आनंद स्वरूप वर्मा-
इसे भी जानें…. कम ही लोगों को याद होगा कि किसी जमाने में अमेरिका में शराबबंदी लागू की गयी थी। यह शराबबंदी 1920 से 1933 तक यानी पूरे 13 साल अस्तित्व में रही। अमेरिकी संविधान में 18वें संशोधन के जरिए एक राष्ट्रव्यापी कानून बनाया गया जिसे Volstead Act नाम दिया गया। 16 जनवरी 1919 को संसद द्वारा इस संशोधन की पुष्टि की गयी और फिर यह कानून लागू हो गया। इसके अंतर्गत शराब के उत्पादन, आयात-निर्यात, और बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके साथ ही कुछ नियम भी बनाए गए थे जिनके तहत कुछ खास वर्ग के लोगों को लाइसेंस लेकर एक सीमित मात्रा में शराब पीने की छूट थी।
5 दिसंबर 1933 को एक संवैधानिक संशोधन के जरिए इस कानून को निरस्त किया गया। अमेरिकी इतिहास में यह एक मात्र घटना है जब किसी संवैधानिक संशोधन को निरस्त करने के लिए एक दूसरे संशोधन का सहारा लिया गया हो।

अमेरिका में शराबबंदी की जरूरत क्यों पड़ी? इसकी पृष्ठभूमि क्या थी? इससे किस तरह के फायदे और नुकसान हुए? इन सारे मुद्दों पर विचार करते हुए मशहूर उपन्यासकार रिचर्ड कोंडन ने ‘माइल हाई’ शीर्षक से एक उपन्यास लिखा था जो 1969 में प्रकाशित हुआ था। रिचर्ड कोंडन का एक दूसरा राजनीतिक थ्रिलर ‘दि मंचूरियन कैंडीडेट’ 1959 में प्रकाशित हुआ था और इसकी काफी चर्चा थी। कोंडन का ‘माइल हाई’ अमेरिका में शराबबंदी, अपराध और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर आधारित है। इस लेखक के बारे में समीक्षकों की राय है कि वह प्रायः काल्पनिक तत्वों के माध्यम से वास्तविक घटनाओं का चित्रण करते हैं।
भारत में पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई शराबबंदी के जबर्दस्त पक्षधर थे। जिन दिनों उनकी सरकार थी, राधाकृष्ण प्रकाशन के संस्थापक ओंप्रकाश के अनुरोध पर मैंने इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद किया जो ‘मयखाने तोड़ दो’ शीर्षक से छपा था। मुझे भी यह उपन्यास बहुत दिलचस्प लगा क्योंकि इसमें बड़ी बारीकी से उन कारणों की छानबीन की गयी थी जिनकी वजह से शराबबंदी का कानून बना। इस उपन्यास का मुख्य पात्र एडवर्ड कोरेंस वेस्ट नामक एक गैंगस्टर है जो एक सामान्य व्यक्ति से शुरू होते हुए अमेरिका के सबसे धनी और शक्तिशाली आपराधिक साम्राज्य का निर्माण करता है।
उपन्यास के अनुसार 1920 से कुछ साल पहले तक देश के अंदर शराब व्यापारियों को काफी घाटे का सामना करना पड़ रहा था। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस घाटे की भरपाई कैसे की जाय। उपन्यास के नायक एडवर्ड कोरेंस वेस्ट ने बहुत सोच समझ कर एक दीर्घकालीन कार्यक्रम बनाया। इसके तहत इसने तय किया कि अमेरिकी संसद में सांसदों की एक ऐसी लॉबी तैयार की जाय जो शराब से होने वाले सामाजिक नुकसान पर रोशनी डालते हुए शराबबंदी के पक्ष में वातावरण तैयार करे। इसके साथ ही कोरेंस वेस्ट ने अपनी उस योजना को भी अंजाम देना शुरू किया कि शराबबंदी होने के बाद उसे किस तरह अवैध शराब का एक समूचा नेटवर्क तैयार करना है। अवैध शराब के धंधे की समूची व्यवस्था मुकम्मल हो जाने के बाद उसके सांसदों की लॉबी ने शराबबंदी की मांग को लेकर हंगामा शुरू कर दिया और इस मांग के समर्थन में संसद के बाहर भी आवाज उठने लगी।
