
त्रिभुवन-
ज्ञानरंजन का हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता में योगदान अप्रतिम है। उनका अपना काम बोलता है। वे एक साहसिक साहित्यकार हैं। उनका काम केवल एक साहित्यिक पत्रिका निकालने भर का नहीं रहा, वह हिन्दी में संपादक-चरित्र की वैचारिक और नैतिक पुनर्खोज है। चौथे लोकसभा चुनाव, नक्सलबाड़ी, आपातकाल, चिली से लेकर आज तक जितने भी ऐतिहासिक झटके और कंपन हमारे समय ने महसूस किए, उनकी प्रतिध्वनि एक अकेले आदमी की संपादकीय चेतना में जितनी साफ़, बहसों को जन्म देने वाली और दीर्घकालिक रूप में दर्ज़ हुई, वह “पहल” और उसके संपादक ज्ञानरंजन के बिना सोची ही नहीं जा सकती।
साहित्यिक आत्म-प्रदर्शन और “ब्रांड-रचनाकार” संस्कृति से अलग, ज्ञानरंजन ने जिस चीज़ का बलिदान किया, वह अपनी ख़ुद की रचनाकार की “कॅरियर” सम्भावना थी। “पिता”, “बहिर्गमन”, “छलाँग”, “शेष होते हुए”, “फेंस के इधर-उधर”“बहिर्गमन”, “संबंध” आदि जैसी कहानियाँ लिखने वाला लेखक चाहता तो अपने को ही केंद्र में रखकर चल सकता था; लेकिन उसने अपना लगभग सारा “ईंधन कोयले से परमाणु ऊर्जा तक” एक पत्रिका में झोंक दिया। यही वह निर्णायक मोड़ है, जहाँ ज्ञानरंजन सिर्फ़ अच्छे कहानीकार से आगे बढ़कर हिन्दी के लिए वही काम करने लगते हैं, जो विश्व-साहित्य में पैरिस रिव्यू, ग्रांटा, पॉएट्री, एन्काउंटर जैसी पत्रिकाएँ करती रही हैं। रचनाशीलता, विचार, राजनीति, संस्कृति और विश्व साहित्य के बीच पुल बनना, एक सपना तो है; लेकिन ज्ञानरंजन उस पुल को अपनी विचार चेतना के कंधे पर उठाकर यहाँ तक ले आए।
“पहल” का सपना कोई छोटे कक्ष की लघु पत्रिका का सपना नहीं था; यह इस महादेश की चेतना के “वैज्ञानिक विकास” की परियोजना था। मैंने जब विज्ञान के एक विद्यार्थी होने के नाते पहली बार यह पत्रिका देखी तो यही समझा था कि यह कोई विज्ञान की पत्रिका है; लेकिन बाद में पढ़ा तो पता चला कि यह वैज्ञानिक चेतना से नहाई हुई एक वैचारिकी वाली धारा है। इसे सिर्फ़ वामपंथ कहना इसके साथ ज़्यादती है। ज़रूरी नहीं कि हर वामपंथी चीज़ वैज्ञानिक चेतना से जुड़ी हुई हो ही। मार्क्स और एंगल्स के कैम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के प्रकाशन के बाद के 177 साल बाद दुनिया के समुद्रों में पानी बहुत भर गया है और उसमें बहुत सारे द्वीप-उपद्वीप डूब रहे हैं या डूबने जा रहे हैं।
वामपंथी होना अपने-आप में वैज्ञानिक चेतना की गारंटी नहीं है। मार्क्स और एंगेल्स के समय, विशेषकर 1848 के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो तक, यह बात काफ़ी हद तक सत्य मानी जा सकती थी कि वामपंथ आधुनिक विज्ञान, इतिहास और समाजशास्त्र की उपलब्धियों से सबसे अधिक संवाद में रहने वाली धारा है। लेकिन उसके बाद विज्ञान स्वयं जिस अविश्वसनीय गति से आगे बढ़ा; डार्विन, आइंस्टीन, क्वांटम भौतिकी, जीवविज्ञान, सूचना-प्रौद्योगिकी, जीन विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान आदि उसके सामने कोई भी राजनीतिक विचारधारा यदि अपने को “वैज्ञानिक” कहती है तो उसे लगातार अपने बौद्धिक औज़ारों की समीक्षा और अद्यतन करना पड़ता है।
