यशवंत सिंह-
दिल्ली वाली आयोजक पूजा प्रियंवदा ने गाजीपुर वाले जनप्रतिनिधि व फेस्टिवल एक्टिविस्ट Mantu Pradhan जी के हाथ से खाने का प्लेट छीना, ऐसी चर्चा है! अगर ये सच है तो शर्मनाक है! करोड़ रुपये बटोरने के बाद भी भोजन के लिए मारामारी!!
पढ़िए संजय राय उर्फ़ मंटू प्रधान द्वारा लिखित घटना का विवरण-

संजीव गुप्ता- मंटू भैया सिटी स्कूल मे मेरे मित्र हैँ व सेवा समर्पण संस्थान के हित रक्षा प्रमुख के रूप मे जिले के मुसहर बांसफॉर बन्धुओं के सुख दुख मे सबसे आगे खड़े रहते हैँ। विवेक सत्यमितरम के आग्रह पर मेरे मित्र के नाते गाज़ीपुर लीटरेचर फेस्तिवल को लेकर आयोजित पहली बैठक मे शामिल रहे। इस कार्यक्रम मे भी मेरे निमंत्रण पर आये और पूरे कार्यक्रम के दरम्यान भरपुर सहयोग किया। मेरी पुस्तक पर चर्चा चल रही थी जिसमे मै व्यस्त था।इसी बीच मंटू भैया की निगाह एक ऐसे अपरिचित अतिथि पर पड़ी जिन्हे गेट पर मौजूद बाउंसर भोजन कक्ष मे नही जाने दे रहे थे। मंटू जी उन्हे लिवाकर अंदर गये तो किसी हॉस्ट ने उन अतिथि का गरमजोशी से स्वागत किया। इस पर मंटूजी बोले की बाहर आपके कले कपड़े वाले रोक रहे और आप इतना सम्मान दे रहे। किसी ने मंटू भैया से कह दिया आप भी भोजन कर लें उन्होंने प्लेट उठायी। इसी बीच वह अहंकारी महिला आई और यह घटना हुई। मुझे शर्म है व मै मंटू भैया मे व्यक्तिगत रूप से क्षमा मांगता हूँ की मेरे आमंत्रण पर वह आये और ऐसा अफसोसजनक कांड हुआ।
उमेश श्रीवास्तव- चर्चा ही नहीं है, यह घटना सत्य है। सबसे पहले गाजीपुर में ये आयोजक लोग आए थे तो उत्थान फाउंडेशन में मंटू प्रधान समेत हम सब लोग एक साथ मिले थे। इस प्रकार के कृत्य की जितना भी निंदा हो, कम है।
गाजीपुर के हर घर में एक दो लोगों का खाना एक्स्ट्रा बनता है ताकि कोई कभी आ भी जाए तो भूखा न जाए। ऐसे उदार उदात्त जिले के वासी मंटू भाई एक लोकप्रिय ग्राम प्रधान हैं, जानेमाने समाजसेवी हैं, फेस्टिवल आयोजन की लोकल टीम के सक्रिय लोगों में से हैं। उनके हाथ से खाने का प्लेट छीन लेना बहुत ही अपमानजनक और पीड़ादायक है। ऐसे साहित्य फेस्टिवल का क्या मतलब जब किसी के हाथ से खाने का प्लेट छीन लेने की मजबूरी आयोजकों की हो। बहुत शर्मनाक और घृणित!- यशवंत सिंह
राकेश श्रीवास्तव- मैं इस घटनाक्रम या उससे जुड़े किसी व्यक्ति को तो नहीं जानता हूं पर आपकी घटना तो बहुत ही अजीब है। ऐसे साहित्य और पढ़ाई का क्या मतलब जब आपके भीतर सामान्य मानवता भी न रहे। यह तो आयोजन से जुड़े सम्मानित व्यक्ति के साथ किया गया जबकि वैसे भी अपनी संस्कृति और शिष्टाचार मे किसी व्यक्ति के हाथ से प्लेट छीनी नहीं जाती है। वैसे भी आजकल साहित्य की गोष्ठियों के स्थान पर मेलों का आयोजन होने लगा है जो अभिजात्यवाद का प्रदर्शन है। अब रचना से अधिक ध्यान प्रदर्शन का रहता है। तीस तीस चालीस मिनट के सत्र होते हैं जिसमे भी अधिकतर समय स्वागत, सम्मान और धन्यवाद मे व्यतीत हो जाता।
राकेश जायसवाल- दिल्ली वाली आयोजक पूजा प्रियंवदा द्वारा गाजीपुर वाले जनप्रतिनिधि व फेस्टिवल एक्टिविस्ट Mantu Pradhann जी के हाथ से खाने का प्लेट छीनना गाजीपुर वालों का अपमान है। प्रधान जी पिछले 30 वर्षों से अपने गांव के प्रधान है और इस शहर के सम्मानित व्यक्ति हैं।
बहुत गलत हुआ, मंटू प्रधान जी का जिले में एक सम्मानित स्थान है, समाज में उनका उठना-बैठना बड़े लोगों के बीच है। ऐसे सम्मानित व्यक्ति के साथ सार्वजनिक रूप से इस तरह का व्यवहार करना आयोजकों की सोच और संस्कार दोनों पर सवाल उठाता है। शर्म आनी चाहिए ऐसे आयोजनकर्ताओं को।- राजू सिंह, पत्रकार
अनिल उपाध्याय-
यह घटना इस कार्यक्रम में सहयोग करने वाले सभी के लिए शर्मनाक है। जनपद में आने वाले ऐसे किसी कार्यक्रम करने वाले पर आगे विशेष ध्यान देने की जरूरत है, नहीं तो लुटेरे इसी तरह हमें लूटते रहेंगे।
मुन्ना सिंह-
खाने की प्लेट तो अनजान से भी कोई नहीं छीनता, यह तो शायद लोगों के आर्थिक सहयोग से आयोजित कार्यक्रम था।
प्रकरण पर मंटू प्रधान जी की पोस्ट और कुछ तस्वीरें भी देखिए…








