अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में वंदे मातरम पर मोदी के बयान की खबर पढ़िए और फिर यह नोट कीजिए कि कांग्रेस अध्यक्ष ने इसका जवाब दिया है जो देशबन्धु में लगभग बराबरी में छपा है। द टेलीग्राफ में और विस्तार से है। जानकार इतिहासकारों का भी पक्ष लिया गया है। यह हिन्दी और अंग्रेजी की रिपोर्टिंग का अंतर भी हो सकता है। मोदी का पक्ष मातृभाषा में शिक्षा या आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित नजरिया लगता है जबकि द टेलीग्राफ की रिपोर्ट बताती है कि अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले किस तरह मातृभाषा वालों से अलग हो सकते हैं। इसपर इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से भ्रमित न हों – वहां मामला पत्रकारिता पुरस्कार और उसके प्रायोजकों का हो सकता है।

संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला के साथ देशबन्धु, द हिन्दू और द टेलीग्राफ की लीड आवारा कुत्तों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया के अधपन्ने की लीड यही खबर है। इस तरह मेरे नौ में से छह अखबारों की लीड या पहले (या अध) पन्ने की सबसे बड़ी खबर बताती है कि सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया है। निश्चित रूप से यह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जो मामले हैं उनमें से एक रहा होगा, आदेश महत्वपूर्ण है, आम लोगों से जुड़ा है और सार्वजनिक स्थलों से संबंधित होने के कारण पहले पन्ने पर हो सकता है। आज मैं दूसरी खबरों से तुलना करके नहीं बताउंगा कि इसकी जगह उसे भी लीड बनाया जा सकता था। यह काम मैं कल कर चुका हूं और बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण और गंभीर आदेशों को छोड़कर बिहार में बंपर मतदान की खबर को लीड बनाया गया था। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रतिशत में बताया जाने वाला मतदान अगर बढ़ गया है तो इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए था कि हाल में एसआईआर हुआ था और मतदाता सूची को शुद्ध करने का दावा किया गया था। इस तरह इसमें मृत, निवास छोड़कर जा चुके वोटर थे ही नहीं तो प्रतिशत बढ़ना ही था। सच्चाई यह है कि एसआईआर के बाद बिहार के कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 47 लाख कम हुई है। खबरों के अनुसार, मोटे तौर पर 65 लाख नाम हटे और करीब 21.5 लाख नए जोड़े गए। अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या 7.89 करोड़ से घटकर 7.42 करोड़ रह गई है। इस लिहाज से प्रतिशत बढ़ना बहुत मायने नहीं रखता है और इतना तो नहीं ही कि चुनाव आयोग वास्तविक आंकड़ों के बिना, “बिहार के इतिहास में अब तक के सबसे अधिक 64.66% मतदान” की सराहना करे और कहे, इससे संकेत मिलता है कि पहले चरण का मतदान “उत्सव के माहौल में शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ”। कल मैंने द टेलीग्राफ की खबर के हवाले से यह जानकारी भी दी थी।
अब आज जब चुनाव आयोग की चुप्पी महत्वपूर्ण है, एक पाठक के रूप में मैं यह जानना चाह रहा था कि चुनाव आयोग ने खुद कुछ कहा या नहीं, राहुल गांधी के खुलासे में विसंगतियां ढूंढ़ने वाले इंडियन एक्सप्रेस और दूसरे प्रचारकों ने चुनाव आयोग से चुप्पी का कारण या राहुल गांधी के आरोपों का जवाब पूछा या नहीं तो मुझे बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों के संबंध में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। वैसे तो मैं नहीं भूलूंगा, लेकिन आम पाठक भूल जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के मामले में स्वतः संज्ञान नहीं लिया। दूसरी ओर, मीडिया (खासकर इंडियन एक्सप्रेस) ने चुनाव आयोग या मुख्य चुनाव आयुक्त से तो प्रश्न नहीं ही किया या मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन करने वालों से भी नहीं पूछा कि उनके पसंदीदा चुनाव आयुक्त कहां हैं, क्या कर रहे हैं। जहां तक स्वतः संज्ञान लेने की बात है, कल मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर लगाई थी जिससे पता चल रहा है कि भारत सरकार कैसे देश के मुख्य न्यायाधीश को नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रही है और कल यह खबर दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर तो नहीं ही थी आज कुत्तों की खबर को जो प्रचार दिया है वह आम आदमी से संबंधित सरकार के रवैये को कल नहीं दिया था। यह अमृतकाल में मीडिया का हाल है। शुरू से सब को मालूम है। मैं तो बस रेखांकित करता जा रहा हूं। अगर कभी अमृतकाल की पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा तो मेरा काम संदर्भ के रूप में मददगार हो सकेगा।