ऐसे ही समय में ज्ञानरंजन जैसे चेतनशील मार्क्सवादी की विशिष्टता उभरती है। उन्होंने समय से बहुत पहले उस आहट को भांप लिया और वैज्ञानिक चेतना पर ज़ोर दिया। उन्होंने वामपंथ को केवल नारे, इतिहास-स्मृति या पार्टी लाइन के रूप में नहीं, “वैज्ञानिक चेतना” की एक लगातार विकसित होती परंपरा के रूप में समझा। “पहल” में अर्थशास्त्र, फ़ासीवाद, साम्राज्यवाद, तकनीक, मीडिया, प्रकृति-विज्ञान, भाषा और संस्कृति के प्रश्न जिस तरह साथ-साथ रखे गए, वह इस बात का प्रमाण हैं कि वे विचारधारा को जड़ सूत्रों की तरह नहीं, गतिशील ऐतिहासिक प्रक्रिया की तरह देखते थे। उनके लिए मार्क्सवाद का अर्थ किसी किताब की स्थिर उद्धरणशीलता नहीं, “आलोचनात्मक और वैज्ञानिक दृष्टि” था, जो नई वैज्ञानिक खोजों, नयी सामाजिक संरचनाओं और नये पूंजीवादी रूपों के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद कर सके। यह सुखद भी है और बेहद विडंबनामूलक भी कि भारतीय राजनीतिक मार्क्सवादियों को जो बात आज तक समझ नहीं आ सकी, उसे नक्सलबाड़ी के दिनों में एक वैज्ञानिक ऊर्जा आप्लावित साहित्यकार समझ चुका था।
भारतीय मार्क्सवादियों की एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि यहाँ राजनीतिक खेमा वैचारिक लोगों को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, जबकि होना इसका उलटा चाहिए। राजनीति के महासमर में आज वे इसीलिए मारे-मारे फिर रहे हैं; क्योंकि उन्होंने उलटी रीत को अपनाया। ख़ैर, यह बहुत बड़ी बहस का विषय है। इस हिसाब से और इस अर्थ में ज्ञानरंजन का काम ख़ुद सहज मार्क्सवादी परंपरा की उस मूल ऐतिहासिकता से जुड़ता है, जो हर दौर में अपने समय की वास्तविकता, उसके विज्ञान और उसकी सामग्री को गंभीरता से लेकर स्वयं को आलोचनात्मक रूप से बदलने की क्षमता रखती है। उन्होंने दिखाया कि वामपंथ की विश्वसनीयता केवल “वाम होने” में नहीं, इस बात में है कि वह अपने समय के सबसे उन्नत वैज्ञानिक और बौद्धिक विवेक के साथ कितनी ईमानदारी से खड़ी रहती है।
एक तरफ मार्क्स, लेनिन, माओ, नेरुदा, पाश, नाज़िम, दरवेश, ब्रेख्त, दूसरी तरफ भारतीय भाषाओं; जैसे पंजाबी, बांग्ला, मराठी, तमिल, उर्दू, असमिया आदि की कविताएँ और कथा, साथ में अर्थशास्त्र, साम्राज्यवाद, फ़ासीवाद, सांस्कृतिक राजनीति, तकनीक, विज्ञान पर गंभीर लेख। हिन्दी में इससे पहले किसी पत्रिका ने पाठक को इतना व्यापक, सघन, विश्वस्तरीय बौद्धिक नभ नहीं दिखाया था। इस अर्थ में “पहल” सचमुच हिन्दी की पैरिस रिव्यू नहीं, उससे आगे की चीज़ भी कही जा सकती है; क्योंकि उसमें केवल लेखकीय “क्राफ़्ट” नहीं, वर्ग-संघर्ष और सांस्कृतिक प्रतिरोध की सुचिंतित दृष्टि भी है।
“दॅ पैरिस रिव्यू” का नाम तो लोग सहजता से ले लेते हैं; लेकिन वे यह उल्लेख करना भूल जाते हैं कि “दॅ पैरिस रिव्यू” ज्ञानरंजन का एक छोटा-सा “घरेलू” दफ़्तर नहीं, एक ठीक-ठाक आकार की अमेरिकी संस्था है और उसके मुक़ाबले अकेले ज्ञानरंजन का काम कहीं विराट् दिखने लगता है। कोई भी “दॅ पैरिस रिव्यू” जैसी पत्रिका के बारे में सोचता है और सोचता है कि “पहल” क्या है और उन पर प्रश्न उछालता है तो उसे देखना चाहिए कि अमेरिका में “दॅ पैरिस रिव्यू फाउंडेशन” नाम से एक नॉन-प्रॉफ़िट संगठन चलता है, जो इस पत्रिका को निकालता है। उनकी ताज़ा फाइलिंग के मुताबिक इसके बीस कर्मचारी हैं, जो एडिटर, सब-एडिटर, इवेंट-फंडरेज़िंग, डिजिटल, एडमिन, अकाउंट आदि का काम देखते और करते हैं। यानी यह एक पूरा प्रोफ़ेशनल दफ़्तर है। इसकी कुल आमदनी 3.75 मिलियन डॉलर और कुल ख़र्च 3.43 मिलियन डॉलर है। यानी मोटे तौर पर कहें तो “दॅ पैरिस रिव्यू” का सालाना ऑपरेशनल बजट लगभग 3.5 मिलियन यूएस डॉलर है यानी 30–31 करोड़ रुपये।
