर इस पीढ़ी को भ्रमित मत कीजिए और उसे “दुःख” को “सुख” मत बताइए।
अपने बच्चों से कहिए कि “अगर तुम संतान करोगे तो सिर्फ़ और सिर्फ़ दुख पीड़ा और मुसीबत ही उठाओगे.. तुम जो स्वयं के लिए करोगे जीवन में वही तुम्हें सुख देखा, कोई संतान नहीं.. इसलिए संतान करना है वो तुम्हारी मर्ज़ी, मगर संतान किसी भी तरह से “सुख” का कारण नहीं होती है”
अब कम से कम एक काम करो कि इस दुनिया से सच बोलकर जाओ.. ये पूरी मानव जाति इस समय घोर पीड़ा और मानसिक अवसाद में है.. ये जो मनुष्य अब पार्टियों, नेताओं, धर्म, धार्मिक गुरुओं में अपना उद्धार ढूंढ रहे हैं, ये सिर्फ़ इसलिए क्योंकि इनका जीवन बहुत अधिक दुख, कुंठा और पीड़ा में है.. इन्हें लगता है कि कोई खास धर्म, कोई खास जाति, कोई खास नस्ल इन्हें पीड़ा दे रही है जबकि हकीकत में ये एकदम झूठ है.. ये पीड़ित हैं तो इसलिए क्योंकि आप इन्हें बताते हैं कि शादी सुख है, संतान कमाई, शिक्षा आज़ादी, और सुख तुम्हें त्योहारों, संतानों और भीड़ के साथ उत्सव मनाने में मिलता है.. ये झूठ अब बोलना बंद कीजिए।