यह तो हुई सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश से संबंधित खबर या खबरों की खबर। आइए, अब यह भी देख लें के प्रधानमंत्री को कैसे महामानव बनाया जाता रहा है। इस दिशा में वे स्वंय नॉन बायोलॉजिकल होने की कल्पना (या सपना) प्रचारित कर चुके हैं। आज वंदे मातरम के 150 साल होने पर आयोजित कार्यक्रम की खबर में प्रधानमंत्री ने जो कहा उसकी भी खबर है। उसी की चर्चा और खबर पर बात करता हूं। यह खबर भी कई अखबारों में हैं मैं पहले अमर उजाला की बात कर रहा हूं। यहां यह ‘खबर’ लीड के ऊपर पांच कॉलम में है। शीर्षक है, “वंदे मातरम के छंद हटाकर विभाजन का जो बीज बोया, वह आज भी चुनौती : मोदी”। यह 1937 का मामला है और 2025 में इसकी बात कर रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2013-14 में 100 दिन में विदेश में रखा काला धन वापस लाने और (नोटबंदी से भी) 50 दिन में सपनों का भारत बनाने जैसी बात करते थे। मीडिया यह प्रारंभिक या बुनियादी सवाल भी नहीं करता कि इसप 11 साल उन्होंने क्या किया या अब यह मुद्दा कैसे है? अब पूरी तरह भाजपा और आरएसएस के प्रधान प्रचारक बन बैठे नरेन्द्र मोदी तब चौकीदार होते थे और जब राफेल चोर कहा गया तो पूर्व जनरल भी उनकी अपील पर चौकीदार हो गए थे। केंद्रीय मंत्री रहने के कारण मजबूरी रही हो तो इसका ईनाम मिला, राज्यपाल हो गए। बचाव में अब कहा जा सकता है कि कांग्रेस भी यही सब करती थी लेकिन भाजपा के अलग चाल चरित्र और चेहरे का क्या हुआ? निश्चित रूप से यह 1937 और 2025 की चर्चा एक साथ करने के लिए नहीं है। और बात इतनी ही नहीं है। हालांकि, वह सब मेरा मुद्दा नहीं है और यहां मैं खबरों की ही बात करूंगा।
अमर उजाला ने इस ‘खबर’ को पांच कॉलम में तान दिया है। प्रचारक और स्वार्थी लोग इसके स्क्रीन शॉट का उपयोग करेंगे तथा प्रधानमंत्री ने जो कहा उसका व्हाट्सऐप्प पर प्रचार होगा, वीडियो और मीम भी बनेंगे क्योंकि इसका उपयोग पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान भी किया जाना है। इसलिए कोलकाता के अखबार, द टेलीग्राफ ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इस खबर को विस्तार से प्रकाशित किया है और शीर्षक है, मोदी ने वंदेमातरम के ‘छत्ते’ को फिर छेड़ा। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट पर आने से पहले बता दूं कि अमर उजाला का शीर्षक द टेलीग्राफ की तरह पाठको को सतर्क करने वाला या निष्पक्ष नहीं है। प्रधानमंत्री के कहे को प्रचारित करने के अलावा इस बात को हाइलाइट करके पेश किया है कि, आज की पीढ़ी को यह जानने की जरूरत है कि राष्ट्र निर्माण के इस महामंत्र के साथ अन्याय क्यों हुआ था। तथ्य यह है कि कम से कम मुझे निजी तौर पर कोई जरूरत नहीं लगती, मेरा उत्पाद जीवन पूरा हो गया मैंने जानने की जरूरत नहीं समझी अपने बच्चों को नहीं बताया और मुझे नहीं लगता कि उन्हें यह सब बताने और जानने की जरूरत है। फिर भी मोदी और भाजपा के लोग यह प्रयास करेंगे और हिन्दी वाले पूरा मामला नहीं बताएंगे जो टेलीग्राफ ने बताया है। शुरुआत शीर्षक से ही की है। हिन्दी वाले यह प्रचारित करने की कोशिश करेंगे कि मोदी या प्रधानमंत्री ने इसकी जरूरत बताई है। इसी लिए बच्चों को मातृभाषा के अलावा अंग्रेजी भी सीखना चाहिए ताकि उनके पास अंतरराष्ट्रीय नागरिक होने का विकल्प रहे और भारत माता के पूत बने रहने की मजबूरी में न जीयें। लेकिन यह भी अलग मामला है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने नेहरू और गांधी के हवाले से जवाब दिया कि कांग्रेस ने इस गीत को कितने उत्साह से अपनाया था और आरोप लगाया कि आरएसएस तथा भाजपा ने अपनी सभाओं या कार्यालयों में कभी भी वंदे मातरम या जन गण मन नहीं गाया। इसके लिखे जाने के कुछ साल बाद, मातृभूमि के लिए संस्कृत और बंगाली के मिश्रण में रचित छह छंदों वाला यह गीत 1882 के (बंकिम चंद्र) चट्टोपाध्याय उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। दशकों बाद, यह गीत सभी प्रकार के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक गीत बन गया और “वंदे मातरम” उनका प्रमुख नारा रहा। केवल पहले दो छंदों को सार्वजनिक गायन के लिए अपनाने के पीछे कांग्रेस का तर्क था कि अंतिम चार छंद, जिनमें देवी-देवताओं और अन्य हिंदू धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है, मुसलमानों के लिए गाना मुश्किल होगा। 1950 में, संविधान सभा ने पहले दो छंदों को गणतंत्र के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया। हालाँकि, अपनाया गया रूप भी विवादास्पद बना हुआ है। “वंदे मातरम” का अनुवाद “मैं आपकी स्तुति करता हूँ, माँ” और “मैं आपका नमन करता हूँ, माँ” दोनों रूपों में किया जा सकता है – दूसरा रूप उन मुसलमानों के लिए मुश्किल है जिनके बारे में माना जाता है कि वे ईश्वर के अलावा किसी और के सामने नहीं झुकते हैं।