“पहल” करे ज्ञानरंजन ख़ुद का खून जलाकर तैयार करते रहे हैं और “दॅ पैरिस रिव्यू” की संपादक ऐमिली स्टॉक्स सालाना दो लाख चार हजार तीन सौ छियासठ डॉलर यानी 15 लाख रुपए महीना और इसकी एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर लॉरी डॉल एक लाख 45 हजार 399 डॉलर सालाना यानी दस लाख पचहत्तर रुपए महीना वेतन पाती हैं। और उसमें जो बीस लोगों की प्रोफ़ेशनल टीम है, उसे साढ़े तीन मिलियन डॉलर का बजट मिलता है। यहीं से साफ़ दिखता है कि जिस तरह की वैश्विक-स्तर वाली पत्रिका “दॅ पैरिस रिव्यू” इस पूरी संस्थागत मशीनरी, भारी बजट और ऊँची तनख़्वाहों पर टिककर निकलती है, वैसी ही क्षितिज वाली पत्रिका ‘पहल’ ज्ञानरंजन ने लगभग अकेले, बेहद सीमित संसाधनों और लगातार हमलों और संदेहों के बीच खड़ी की। ये तथ्य उनके योगदान को असाधारण ही नहीं, ऐतिहासिक भी बना देते हैं।
और यह सब किसी संस्थान, मीडिया-हाउस या पार्टी के बज़ट पर नहीं, जबलपुर के एक लेखक की निजी कमरकस ज़िद पर खड़ा था। उन्होंने साफ़ लिखा कि वे “टीए-डीए, कमेटीवाल, जनसंपर्कीय कॅरियरवाद” के ख़िलाफ़ रहे हैं और इसीलिए “पहल” को उन्होंने किसी संगठन का मुखपत्र बनने नहीं दिया। यही स्वतंत्रता उसे वैचारिक रूप से तेज, चयन में कठोर और नजरिए में निर्भीक बनाती है। यही वजह है कि आपातकाल के दौर में धर्मवीर भारती, राजेंद्र अवस्थी जैसे शक्तिशाली नामों के सार्वजनिक आक्रमण झेलने पड़े और वह सिलसिला आज तक भी रुका नहीं है; गृहमंत्रालय तक शिकायतें पहुँचीं, फेलोशिपें छीनी गईं; लेकिन फिर भी न तो पत्रिका रुकी, न संपादक का स्वर नरम हुआ। सबसे बड़ी बात तो यह है कि “पहल” और ज्ञानरंजन के उस काम ने जाने पहल जैसी कितनी ही पत्रिकाओं को जन्म दिया और जाने कितने ज्ञानरंजन बनने की कोशिशों में हिन्दी को बेहतरीन साहित्यकार मिले।
ज्ञानरंजन की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने हिन्दी में “पत्रिका” को महज़ रचनाएँ छापने वाली फाइल न रहने देकर उसे जागरूक वर्ग-चेतना, विश्व दृष्टि और सौंदर्यबोध का जीवित मंच बनाया। उन्होंने वामपंथी संगठनों की संकीर्णता से दूरी रखते हुए भी मार्क्सवादी दृष्टि की ज़मीन नहीं छोड़ी, उन्होंने उसके फ़लक को वैज्ञानिक विस्तार दिया और जरख़ेज़ भी बनाया। विविध धाराओं जैसे प्रगतिशील, जनवादी, उग्र, नरम, प्रयोगधर्मी आदि सबको एक बड़ी, बहसयोग्य, जटिल परंतु दीर्घकालिक परियोजना में जोड़ दिया। इसलिए ज्ञानरंजन का महत्व सिर्फ़ इस बात में नहीं है कि उन्होंने हिन्दी को विश्वस्तरीय पत्रिका दी; असल बात यह है कि उन्होंने दिखा दिया कि एक अकेला लेखक, अपनी निजी रचनाशीलता की कीमत पर भी पूरी पीढ़ियों के लिए बौद्धिक और राजनीतिक “इन्फ्रास्ट्रक्चर” तैयार कर सकता है और मारक हमलों, झूठे आरोपों और बाज़ार-संस्कृति की लहरों के बीच भी अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटता। यही “पहल” की और ज्ञानरंजन की ऐतिहासिकता है।