खासतौर पर महिलाओं के सक्रिय समूहों ने इस मांग का जोरदार समर्थन किया क्योंकि पुरुषों के शराब पीने की लत से वे ही सबसे ज्यादा प्रताड़ित थीं। संक्षेप में कहें तो इस पूरे कवायद की परिणति शराबबंदी में हुई और अमेरिका के इतिहास में यह पहली घटना थी। उपन्यास में मुख्य रूप से सत्ता के दुरुपयोग, नैतिक पतन और अमेरिकी पूंजीवाद का काला चेहरा देखा जा सकता है। एक आलोचक के अनुसार कोंडन ने इस निषेधकाल को ‘राष्ट्रीय प्रवृत्तियों के साथ हिंसा और त्वरित लाभ की संगठित लालसा’ के रूप में चित्रित किया है।
इस शराबबंदी की वजह से अवैध शराब का व्यापार जबर्दस्त ढंग से फलने फूलने लगा, अपराध की घटनाओं में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, नये नये जुआघरों और वेश्यालयों का निर्माण हुआ और समूचे देश में शराब के अवैध व्यापार में लगे अपराधी गिरोह अस्तित्व में आये। बहुत सारे ऐसे केंद्र बन गये जहां से अधिक पैसे देकर कोई भी शराब हासिल कर सकता था। अब सरकारी स्तर पर कोई ऐसी एजेंसी नहीं सक्रिय थी जो शराब की गुणवत्ता की जांच परख कर सके जिसका नतीजा यह हुआ कि जहरीली शराब से आये दिन लोगों की मौतें भी होने लगीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस शराबबंदी से महिलाओं को काफी राहत मिली और घरेलू हिंसा में उल्लेखनीय कमी आयी लेकिन यह भी सच है कि सरकारी राजस्व को हजारों लाखों डॉलर का नुकसान हुआ।
इस घटना और इस पर लिखे उपन्यास की याद दिलाकर मैं शराबबंदी के खिलाफ या शराबबंदी के पक्ष में कोई राय नहीं व्यक्त कर रहा हूं बल्कि यह बताना चाहता हूं कि सामाजिक सुधार के नाम पर ऊपर से दिखाई देने वाले सरकारी कार्यक्रमों की तह में जाएं तो बहुत सारे अनजान तथ्य नजर आते हैं।
पिछले दिनों प्रशांत किशोर का एक इंटरव्यू मैं देख रहा था जिसमें उन्होंने शराबबंदी का विरोध किया था और कहा था कि अगर उनकी ‘जनसुराज पार्टी’ सत्ता में आयी तो वह अविलंब शराबबंदी समाप्त कर देगी। साक्षात्कार लेने वाले ने जब उनसे पूछा कि क्या आप शराब पीने के पक्षधर हैं तो इसके जवाब में उनका कहना था कि यहां पक्षधर या विरोधी होने की बात नहीं है- मेरे कहने का मतलब यह है कि कानून के जरिए इन पर काबू नहीं पाया जा सकता। उन्होंने गांधीवादी तौर-तरीकों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक इस बुराई के प्रति समाज में जागरूकता नहीं पैदा की जाएगी, इस पर काबू नहीं पाया जा सकता। इसके साथ ही उन्होंने सरकारी स्तर पर ऐसे नियम बनाने की बात की जिनसे मद्यपान को प्रोत्साहन न मिले। प्रशांत किशोर ने यह भी बताया कि बिहार में शराबबंदी की वजह से अब तक सरकार को 28000 करोड़ का राजस्व घाटा हो चुका है।
बहरहाल, यह एक बहुत जटिल मसला है और इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि अमेरिका की ही तरह बिहार में भी शराबबंदी की वजह से महिलाओं को राहत मिली और घरेलू हिंसा में उल्लेखनीय कमी आयी। लेकिन यह भी सच है कि सरकारी नियंत्रण न होने की वजह से जहरीली शराब से बहुत सारी मौतें भी हुई हैं।