द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, भाजपा प्रवक्ता सीआर केसवन ने ट्वीट किया, “नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर जानबूझकर वंदे मातरम के उन छंदों को हटा दिया जिनमें देवी मां दुर्गा की स्तुति की गई थी…।” नेताजी सुभाष बोस ने वंदे मातरम के पूर्ण मूल संस्करण की पुरजोर वकालत की थी। 20 अक्तूबर 1937 को नेहरू ने नेताजी सुभाष बोस को पत्र लिखकर दावा किया कि वंदे मातरम की पृष्ठभूमि मुसलमानों को चिढ़ा सकती है।” जेएनयू की सेवानिवृत्त इतिहास प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी ने कहा कि पहले दो छंदों को अपनाने का निर्णय अकेले नेहरू ने नहीं, कांग्रेस की बनाई एक समिति ने लिया था। इसमें नेहरू, मौलाना आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर और आचार्य नरेंद्र देव सहित अन्य शामिल थे।” चूंकि मुसलमानों को हिंदू देवी-देवताओं के प्रत्यक्ष संदर्भ वाले छंदों को लेकर चिंता थी, इसलिए समिति ने सामूहिक रूप से शुरुआती दो छंदों को अपनाने का फैसला किया, जो विभिन्न समारोहों में उनके राष्ट्रीय गीत के रूप में थे।” खबर में आगे लिखा है, “दो छंदों को अपनाकर, कांग्रेस ने सभी वर्गों की चिन्ताओं का ख्याल रखा और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया। यह कहना कि (केवल) दो छंदों को अपनाने से फूट को बढ़ावा मिला, सही नहीं है।” इतिहासकार सुगत बोस अपनी पुस्तक, द नेशन ऐज़ मदर एंड अदर विज़न्स ऑफ़ नेशनहुड में कहते हैं कि यह टैगोर ही थे जिन्होंने कांग्रेस की सभाओं में गाने के लिए वंदे मातरम के केवल पहले दो छंदों को अपनाने का सुझाव दिया था। सुभाष चंद्र बोस ने सुझाव दिया था कि टैगोर की सलाह मानी जाए। पुस्तक में कहा गया है कि टैगोर ने बोस को निजी तौर पर लिखा था कि दुर्गा की आराधना वाला यह गीत एक ऐसे राष्ट्रीय संगठन के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त था जो विभिन्न धार्मिक समुदायों का मिलन स्थल था। पुस्तक के अनुसार, “उन्होंने (टैगोर ने) बांग्ला में लिखा: ‘इस बहस से बंगाली हिंदू बेचैन हो गए हैं, लेकिन मामला हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है। जहाँ दोनों पक्षों की भावनाएँ प्रबल हों, वहाँ निष्पक्ष निर्णय की आवश्यकता है। हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य में हमें शांति, एकता और सद्बुद्धि की आवश्यकता है क्योंकि एक पक्ष हठधर्मिता के कारण झुकने से इनकार करता है – हमें अंतहीन प्रतिद्वंद्विता की आवश्यकता नहीं है।”
जाहिर है कि 1937 में अगर छंद हटाए गए थे तो मकसद देश की धर्मनिरपेक्ष भावना रही होगी और इसका 1947 में देश के बंटवारे से कोई संबंध नहीं है। फिर भी नरेन्द्र मोदी और आरएसएस की सांप्रदायिक राजनीति कुछ और करती बताती है। शर्मनाक यह कि अभी भी लोग समझ नहीं रहे हैं और संघ व भाजपा इसे जारी रखने के लिए लोगों को अशिक्षित रखने और मातृभाषा में शिक्षा जैसी बातें करते हैं। मीडिया का काम इन चीजों का खुलासा करना है पर वह खुद इसमें शामिल लगता है और इसका कारण मीडिया में संघ के लोगों का प्लांटेशन भी है। यह सब अलग मुद्दा है लेकिन मीडिया से संबंधित है। आज जब अखबारों में कुत्तों और वंदेमतरम को प्रमुखता मिली है तो खबर है कि तकनीकी खराबी के कारण कल 800 उड़ानें प्रभावित हुईं। आज ही द हिन्दू में पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि देश में कोई नहीं मानता है कि एयर इंडिया की विमान दुर्घटना पायलट की गलती के कारण हुई थी। हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड हवाई नियंत्रण यातायात प्रणाली के ठप होने से हुई परेशानी है। इंडियन एक्सप्रेस और दि एशियन एज की लीड अगले साल ट्रम्प के भारत दौरे के उनके संकेत हैं। यहां वंदेमातरम की खबर संघी शैली में ही है। खरगे का पक्ष पहले पन्ने पर नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


